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मनोरंजन / शौर्यपथ / कॉमेडियन जॉनी लीवर की अभिनेता की बेटी जेमी लीवर बॉलीवुड में फैले पक्षपात और भाई-भतीजावाद के बहस पर अपना रिएक्शन दिया है। खुद एक स्टार किड होने के नाते उनका यह मानना है कि सभी स्टार किड्स को जन्म के विशेष अधिकारों के श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है क्योंकि बहुत से लोग अपने दम और अपने हुनर की वजह से बॉलीवुड में टिके हुए हैं। उनका कहना है कि बॉलीवुड में पक्षपात और भाई-भतीजावाद कीवर्ड नहीं है।
मिड डे से बात करते हुए जेमी ने कहा कि मेरा मानना है कि सभी का अपना-अपना सफर है और मैं तुलना का कोई कारण नहीं देखती। सभी का अपना-अपना संघर्ष है। वह कहती हैं कि मैं खुद एक स्टार किड हूं, लेकिन जरूरी नहीं है कि आज जो लोग बॉलीवुड नेपोटिज्म की बात कर रहे हैं वह सभी स्टार किड्स पर लागू हो। क्योंकि बहुत से ऐसे स्टार किड्स हैं जिनके पास स्टार किड प्रिवलेज नहीं है। मेरे सफर ये बात तो बिल्कूल भी लागू नहीं होती है क्योंकि जहां मैं हूं वहां पक्षपात नहीं है, वहां कोई भाई-भतीजावाद नहीं है, वहां कुछ खास लोगों का पक्षपात है। जेमी ने आगे कहा कि उन्होंने कभी भी अपने पिता के नाम का इस्तेमाल ऑडिशन के लिए नहीं किया। उन्होंने कहा कि पिता जॉनी ने कभी उनके कोई फोन नहीं किया।
अपने पिता जॉनी लीवर के काम करने की खूबी और फिल्म इंडस्ट्री में उनकी स्थिति के बारे में बताते हुए जेमी कहती हैं कि मेरे पिताजी ने अपना काम अपनी नौकरी के रूप में किया है, उन्होंने इसे अपना जीवन नहीं बनाया। वह काम पर गए, अपनी फिल्मों के लिए शूटिंग की और घर वापस आए, यही उनकी असली जिंदगी थी। उनका वास्तविक जीवन जो उनका परिवार था, उनके दोस्त, उनकी आध्यात्मिकता। हम कभी किसी फिल्मी पार्टियों का हिस्सा नहीं थे, हम कभी नहीं गए, हम कभी किसी समूह का हिस्सा नहीं थे। मेरे पिता कभी फिल्मी नहीं थे, मेरी मां, जैसा कि मैंने कहा, बहुत विनम्र बैकग्राउंड से आई थीं।
नजरिया / शौर्यपथ कोरोना वायरस की वजह से करीब चार माह के व्यवधान के बाद इंग्लैंड और वेस्ट इंडीज के बीच टेस्ट मैच की शुरुआत के साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की वापसी हो गई। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच 13 मार्च को सिडनी मैदान पर बिना दर्शकों के मैच खेले जाने के बाद से यह पहला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच है। क्रिकेट की वापसी होने के बाद अब निगाहें इस साल के आखिर में ऑस्ट्रेलिया में होने वाले टी-20 विश्व कप के स्थगन और आईपीएल के आयोजन की घोषणा पर लग गई हैं। आईसीसी बोर्ड की इस हफ्ते के अंत में होने वाली बैठक में विश्व कप के स्थगन की घोषणा तय मानी जा रही है। इसकी वजह क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया का अब इससे ध्यान हटाकर सितंबर मध्य में इंग्लैंड के साथ लिमिटेड ओवरों की सीरीज आयोजित करने पर ध्यान केंद्रित करना है। कोरोना की वजह से ज्यादातर क्रिकेट बोर्डों की आर्थिक तौर पर कमर टूट चुकी है और वे खिलाड़ियों की फीस में खासी कटौती कर चुके हैं। इसलिए दुनिया के ज्यादातर क्रिकेटर हमेशा से टी-20 विश्व कप की जगह आईपीएल के आयोजन के पक्षधर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इसमें भाग लेना उनकी माली हालत को सुधार सकता है।
