August 16, 2026
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    शौर्य की बाते ( सम्पादकीय )

    शौर्य की बाते ( सम्पादकीय ) (230)

    वरिष्ठ रंगकर्मी विजय मिश्रा ‘अमित‘ की रंगयात्रा
    सम्पादकीय लेख /शौर्यपथ / लोक कलाओं का कुबेर है छत्तीसगढ़ । यहां के मनोरम लोकगीत, नृत्य, वाद्य परम्पराओं को लुप्त होने से बचाने और पुनर्जीवित कर सांस्कृतिक क्रांति का शंखनाद करने में अग्रणी योगदान दुर्ग जिला के निकट स्थित ग्राम बघेरा के दाऊ रामचन्द्र देशमुखजी का है। उन्होंने छत्तीसगढ़वासियों के भीतर सांस्कृतिक चेतना जगाने के उद्देश्य से ‘चन्देनी गोंदा‘ का गठन किया था। इस संस्था के उद्देश्य के पूर्ण हो जाने के पश्चात उन्होंने 22 फरवरी 1983 को ‘चंदैनी-गोंदा‘ को विसर्जित कर लोकनाट्य ‘कारी‘ की तैयारियों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर दिया था। ‘कारी‘ के निर्देशन का दायित्व अंचल के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी श्री रामहृदय तिवारी जी को सौंप दिया था। ‘कारी‘‘ का प्रथम प्रदर्शन 22 फरवरी 1984 को सिलियारी में हुआ था। दाऊ रामचन्द्र देशमुख जी कालजयी सर्जना लोकनाट्य ‘कारी‘ में सरपंच तथा कथावाचक (छंततंजवत) की दोहरी भूमिका बहुमुखी प्रतिभा के धनी विजय मिश्रा ‘अमित‘ ने बड़ी ही कुशलता से निभायी थी। जहाँ सरपंच की भूमिका में उन्हें छत्तीसगढ़ी में संवाद करना होता था, वहीं कथावाचक की भूमिका में वे हिन्दी में कथानक को गति प्रदान करते थे। वर्तमान में वे छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कंपनीज रायपुर में अतिरिक्त महाप्रबंधक (जनसंपर्क) के पद पर सेवारत रहते हुए अभिनय व लेखन के क्षेत्र में भी सतत साधनारत हैं।

    रायपुर बस स्टेन्ड में जमीन पर सोया
    लोकनाट्य ‘कारी‘ की प्रस्तुति के दौरान अपने संघर्ष को साझा करते हुए विजय मिश्रा ‘अमित‘ बताते हैं कि ‘‘ वर्ष 1984-85 में मैं महासमुंद के एक निजी स्कूल में उच्च श्रेणी शिक्षक के पद पर सेवारत था। तब रात को कारी नाटक की प्रस्तुति के उपरांत मुझे सुबह महासमुंद स्कूल पहुंचना होता था, अतः रात को एक-दो बजे कारी नाटक की समाप्ति के उपरान्त मेन रोड पर आकर खड़ा हो जाता था, ताकि रायपुर बस स्टैंड पहुँचने के लिए गाड़ी उपलब्ध हो सके, अतः किसी भी वाहन कभी ट्रक तो कभी कबाड़ी की गाड़ी को रोक कर मैं रायपुर बस स्टैंड पहुँचने का प्रयास करता था और बस स्टैंड में जमीन पर ही चादर बिछा कर सो जाता था क्योंकि सुबह 4 बजे मुझे महासमुंद के लिए बस मिलती थी। अनेक रातों को रायपुर के बस स्टैंड पर मैं ऐसे ही सोया करता था और सुबह स्कूल पहुंचने के लिए सफर करता था।
    इसी दौरान छत्तीसगढ़ की सुप्रसिद्ध लोक-गायिका कविता विवेक वासनिक जी की संस्था ‘‘अनुरागधारा - राजनांदगाँव‘‘ से भी जुडने का अवसर मिला। अनुरागधारा में अभिनय करने के साथ-साथ उद्घोषक के रूप में भी विशेष पहचान व लोकप्रियता मिली। कविता वासनिक जी के प्रमुख कैसेट ‘धरोहर‘, ‘धनी‘, ‘धुन‘, ‘नहीं माने काली‘ के अलावा लक्ष्मण मस्तुरिया जी के कैसेट मैं छत्तीसगढ़ के माटी अंव में प्रारंभिक उद्घोष का भी बखूबी निर्वहन किया।

    हिन्दी रंगकर्म में भी अभिनय का मनवाया लोहा
    विजय मिश्रा ‘अमित‘ जी वर्ष 1976 में दुर्ग सुप्रसिद्ध संस्था क्षितिज रंग शिविर से जुड़े और अपनी अभिनय-कला का लोहा मनवाने लगे। इस दौरान वे नुक्कड़ नाटक में भी श्री राम ह्दय तिवारी जी के साथ सतत सक्रिय रहे। क्षितिज रंग शिविर के बैनर तले वर्ष 1980 से 1987 तक श्री संतोष जैन जी के निर्देशन में हम क्यों नहीं गाते, घर कहाँ है, अरण्य गाथा, मुर्गी वाला, विरोध, हाथी मरा नहीं है, जैसे कई सुप्रसिद्ध नाटकों का मंचन किया। सन् 1982 में जब टेलीविजन मोहल्ले के इक्का-दुक्का घरों में ही होता था तब उपग्रह दूरदर्शन केंद्र दिल्ली से लोरिक चंदा के दो एपिसोड प्रसारित हुए थे जिसमें विजय मिश्रा ‘अमित‘ ने राजा मेहर की महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। वे दाऊ महासिंह चंद्रकार के सोनहा बिहान से भी जुड़े थे।

