August 02, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

    मेरी कहानी / शौर्यपथ / वह रक्त में कुछ खोज रहे थे। दिन-रात रक्त चिंतन करते अध्ययन की गहराई में उतर गए थे। जानते थे कि रक्त में कुछ है, लेकिन बहुत गौर करने पर भी सिवाय उसकी लालिमा के कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता था। प्रयोगशाला में सैकड़ों नमूने जुटा लिए, सब रक्त एक समान लाल ही तो हैं, तो फिर ऐसा क्यों होता है कि किसी के शरीर में रक्त जाकर कामयाब हो जाता है और किसी की मौत हो जाती है। खून समान है, तो फिर क्यों होती है मौत? 32 की उम्र थी, लेकिन हजारों पोस्टमार्टम कर चुके थे, हर जगह यही खोज रहती थी कि आखिर रक्त का रहस्य क्या है? वह रह-रहकर बेचैन हो जाते, देर तक माइक्रोस्कोप के जरिए रक्त में झांकते रहते थे। उन दिनों ईसा का कैलेंडर बीसवीं सदी की दहलीज पर पहुंच चुका था। इंसानी सभ्यता को आगे बढ़ते इतनी सदियां बीत गई थीं, लेकिन लोग तब भी यही मानते थे कि इंसानों का खून दो तरह का होता है- अच्छा खून और गंदा खून। अच्छा खून निरोग रखता है, बेहतर इंसान गढ़ता है और गंदा खून बीमार कर डालता है, दुर्जन बनाता है। अच्छे लोगों में अच्छा खून और बुरे लोगों में गंदा खून रहता है, पर यह एक ऐसी सतही दलील थी, जो डॉक्टर को पचती नहीं थी। अत: यह जरूरी था कि रक्त को ढंग से पकड़कर उसका सही पता पूछा जाए।
    और वो लम्हा आया, जब उन्होंने रक्त को नए नजरिये से कसौटी पर कसना शुरू किया। साल 1900 चल रहा था। जांचते-परखते एक दिन प्रयोगशाला में रक्त का राज खुलना शुरू हुआ। कमाल हो गया। ‘क’ लाल कोशिकाओं को ‘ख’ रक्त सेरम (रक्तोद) बूंदों से मिलाया, तो तत्काल रक्तकण एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था हो गए, परस्पर दो-दो हाथ कर बैठे। रक्त के थक्के या गुच्छे बन गए, उनकी सहजता खत्म हो गई। दूसरी ओर, जब ‘क’ लाल कणों के साथ ‘ग’ सेरम बूंदों को मिलाया, तो दोनों ऐसे मिले, मानो कभी जुदा न थे।
    डॉक्टर ने इस प्रयोग को दर्ज किया और सेहत की दुनिया में कायापलट के संकेत मिल गए। लेकिन साथियों ने कहा कि रक्त कणों का गुत्थमगुत्था होना किसी रोग का लक्षण है। जिससे रक्त लिया गया है, उसे कोई रोग होगा। फिर चुनौती मिली, तो डॉक्टर ने सेहतमंद लोगों के नमूने जुटाने शुरू किए। रक्त से रक्त का मेल कराने-जांचने का जुनून फिर प्रयोगशाला में नुमाया हुआ। फिर वही बात सामने आई, कुछ रक्त मिले, तो लड़कर खुद को ही बर्बाद कर गए और कुछ मिले, तो एक-दूजे के हो गए। नतीजे कड़ी-दर-कड़ी जुड़ते गए। बीमारी से थक्कों का कोई लेना-देना नहीं। जो रक्त परस्पर मिल नहीं रहे, वे लड़कर नष्ट हो जा रहे हैं। जो मिल रहे हैं, वे एक समान हैं। मतलब, सबका रक्त एक जैसा नहीं है। इन नतीजों से ही एक प्रश्न फूटा, तो फिर रक्त के कितने प्रकार हैं?
    रक्त के रहस्य के पीछे जुनूनी डॉक्टर साहब फिर जुट गए। सैकड़ों नमूनों की जांच की, माइक्रोस्कोप में डाला और घंटों निहारा, परखा, दर्ज किया। सफलता पुकारने लगी, तो पूरी टीम को लगा दिया और दुनिया को बताया कि तीन तरह के रक्त समूह हैं- ए, बी और सी (बाद में सी ही ओ कहलाया)। अगले साल एक और नया रक्त समूह ‘एबी’ हाथ लग गया। डॉक्टर ने रक्त के मिलान या आदान-प्रदान का एक चार्ट बना दिया कि कौन-सा रक्त किससे मिल सकता है। रक्त का पूरा सच जान लेने का जुनून ऐसा था कि अभी भी संतोष न था, रक्त के मेल में समस्याएं आ ही रही थीं, तो समाधान के लिए एक अन्य वैज्ञानिक के साथ मिलकर आरएच फैक्टर की खोज हुई। रक्त का माइनस और प्लस तय हुआ। दुनिया शोध के स्तर पर जान गई कि आठ प्रकार के रक्त चार समूहों में होते हैं।
    रोग प्रतिरक्षा विज्ञान के महारथी डॉक्टर कार्ल लेंड्सटेनर आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। पोलियो वायरस की खोज सहित अनेक आविष्कारों में उनका अतुलनीय योगदान है। अपराध विज्ञान को भी उन्होंने सशक्त किया। उन्होंने बताया कि किसी भी सूखे रक्त की जांच से भी उसका समूह व प्रकार बताया जा सकता है, जिससे पीड़ित या अपराधी की पहचान में सुविधा हो सकती है।
    डॉक्टर कार्ल लगातार रक्त के रहस्य को खोलते रहे। उनके आविष्कार की वजह से आगे चलकर रक्तदान के तौर-तरीके पुख्ता हुए। ब्लड बैंक की स्थापना संभव हुई। प्रथम विश्व युद्ध जब छिड़ा, तो हजारों सैनिक कार्ल की खोज की वजह से ही रक्तदान का लाभ लेकर सकुशल घर लौटे। उन्हें 1930 में नोबेल से सम्मानित किया गया। शोध के लिए खुद को समर्पित कर देने वाले इस महान डॉक्टर के जन्मदिन 14 जून को विश्व रक्तदाता दिवस मनाया जाता है। बताते हैं कि जब उनकी मौत हुई, तब भी उनकी उंगलियों में एक परखनली थी। शायद दुनिया से जाते हुए भी वह रक्त में देख लेना चाहते थे और कुछ।
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय कार्ल लेंड्सटेनर नोबेल से सम्मानित डॉक्टर