अब सवाल यह है कि बीसीसीआई को यदि टी-20 विश्व कप की विंडो मिल भी जाती है, तो क्या वह अपने यहां इस टी-20 लीग को आयोजित करने की स्थिति में भी है? देश में कोरोना वायरस के लगातार पैर पसारने से तो नहीं लगता कि यहां इस समय आईपीएल आयोजन की स्थिति है और साल के आखिर तक इन हालात में बदलाव की भी संभावना नजर नहीं आ रही है। सभी क्रिकेट बोर्ड इस बात को अच्छे से जानते हैं कि आईपीएल का आयोजन करने से कोरोना के कारण बिगड़ी आर्थिक हालत पटरी पर आ सकती है। संयुक्त अरब अमीरात और श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड तो पहले ही आईपीएल के आयोजन अपने यहां कराने का प्रस्ताव बीसीसीआई को भेज चुके हैं। अब इसमें नया नाम न्यूजीलैंड क्रिकेट बोर्ड का भी जुड़ गया है। न्यूजीलैंड कोरोना से मुक्त होने वाला पहला देश भी है। अब यह बीसीसीआई को तय करना है कि साल 2009 की तरह क्या इस बार भी आईपीएल का आयोजन विदेश में किया जाए?
इसमें कोई दो राय नहीं है कि न्यूजीलैंड में आईपीएल दर्शकों के साथ आयोजित किया जा सकता है, लेकिन यूएई और श्रीलंका में इसे आयोजित करने पर यह बात पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती। लेकिन न्यूजीलैंड में आईपीएल कराने के खिलाफ एक ही बात जाती है कि उसके और भारत के बीच समय में करीब साढ़े सात घंटे का फर्क है, इसलिए वहां भारतीय समयानुसार देर से देर दोपहर 12.30 बजे तक मैच शुरू कराए जा सकते हैं, लेकिन इस कारण भारत में दफ्तरों में काम करने वाले ज्यादातर लोग इन मैचों से नहीं जुड़ सकेंगे। इसके अलावा, वहां मैचों में भारतीय उपमहाद्वीप की तरह दर्शक भी नहीं जुट सकते। फिर, यूएई को 2014 में आईपीएल के कुछ मैच आयोजित करने का अनुभव है, तो श्रीलंका में आयोजन किफायती रह सकता है।
बीसीसीआई को दुनिया भर के क्रिकेट बोर्डों में सबसे अमीर माना जाता है और इसमें आईपीएल की भी अहम भूमिका है। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि वर्ष 2018 से 2022 का मीडिया राइट्स करार स्टार स्पोट्र्स से 4,087 करोड़ रुपये का हुआ है। यही नहीं, बीसीसीआई टाइटल प्रायोजक, आधिकारिक पार्टनर्स, अंपायरों के प्रायोजक व स्ट्रेटजिक टाइम आउट प्रायोजकों के जरिए भी कमाई करता है। इसी तरह, कोई जीते या हारे, खूब कमाई होती है। इन वजहों से ही इस लीग से जुड़े लोग इसे रद्द करने के पक्ष में नहीं हैं। इनका मानना है कि कोरोना की वजह से लॉकडाउन हो चुकी क्रिकेट अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है।
बीसीसीआई आईपीएल के आयोजन के संबंध में कोई भी घोषणा करने को लेकर देखो और इंतजार करो की नीति अपना रहा है। वह चाहता है कि पहले टी-20 विश्व कप के स्थगन की घोषणा हो और फिर चीनी कंपनियों के प्रायोजक होने का मामला सुलझे, उसके बाद ही आईपीएल के आयोजन को लेकर कोई घोषणा की जाए। वैसे बीसीसीआई सितंबर के आखिर से लेकर नवंबर की शुरुआत के बीच आईपीएल आयोजन करने का मन बना चुका है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)मनोज चतुर्वेदी, वरिष्ठ खेल पत्रकार