    लोकनाट्यों की राष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुति - बलराज साहनी अवाॅर्ड से अंलकृत
    छत्तीसगकढ़ के बहुचर्चित लोकनाट्य कारी और लोरिक चंदा की मूल स्क्रिप्ट भिलाई निवासी सुप्रसिद्ध लेखक श्री प्रेम साइमन ने लिखी थी। दोनों लोक नाट्यों के मंचन की अवधि तीन से चार घण्टों की होती थी। इन दोनों लोकनाटयों का हिन्दी रूपान्तरण एक घंटे की अवधि के लिए अमितजी ने किया। इन नाटकों के संवाद ही हिंदी में लिखे गए, छत्तीसगढ़ी वेशभूषा, छत्तीसगढ़ी नृत्य-गीत, छत्तीसगढ़ के तीज त्यौहार और परम्पराओं से सुसज्जित इन नाटकों को मूल रूप में ही प्रस्तुत किया गया। इनका मंचन ऑल इंडिया ड्रामा काम्पीटिशन इलाहाबाद, उड़ीसा, दिल्ली, महाराष्ट्र , हिमाचल प्रदेश, बरेली, कोलकाता, शिमला, सोलन, भोपाल, नागपुर और जबलपुर में किया गया। इन नाटकों को हर स्पर्धा में सर्वश्रेष्ठ नाटक के अलावा अन्य अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए। हिमाचल प्रदेश में ऑल इंडिया आर्टिस्ट एसोसिएशन ने विजय मिश्रा को इन उपलब्धियों के लिए वर्ष 1996 में बलराज साहनी अवार्ड से अलंकृत किया ।
    राजधानी रायपुर में रहते हुए इन्होंने अनेक छत्तीसगढ़ी फिल्म जैसे - ‘मोही डारे रे‘, ‘पहुना‘, ‘बहुरिया‘, ‘पंचायत के फैसला‘, ‘सोंचत सोंचत प्यार होगे‘ आदि में प्रभावी अभिनय किया। इसके साथ ही दूरदर्शन के अनेक सीरियल व अनेक टेली फिल्म में भी काम किया । विशेष उल्लेखनीय है कि विजय मिश्रा ‘अमित‘ द्वारा लिखित नाटक रिजेक्ट पंडित का प्रसारण, हवा महल से भी हुआ। इनके द्वारा लिखे गए नाटकों, कहानियों तथा कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी रायपुर और जबलपुर से समय-समय पर होता रहा है। अनेक रचनाएँ राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं ।

    चार दशक से अधिक की गौरवमयी कला यात्रा
    40 वर्षों से अधिक की कला यात्रा के दौरान भीष्म साहनी, सुनील दत्त, मोहन गोखले, शफी ईनामदार, पंडित जसराज, जैसे अनेक ख्यातिलब्ध कलाकारों के करकमलों से पुरस्कृत होने का गौरव इन्हें प्राप्त हुआ। विजय मिश्रा ष्अमितष् जी बहुत गर्व के साथ बताते हैं कि उन्हें दाऊ रामचन्द्र देशमुख, दाऊ महासिंह चंद्रकार, दाऊ दीपक चंद्रकार, लक्ष्मण मस्तुरिया, केदार यादव, खुमानलाल साव, गिरिजा कुमार सिन्हा, संतोष कुमार टांक, पंचराम देवदास, शिव कुमार दीपक, भैयालाल हेड़ाऊ, मदन निषाद, गोविंद निर्मलकर, कविता वासनिक, विवेक वासनिक, साधना यादव, अनुराग ठाकुर, शैलजा ठाकुर, ममता चंद्राकर, रामहृदय तिवारी, संतोष जैन,चतरू साहू, कृष्णकुमार चैबे, विनायक अग्रवाल जैसी नामी-गिरामी छत्तीसगढ़ की विभूतियों के साथ काम करने का अवसर मिला ।

    पशु पक्षियों और पर्यावरण संरक्षण में गहरी अभिरुचि
    हिन्दी रंगकर्म, लोकनाट्य सहित लेखन के अलावा श्री विजय मिश्रा ‘अमित‘ जी को पशु पक्षियों और पर्यावरण संरक्षण में गहरी अभिरुचि है। इसके लिए इन्हें भास्कर समूह ने ‘वृक्ष-मित्र सम्मान‘ से सम्मानित किया है। विजय जी ‘पेड़-प्रहरी‘ नामक संस्था का गठन कर अभी तक हजारों वृक्षारोपण कर चुके हैं। वे पर्यटन के भी शौकीन हैं। इसी शौक के चलते उन्होंने कैलाश मानसरोवर, तिब्बत, श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल और थाईलैंड की यात्रा की है।