     

    नजरिया / शौर्यपथ / ‘जान है, तो जहान है’ से होते हुए हमारी लड़ाई अब ‘जान भी, जहान भी’ तक पहुंच गई है। कोविड-19 के खिलाफ इस लड़ाई में सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं एकजुट होकर जो काम कर रही हैं, वह अपने आप में प्रशंसनीय है। ऐसे में, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् यानी आईसीएमआर की भूमिका स्वत: महत्वपूर्ण हो गई है। यह संस्था अपनी पूरी शक्ति से इस प्रयास में लगी हुई है कि जल्द से जल्द इस महामारी से निजात पाई जा सके। शुरुआत में वायरस संक्रमण पूरी तरह काबू में था, मगर लॉकडाउन खुलने की वजह से मामलों में वृद्धि हो गई। लॉकडाउन का एक मकसद यह भी था कि दूरदराज के इलाकों में चिकित्सा और जांच की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। लिहाजा, अस्पतालों में बेहतर सुविधाएं मुहैया करवाई गईं, जरूरी उपकरणों और ऑक्सीजन का इंतजाम किया गया। विभिन्न इलाकों में आइसोलेशन और क्वारंटीन की व्यवस्था की गई। इन सबसे संक्रमण को रोकने में काफी मदद मिली। मगर, सच यह भी है कि कोरोना ने गांव, गरीब और मजदूरों को सबसे अधिक प्रभावित किया है, जिसके कारण प्रवासियों का जो पलायन शुरू हुआ, उसमें कामगार, श्रमिकों की संख्या काफी अधिक रही। प्रवासियों के कारण संक्रमण का दायरा और संक्रमितों की संख्या, दोनों ही बढ़े। ऐसे में, यह जरूरी था कि देश के हर शहर में कोरोना का टेस्ट हो।
    हालात की गंभीरता का संज्ञान लेकर ही प्रधानमंत्री ने शीघ्र फैसला लेते हुए एक के बाद एक राहत पैकेज की न केवल घोषणा की, बल्कि उन्हें हकीकत की जमीन पर उतारा भी। केंद्र के राहत अभियान को राज्य सरकारों ने अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मसलन, उत्तर प्रदेश में, जो आबादी के हिसाब से देश का सबसे बड़ा राज्य है, एक लाख बेड तैयार कर लिए गए हैं। मार्च की शुरुआत में वहां मात्र एक लेबोरेटरी थी, जो आज बढ़कर 33 हो गई हैं और जिनको आईसीएमआर की देख-रेख में संचालित किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में अब हर रोज 15 हजार से भी अधिक टेस्ट हो रहे हैं, जिनको जून के अंत तक 20 हजार प्रतिदिन कर लिया जाएगा। मध्य प्रदेश सरकार ने भी इन योजनाओं को एक अभियान का रूप देकर कोरोना के खिलाफ जंग में अपना अहम योगदान दिया है। आज की तारीख में देश भर में 50 लाख से अधिक लोगों की कोरोना जांच हो चुकी है और अब प्रतिदिन करीब 1.40 लाख लोगों की जांच की जा रही है।
    आईसीएमआर ने कोविड-19 के खिलाफ जंग लड़ने के लिए देश को मजबूत बनाया है। देश के सुदूर इलाकों तक कोरोना टेस्टिंग लैब की स्थापना की गई है। लेह में 18 हजार फीट की ऊंचाई पर कोरोना टेस्टिंग लैब की स्थापना करके आईसीएमआर ने अपनी कार्य-क्षमता का बेहतर नमूना पेश किया है। इस संस्था ने देश में अब तक 877 कोरोना टेस्टिंग लैब की स्थापना की है, जिनमें वे इलाके भी शामिल हैं, जहां पर यात्रा करना भी कठिन है। हर जिले में कोरोना टेस्टिंग लैब स्थापित किए जाने के लक्ष्य को आईसीएमआर का साथ मिलने से प्रदेश स्तर पर टेस्टिंग क्षमता में विस्तार हुआ है। हालांकि, मीडिया में कुछ ऐसी खबरें भी हैं कि लोगों में आरटी-पीसीआर और एलाइजा टेस्ट को लेकर भ्रांतियां हैं। एलाइजा टेस्ट दरअसल जांच के लिए नहीं, बल्कि सर्वे के लिए है। यह सर्वे इस बात के लिए किया जा रहा है कि किसी समुदाय या किसी क्षेत्र में किस हद तक बीमारी फैल चुकी है, या 15 दिन पहले तक कितनी बीमारी फैली थी। एलाइजा टेस्ट शरीर में एंटीबॉडी की जांच करता है। जिनका यह टेस्ट पॉजिटिव होता है, उनके बारे में यह कह सकते हैं कि वह व्यक्ति बीमार हुआ था, पर उसके दूसरी बार बीमार होने की आशंका नहीं है। और जो आरटी-पीसीआर टेस्ट है, वह काफी संवेदनशील है। हमने सभी परीक्षणशालाओं को दिशा-निर्देश जारी किए हैं, और उन्हीं के हिसाब से देश भर में टेस्ट हो रहे हैं।
    जाहिर है, टेस्टिंग के लिए लेबोरेटरी तैयार करने में आईसीएमआर की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। इस संस्था द्वारा प्लाज्मा थेरेपी, दवा आदि पर भी शोध किए जा रहे हैं। दवा की खोज के लिए भी हम प्रयासरत हैं। हमने वायरस को आइसोलेट करके वैक्सीन पर काम शुरू कर दिया है। बीमारी से लड़ने का काम हर स्तर पर हो रहा है और हमें लगातार इसमें सफलता भी मिल रही है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) बलराम भार्गव, महानिदेशक, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद्