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / से अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई है, तब से देश में कोरोना मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अभी हम संक्रमितों के मामले में तीसरे सबसे बड़े देश हैं। बहुत सारे लोगों ने लॉकडाउन का मजाक उड़ाया था, परंतु अनलॉक में मरीजों की बढ़ती संख्या उन्हें माकूल जवाब दे रही है। गनीमत है कि हमारे यहां इस बीमारी के कारण मृत्यु-दर कम है, लेकिन इसका एक प्रभाव यह है कि लोग असावधान हो गए हैं। यह हाल तब है, जब स्वास्थ्य संसाधन के लिहाज से हमारी हालत बहुत अच्छी नहीं है। ऐसे में, यदि सामुदायिक संक्रमण फैलता है, तो बीमारी पर काबू पाना काफी मुश्किल हो जाएगा। इसलिए एक सच्चे नागरिक का हम फर्ज निभाएं और सुरक्षित रहने का हर तरीका अपनाएं। सजगता ही इसका निदान है।
आनंद पाण्डेय, रोसड़ा
हकीकत समझे नेपाल
आज नेपाल जिस प्रकार चीन के इशारे पर भारत को आंखें दिखाने की हिमाकत कर रहा है, उसे इसका अंदाजा नहीं है कि चीन धीरे-धीरे उस पर कब्जे की कोशिश में है। आजाद भारत में पहली बार ऐसा हुआ है कि बेटी-रोटी के संबंधों के बीच दूसरी ओर से कंटीली तारों से सीमा-रेखा खींचे जाने की बात कही गई और भारत की संप्रभुता को चुनौती देने का प्रयास किया गया। ऐसी स्थिति में भारत को ठोस कदम उठाना ही होगा। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि अपनी विस्तारवादी नीतियों के तहत चीन कई देशों की अर्थव्यवस्था पर कब्जा जमा चुका है। वह रह-रहकर हमें भी आंखें दिखाता है। ऐसे में, नेपाल को यह समझ लेना चाहिए कि चीन के प्रति दोस्ताना रवैया भविष्य में उसे परतंत्र बना सकता है। उसे अपनी संप्रभुता की रक्षा करनी चाहिए, ताकि उसका अस्तित्व स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बरकरार रहे।
बिन्नी कुमारी, सारण
पीछे लौटा चीन
वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पिछले लगभग दो महीनों से जो भारी तनाव बना हुआ था, उसमें अब काफी सुधार आया है और चीन की सेना वापस लौटने लगी है। यह एक सुखद खबर है, क्योंकि युद्ध से किसी भी देश का भला नहीं होता। भारत की जवाबी कार्रवाइयों और आर्थिक चोट के बाद चीन में यह नरमी आई है। दोनों देशों के बीच सामान्य रिश्ता बेहद जरूरी है, क्योंकि दोनों एशिया की सबसे महत्वपूर्ण ताकतें हैं। इनका आपस में टकराना इस पूरे उपमहाद्वीप में शांति के लिहाज से अच्छा नहीं होगा। इससे विश्व राजनीति पर भी असर पडे़गा। सबसे अच्छी बात यह है कि समय रहते बीजिंग को इस बात का एहसास हो गया और वह पीछे लौट गया।
शुभम पांडेय गगन
अयोध्या, फैजाबाद
विवाद बनाम व्यापार
किसी देश की अर्थव्यवस्था पर चोट करने से उसकी अकल ढीली पड़ जाती है। इसका ज्वलंत उदाहरण चीन है। वह भारत से टकराने की नीति से पीछे हट गया है। दरअसल, भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए उसके 59 एप पर पाबंदी लगा दी, साथ ही रेलवे ने चीन की कंपनियों को मिले ठेके रद्द कर दिए। हमारे इस सख्त रुख को देखकर चीन को यह बात समझ में आ गई कि भारत विवाद और व्यापार एक साथ नहीं करेगा। इसके बाद चीन पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में पीछे हटने लगा। इससे स्वाभाविक तौर पर वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बहाल हो सकेगी। इससे नेपाल के तेवर भी नरम पड़ जाएंगे। मानचित्र विवाद को उसने बेवजह ही तान दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के उकसावे में आकर वह ऐसा कर रहा है। चूंकि अब चीन को एहसास हो गया है कि भारत 1962 के दौर से काफी आगे बढ़ चुका है, इसलिए वह शायद ही हमसे टकराना चाहेगा। ऐसा होने पर नेपाल भी ढीला पड़ता जाएगा, क्योंकि उसे चीन का साथ शायद ही मिले।
राकेश चौधरी, दरभंगा, बिहार
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / कोरोना महामारी ने अमेरिकी समाज और उसके शासन से जुडे़ कई मिथकों को ध्वस्त किया है। अमेरिका की केंद्रीय आव्रजन संस्था ‘इमिग्रेशन ऐंड कस्टम्स एनफोर्समेंट’ (आईसीई) का ताजा फैसला इसका नया उदाहरण है। आईसीई ने सोमवार को फरमान सुनाया कि अमेरिका में पढ़ रहे उन तमाम विदेशी छात्रों को देश छोड़ना पड़ेगा, जिनकी यूनिवर्सिटी ने आगामी सेमेस्टरों में ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था मुकम्मल कर ली है। यदि इसके बावजूद कोई छात्र अमेरिका में टिका रहा, तो उसे जबरन बाहर किया जाएगा। जाहिर है, इस फैसले का असर लाखों विदेशी विद्यार्थियों पर पडे़गा। खासकर भारत और चीन के छात्र इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे, क्योंकि सबसे ज्यादा इन्हीं दोनों देशों के विद्यार्थियों की तादाद है। यही नहीं, उन हजारों विद्यार्थियों के आगे भी फिलहाल अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है, जो सितंबर से नए अकादमिक-सत्र में भाग लेने के लिए अमेरिका पहुंचने वाले थे।
इसमें कोई दोराय नहीं कि इस महामारी से निपटने में प्रशासनिक कमियों को लेकर अमेरिकी समाज में अंदरखाने काफी उबाल है। जल्द ही वहां राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में, ट्रंप प्रशासन अमेरिकी अवाम को अब यह दिखाना चाहता है कि उसे सिर्फ उनका ख्याल है। महामारी के बाद वह वीजा नियमों में कई बदलाव कर चुका है। मगर हकीकत यह है कि दुनिया में सबसे अधिक जान-माल का नुकसान उठाने के बावजूद अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों में कोरोना से निपटने को लेकर अब भी समन्वय की भारी कमी है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट महामारी के सवाल पर आज भी अलग-अलग नजरिया रखते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ लगातार आगाह कर रहे हैं कि अमेरिका की स्थिति बेहद गंभीर है, और यह महामारी के बीचोबीच खड़ा है, पर राष्ट्रपति ट्रंप के बेहद करीबी लोग ही संक्रमण से बचाव के मान्य उपायों का मजाक उड़ाते फिर रहे हैं। वे मास्क पहनने की अनिवार्यता की भी खिल्ली उड़ाने से बाज नहीं आ रहे, जबकि ठोस नजीर सामने हैं कि जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने कैसे मास्क और फिजिकल डिस्टेंसिंग के जरिए इस घातक वायरस के प्रसार को काबू करने में सफलता पाई है। मगर सच्ची कोशिश और प्रतीकात्मक लड़ाई अमेरिकी समाज के दोहरेपन को अक्सर दुनिया के सामने ले आती रही है। कोरोना महामारी ने एक बार फिर इसे उजागर कर दिया है।