    अरुण कुमार निगम
    आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

    शौर्यपथ लेख / माननीय मंत्री जी, शराबबंदी के सवाल पर आपके शानदार परफॉर्मेंस के बाद छत्तीसगढ़ राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री जी के बयान का अंश है कि, अब वक्त है पछतावे का । पूर्व चुनाव में आपकी पार्टी का नारा था अब वक्त है बदलाव का । उनके बयान और आपके नारे की तुकबंदी कमाल की है। प्रदेश के आम मतदाताओं के कवियों-लेखकों-बुद्धिजीवियों की ओर से दोनों पार्टियों के मंत्रियों को साष्टांग प्रणाम। बड़े चाहे जैसे भी हों उन्हें प्रणाम करने की भारतीय सनातन परम्परा के इस निर्वहन के बाद कृपया आप ये बतायें कि आपने पिछले विधानसभा चुनाव के समय नारा दिया था, वक्त है बदलाव का। हमने बदल दिया। पर आपको तो सुनाई ही नहीं देता। अब क्या करें ? राईट टू रिकॉल तो अभी है नहीं।
    कोरोना प्रोटोकॉल की मैय्यत के बीच आनंदित भीड़ - रिपोर्टर ने कहा कि आप संस्कृति मंत्री हैं और शराब के कारण संस्कृति खराब हो रही है जिसे आप नहीं सुन पाए। रिपोर्टर ने सरल करके फिर दुहराया पर आप कोरोना प्रोटोकॉल की मैय्यत के बीच वहाँ मौजूद आपके कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ और उनके आनंदमय सन्नाटे के कारण फिर नहीं सुन पाये। हालांकि दो-दो बार पूछे गये सवालों को आपने पूरी शालीनता से सुना,लेकिन आपको फ़िर भी सुनाई ही नहीं दिया तो इसमें आपकी क्या गलती ? उस पूरे सीन में आपका धैर्य और मीडिया के प्रति सम्मान भी देखने को मिला। जिस पर मीडिया का ध्यान ही नहीं गया। इन्हें तो केवल निगेटिव चाहिये।
    बेमिसाल मुस्कान और नासमझ मीडिया - मेरे को सुनाई ही नहीं दिया आप क्या बोले,यह कहते हुए आप आगे बढ़ गए। आदरणीय मंत्रीजी, शराबबंदी के सवाल के जवाब में हल्की मुस्कान के साथ दोनों हाँथ जोड़े आपका आगे सरक जाने वाला वह सीन कमाल का था। आपकी संवाद अदायगी भी बेमिसाल है। पर मीडिया ने आपकी इस अदा को नोटिस ही नहीं किया। प्रॉपर हाईलाइट भी नहीं किया। मुद्दों के बीच मंचीय मैच्योरिटी की जरा भी समझ नहीं हैं मीडिया को। छी।
    बाकी सब माया है - आपके साथ आप पर समर्पित भीड़ भी चुप्प आगे सरक गई। इस दृश्य में पॉजिटिव बात मुझे यह दिखी कि चलते समय मंत्रीजी के दोनों हाँथों की पूरी की पूरी दसों उंगलियां जुड़ी हुई थीं। यानी हमारे सर जी बहुत विनम्र जननेता हैं। जिन्हें जिले की कमान मिली है उनमें आलाकमान ने कुछ तो देखा होगा? सच्चाई यही है। बाकी सब माया है।
    नशा शराब में होता तो नाचती बोतल - हमारे लोकतांत्रिक इतिहास के अनुसार नेताओं के कान की क़्वालिटी पर सवाल दागना या शराब की बंदी-बिक्री या नष्ट होती संस्कृति से संबंधित सवाल करना क्या एक्सपायरी डेट की रिपोर्टिंग नहीं थी ? सरेआम, दिनदहाड़े और वह भी मंत्री जी के प्रभारी बनने के बाद प्रथम नगर आगमन के शुभ दिवस में ऐतिहासिक उत्साह और आनंद के मौसम में रिपोर्टर का दारू पर प्रश्न उठाना निहायत ही असभ्य हरकत थी। तो सारे सुबूतों और गवाहों को मद्दे नज़र रखते हुये यह अदालत इस नतीजे पर पहुंचती है कि पूछने वाले का दिमाग ही खराब रहा होगा। कान एकदम ठीक थे। अदालत का यह भी मानना है कि रिपोर्टर ने शायद फिल्म शराबी भी नहीं देखी है। अन्यथा उसे पता होता कि नशा शराब में होता तो नाचती बोतल, नशे में कौन नहीं है ये बताओ जरा ?
    आप आम निचोड़ कर खाते हैं कि चूसकर - शराब पर रिपोर्टर के सतही ज्ञान को देखकर मंत्रीजी रिपोर्टर पर तरस खाकर आगे बढ़ गये होंगे। कुछ तो ढंग का सवाल करना था। अभी आम का सीजन है तो उस बंबईया स्टार की तरह ही पूछ लेना था। मंत्री जी, आप आम कौन सा खाते हैं? कैसे खाते हैं ? पिजगोल (निचोड़) कर खाते हैं कि चूसकर खाते है ? पर रिपोर्टर ने तो खाने की जगह बेधड़क पीने पर ही सवाल दाग दिया। इसलिए भी चौथा स्तंभ बदनाम है। सरेआम ऐसी बेशर्म और बेधड़क रिपोर्टिंग ? छी।
    अकेल्ला- दुकेल्ला में - आदरणीय मंत्री जी, इस घटना के वीडियो को देखने के बाद लोग बौरा गए हैं। वे तरह-तरह के गोठिया रहे हैं। एक पूछता है, जब मीडिया के द्वारा, इतने लोगों के बीच, वो भी माइक में,सरेआम पूछे गए सवाल का वे अइसन दुर्गति कर सकते हैं तो अकेल्ला- दुकेल्ला में आम आदमी का वे कतका जंउहर करेंगे? ये सवाल ला सुनके तो मोर कान के संग दिमाग हा तको काम नहीं करत हे।
    : योगेश अग्रवाल, एक मतदाता ।