     

     

    सम्पादकीय लेख /शौर्यपथ / कोरोना के समय भी नकारात्मक कूटनीति के लिए मौका निकाल लेना बेहद अमानवीय और शर्मनाक है। पाकिस्तान 31 मई के बाद से ही अपने यहां स्थित भारतीय दूतावास के अधिकारियों-कर्मचारियों को परेशान करने में जुटा था। सोमवार को यह सूचना भी आ गई कि दो भारतीय दूतावासकर्मी लापता हैं। जो पाकिस्तानी खुफिया बल इस्लामाबाद में भारतीयों को कभी अकेला नहीं छोड़ता, वह उनकी तलाश की कोशिश का दावा कर रहा है। पाकिस्तान का भारतीयों के प्रति जैसा निर्मम व्यवहार रहा है, उसे देखते हुए भारत को कड़ा रुख अपनाना ही चाहिए। कोरोना के समय में पहली बार नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास के प्रभारी अधिकारी को बुलाकर यथोचित आपत्ति दर्ज कराई गई है। इतिहास में हम देख चुके हैं, पाकिस्तान भारतीयों को पकड़कर उन पर झूठे आरोप मढ़ने की भी साजिश करता रहा है। नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय को ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास को भी सचेत रहना होगा। अपने लोगों की सुरक्षा के लिए हर संभावना को टटोलना चाहिए और आगे के लिए सावधान रहना चाहिए।
    पाकिस्तान के ऐसे व्यवहार की वजह है। 31 मई को ही दो पाकिस्तानी दूतावासकर्मियों को भारत छोड़ने का फरमान सुनाया गया था। ये दोनों पाकिस्तानी एक भारतीय से दस्तावेज लेते और बदले में पैसे व फोन देते पकडे़ गए थे। पकडे़ जाने पर इन्होंने खुद को भारतीय नागरिक बताया, लेकिन पूछताछ में उनकी कलई खुल गई। उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। कूटनीति में बदला बहुत चलता है, जिसमें पाकिस्तान शुरू से माहिर है। दोनों भारतीयों को अगर बदला लेने की मंशा से गायब किया गया है, तो इसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम है। येन-केन-प्रकारेण बदला लेने की यह प्रवृत्ति कतई सभ्य नहीं है। इसमें जो बदनामी होती है, उसकी परवाह अब पाकिस्तान को करनी चाहिए। कोई भी देश अपने यहां किसी दूसरे देश के जासूस को स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन किसी सामान्य दूतावासकर्मी को परेशान करना कूटनीतिक धर्म या विधान के किसी पैमाने पर तार्किक या न्यायपूर्ण नहीं है। बहुत दुखद है, कोरोना के समय भी घुसपैठ की कोशिशें जारी हैं, आतंकी हमले जारी हैं। चीन की ओर से जमीन का विस्तार जारी है? नेपाल की ओर से नक्शा बदल जारी है? केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सही कहा है कि हम चीन या पाकिस्तान से जमीन नहीं चाहते, केवल शांति चाहते हैं? वाकई भारत ने कभी किसी की जमीन पर नया या अनर्गल दावा नहीं किया, जो उसका हिस्सा है, उसी की रक्षा के बारे में वह सोचता रहता है।
                                          हमें हर कोण से सोचना होगा। पिछले एक महीने से देश के खिलाफ कुछ पड़ोसी देशों की जो सक्रियता बढ़ी है, कहीं वह भारतीय कूटनीति में इन दिनों दिखती शिथिलता का परिणाम तो नहीं है? भारत कहीं फिर से अपने शत्रुओं का सॉफ्ट टारगेट तो नहीं बन रहा? भारत को अपनी परंपरागत अच्छाई और संवाद से ही अपनी कूटनीतिक समस्याओं का समाधान करना होगा। जैसे को तैसा की नीति ओछी होती है और उसे भलमनसाहत व अच्छाई से ही माकूल जवाब मिलता है। गले मिलना अच्छा है, पर उससे पहले सामने वाले के आस्तीन में देख लेना चाहिए। अफसोस, दक्षिण एशिया में ऐसे पड़ोसी, ऐसे नेता हैं, जो महामारी के दुखद समय में भी घात लगा सकते हैं, इसलिए सावधान रहिए।

