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SHOURYAPATH vishesh । “तीन बार पूछा यह तरबूज कितने का है और वह टिकटिकी बांधे मुझे देख रहा था, फिर एक बार बोला आपने मेरी बेटी की जान बचाई थी । मैं सोच में पड़ गई कब और आज तक सोचती हूं“किसी का जीवन बचाना परमात्मा के हाथ में होता है हम तो उसकी रस्सी से बंधे एक कलाकार है । यह बात 1987-88 की है जब वह गोल बाजार में फल लेने गई थी। लेकिन नर्स सावित्री चंद्राकर अब तक नहीं समझ पाई उसने कब और किसकी जान बचाई थी क्योंकि अपने 37 वर्ष के नर्सींग प्रोफेशन में उसने कई लोगों की मदद की है। 9 मई को स्वास्थ्य विभाग में सेवा करते हुए सावित्री के 37 वर्ष पूरे हुए । पहली पोस्टिंग पिथौरा पीएचसी में हुई थी जो वर्तमान में सीएचसी हो गया है । वर्ष 1984 की बात याद करते हुए सावित्री कहती है उन दिनों पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जहां पूरे देश में हालत खराब थे तो प्रदेश में भी हालात बिगड़ गए थे। शाम को अस्पताल से एक व्यक्ति मुझे लेने आया और बोला चलो गोली निकालनी है लेकिन में समझ नहीं पाई क्या हुआ था। ``वह साइकिल पर बैठाकर मुझको अस्पताल तक लेकर गया । एक सब्जी वाले को गोली लगी हुई थी जिसकी गोली मैंने निकाली। लेकिन जीवन में कभी कभी लगता है कितने लोगों की सेवा की जाते समय कोई धन्यवाद का एक शब्द भी नहीं कहकर गया’’ सावित्री कहती है । सावित्री कहती हैं कि सन 1980-81 में डीकेएस से नर्सिंग की ट्रेनिंग करने के उपरांत 14 वर्ष पिथौरा पीएचसी में 3 वर्ष डीकेएस रायपुर में 16 वर्ष माना (रायपुर) के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में 1 वर्ष धरसींवा में सेवाएं दी। वर्तमान में 2017 से जिला चिकित्सालय पंडरी में मैट्रन के पद पर कार्य कर रही है । अपने जीवन के अनुभव को साझा करते हुए सावित्री कहती हैं कि कोरबा 1983 में एक रिश्तेदार के घर डिलीवरी हुई बच्चा प्री-मेच्योर था। प्रसव के उपरांत बच्चा नीला पड़ गया । ``कोरबा से रायपुर आने में बस से लगभग 6 घंटे हम लोग लगे । मैं बच्चे को रस्ते भर थपथपाती रही, मुंह से कृत्रिम सांस देती रही चुटकी भरती रही ।डीकेएस अस्पतल रायपुर में लाकर उसको एडमिट कराई और वह बच्चा बच गया । उस बच्चे को देखकर आज भी लगता है । जीवन की असली सफलता यही होती है कि हम किसी का जीवन बचा सके ।‘’
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