    शौर्यपथ लेख / ‘‘शाम सुबह की हवा लाख रूपये की दवा‘‘ इस बात को अपने बुजुर्गों से सुनते मैंने बचपन से प्रातः भ्रमण को अपनी दिनचर्या में शामिल किया। इससे ताजी हवा से तन-मन प्रसन्न रहता है और अच्छे विचारों की उत्पत्ति भी होती है। अपनी इसी दिनचर्या के अनुरूप पिछले रविवार को सुबह चार बजे प्रातः भ्रमण के लिए मैं निकल पड़ा था। चलते-चलते मुझे अचानक किसी के सिसकने की आवाज सुनाई दी। मेरे कदम उस दिशा में बढ़ चले जहां से रोने-सिसकने की आवाज आ रही थी। आगे जाकर मैंने देखा कि काले धागे में गंूथे मिर्च और नीबू एक-दूसरे से लिपट कर रो रहे है। मैंने उन्हें बड़े प्यार से उठाया और पूछा, क्या बात हैं, क्यों रो रहे हो आप लोग i
    मेरा यह प्रश्न सुनते ही मिर्च और नीबू गुस्से से लाल हो उठे। नीबू ने कहा - ज्यादा दया दिखाने की जरूरत नहीं है। तुम लोगों की वजह से ही हम नीबू और मिर्च परिवार के लोगों को ऐसी तकलीफ का सामना करना पड़ रहा है। सुई-धागा में एक साथ नीबू और मिर्च को पिरो कर तुम लोग घर-दुकान अथवा मोटर गाड़ी में लटका कर रखते हो। जरा सोचों तुम्हें जब सुई चुभती है, कांटा गड़ता है तो कितनी पीड़ा होती है। हमें भी सुई-धागे में तुम पिरोते हो तो हम दर्द के मारे कराह उठते है, पर दूसरे के दुख दर्द में हंसने वाले तुम लोग क्या समझोगे नीबू और मिर्च की पीड़ा।
    मैंने इस पर नीबू को सहलाते हुए कहा - दरअसल टोना-टोटका और बुरी नजर से बचने के लिए ऐसा किया जाता है। मेरे इस जवाब से लाल मिर्ची भड़कते हुए बोली- यह पूरी तरह से अंधविश्वास है। कान खोल कर सुन लो, जिस नीबू और मिर्च को उपजाने में किसान की मेहनत, पसीना के साथ-साथ पानी, बिजली और खाद का उपयोग भी होता है। उसे दरवाजे पर लटका कर दूसरे दिन सडक पर फेंक देते हो, जो कि राहगीरों के जूते चप्पल, मोटर गाड़ियों के चक्के तले कुचल कर बरबाद हो जाते हैं। ऐसा करते समय भूल जाते हो कि बहुमूल्य नीबू-मिर्च को अंधविश्वास के चक्कर में टांगने-फेंकने से तुम्हारी सदगति नहीं, दुर्गति ही होगी।
    मिर्च की बात सुनकर अपनी गलती का अहसास करते हुए मैंने कहा - हां मिर्च बहन, तुम ठीक कह रही हो। तुम्हारी बाते सुन कर मेरी आत्मा से यही आवाज आ रही है कि सेहत के लिए बहुपयोगी नीबू,मिर्च का ऐसा दुरूपयोग करना मानव समुदाय के लिए अनिष्टकारक है। दुनिया कहां से कहां पहंुच गई है, फिर भी अंधविश्वास में डूबे लोग अपना समय, श्रम और पैसों की बर्बादी के साथ मन को कमजोर बनाये हुए जी रहे है।
    मेरी बात को बीच में टोंकते हुए नीबू ने कहा - इंसान बेहद स्वार्थी होता है, नीबू मिरची की तो बात ही छोड़ो, वह अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए जीव जन्तुओं की बलि देने से भी बाज नहीं आता है। पढा-लिखा ज्ञानीजन भी अंधविश्वास के मकड़जाल में फंसा हुआ है। मेहनत की महिमा का मर्म समझने के बजाय नीबू मिर्च लटकाने और जीवों की हत्या को अपनी सदगति का राह मान रहा है। सच तो यह है कि सदगति तभी मिलेगी जब पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं के प्रति इंसान दया भाव रखेगा। अपनी मेहनत से कमाये धन-दौलत में से कुछ अंश को दीनहीन, गरीब असहाय मानव सेवा में लगायेगा।
    बिल्कुल सही बात कह रहे हो नीबू भाई, कहते हुए मिर्ची उंची आवाज में बोली - अगर थोड़ी भी समझदारी इंसानों में है तो हमारा तो यहीं कहना है कि नीबू और मिर्च रोज खरीदे, ताकि इसे बेचने वालों का भी जीवन निर्वाह हो सके। लेकिन इसे खरीद कर बर्बाद कर देने से अच्छा है कि किसी गरीब मजदूर को दान दे देना। ऐसा करने से इंसान के मेहनत की कमाई का सदुपयोग, किसान के श्रम का सम्मान और गरीब मजदूरों के आशीर्वाद की भी प्राप्ति होगी। यह ऐसा आशीर्वाद होगा जो कि सदैव दानदाता के मन को मजबूत बनायेगा और अंधविश्वास जैसे ढकोसलों से दूर रखेगा।
    नीबू और मिर्च से बातचीत समाप्त करके मैं घर की ओर लौटने लगा। मेरे मन में उस समय यह भी विचार बार-बार आ रहे थे कि नीबू का उपयोग पूजा पाठ में होता है। मां दुर्गा और काली के लिए गहने का स्वरूप होता है, अतः इसे फेंकना सचमुच अनिष्टकारी हैं।
    विजय मिश्रा 'अमित'
    अतिरिक्त महाप्रबंधक (जनसंपर्क)
    छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कम्पनी