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / फिल्म ‘छिछोरे’ में एक पिता आत्महत्या करने की कोशिश करने वाले अपने बेटे को अवसाद से उबारते हुए कहते हैं, ‘अगर जिंदगी में सबसे अधिक कुछ जरूरी है, तो वह है, खुद की जिंदगी’। इस डायलॉग को कहने वाले रील लाइफ के अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत खुद को असली जिंदगी के अवसाद से उबार न सके। आखिर क्यों? जब हमें काफी मेहनत के बाद सफलता मिलती है, तो हम उस सफलता के इतने दीवाने हो जाते हैं कि जरा-सी असफलता भी हमें अंदर से तोड़ देती है। इस तरह की असफलता हमें अवसाद की ओर ले जाती है। संयुक्त परिवार न होना हमारे अकेलेपन पर हावी हो जाता है, जिसके कारण हम इतने परेशान हो जाते हैं कि अपनी सबसे कीमती जिंदगी भी स्वयं समाप्त कर देते हैं। अवसाद में डूबे इंसान के लिए अकेलापन जानलेवा होता है। इस समय हमें सबसे अधिक अपनों की जरूरत होती है, जो हमारा ख्याल रख सके। अपने सहयोगी कर्मचारियों के होने के बावजूद प्यार और ख्याल रखने वाले अपनों की कमी ने शायद सुशांत सिंह राजपूत को हमसे दूर कर दिया।
    आनंद पाण्डेय, रोसड़ा

    रक्तदान की जरूरत
    रविवार को पूरी दुनिया ने रक्तदान दिवस मनाया। मगर रक्तदान का दिन तो हर रोज है, क्योंकि हर पल, किसी न किसी के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण होता है। जरूरतमंद को रक्त मिल जाए, तो उसकी जान बचाई जा सकती है। लेकिन आज की सच्चाई यह भी है कि रक्तदान करने से कई पढ़े-लिखे लोग भी डरते हैं। इससे जुड़ी कई भ्रांतियां हमारे समाज में मौजूद हैं, जिनको दूर करना बहुत जरूरी है। इसके साथ ही ब्लड बैंक की उपलब्धता भी हर जगह होनी चाहिए। हर गांव-हर शहर में ब्लड बैंक का जाल होना आवश्यक है। अगर ऐसा होता है, तो रक्तदान करने लोग स्वयं आगे आ सकेंगे और आपात स्थितियों में किसी को भी खून की कमी से नहीं जूझना होगा। सिर्फ रक्तदान दिवस मनाने से कुछ नहीं होगा, रक्तदान के प्रति जागरूकता फैलाने का प्रयास भी सरकारों को करना होगा।
    प्रदीप कुमार दुबे, देवास, मध्य प्रदेश

    बॉलीवुड पर ग्रहण
    इस साल लगता है, बॉलीवुड को ग्रहण लग गया है। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत दुनिया को अलविदा कह गए। अभी कुछ दिनों पहले ही इरफान खान और ऋषि कपूर ने भी हमसे विदाई ली थी। साफ है, कोरोना काल में न जाने कितनी विपदाएं आई हैं और न जाने कितना कुछ देखना बाकी है। बहरहाल, सुशांत सिंह की मौत का रहस्य शायद ही सामने आ पाए, लेकिन इससे पता चलता है कि बॉलीवुड में हंसते-मुस्कराते चेहरे के पीछे भी कई गहरे राज छिपे होते हैं। जिंदगी में सब कुछ मिलने के बाद भी कोई कलाकार जीवन से नाखुश हो सकता है। इतना सुलझा, शांत और सादगी भरा जीवन जीने वाला इंसान इतना अकेला कैसे हो गया, और दुनिया को इसका पता भी नहीं चल सका, ताकि उसका हाथ थामकर उसे तनाव से बाहर निकाल लिया जाता? ग्लैमर की दुनिया का शायद अलग ही दस्तूर है, जो आम आदमी कतई नहीं समझ सकता।
    संजय कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड

    लापरवाह तंत्र
    कोरोना से संक्रमित लोगों की सारी उम्मीदें अस्पताल और डॉक्टरों द्वारा हो रहे इलाज पर टिकी हैं। लेकिन यह अफसोस की बात है कि अस्पतालों में मरीजों को जो सुविधाएं मिलनी चाहिए, वे उन्हें नहीं मिल रही हैं। वहां मरीजों की संख्या के हिसाब से बेड कम हैं और साफ-सफाई पर भी कुछ खास ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में, सवाल यह है कि क्या अस्पतालों की इस कुव्यवस्था को दूर करने के लिए सरकार कोई सख्त कदम उठाएगी? डॉक्टर, नर्सें और पैरा मेडिकल स्टाफ, जो दिन-रात कोरोना संक्रमित मरीजों के इलाज में जुटे हुए हैं, उनकी सेहत और सुरक्षा पर भी ध्यान देना जरूरी है।
    मिताली, नई दिल्ली

    ओपिनियन / शौर्यपथ /कुछ वाक्य इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। वे किसी एक व्यक्ति द्वारा बोले जरूर जाते हैं, लेकिन दर्ज हो जाते हैं मनुष्यता के स्मृति-पटल पर और बीच-बीच में कौंध उठते हैं मानव उपलब्धियों या असफलताओं को रेखांकित करने के लिए। मित्र द्रोही ब्रूटस के खंजर के सामने खड़े जूलियस सीजर ने अविश्वास आंखों में भरकर पूछा था, तुम भी ब्रूटस! महाभारत में युद्ध के बीच संशय पैदा करने वाला युधिष्ठिर का एक वाक्य - अश्वत्थामा मारा गया... सुनकर महारथी, लेकिन उस क्षण सिर्फ एक पिता द्रोणाचार्य ने अपना धनुष जमीन पर टिका दिया। चंद्रमा पर पहला कदम रखते हुए नील आर्मस्ट्रांग के मुंह से निकला- इंसान का एक छोटा कदम, पर मानव जाति की एक लंबी छलांग।
    ये और ऐसे ही कई वाक्य हमारी स्मृतियों में दर्ज हैं। ऐसा ही एक वाक्य अमेरिका के मिनेसोटा में पुलिस के घुटनों तले दबी गरदन वाले जॉर्ज फ्लॉयड ने छटपटाते हुए कहा था- आई कांट ब्रीद -मेरा दम घुट रहा है। अमेरिकी पुलिस निहत्थी लड़ाई में विरोधी को काबू में करने के लिए जमीन पर पटककर चोकहोल्ड दांव लगाती है, जिसमें उसका सिर घुटनों से दबाया जाता है।
    इस बार जो सिर घुटने के नीचे था, वह एक अश्वेत का था, इसलिए दबाव सिर्फ एक मजबूत जिस्म का नहीं था, बल्कि उसमें वह सारी नस्लीय घृणा भी शरीक थी, जो किसी काले व्यक्ति के प्रति गोरों के मन में भरी होती है। तकनीक ने एक भयानक फिल्म पूरी दुनिया को दिखा दी - एक मध्यवय का अश्वेत आदमी एक हट्टे-कट्टे श्वेत पुलिसकर्मी के घुटने के नीचे दबा हुआ है और यह बताने की कोशिश कर रहा है कि वह सांस का मरीज है और उसका दम फूल रहा है। यह तो उसकी मृत्यु के बाद पता चला कि वह कोरोना से भी संक्रमित था। लोगों को याद आया कि साल भर पहले भी एक और अश्वेत व्यक्ति की इन्हीं परिस्थितियों में मृत्यु हुई थी और वह भी इसी तरह गिड़गिड़ा रहा था। लेकिन इस बार के वाक्य आई कांट ब्रीद की ध्वनियां अमेरिका, यूरोप, हर जगह गूंजने लगी।
    लोगों ने समवेत स्वर में गाना शुरू कर दिया, आई कांट ब्रीद। लोगों का दम इस नस्लभेदी व्यवस्था में घुट रहा था। इस बार उनके हाथों में तख्तियां थीं, जिन पर लिखा हुआ था कि ब्लैक लाइफ मैटर्स अर्थात अश्वेतों की जिंदगी का भी मतलब है। श्वेतों के महाद्वीपों अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में भूचाल आ गया। इस भूचाल के पीछे अश्वेत और श्वेत दोनों थे, बल्कि श्वेत अधिक थे। यह आंदोलन इतिहास की ज्यादतियों का भी बदला लेने निकल पड़ा है। इसने रंगभेद के बचे-खुचे अवशेषों के साथ पुराने नस्लभेदियों, उपनिवेशवादियों और गुलामों के व्यापारियों की स्मृतियों को खुरचना शुरू कर दिया है। कई शताब्दियों से दर्प के साथ चौराहों पर खडे़ औपनिवेशिक युद्धों के नायकों, नस्लभेद के भाष्यकारों और गुलामों के सौदागरों की मूर्तियां धड़ाधड़ गिराई जाने लगी हैं।
