August 02, 2026
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    बादलों को पहचानने और सजग रहने के दिन

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    नजरिया / शौर्यपथ / बिजली गिरने या वज्रपात की परिस्थिति सामान्यत: दक्षिण-पश्चिमी मानसून के पहले दौर और उत्तराद्र्ध में बहुतायत में बनती है, किंतु पूरे मानसून के दौरान वज्रपात की आशंका बन सकती है। पश्चिमी विक्षोभ की विशेष परिस्थितियों में यह घटना ठंड के मौसम (नवंबर से मार्च) में भी कुछ जगहों में हो सकती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पश्चिमी और मध्य भारत में वज्रपात का प्रकोप अधिक है। पूरे देश में 12 ऐसे राज्यों की पहचान की गई है, जहां वज्रपात की घटनाएं सबसे अधिक होती हैं। इनमें मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा प्रमुख हैं।
    अभी मानसून की शुरुआत ही हुई कि बिहार और उत्तर प्रदेश में वज्रपात का कहर टूट पड़ा। दोनों प्रदेशों में ऐसी घटनाओं की निगरानी के लिए ‘भारत मौसम विज्ञान विभाग’ ने उन्नत किस्म के यंत्र इन प्रदेशों की राजधानियों में लगा रखे हैं और करीब ढाई से तीन घंटे पूर्व यह ऐसी घटनाओं की जानकारी संबंधित राज्य सरकारों को उपलब्ध कराता है। इस सबके बावजूद इस प्रकार की घटनाओं का होना दुखद है और दर्शाता है कि वज्रपात से होने वाली क्षति से बचने के प्रबंधन में कहीं न कहीं कमी हो रही है। वास्तव में, इस क्षेत्र में ज्यादा काम हुआ ही नहीं है। वज्रपात से खतरा सामान्यत: खुले में, पानी से भरे खेतों में काम करने वाले किसानों, मजदूरों, लंबे पेड़ों के नीचे शरण लिए लोगों को ज्यादा होता है। अत: अगर आपको वज्रपात करने वाले बादलों की सही समय पर जानकारी मिल जाए और आस-पास के किसी पक्के घर में चले जाएं, तो आप सुरक्षित रह सकते हैं।
    वज्रपात कर सकने वाले बदलों का आधार काफी गहरे काले रंग का होता है। बादलों की ऊपरी सतह समतल होती है। ऐसे बादलों के अंदर से रुक-रुककर बिजली के चमकने से एक लंबी लकीर जैसी बनती रहती है तथा गर्जना की आवाज आती रहती है। बिजली की चमक और आवाज के बीच के अंतराल को मापकर बादल की दूरी ज्ञात की जा सकती है। जैसे, अगर अंतराल 18 सेकंड है, तो बादल की दूरी (18/3=6) छह किलोमीटर है, अगर अंतराल 30 सेकंड है, तो बादल की दूरी (30/3=10) दस किलोमीटर होगी। अत: प्रत्येक तीन सेकंड के अंतराल की दूरी करीब एक किलोमीटर होगी। वज्रपात के समय पैदा चमक की लंबाई औसतन छह मील के करीब होती है। ऐसे बादल करीब 10 किलोमीटर की दूरी तक प्रभाव डाल सकते हैं। अगर इस प्रकार का बादल पास है और आप घर से बाहर खुली जगह पर हैं, तो आस-पास के घर में जाकर खुद को सुरक्षित कर सकते हैं, क्योंकि वज्रपात से बचने हेतु सबसे सुरक्षित स्थान घर ही होता है।
    मौसम विभाग ने लखनऊ और पटना में जो रडार लगा रखे हैं, वे करीब 200-300 किलोमीटर की दूरी से ही वज्रपात वाले बादलों को चिन्हित कर सूचना दे सकतन इलाकों में ज्यादा वज्रपात होते हैं, उनमें विशेष चेतावनी और विशेष टावर निर्माण जैसे उपाय किए जा सकते हैं। तात्कालिक जरूरत को देखते हुए लोगों को अलर्ट करने हेतु सभी ग्राम पंचायतों में लोकल हूटर का प्रबंध किया जा सकता है। लोगों की जान बचाने के लिए अगर पूरे जिले में एक-दो घंटे काम बंद रहता है, तो कोई हर्ज नहीं है।
    मानसून सीजन के शुरू होते ही भारी वर्षा की वजह से वज्रपात की समस्या के अलावा बाढ़ की समस्या भी बढ़ जाती है। अभी मानसून के शुरू होते ही पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर असम और पूर्वी बिहार जलभराव या बाढ़ की समस्या से जूझने लगे हैं, जिससे करीब 10 लाख लोगों के प्रभावित होने तथा करीब 15 लोगों के मारे जाने की खबर है। यह समस्या आने वाले दिनों दिनों में निश्चित तौर पर बढ़ेगी।
    अत्यधिक वर्षा की समस्या वायु प्रदूषण, पेड़ों को काटे जाने, भूमि के उपयोग में परिवर्तन की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई है। ऐसी घटनाएं पिछले दशकों में काफी बढ़ी हैं। मौसम विभाग एक से पांच दिन पहले ही भविष्यवाणी करने की क्षमता रखता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का तंत्र पूरे देश में फैला है। यह लोगों की भी जिम्मेदारी है कि आपदा के समय चेतावनियों पर विशेष ध्यान दें। सतर्क रहने के साथ ही बचाव के तमाम जरूरी इंतजामों पर भी ध्यान देना चाहिए।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)अतींद्र कुमार शुक्ला, मौसम विज्ञानी

     

     

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