September 29, 2026
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    महापौर बाघमार के कक्ष में काला स्प्रे प्रकरण: शहर के बढ़ते जनाक्रोश का विस्फोट… या व्यवस्था की नाकामी? Featured

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    नेम प्लेट पर स्प्रे करने वाले दो युवकों पर अपराध दर्ज, पर असली सवाल—शहर की अनसुनी आवाज कब सुनेगी ‘शहरी सरकार’?

     

    दुर्ग। शौर्यपथ। नगर निगम के महापौर कक्ष में घुसकर नेम प्लेट पर काला स्प्रे मारने की घटना ने शहर की राजनीति में हलचल मचा दी है। सोमवार दोपहर करीब 12 बजे निगम सचिव रेवाराम मनु की शिकायत पर पदमनाभपुर थाना पुलिस ने आरोपी वरुण केवलतानी और आदिल खान के खिलाफ धारा 3, 3(5), 324(3) के तहत अपराध दर्ज कर लिया है। दोनों ने महापौर अलका बाघमार के कमरे में प्रवेश कर उनके नेम प्लेट पर काला रंग छिड़क कर विरोध दर्ज किया।

    निगम कर्मचारियों—भूपेंद्र अहीर और विजय यादव—ने बताया कि दोनों युवक किसी जनसमस्या को लेकर महापौर से मिलने आए थे, लेकिन महापौर का दौरे पर होना बताने पर वे नाराज़ हुए और देखते ही देखते स्प्रे छिड़क दिया।

    दूसरा पक्ष भी सामने आया—“कई दिनों से हमारी सुनवाई नहीं, आवेश में हुआ कृत्य ”

    आरोपियों के नज़दीकी सूत्रों ने दावा किया है कि दोनों युवक कई दिनों से अपनी शिकायत महापौर तक पहुंचाने कोशिश कर रहे थे लेकिन न मुलाकात मिली न स्पष्ट जवाब।

    सूत्रों के अनुसार,

    “हमारा मकसद नुकसान पहुँचाना नहीं था। निराशा और महापौर की जवाबदेही में यह कृत्य हुआ।”

    हालांकि पुलिस का कहना है कि अभी तक इन दावों की पुष्टि नहीं हुई है। जांच अधिकारी दोनों पक्षों के बयान लेकर पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि खंगाल रहे हैं।

    पर असली सवाल… शहर का यह गुस्सा आखिर फूटा क्यों?

    स्प्रे की यह घटना शहर में बढ़ती नाराज़गी और प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बनकर सामने आई है।

    पिछले छह महीनों में शहर कई ऐसे विवादों से गुज़रा, जिन्होंने सीधे तौर पर महापौर और कार्यपालिका की जवाबदेही पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए है।

    1. नलघर हादसा और लाश वाले पानी का वितरण

    चार दिनों तक शहर की आबादी मृत देह की गंदगी से मिश्रित पानी पीती रही।

    जिम्मेदारी तय करने के नाम पर कार्रवाई सिर्फ एक कर्मचारी पर की गई, जबकि सवाल यह उठा कि महापौर और एमआईसी की निगरानी कहाँ थी?

    2. लाखों रुपए सिर्फ महापौर बंगले की साज-सज्जा पर

    जनता गड्ढों, कचरे और दुर्गंध से त्रस्त, पर सत्ता संभालते ही महापौर एवं एमआईसी द्वारा अपने बंगले की मरम्मत और साज-सज्जा पर भारी खर्च सवालों में है।

    3. शहर में कचरे का ढेर, गंध और सड़कों पर जानवर

    सुराना कॉलेज के सामने का बदबूदार कचरा महीनों से स्थानीय समस्या है।

    महापौर सरकारी वाहन में निकलती हैं, इसलिए हालात की असलियत शायद दिखती ही नहीं।

    4. महापौर निवास कार्यालय के ठीक सामने पड़ा गड्ढा

    जनता की विडम्बना यह कि शहर का सबसे चर्चित गड्ढा उसी स्थान पर है जहां से महापौर प्रतिदिन गुजरती हैं—लेकिन उसकी मरम्मत तक नहीं हो सकी।

    5. आम जनता को समय नहीं, निगम में चक्कर ही चक्कर

    जनता निगम में महापौर-आयुक्त के कक्ष के बाहर घंटों इंतजार करती है, पर “मुलाकात कब होगी”—इसका कोई निर्धारण नहीं।

    **क्या स्प्रे घटना गलत?—हाँ।

    पर क्या जनता का आक्रोश सही?—यह सवाल शहरी सरकार को खुद से पूछना चाहिए।**

    युवा कांग्रेस नेता और कई सामाजिक संगठनों ने भी हाल के महीनों में लगातार शिकायत की है कि“महापौर जनता से मिलने से बचती हैं, समस्याएं उठाने पर तंज़ करती हैं और छोटे दुकानदारों पर बेवजह चालानी कार्रवाई की धमकी देती हैं।”

    वहीं शहर में भाजपा की ट्रिपल इंजन सरकार के बावजूद

     धनवानो / भाजपा नेताओं द्वारा अवैध कब्जे

    वेतन देरी

    भेदभावपूर्ण कार्रवाई

    बदहाल स्वच्छता आज भी जस के तस हैं। लोगों का कहना है कि “पिछले छह महीनों में परिवर्तन तो दूर, शहर की हालत और गिर गई है।”

    क्या महापौर की जवाबदेही भी तय होगी?

    जब एक नागरिक पर तुरन्त अपराध दर्ज हो सकता है,तो क्या जनता की अनदेखी, कुप्रबंधन, लापरवाही और असंवेदनशीलता का राजनीतिक हिसाब भी नहीं होना चाहिए?

    शहर की जनता ने भारी जनादेश देकर महापौर अलका बाघमार को चुना था। परंतु सिर्फ छह महीनों में ही जनता व्यवस्था से निराश और आक्रोशित क्यों हो गई—इस उत्तरदायित्व से महापौर स्वयं कैसे बच सकती हैं?

    काला स्प्रे सिर्फ नेम प्लेट पर नहीं पड़ा…

    यह शहर की उम्मीदों पर पड़ा धब्बा है, जिसे धोने की जिम्मेदारी शहरी सरकार की है।

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