          सम्पादकीय लेख /शौर्यपथ /अब भाषा पर गौर फरमाइए। व्यक्ति लालची नही है। Dr लालची है। एक पद, एक टाइटल एक नाम। जब कोई आतंकी पकड़ा या मारा जाता है तो दुनिया भर के सेक्युलर आकर दुहाई देते हैं कि आतंकवाद की कोई जाति नही होती। कोई नेता भ्रष्टाचार के आरोप में अंदर हो जाता है तो संसद भवन बन्द कराने की मांग नही की जाती पर डॉक्टर लालची हो जाता है।
    घर में जब कोई बच्चा पैदा होता है उस दिन से माँ बाप का सपना या तो उसे Dr बनाने का होता है या इंजीनियर। अगर औलाद वाकई काबिल हो तो कभी कभी ये सपना पूरा भी हो जाता है। भारत में जहां एक सीट पर लाखों के सपने सजे होते हैं वहां 67% तक पहुच चुके आरक्षण के बीच कोई विरला ही इस मुकाम को अपनी अथक मेहनत से हासिल कर पाता है।
    इस कलियुग में Dr को जान बचाने वाला और धरती पर भगवान का रूप माना जाता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि कोई भी पद, प्रतिष्ठान बिना व्यक्ति के लिए नही चल सकता और कोई व्यक्ति सम्पूर्ण नही हो सकता। ईमानदारी वो बीमारी है जो आजकल संक्रामक नही है। जितना मुश्किल इस देश मे डॉक्टर बनना है उतना ही मुश्किल ईमानदार रह पाना।
    सेलेक्शन के बाद भी महंगे कॉलेज की मोटी फीस, 5 साल की डिग्री के बाद 3 साल की pg डिग्री लेकर एक युवा जब भारत के हेल्थ सिस्टम में उतरता है तब खुद को युवा नही पाता। कभी कर्जे से डूबा युवा अचानक इस बाजार में खुद को पाकर उस प्यासे की तरह हो जाता है जिसे अचानक रेगिस्तान में झील मिल गई हो। कुछ वाकई जल्दी सफल डॉक्टर होने की लालसा में अच्छा इंसान बनने में असफल हो जाते हैं।
    एक प्रयोग की याद आती है। एक व्यक्ति ने तीन नई वस्तुएं 1 टायर ट्यूब एक टीवी और एक फ्रीज लिया। फिर तीनों को लेकर उनके उनके रिपेयरिंग शॉप्स पर लेकर गया और बताया कि इन सभी उपकरणों में शायद कोई समस्या आ रही है। फ्रीज वाले ने बताया भाई कंडेनसर खराब है 10000 लगेगा, टीवी वाले ने 5000 और टायर टयूब वाले ने 80 रुपये दो पंचर के बताए।
    सभी का मेहनताना अदा करने के बाद जब व्यक्ति सभी उपकरणों के सही होने की जांच के कागजात लेकर सभी के पास पंहुचा तो सभी ने अपने काम मे कोई भी गड़बड़ी होने की संभावना से इनकार कर दिया। एक ने तो अमुक कंपनी को चीनी- फर्जी बता दिया दूसरे ने कस्टमर को झूठा कह दिया। टायर वाले ने थोड़ी ईमानदारी दिखाई और गलती मानीं पर साथ ही उंसने ये भी कह दिया कि वो ईमानदार है क्योकि उंसने दो पंचर गिनाए पर वो 4 भी बता सकता था। इस घटना से हमको इस बाद का पता चलता है कि भ्रष्टाचार का व्यक्ति की जरूरतों से नही उसकी इच्छाओं, उसके लालच उसके जल्द सफल होने की भावना से संबंध होता है। जो 10 रुपये का भ्रष्टाचार कर सकता है वो 10 का ही करता है क्योकि मौका उतना ही मिल पाता है। पर यदि इसे मौका मिला तो बड़े लेवल का भ्रष्टाचार भी जरूर करना चाहेगा। यदि अधिकारी होता तो लाखों का करता नेता बन पाता तो सपने करोडों के होते।
    इससे एक बात सिद्ध होती है। भ्रष्टाचार की पहुच ऊपर से नीचे नही नीचे से ऊपर है। पैसे देखकर दिमाग नही फिरता, फिरे दिमाग को पैसा ही दिखता है।
    आजकल बाबाजी के विवादित बयान के बाद एक अजीब जंग छिड़ी हुई है एलोपैथी और आयुर्वेद के बीच। आयुर्वेद समर्थक आयुर्वेद को इसलिए श्रेष्ठ बता रहे क्योकि आज तक किसी आयुर्वेदाचार्य ने किसी मरीज की किडनी नही बेची। सस्ते दरों पर काम किया और लाखों का बिल नही थमाया। पहली नजर में ये बात तो सही लगती है पर जब हम टायर वाले उदाहरण पर ध्यान देते हैं तब हमें अहसास होता है कि चोरी छोटी बड़ी तो हो सकती है लेकिन चोरी की नीयत एक समान ही होती है। जो जितना भ्रष्ट उतना सफल भ्रष्टाचारी।
