August 02, 2026
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    रक्त से ही पूछ लिया पता

    • rounak group

    मेरी कहानी / शौर्यपथ / वह रक्त में कुछ खोज रहे थे। दिन-रात रक्त चिंतन करते अध्ययन की गहराई में उतर गए थे। जानते थे कि रक्त में कुछ है, लेकिन बहुत गौर करने पर भी सिवाय उसकी लालिमा के कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता था। प्रयोगशाला में सैकड़ों नमूने जुटा लिए, सब रक्त एक समान लाल ही तो हैं, तो फिर ऐसा क्यों होता है कि किसी के शरीर में रक्त जाकर कामयाब हो जाता है और किसी की मौत हो जाती है। खून समान है, तो फिर क्यों होती है मौत? 32 की उम्र थी, लेकिन हजारों पोस्टमार्टम कर चुके थे, हर जगह यही खोज रहती थी कि आखिर रक्त का रहस्य क्या है? वह रह-रहकर बेचैन हो जाते, देर तक माइक्रोस्कोप के जरिए रक्त में झांकते रहते थे। उन दिनों ईसा का कैलेंडर बीसवीं सदी की दहलीज पर पहुंच चुका था। इंसानी सभ्यता को आगे बढ़ते इतनी सदियां बीत गई थीं, लेकिन लोग तब भी यही मानते थे कि इंसानों का खून दो तरह का होता है- अच्छा खून और गंदा खून। अच्छा खून निरोग रखता है, बेहतर इंसान गढ़ता है और गंदा खून बीमार कर डालता है, दुर्जन बनाता है। अच्छे लोगों में अच्छा खून और बुरे लोगों में गंदा खून रहता है, पर यह एक ऐसी सतही दलील थी, जो डॉक्टर को पचती नहीं थी। अत: यह जरूरी था कि रक्त को ढंग से पकड़कर उसका सही पता पूछा जाए।
    और वो लम्हा आया, जब उन्होंने रक्त को नए नजरिये से कसौटी पर कसना शुरू किया। साल 1900 चल रहा था। जांचते-परखते एक दिन प्रयोगशाला में रक्त का राज खुलना शुरू हुआ। कमाल हो गया। ‘क’ लाल कोशिकाओं को ‘ख’ रक्त सेरम (रक्तोद) बूंदों से मिलाया, तो तत्काल रक्तकण एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था हो गए, परस्पर दो-दो हाथ कर बैठे। रक्त के थक्के या गुच्छे बन गए, उनकी सहजता खत्म हो गई। दूसरी ओर, जब ‘क’ लाल कणों के साथ ‘ग’ सेरम बूंदों को मिलाया, तो दोनों ऐसे मिले, मानो कभी जुदा न थे।
    डॉक्टर ने इस प्रयोग को दर्ज किया और सेहत की दुनिया में कायापलट के संकेत मिल गए। लेकिन साथियों ने कहा कि रक्त कणों का गुत्थमगुत्था होना किसी रोग का लक्षण है। जिससे रक्त लिया गया है, उसे कोई रोग होगा। फिर चुनौती मिली, तो डॉक्टर ने सेहतमंद लोगों के नमूने जुटाने शुरू किए। रक्त से रक्त का मेल कराने-जांचने का जुनून फिर प्रयोगशाला में नुमाया हुआ। फिर वही बात सामने आई, कुछ रक्त मिले, तो लड़कर खुद को ही बर्बाद कर गए और कुछ मिले, तो एक-दूजे के हो गए। नतीजे कड़ी-दर-कड़ी जुड़ते गए। बीमारी से थक्कों का कोई लेना-देना नहीं। जो रक्त परस्पर मिल नहीं रहे, वे लड़कर नष्ट हो जा रहे हैं। जो मिल रहे हैं, वे एक समान हैं। मतलब, सबका रक्त एक जैसा नहीं है। इन नतीजों से ही एक प्रश्न फूटा, तो फिर रक्त के कितने प्रकार हैं?
    रक्त के रहस्य के पीछे जुनूनी डॉक्टर साहब फिर जुट गए। सैकड़ों नमूनों की जांच की, माइक्रोस्कोप में डाला और घंटों निहारा, परखा, दर्ज किया। सफलता पुकारने लगी, तो पूरी टीम को लगा दिया और दुनिया को बताया कि तीन तरह के रक्त समूह हैं- ए, बी और सी (बाद में सी ही ओ कहलाया)। अगले साल एक और नया रक्त समूह ‘एबी’ हाथ लग गया। डॉक्टर ने रक्त के मिलान या आदान-प्रदान का एक चार्ट बना दिया कि कौन-सा रक्त किससे मिल सकता है। रक्त का पूरा सच जान लेने का जुनून ऐसा था कि अभी भी संतोष न था, रक्त के मेल में समस्याएं आ ही रही थीं, तो समाधान के लिए एक अन्य वैज्ञानिक के साथ मिलकर आरएच फैक्टर की खोज हुई। रक्त का माइनस और प्लस तय हुआ। दुनिया शोध के स्तर पर जान गई कि आठ प्रकार के रक्त चार समूहों में होते हैं।
    रोग प्रतिरक्षा विज्ञान के महारथी डॉक्टर कार्ल लेंड्सटेनर आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। पोलियो वायरस की खोज सहित अनेक आविष्कारों में उनका अतुलनीय योगदान है। अपराध विज्ञान को भी उन्होंने सशक्त किया। उन्होंने बताया कि किसी भी सूखे रक्त की जांच से भी उसका समूह व प्रकार बताया जा सकता है, जिससे पीड़ित या अपराधी की पहचान में सुविधा हो सकती है।
    डॉक्टर कार्ल लगातार रक्त के रहस्य को खोलते रहे। उनके आविष्कार की वजह से आगे चलकर रक्तदान के तौर-तरीके पुख्ता हुए। ब्लड बैंक की स्थापना संभव हुई। प्रथम विश्व युद्ध जब छिड़ा, तो हजारों सैनिक कार्ल की खोज की वजह से ही रक्तदान का लाभ लेकर सकुशल घर लौटे। उन्हें 1930 में नोबेल से सम्मानित किया गया। शोध के लिए खुद को समर्पित कर देने वाले इस महान डॉक्टर के जन्मदिन 14 जून को विश्व रक्तदाता दिवस मनाया जाता है। बताते हैं कि जब उनकी मौत हुई, तब भी उनकी उंगलियों में एक परखनली थी। शायद दुनिया से जाते हुए भी वह रक्त में देख लेना चाहते थे और कुछ।
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय कार्ल लेंड्सटेनर नोबेल से सम्मानित डॉक्टर

     

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