August 02, 2026
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    सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / लद्दाख सीमा पर भारत और चीन के बीच जो समस्या खड़ी हुई है, उसके फौरी निदान की कोशिशें जारी हैं, मगर इससे इतर भी कई मोर्चे हैं, जिन पर दोनों देशों के बीच तल्खियां बढ़ सकती हैं। डिजिटल क्षेत्र में 59 चीनी एप को प्रतिबंधित करके नई दिल्ली ने बीजिंग को यह साफ कर दिया है कि अब वह उससे बहुत सदाशयता की उम्मीद न रखे। इस बीच एक खबर यह आ रही है कि चीनी कंपनियां तीसरी पार्टी के जरिए भारतीय बाजार में अपना निवेश और उत्पादों का प्रवाह बढ़ाने में जुटी हैं। और इसके लिए वे सिंगापुर व हांगकांग जैसे देशों के व्यापारिक-मार्ग का इस्तेमाल कर रही हैं। जाहिर है, इन देशों के साथ हमारा मुक्त व्यापार समझौता है और इसके अलावा भी अनेक द्विपक्षीय करार हैं। यदि ऐसा है, तो यह न सिर्फ अवैध कारोबार है, बल्कि यह हमारे घरेलू उद्योगों के हितों को नुकसान पहुंचाने वाली धूर्तता है।
    फेडरेशन ऑफ इंंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स के आंकडे़ भी इस बात के साफ संकेत दे रहे हैं। इसके मुताबिक, पिछले साल चीन के साथ अपने व्यापार घाटे को भारत ने जितना पाटा था, लगभग उतना ही हांगकांग के साथ उसका व्यापार घाटा बढ़ गया। यानी भारत का सारा लाभ शून्य हो गया। सिंगापुर के मामले में भी आंकडे़ ऐसे ही इशारे कर रहे हैं। उम्मीद है, वाणिज्य मंत्रालय नई पृष्ठभूमि में इसका संज्ञान लेगा और सरकार समुचित कार्रवाई करेगी। यह कोई ढकी-छिपी बात नहीं है कि पिछले कई वर्षों से दुनिया के बड़े बाजारों पर कब्जा करने के लिए चीन हर मुमकिन कोशिश कर रहा है। एशिया और अफ्रीका के छोटे-छोटे देशों को बड़े कर्ज देकर या तरह-तरह की परियोजनाओं में निवेश के जरिए वह पहले ही अपना आर्थिक उपनिवेश बना चुका है, पर बडे़ बाजारों में उसकी दाल नहीं गल रही। अमेरिका ने ‘टैरिफ-वॉर’ छेड़कर उसे काफी हद तक झुकने को बाध्य भी किया है। ऐसे में, भारतीय बाजार में यदि चीन चोर दरवाजे से घुसने में कामयाब हुआ, तो हमारे घरेलू उद्योग-धंधों को वह काफी आघात पहुंचा सकता है। खासकर लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्योगों के लिए उसके उत्पादों का सामना करना असंभव हो जाएगा। बडे़ पैमाने पर रोजगार पैदा करने की चुनौती झेल रहा देश इस स्थिति से निपटने के लिए तैयार नहीं है।
    अंतरराष्ट्रीय राजनय के अपने तकाजे होते हैं। हम कई बार मित्र देश के साथ भी कुछ मसलों पर इत्तफाक नहीं रखते और अपनी अलग राह चुनते हैं। चीन पड़ोसी है, मित्र देश नहीं। वह हमारे लिए लगातार चुनौतियां खड़ी कर रहा है। न सिर्फ वैश्विक मंचों पर, बल्कि प्रकारांतर से करीबी पड़ोसियों के मामले में भी। अब हमारे आर्थिक हितों को चोर दरवाजे से नुकसान पहुंचाने की बातें आ रही हैं। इसलिए वक्त आ गया है कि उससे जुड़े तमाम मोर्चों पर पैनी निगाह रखने और त्वरित फैसले में समर्थ एक मुकम्मल विंग का गठन किया जाए। भौगोलिक सीमाओं के अलावा डिजिटल दुनिया व अन्य आर्थिक क्षेत्रों में भी बेकाबू हो रही चीनी महत्वाकांक्षाओं को लगाम लगाने का यही सबसे मुफीद वक्त है। चीन के साथ अपने व्यापार घाटे को कम करने की कवायदों को गति देने के अलावा हमें उन छिद्रों को भी बंद करने की जरूरत है, जिधर से हमारे हितों को हानि पहुंच रही है। बीजिंग को समझना ही होगा कि भारत अब उसके किसी छल का शिकार नहीं बन सकता।

     

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