    इसी बीच एक अद्भुत दृश्य दिखा, मिनेसोटा की पुलिस ने चोकहोल्ड की मुद्रा में घुटनों के बल बैठकर अश्वेतों से माफी मांगी। इसके बाद तो घुटनों के बल बैठकर माफी मांगने की होड़ लग गई, छात्रों, प्राध्यापकों, राजनीतिज्ञों, कलाकारों, सबने घुटने टेककर माफी मांगी। अद्भुत है अमेरिकी समाज! एक तरफ तो उसका प्रभु वर्ग वियतनाम, इराक या अफगानिस्तान में नागरिकों पर बम बरसाकर उनका संहार करता है और साथ ही, उसकी जनता को दुनिया के सबसे बड़े युद्ध विरोधी आंदोलनों की इजाजत भी है। कई बार मुझे लगता है कि अगर इस तरह का आंतरिक लोकतंत्र सोवियत रूस में रहा होता, तो शायद एक खूबसूरत समाज नष्ट नहीं होता। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि अमेरिका का सबसे अधिक विरोध माक्र्सवादी और इस्लामी विचारक करते हैं और इन दर्शनों से जुड़े ज्यादातर बड़े नामों की एक कामना यह भी होती है कि उनके या उनकी संतानों के लिए अमेरिका के दरवाजे खुल जाएं। कभी इस पर भी सोचना चाहिए कि नोम चॉमस्की अमेरिका में ही क्यों संभव हुए, सोवियत रूस में होते, तो शायद उनकी जिंदगी साइबेरिया में ही कटती। अमेरिकी समाज के अंतर्विरोधों पर काफी गंभीर समाजशास्त्रीय अध्ययन हो सकते हैं, पर इसे कैसे भूला जा सकता है कि वियतनाम युद्ध के खिलाफ सबसे बड़ी रैलियां अमेरिकी शहरों में ही आयोजित की गई थीं और दुनिया की सबसे ताकतवर सेना ने अंतत: शिकस्त कुबूल कर ली, पर जनमत के दबाव ने सैन्य-राजनीतिक नेतृत्व को परमाणु बम का इस्तेमाल नहीं करने दिया।
    अमेरिकी दृश्यों से गुजरते हुए मैं भी कुछ सपने देखने की इजाजत चाहता हूं। मैं सपना देखता हूंं कि दिल्ली पुलिस 1984 के दंगों के दोषी के रूप में माफी मांगने के लिए गुरुद्वारा बंगला साहिब के सामने शर्मिंदगी से सिर झुकाए बैठी है। मेरा एक दूसरा सपना इतना ही असंभव-सा है, जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस अयोध्या में बाबरी विवाद में अपनी सहभागिता के लिए लखनऊ में पुलिस मुख्यालय के सामने मौन रखकर देश से क्षमा मांग रही है। पश्चिम में गुलामों के सौदागरों की मूर्तियां गिराते देखकर मैंने सपना देखा कि समानता की गारंटी देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 पर दिन-रात बहस करते-करते न्यायमूर्तियों, वकीलों को भी जागना चाहिए। देश में असमानता के लिए जिम्मेदार रहे लोगों की कुछ मूर्तियां अब तक क्या कर रही हैं?
    ऐसे ही बहुत से सपने हैं, जो आजकल मैं देख रहा हूं। मुझे पता है, मेरे सपने हाल-फिलहाल तो सच होने वाले नहीं हैं। हमने खुद को जगद्गुरु घोषित कर रखा है। हमारा अतीत इतना महान है कि उस पर किसी तरह की शंका करना वर्जित है, अपने किसी किए पर क्षमा मांगने का तो सवाल ही नहीं उठता। अमेरिका के पास सिर्फ चार सौ वर्षों का इतिहास है, पर उसने इतनी क्षमता अर्जित कर ली है कि वह अपनी गलतियों पर शर्मिंदगी महसूस कर सकता है और हमारा हजारों साल पुराना ‘गौरवशाली’ अतीत हमें इससे रोकता है। पता नहीं हम कब सीख पाएंगे कि गलती की क्षमा मांगना कमजोरी नहीं, जातियों की शक्ति का द्योतक होता है। शर्मिंदगी का सार्वजनिक इजहार हमें बड़ा बनाता है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)विभूति नारायण राय,पूर्व आईपीएस अधिकारी

