August 02, 2026
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    मानसिक रोगों से कब तक मुंह मोड़ते रहेंगे हम

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    नजरिया / शौर्यपथ / हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और बीमा नियामक ‘आईआरडीएआई’ से पूछा है कि मानसिक रूप से बीमार लोगों को स्वास्थ्य बीमा के दायरे में क्यों नहीं लाया गया? कोर्ट में याचिका दायर करके कहा गया है कि मानसिक स्वास्थ्य को ‘स्वास्थ्य बीमा’ के दायरे में न रखा जाना संविधान के समता मूलक व भेदभाव न करने संबंधी कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन है। गौरतलब है कि मानसिक स्वास्थ्य कानून 2017 की धारा 21(4) में बीमा पॉलिसी में मानसिक रोगों को भी शामिल किए जाने का प्रावधान है।
    जिस तरह से पिछले दो-तीन दशकों में मानसिक बीमारियों में वृद्धि हुई है, उसे देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि इनसे जूझ रहे लोगों को आर्थिक संरक्षण मिले, ताकि वे बेहतर तरीके से अपना इलाज करा सकें। दरअसल, इस समस्या के मूल में वह मिथक है, जिसे शायद बीमा कंपनियां भी अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करती हैं कि मानसिक बीमारियां लाइलाज होती हैं। इसी से ये उपेक्षा का शिकार रही हैं। अभी हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने विश्व-समुदाय से आग्रह किया है कि ‘बढ़ते दबावों का सामना कर रहे लोगों की रक्षा करने के लिए और ज्यादा प्रयास करने होंगे। उनके मुताबिक, तथाकथित सामाजिक कलंक और भेदभाव का शिकार होने से अक्सर यह पीड़ा और ज्यादा गहरी हो जाती है।’
    यह एक कटु सत्य है कि मानसिक रोगों को सामाजिक कलंक के रूप में देखे जाने के कारण ज्यादातर लोग अपनी मानसिक परेशानियों में पेशेवर मदद हासिल करने से परहेज करते हैं। मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ने के पीछे यह एक बड़ी वजह है। दिसंबर 2019 में लांसेट द्वारा जारी एक रिपोर्ट में भारत में 1990 से 2017 तक मानसिक स्वास्थ्य को लेकर क्या स्थिति रही, उसका विश्लेषण किया गया है। लांसेट के आंकड़ों के अनुसार, 2017 तक भारत में हर सात में से एक व्यक्ति किसी न किसी तरह के मानसिक रोग से पीड़ित है।
    भारत में मानसिक रोगों में सबसे ज्यादा भागीदारी अवसाद की हैै। यूं तो विश्व भर में मानसिक रोगियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, लेकिन पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों के उलट हमारे यहां मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता और चेतावनी की व्यवस्थाओं का अभाव है। वैसे इस बीमारी के कारणों को लेकर कई अध्ययन हुए हैं। फ्रांस की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्सेल्स सेंट क्वेंटिन एन वैलेंस के शोधकर्ताओं ने इंग्लैंड में 16 से 69 साल के 25,000 लोगों पर किए गए अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि वहां आम तौर पर होने वाली दिमागी परेशानी का संबंध अकेलेपन से है। विश्व भर में दिमागी बीमारियों को लेकर किए गए अमूमन सभी शोध इसी निष्कर्ष के इर्द-गिर्द घूमते हैं। भारत की भी यही स्थिति है। ऐसे में, विचार का विषय यह है कि उन रास्तों को ढूंढ़ा जाए, जिनसे इस समस्या का हल मिल सके।
    विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग 7.5 प्रतिशत आबादी मानसिक रोगों से जूझ रही है। बावजूद इसके यहां मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए धन का आवंटन बहुत कम है। भारत में हर दस लाख आबादी पर सिर्फ तीन मनोचिकित्सक हैं। मनोवैज्ञानिक सलाहकारों का अनुपात तो इससे भी कम है। आज जब तरह-तरह का दबाव हमारे ऊपर बढ़ रहा है, हम इस रोग की उपेक्षा नहीं कर सकते।
    इस संबंध में हम जिम्बाब्वे का मॉडल अपना सकते हैं। जिम्बाब्वे के मनोवैज्ञानिक डिक्सन चिबांदा ने अवसादग्रस्त लोगों की मदद के लिए नायाब तरीका निकाला। मनोचिकित्सकों की कमी का तोड़ निकालने के लिए उन्होंने साल 2006 से आज तक 400 बुजुर्ग महिलाओं को प्रशिक्षण देकर एक ‘ग्रैंड मदर्स क्लब’ का गठन किया है। जब डिक्सन ने पाया कि अस्पतालों में जगह कम है, तो उन्होंने इसका हल ‘फ्रेंडशिप बेंच’ के रूप में निकाला। सार्वजनिक पार्कों में ऐसी बेंचें लगाई गईं, जहां ये बुजुर्ग महिलाएं लोगों से उनकी भाषा में बात करती हैं। डिक्सन का यह प्रयास असरदार साबित हुआ। आज दादियों-नानियों की मदद से अवसाद के इलाज के कार्यक्रम कई देशों में चलाए जा रहे हैं। मानसिक बीमारी हमारे लिए भी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इसे लेकर गहन चिंतन व प्रयासों की जरूरत है। इस प्रयास में ‘फे्रंडशिप बेंच’ एक बेहतर विकल्प हो सकती है।
    (ये लेखिका के अपने विचार हैं)ऋतु सारस्वत, समाजशास्त्री

     

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