ठीक है, हर सरकार अपने नागरिकों के हितों का ख्याल सबसे ऊपर रखती है, पर उसका यह भी फर्ज है कि अपनी भौगोलिक सीमा में दूसरे देशों के बाशिंदों के मानव अधिकारों की भी वह रक्षा करे। वैसे भी, ये विद्यार्थी शरणार्थी नहीं हैं, जिन्हें अमूमन हर देश एक बोझ समझता है। ये वे विद्यार्थी हैं, जिनसे अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने मोटी फीस वसूली है। एक ऐसे वक्त में, जब अंतरराष्ट्रीय सरहदें बंद हैं, तमाम उड़ानें रद्द हैं, ट्रंप प्रशासन को इन विदेशी छात्रों को उनके मुल्क तक सुरक्षित पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिए। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उच्च शिक्षा उद्योग का अच्छा-खासा योगदान है। उसे सालाना करीब 37 अरब डॉलर की कमाई इससे हो रही है। मुश्किल समय के ऐसे आचरण भावी विद्यार्थियों को उससे विमुख भी कर सकते हैं। बहरहाल, इस नई स्थिति में देशों और सरकारों के लिए भी एक सबक है, अपने यहां ज्यादा से ज्यादा विश्व-स्तरीय संस्थान खड़े कीजिए।
ओपिनियन / शौर्यपथ /पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी से आती खबरें सुखद हैं। चीन की सेना कई वजहों से पीछे लौटने को मजबूर हुई है। पहला कारण तो निर्विवाद रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल है। उन्होंने हालात से निपटने के लिए दोतरफा रणनीति अपनाई। एक तरफ, उन्होंने सेना का मनोबल बढ़ाया और उसके लिए आधुनिक साजो-सामान जुटाए, तो वहीं दूसरी तरफ, लेह-लद्दाख जाकर पड़ोसी देश को यह संदेश दिया कि शीर्ष स्तर पर बनी सहमति जमीन पर उतारी जाए, तो वह दोस्ती के लिए भी तैयार हैं। इसके बाद ही अजीत डोभाल को सक्रिय किया गया, जो चीन के मामलों में प्रधानमंत्री के निजी प्रतिनिधि रहे हैं।
यह सही है कि कई बार युद्ध आवश्यक हो जाता है, पर किसी भी राष्ट्र के लिए यह एकमात्र विकल्प नहीं होना चाहिए। इससे बचने के लिए अपनी आंतरिक शक्तियों को मजबूत करना आवश्यक है। भारत ने भी यही किया। हमने आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाए, साथ ही वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अपना योगदान बढ़ाना शुरू किया। एक बड़ा उपभोक्ता बाजार हमारे हित में है ही। लिहाजा, चीन को आर्थिक चोट पहुंचाने की शुरुआत हुई। फिर तो, अन्य देश भी खुलकर हमारे साथ आ गए और बीजिंग की आलोचना करने लगे, जबकि शुरुआत में इन देशों ने 20 भारतीय सैनिकों के बलिदान पर महज शोक जताया था।
हालांकि, चीनी नेतृत्व की भी तारीफ करनी चाहिए। उसने सही समय पर अपने कदम पीछे खींचे हैं। बीजिंग ने यह फैसला तब किया, जब वहां का मीडिया बार-बार 1962 के संघर्ष की याद दिला रहा था और कूटनीतिज्ञ पाकिस्तान और नेपाल के रास्ते नई दिल्ली को घेरने की रणनीति बनाने में मशगूल थे। मगर भारत सरकार ने आपसी मतभेद खत्म कराने में आखिरकार सफलता हासिल कर ली।
अब सवाल यह है कि आगे की क्या रणनीति बनाई जाए? एक आशंका यह भी है कि कहीं 1962 तो नहीं दोहराया जा रहा, क्योंकि उस वर्ष भी पीछे लौटकर चीन ने हम पर हमला बोला था? मगर मैं इससे इत्तफाक नहीं रखता। हमने इस बार चीन की आंखों में आंखें डालकर उसे पीछे हटने को मजबूर किया है। फिर भी, हमें सजग और सावधान रहना होगा।