     

    दुर्ग / शौर्यपथ / जिले के कुबेर इनकेव वार्ड नं. 7, जुनवानी रोड कोहका, नगर पालिक निगम भिलाई एवं वार्ड नंबर 15, मउहारी भाटा मड़ोदा, रिसाली में कोरोना पॉजिटव केस पाये जाने के उपरांत उक्त क्षेत्र को कन्टेनमेंट जोन घोषित किया गया था। उक्त क्षेत्र में पिछले 14 दिवस में कोई भी नए पॉजिटीव केस नहीं आये है। अत: कन्टेनमेंट जोन की अधिसूचना को समाप्त करते हुए चिन्हित क्षेत्र में जिन व्यक्तियों को होम क्वारंटाईन किया गया है उनके क्वारंटाईन अवधि तक यथास्थिति बनी रहेगी।
    चिन्हांकित क्षेत्र अंतर्गत सभी दुकाने एवं अन्य वाणिज्यिक प्रतिष्ठान शासन के नियमानुसार संचालित होंगे। चिन्हित क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को कोरोना से संबंधित लक्षण होने पर तत्काल कंट्रोल रूम के दूरभाष क्रमांक 0788-2210180 अथवा 0788-2210773 पर सूचित करेंगे।

    दुर्ग / शौर्यपथ / विकास कार्यों के लिए लगातार सक्रिय रहने वाले विधायक अरूण वोरा की पहल पर वाय शेप ओवरब्रिज में 50 लाख की लागत से माइक्रो सरफेसिंग डामरीकरण का कार्य प्रारंभ हो गया है। उल्लेखनीय है कि पुलगांव नाला ब्रिज, वायशेप ब्रिज में लगातार हो रही दुर्घटनाओं को देखते हुए वोरा ने सड़क सुरक्षा समिति की बैठक में शहर के ब्रिजों में सुरक्षात्मक उपाय करने हेतु आवश्यक कार्यों के लिए राशि मांगी थी .
    जिसके बाद वायशेप व धमधा नाका ओवरब्रिज में डामरीकरण एवं प्रोटेक्टिव जाली लगाने के कार्य के अतिरिक्त पुलगांव नाला ब्रिज में मार्ग विभाजक निर्माण हेतु 2.06 करोड़ रुपए स्वीकृति मिली थी। लंबे समय से दोनों ओवरब्रिज की मरम्मत की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। विधायक ने कहा कि जनसुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है प्रोटेक्टिव जाली एवं माइक्रो सरफेसिंग डामरीकरण कार्य शुरू हो गया है। काम पूरा होने पर यहां आवागमन में सुविधा होगी। धमधानाका ओवरब्रिज का निर्माण लगभग तीन दशक पहले किया गया है।
    ओवरब्रिज के सभी संधारण कार्यों में लोगों की सुरक्षा की अनदेखी नहीं होना चाहिए। साथ ही उन्होंने धमधा नाका में प्रोटेक्टिव वाल सुरक्षित एवं मजबूत बनाने के लिए विभागीय आदेश जारी करने कलेक्टर से आग्रह किया है।

    दुर्ग / शौर्यपथ / 14 जून विश्व रक्तदान दिवस के अवसर पर नवदृष्टि फाउंडेशन के आव्हान पर दुर्ग जिला चिकित्सालय ब्लड बैंक में 44 लोगों ने स्वैच्छिक रक्तदान किया,संस्था के संस्थापक सदस्य राज आढ़तिया की माता श्रीमती पुष्पा बेन आढ़तिया ने 65 वर्ष की आयु में रक्तदान कर सब को चौंका दिया उपस्थित सभी लोगों में उनकी ही चर्चा रही एवं सभी ने पुष्प बेन के जज़्बे की तारीफ़ की,पुष्प बेन को रक्तदान करते देख उनकी बहु कोमल आढ़तिया ने भी अपना पहला रक्तदान किया,जिला चिकित्सालय ब्लड बैंक की मुख्य कॉउंसलर आशा साहू ने रक्तदान कर अन्य लोगों को प्रेरित किया,अंकित दुबे,कुलदीप भमरा,खुर्शेद अहंमद,देवनन्द ढीमर,सुरेश सिंह बनाफर(क्राइम ब्रांच),नीरज जैन,विपल कोठारी,गुरप्रीत सिंह ढींगरा सहित 44 लोगों ने रक्तदान किय,
    नवदृष्टि फाउंडेशन के कुलवंत भाटिया,राज आढ़तिया,रितेश जैन,संतोष राजपुरोहित,जितेंद्र हासवानी,हरमन दुलाई ने सभी रक्तदानियों का सम्मान किया व उनका उत्साह बढ़ाया,
    कुलवंत भाटिया ने पुष्प बेन द्वारा 65 वर्ष की उम्र में रक्तदान को सभी के लिए प्रेरणादाई बताया यह रक्तदान आढ़तिया परिवार का समाज के प्रति समर्पणको दिखता है,नेहरू युवा केन्द्र के नितिन शर्मा ने रक्तदान प्रक्रिया में सहयोग किया
    नव दृष्टि फाउंडेशन के अनिल बल्लेवार, कुलवंत भाटिया,राज आढ़तिया,प्रवीण तिवारी ,मुकेश आढ़तिया ,हरमन दुलई,प्रभु दयाल उजाला,प्रमोद बाघ,रितेश जैन,जितेंद्र हासवानी,गोपी रंजन दास,धर्मेंद्र शाह,पियूष मालवीय,मुकेश राठी,संतोष राजपुरोहित, किरण भंडारी,चेतन जैन,चन्दन मिश्रा,यतीन्द्र चावड़ा,नत्थू अग्रवाल,खुर्शीद अहमद ,आकाश मसीह ,अनुराग तैलंग,वीरेंद्र पाली,अभय माहेश्वरी ,प्रफुल्ल जोशी, संजीव श्रीवास्तव,विवेक साहू ,शैलेश कारिया,हरपाल सिंह,मनीष जोशी,प्रसाद राव,दीपक बंसल ने सभी रक्तदानियों की प्रशंसा की व शुभकामनाएं दी. 

    रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता विकास तिवारी ने प्रदेश की कांग्रेस सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों पर पूरे प्रदेश वासियों की ओर से हर्ष प्रकट किया है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सुशासन के कारण प्रदेश के 67 हजार से अधिक कुपोषित बच्चों को कुपोषण से मुक्ति मिली और वह अब सामान्य बच्चों की तरह जिंदगी जी रहे हैं जबकि 15 सालों के रमन राज में 38 प्रतिशत से भी अधिक बच्चे कुपोषण की श्रेणी में थे मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर, जन्म दर में भी प्रदेश की हालत बद से बदतर थी लाइफ-एक्सपेंटेंसी की सभी मानकों में भाजपा सरकार ने प्रदेश को गर्त में धकेल रखा था। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनकी सरकार का मुख्य उद्देश्य केवल कमीशन खोरी करना था।
    कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपने मात्र डेढ़ साल के कार्यकाल में ही 13 प्रतिशत से अधिक कुपोषित बच्चों को कुपोषण से मुक्ति दिलाने का भागीरथी काम किया है और आने वाले समय मे छत्तीसगढ़ राज्य का एक भी बच्चा कुपोषित नही रहेगा। विकास ने आंकड़े प्रस्तुत करते हुवे कहा कि भाजपा सरकार के समय दंतेवाड़ा, बस्तर, कांकेर, जशपुर, कबीरधाम और नरायणपुर में कुपोषित बच्चो की संख्या अधिक थी। इन जिलों में 45 प्रतिशत बच्चे कुपोषित कुपोषित थे। यही नही पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह जो खुद एक चिकित्सक थे उनके 15 वर्षों के शासनकाल में सम्पूर्ण टीकाकरण कार्यक्रम में प्रदेश के 24 प्रतिशत बच्चों को हर साल जरूरी टीका नहीं लग पा रहा। यही नहीं 2 प्रतिशत बच्चे एयआरआई की चपेट में थे। रमन राज में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम पूरी तरह ढप्प हो गया था।
    कांग्रेस प्रवक्ता विकास तिवारी ने कहा कि पूर्ववर्ती रमन सरकार के समय स्वास्थ विभाग और अन्य विभागों में भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी व्याप्त थी और प्रदेश के सभी सीएमएचओ पर 7 करोड़ धनराशि के दुरुपयोग का लगा था आरोप जिसकी जांच भी तत्कालीन भाजपा सरकार ने नही करवाई थी। चाइल्ड हेल्थ का ऐसा हाल इसलिए था क्योंकि बच्चों के स्वास्थ्य संबधी योजनाओं के क्रियान्वयन में भ्रष्ट्राचार पाए जाने पर भी रमन सरकार कोई भी कार्यवाही नहीं करतीं थी। जिसके कारण प्रदेश के 38 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषित हो गये थे।
    तिवारी ने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कांग्रेस पार्टी ने संकल्प लिया है कि प्रदेश का एक भी बच्चा कुपोषित नही रहेगा और रमन राज में जो कुल 38 प्रतिशत बच्चे कुपोषित थे जिनमें से अभी 13 प्रतिशत बच्चे सुपोषित हुवे है आने वाले समय मे सभी को सुपोषित रखने की रूप रेखा कांग्रेस सरकार ने बना ली है। गर्भवती माताओं, छोटे बच्चो को भी स्वास्थ्यवर्धक आहार भी उपलब्ध करवाया जा रहा है।

    दुर्ग / शौर्यपथ / भिलाई के रिसाली में अपने ही मालिक के घर के बेडरूम से 10 लाख 80 हजार रुपए नगद एवं सोने चांदी के जेवर चोरी करने वाली नौकरानी को नेवई पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने नौकरानी से 8 लाख 11 हजार रुपए नगद व 2 लाख के सोने चांदी के जेवर सहित कुल 10 लाख 80 हजार रुपए की जब्ती की गई है आरोपियों को नेवई पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।
    वी/ओ- 1 दुर्ग के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ने तीन दिन पहले हुए चोरी की शिकायत मिलने पर पुलिस ने आरोपियों की तलाश शुरू कर दि थी जिसके बाद पता चला कि आरोपी मैत्रीनगर रिसाली में अनिल सोनी के घर पर ही झाड़ू पोछा का काम करती है। आरोपी ने 5 जून को अनिल सोनी के घर काम करते समय बेडरूम को सुना पाकर पास में रखी अलमारी से नगद रकम चोरी करना स्वीकार किया है। आरोपी ने पैसे से कीमती जेवर एवं कपड़े खरीदना स्वीकार किया है, आरोपी की निशानदेही पर नगदी रकम 8 लाख 11 हजार रुपए सोने के जेवर कीमती एक लाख 92 हजार, चांदी के जेवर 46 हजार एवं 20 हजार के कपड़े एवं दो मोबाइल फोन कुल कीमती 10 लाख 80 हजार आरोपियों के कब्जे से जप्त किया गया है। नेवई में आरोपियों के विरुद्ध भादवि की धारा 454, 380 का अपराध दर्ज कर विवेचना में लिया गया है। आरोपी लता बाई साहू को गिरफ्तार कर पुलिस पूछताछ कर रही है..

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