    कहने का मतलब ये बीमारी किसी पैथी विशेष से जुड़ी हुई नही है। अपनी योग्यता अनुसार ही कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार कर सकता है। न एलोपैथी कोई गंदा नाला है न आयुर्वेद कोई बहती गंगा। अच्छे बुरे दोनो तरह के लोग दोनो ही विधा में पाए जाते हैं। पर आयुर्वेद का बाजार आज भारत मे तुलनात्मक रूप से कमजोर नजर आता है जिसमे हालिया कुछ वर्षों में जरूर सुधार हुआ है और स्वदेशी पद्धति का तमगा मिलने के चलते लोग खुद को आयुर्वेद से जोड़कर सपोर्ट करते नजर आ रहे।पर बड़े आश्चर्य की बात है कि एलोपैथी शब्द हमें एलोपैथी की किसी भी किताब में नही मिलता। विदेशी माने जाने वाली एलोपैथी का नाम विदेशियों ने भी कम ही सुना है। असल मे भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश में ये शब्द ज्यादा प्रचलित है।
    किताबें तो इन्हें मॉडर्न मेडिकल साइंस ही कहती है जिसमें कोई पैथियों का बंधन ही नही है। यहां तक कि माईग्रेन जैसी बीमारियों में किताबें योगा की अनुशंसा करती है।
    आधुनिक मेडिकल साइंस एक एविडेंस बेस्ड सिस्टम है जिसने यूरोपीय चिकित्सा पद्धति, यूनानी चिकित्सा पद्धति, होमियोपैथी और हमारे आयुर्वेद सभी से कुछ न कुछ लिया है। बल्कि उसे और परिष्कृत किया है।
    उदाहरण के तौर पर सिनकोना की छाल का उपयोग मलेरिया की दवा के तौर पर सदियों से किया जा रहा है जो घरेलू पद्धति है। इसी दवा को कुनैन के रूप में खोजकर उसे अलग कर इलाज करने में आधुनिक चिकित्सा ने सफलता प्राप्त की। अलग इसलिए किया गया क्योंकि सिनकोना की छाल में इस कुनैन के अलावा भी दूसरे अल्कालोइड होते थे जो नुकसान पहुचाते थे।जब कुनैन का असर कम होने लगा तब चीनी चिकित्सा पद्धति की सहायता से नई दवाएं खोजी गई। ये सभी पद्धतियों की एकता का एक खूबसूरत उदाहरण है। क्योकि यहां शत्रु कोरोना जैसी बीमारियां है न कि चिकित्सा पद्धतियां।
    अब तो दूसरी पद्धति की टांग खिंचकर उसे स्टुपिड साइंस तक कहने तक हमारा पतन हो चुका है।
    कोई राजनीतिक पार्टी इसलिए वैक्सीन का विरोध कर रही क्योंकि उसको राजनीतिक टांग खिंचाई करनी है। उसके अपने स्वार्थ हैं। कोई इसलिए कर रहा क्योकि अपनी दवा बेचना चाहता है पर इस लड़ाई में पीस तो वो जनता रही है जिसे न आयुर्वेद का पता है न एलोपैथी का।क्या आधुनिक चिकित्सा पद्धति को एलोपैथी नाम देकर उस भारतीय योगदान को भुलाने का षड्यंत्र रचा गया है जिसकी शुरु
    वात आधुनिक चिकित्सा पद्धति के जनक चरक और आधुनिक शल्य चिकित्सा के प्रणेता सुश्रुत ने की थी। यदि नालंदा विश्वविद्यालय न जलाया गया होता खिलजी द्वारा तो संभव था आधुनिक चिकित्सा पद्धति में आयुर्वेद का स्थान बहुत ज्यादा होता।
    ये जो लड़ाइयां चल रही कि तुम्हारा कुत्ता, कुत्ता,मेरा कुत्ता टॉमी ये बचकाने सोच की मिसाल है। सच तो यही है कि सभी पद्धतियों को आज कोरोना के खिलाफ खड़े होने की जरूरत है न कि आपस मे लड़ने की, वरना जो गलती पुराने हिन्दू राजाओं ने की वही फिर दोहराई जाएगी। युद्ध गौरी(कोरोना) से है तो जयचंद बनकर पृथ्वी की तबाही का कारण न बनें बल्कि कोरोना वारियर्स का सम्मान करें, उनकी मृत्यु का मज़ाक न बनाएं बल्कि उनका हौसला बढ़ाएं और मिलकर देश को कोरोना मुक्त बनाएं।

    सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ /बेटा चल छत पर चलें कल तो तेरी शादी है, आज हम माँ बेटी पूरी रात बातें करेंगे। चल तेरे सिर की मालिश कर दूँ, तुझे अपनी गोद में सुलाऊँ कहते कहते आशा जी की आँखें बरस पड़ती हैं। विशाखा उनके आंसू पोंछते हुए कहती है ऐसे मत रो माँ, मैं कौन सा विदेश जा रही हूँ। 2 घण्टे लगते हैं आगरा से मथुरा आने में जब चाहूंगी तब आ जाऊँगी।
    विदा हो जाती है विशाखा माँ की ढेर सारी सीख लिए, मन में छोटे भाई बहनों का प्यार लिये, पापा का आशीर्वाद लिये। दादा-दादी, चाचा-चाची, मामा-मामी, बुआ-फूफा, मौसी-मौसा सबकी ढेर सारी यादों के साथ। जल्दी आना बिटिया, आती रहना बिटिया कहते हाथ हिलाते सबके चेहरे धुंधले हो गए थे विशाखा के आंसुओं से। संग बैठे आकाश उसे चुप कराते हुए कहते हैं सोच लो पढ़ाई करने बाहर जा रही हो। जब मन करे चली आना।
    शादी के 1 साल बाद ही विशाखा के दादाजी की मृत्यु हो गयी, उस समय वो आकाश के मामा की बेटी की शादी में गयी थी, आकाश विशाखा से कहता है ऐसे शादी छोड़ कर कैसे जाएंगे विशु, दादाजी को एक न एक दिन तो जाना ही था। फिर चली जाना, चुप थी विशाखा क्योंकि माँ ने सिखा कर भेजा था अब वही तेरा घर है, जो वो लोग कहें वही करना। 6 महीने पहले आनंद भईया (मामा के बेटे) की शादी में भी नहीं जा पायी थी क्योंकि सासु माँ बीमार थीं।
    अब विशाखा 1 बेटी की माँ बन चुकी थी, जब उसका पांचवा महीना चल रहा था तभी चाची की बिटिया की शादी पड़ी थी, सासू माँ ने कहा दिया ऐसी हालत में कहाँ जाओगी। वो सोचती है,कैसी हालत सुबह से लेकर शाम तक सब काम करती हूँ, ठीक तो हूँ इस बार उसका बहुत मन था, इसलिए उसने आकाश से कहा मम्मी जी से बात करे और उसे शादी में लेकर चले, चाची का फोन भी आया था आकाश के पास, तो उन्होंने कहा दिया आप लोग जिद करेंगे तो मैं ले आऊँगा लेकिन कुछ गड़बड़ हुई तो जिम्मेदारी आपकी होगी। फिर तो माँ ने ही मना कर दिया, रहने दे बेटा कुछ भी हुआ तो तेरे ससुराल वाले बहुत नाराज हो जाएंगे।
    वैसे तो ससुराल में विशाखा को कोई कष्ट नहीं था, किसी चीज की कमी भी नहीं थी, फिर भी उसे लगता था जैसे उसे जिम्मेदारियों का मुकुट पहना दिया गया हो। उसके आने से पहले भी तो लोग बीमार पड़ते होंगे, तो कैसे सम्भलता था ! उसके आने से पहले भी तो उनके घर में शादी ब्याह पड़ते होंगे, तो आज अगर वो किसी समारोह में न जाकर अपने मायके के समारोह में चली जाए तो क्या गलत हो जाएगा।
    दिन बीत रहे थे कभी 4 दिन कभी 8 दिन के लिए वो अपने मायके जाती थी और बुझे मन से लौट आती थी।विशाखा के ननद की शादी ठीक हो गयी है, उन दोनों का रिश्ता बहनो या दोस्तों जैसा है। अपनी ननद सुरभि की वजह से ही उसे ससुराल में कभी अकेलापन नहीं लगा। सुरभि की शादी होने से विशाखा जितनी खुश थी उतनी ही उदास भी थी, उसके बिना ससुराल की कल्पना भी उसके आंखों में आंसू भर देती थी।
    विशाखा ने शादी की सारी जिम्मेदारी बहुत अच्छे से संभाल ली थी, उसको दूसरा बच्चा होने वाला है, चौथे महीने की प्रेगनेंसी है फिर भी वो घर-बाहर का हर काम कर ले रही है। सभी रिश्तेदार विशाखा की सास से कह रहे हैं बड़ी किस्मत वाली हो जो विशाखा जैसी बहु पायी हो।
    शादी का दिन भी आ गया, आज विशाखा के आँसू रुक ही नहीं रहे थे, दोनों ननद भाभी एक दूसरे को पकड़े रो रही थीं, तभी विशाखा की सास उसे समझाते हुए कहती हैं, ऐसे मत रो बेटा, कोई विदेश थोड़े ही जा रही हो जब चाहे तब आ जाना। तब सुरभि कहती है, नहीं माँ जब दिल चाहे तब नहीं आ पाऊँगी। वो पूछती हैं ऐसे क्यों कहा रही हो बेटा, माँ के पास क्यों नहीं आओगी तुम ?
    तब सुरभि कहती है, "कैसे आऊँगी माँ हो सकता जब मेरा आने का मन करे तब मेरे ससुराल में कोई बीमार पड़ जाए, कभी किसी की शादी पड़ जाए या कभी मेरा पति ही कह दे तुम अपने रिस्क पे जाओ कुछ हुआ तो फिर मुझसे मत कहना। सब एकदम अवाक रह जाते हैं, वो लोग विशाखा की तरफ देखने लगते हैं, तभी सुरभि कहने लगती है, नहीं माँ भाभी ने कभी मुझसे कुछ नहीं कहा लेकिन मैंने देखा था उनकी सूजी हुई आंखों को जब उनके दादा जी की मौत पर आप लोग शादी का जश्न मना रहे थे।
    मैंने महसूस की है वो बेचैनी जब आपको बुखार होने के चलते वो अपने भईया की शादी में नहीं जा पा रही थीं। मैंने महसूस किया है उस घुटन को जब भैया ने उन्हें उनकी चाची की बेटी की शादी में जाने से मना कर दिया था, उन भईया ने जिन्होंने उनकी विदाई के वक़्त कहा था सोच लो तुम बाहर पढऩे जा रही हो जब मन करे तब आ जाना। आपको नहीं पता भईया आपने भाभी का विश्वास तोड़ा है।
    कल को मेरे ससुराल वाले भी मुझे छोटे भईया की शादी में न आने दें तो, सोचा है कभी आपने। पापा हमारी गुडिय़ा तो आपकी जान है, कभी सोचा है आप सबने कल को पापा को कुछ हो जाये और गुडिय़ा के ससुराल वाले उसे न आने दें। कभी भाभी की जगह खुद को रख कर देखिएगा, एक लड़की अपने जीवन के 24-25 साल जिस घर में गुजारती है, जिन रिश्तों के प्यार की खुशबू से उसका जीवन भरा होता है उसको उसी घर जाने, उन रिश्तों को महसूस करने से रोक दिया जाता है।
    मुझे माफ़ कर दीजिए भाभी मैं आपके लिए कुछ नहीं कर पाई, जिन रिश्तों में बांधकर हम आपको अपने घर लाये थे वही रिश्ते वही बन्धन आपकी बेडिय़ाँ बन गए और ये कहते-कहते सुरभि विशाखा के गले लग जाती है। आज सबकी आंखें नम थी, सबके सिर अपनी गलतियों के बोझ से झुके हुए थे।
    दोस्तों ये किसी एक घर की कहानी नहीं बल्कि हर घर की यही कहानी है, हमारे देश के समाज में शादी होते ही लड़कियों की प्राथमिकताएं बदल दी जाती हैं। अपना परिवार अपना घर ही पराया हो जाता है और उसे वहाँ जाने के लिए उसे दूसरों की आज्ञा लेनी पड़ती है। अगर हो सके तो इस लेख को पढ़कर आप सब भी इस पर गौर जरूर फरमाइयेगा। और हो सके तो बहु को उसके माता-पिता के घर आने-जाने की आज़ादी जरूर दिजियेगा।
    (लेखक के अपने विचार है )