हमारा फायदा इसी में है कि सेना को बैरकों में रहने दिया जाए। सीमा पर बेवजह की उसकी तैनाती भय का माहौल बनाएगी। मगर इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास-कार्य रोक दिए जाएं। वहां न सिर्फ बुनियादी ढांचे का निर्माण और आर्थिक विकास जरूरी है, बल्कि स्थानीय लोगों को भावनात्मक और आर्थिक रूप से शेष भारत से जोड़ना भी आवश्यक है। इस बाबत पहले की सरकारों ने उचित प्रयास नहीं किए, जिसके कारण हमारे कई क्षेत्रों पर पड़ोसी देशों का कब्जा है। इससे वैश्विक मंचों पर गलत संदेश जाता है। हमारी सदाशयता हमारी कमजोरी समझ ली गई है।
ऐसे संदेश कितने खतरनाक होते हैं, इसका पता पहले और दूसरे विश्व युद्ध से चलता है। इन दोनों महासमर की शुरुआत तब हुई, जब एक पक्ष को दूसरा कमजोर महसूस होने लगा। जब ऐसी सोच हावी हो जाती है, तो फिर संघर्ष स्वाभाविक तौर पर पैदा हो जाता है। ईरान-इराक युद्ध का भी यही संदेश है। अच्छी बात है कि इस बार भारत धारणा की जंग में मजबूत होकर उभरा है। पिछले पांच-छह वर्षों में हमने न सिर्फ पड़ोसी देशों के तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास-कार्य किए हैं, बल्कि उनकी उकसाने वाली कार्रवाइयों को उसी की भाषा में जवाब भी दिया है।
मौजूदा तनातनी का अंत एक नई उम्मीद को जन्म दे रहा है। हम बीजिंग को यह एहसास दिलाने में सफल हुए हैं कि विश्व के आर्थिक विकास में अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटना उचित नहीं। एशिया की शांति भी हमारी दोस्ती पर ही निर्भर है। इसमें हम कितना सफल हो पाते हैं, इसका जवाब तो आने वाले दिनों में मिलेगा, पर विश्व में सकारात्मक योगदान की हमारी उम्मीदें कुछ जरूरी काम करने के बाद पूरी हो सकती हैं।
इसमें सबसे पहला काम तो सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी बढ़ाना है। इसके लिए वहां इन्फ्रास्ट्रक्चर, यानी बुनियादी ढांचे का निर्माण जरूरी है। आंतरिक ताकतों को मजबूत किए बिना हम बाहरी शक्तियों का मुकाबला नहीं कर सकते। दूसरा, हमें आतंकवाद के खिलाफ तमाम देशों को एक करना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है, ताकि पाकिस्तान जैसे आतंकवाद के मददगार देश किसी अन्य राष्ट्र द्वारा इस्तेमाल न हो सकें। तीसरा काम है, चीन की विस्तारवादी नीतियों का विरोध। बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) में शामिल न होकर भारत ने इसकी शुरुआत पहले ही कर दी है। चौथा, पड़ोसी देशों के साथ चीन के व्यवहार का मूल्यांकन। दरअसल, दक्षिण चीन सागर सहित चीन का कई राष्ट्रों के साथ सीमा विवाद है। हांगकांग का मसला भी काफी गंभीर है। चीन का इन देशों के प्रति बदलता रुख हमें कई संदेश दे सकता है। अगर बदलाव सकारात्मक आते हैं, तो यह माना जा सकता है कि चीन का नेतृत्व नई सोच का हिमायती है। और अगर ऐसा नहीं होता, तो हमें सावधान रहना होगा, क्योंकि गलवान घाटी में पीछे हटना चीन का छलावा भी हो सकता है।
चीन के भीतरी हालात पर भी हमें नजर रखनी होगी। ऐसी चर्चा गरम है कि बीजिंग के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व में मतभेद गहरा रहे हैं। चीन बेशक कम्युनिस्ट समाज है, पर वहां कन्फ्यूशियसवाद हावी है। इस तरह के समाज में अच्छे काम करने वालों की तारीफ होती है, तो विफल होने पर उसकी जमकर लानत-मलामत भी की जाती है। लिहाजा, अपनी छवि चमकाने के लिए सियासी और सैन्य नेतृत्व अलग-अलग राह पकड़ सकते हैं। जरूरी यह भी है कि हम भी अपने आंतरिक मतभेदों से ऊपर उठें। पहले पाकिस्तान जैसे देश हमारे मनमुटावों का फायदा उठाते थे, अब बीजिंग इससे लाभ कमाना चाहता है। उसे यह मौका नहीं मिलना चाहिए।
इसमें आत्मनिर्भरता की नीति हमारे लिए काफी कारगर साबित हो सकती है, मगर इसे लेकर हमें संकीर्ण नजरिया नहीं रखना चाहिए। हमारी आत्मनिर्भरता संरक्षणवाद का पोषक नहीं बननी चाहिए। ऐसी नीति हमारी कई कमजोरियों को बेपरदा कर सकती है। इससे हम पर कई तरह के दबाव बनने लगेंगे, जिनसे हमारे हितों को चोट पहुंच सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)शशांक, पूर्व विदेश सचिव
दुर्ग / शौर्यपथ / बार-बार अपील करने के बाद भी आम जनता द्वारा घरों से कचरा नाली और सड़क पर डाला जा रहा है । एैसे ही आज निगम आयुक्त इंद्रजीत बर्मन द्वारा शंकर नगर वार्ड भ्रमण के दौरान पाया कि शंकर नगर निवासी श्रीमती प्रभा सोनी द्वारा अपने घर से कचरा निकालकर सड़क और नाली के बीच डाल दिया गया। आयुक्त द्वारा उनकी मोबाइल से फोटो खिच ली गई । उन्होनें स्वास्थ्य अधिकारी को निर्देशित कर कहा उक्त महिला से जुर्माना लेकर उनसे कचरा वापस उठवाईये। स्वास्थ्य विभाग की टीम स्वास्थ्य अधिकारी दुर्गेश गुप्ता, एवं स्वच्छता निरीक्षक मेनसिंग मंडावी, दरोगा राजू सिंह आदि ने श्रीमती प्रभा सोनी के घर पहुॅचे और उन्होनें कचरा बाहर नहीं फेकने की हिदायत देते हुये, उनके द्वारा फेके गये कचरे के लिए 200 रुपये जुर्माना लेकर फेके गये कचरे को प्रभा सोनी से वापस उठवाया गया ।
दुर्ग / शौर्यपथ / नगर पालिक निगम दुर्ग का जांच दल ने रोका-छेका अभियान के अंतर्गत अस्पताल वार्ड, पोलसायपारा, केलाबाड़ी, राजीव नगर, सुराना कालेज वार्ड, और पचरीपारा वार्ड में घर-घर जाकर मवेशियों की जांच किये। मवेशी बाहर छोडऩे और वार्ड में गंदगी करने पर 6 मवेशी मालिकों के खिलाफ कार्यवाही करते हुये सभी को 10-10 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया। अभियान के तहत् प्रभारी बाजार अधिकारी थान सिंह यादव, अतिक्रमण प्रभारी शिव शर्मा, सहा0 राजस्व अधिकारी प्रकाधर दीवान की टीम द्वारा कार्यवाही की गई।
दुर्ग / शौर्यपथ / भाजपा चंडी शीतला मंडल के अंतर्गत आने वाले वार्ड क्रमांक 7 के लुचकी तलाब शिक्षक नगर पानी टंकी एवं 9 खाम तलाब की मौजूदा जीर्ण-शीर्ण अवस्था एवं गंदगी को देखते हुए मंडल अध्यक्ष चंद्रशेखर चंद्राकर के नेतृत्व में जिलाधीश के नाम उपस्थित अधिकारी को ज्ञापन सौंपा । इस दौरान प्रमुख रुप से पूर्व मंडल अध्यक्ष नरेंद्र बंजारे सह मीडिया प्रभारी राजा महोबिया उपस्थित रहे जिलाधीश को ज्ञापन सौंपने के दौरान उचित कदम नहीं उठाने जाने पर मंडल के जनप्रतिनिधियों सहित पार्टी के कार्यकर्ता आम जनमानस के साथ उग्र आंदोलन किया जाएगा
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