    रायपुर / शौर्यपथ / श्री रावतपुरा सरकार यूनिवर्सिटी रायपुर में अध्यनरत बी.ए. एल.एल.बी. प्रथम वर्ष छात्रा (BA.L.LB. ¹St Year student) जयंती(निकिता) नायक ने हमारे जीवन मे वृक्षो की भुमिका बताते हुए अपने विचार व्यक्त किये।

    हमारे जीवन मे वृक्षो की महत्व

    पेड़ हमारे जीवन में भोजन और पानी की तरह ही महत्वपूर्ण है। पेड़ के बिना जीवन बहुत कठिन बन जाएगा या हम यह कह सकते है कि जीवन खत्म हो जायेगा क्योंकि हमे स्वस्थ और समृद्ध जीवन देने में पेड़ बहुत मुख्य पहलु है । पेड़ हमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष जीवन प्रदान करता है क्योंकि ये ऑक्सीजन उत्पादन CO² उपभोग का स्त्रोत और बारिश का स्त्रोत है। प्रकृति की ओर से मानव को दिया गया ये सबसे अनमोल उपहार है जिसका हमे आभारी होना चाहिए तथा इसको सम्मान देने के साथ ही मानवता की भलाई के लिए संरक्षित करना चाहिए। धरती और धरती पर निवास करने वाले प्रत्येक जीव के लिए पेड़–पौधों जीवनदायि महत्व रखते है। बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से निपटने के लिए पेड़–पौधों ही सबसे मजबूत ढाल है। हर व्यक्ति कम से कम एक पौधा जरूर रोपित करे और दूसरों को भी पौधारोपण करने के लिए प्रेरित करे. पेड़–पौधें ही पर्यावरण के रंछक होने के साथ उनको स्वच्छ भी बनाते हैं। इसके बिना कोई भी अपने जीवन की संभावना नहीं कर सकता। इसलिए लोगों को पेड़–पौधे लगाने के कार्य आगे आना चाहिए। लेकिन वर्तमान में लोग अपने भौतिक सुख– सुविधाओं के लिए जंगलों,वनो, को काट कर इस धरती को पेड़ विहीन बना रहे है। यह भी एक प्रकार से पर्यावरण की अवहेलना करना है, इससे पर्यावरण अपमानित हो रही है जिसके परिणाम स्वरूप हमे कई प्रकार की आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है। और देखा जाए तो हम कर भी रहे हैं कोरोना वायरस(COVID–19) महामारी से यह भी एक प्रकार से प्राकृति का अभिशाप ही है। इस महामारी के दौरान ऑक्सिजन की अभाव के कारण कई लोगों की मृत्यु हो रही है। अगर लोग अभी भी जागरूक नहीं होंगे तो पृथ्वी संकट में पड़ सकती है। “सांसे चल रही है पर शुद्ध हवा नहीं सब बराबर के गुनहगार है इसमें, दोष किसी एक का नहीं, सम्भल जाओ अभी भी वक़्त है, अभी सब कुछ लुटा नहीं।” सभी पाठकों से मेरी निवेदन है कि वृक्ष रोपण करके पृथ्वी व अपने स्वयं के जीवन को संरक्षित करे। आप मानेंगे बात तभी तो सुधरेंगे ना हालात।
    सर्वे भवन्तु सुखिनः।
    सर्वे सन्तु निरामया।।

    शौर्य की बातें / आयुर्वेद का जन्म, ऋग्वेद से एक उपवेद या शाखा की तरह हुआ जिसे अनगिनत प्रयोगों के बाद तब के वैज्ञानिक जिन्हें आज हम ऋषि मुनि की संज्ञा देते हैं उनके द्वारा शुरू हुआ। ऐसा माना जाता है कि महर्षि अग्निवेश ने सर्वप्रथम इसका सफलतापूर्वक प्रयोग किया और लिपिबद्ध किया। महर्षि चरक ने इस ज्ञान को अपनाया और इसका अभूतपूर्व विकास किया। जिस कारण से वो मॉडर्न मेडिसिन के जनक कहे जाते हैं। 2600 साल पहले ही भारत ने इतनी उन्नति कर ली थी। इनकी लिखी पुस्तकें चरक संहिता आज आयुर्वेद का आधार बनी।चरक संहिता 8 भागों में विभाजित है जिसमे 12000 श्लोक हैं और 1 लाख औषधीय वनस्पतियों का वर्णन है जिससे 2000 दवाओं का निर्माण भी हुआ है। आयुर्वेद मुख्यतः 3 दोषों वात, पित्त और कफ को आधार मानकर चिकित्सा से ज्यादा प्रिवेंशन यानी बचाव को महत्व देता है और शरीर को स्वस्थ्य बनाने की अनुशंसा करता है।
    हमारे पौराणिक ज्ञान में एक बड़े आधार स्तंभ के रूप में महर्षि सुश्रुत का नाम आता है जिन्होंने शल्य चिकित्सा( सर्जरी) की शुरुवात प्राचीन भारत मे ही कर दी थी। इनका जन्म विश्वामित्र के पुत्र के रूप में हुआ था और इनको गायत्री मंत्र का रचयिता भी माना जाता है। इनकी सुश्रुत संहिता का आयुर्वेद में बड़ा महत्व है।देवभूमि वाराणसी में इन्होंने बहुत से असाध्य रोगों का इलाज किया जब अन्य देश केवल मारकाट और अंधविश्वास में लिप्त थे तब भारत मे तक्षशिला और फिर नालंदा यूनिवर्सिटी की नींव पड़ चुकी थी। पूरे विश्व से यहां लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे। इतिहास में दर्ज अनेक अत्याचारों में से एक कुत्सित इतिहास का वर्णन यहां करना होगा।
    एक बार खिलजी वंश के शासक बख्तियार खिलजी की तबियत बिगड़ी और उसका इलाज किसी भी हकीम से संभव न हो सका। तब किसी ने उन्हें नालंदा यूनिवर्सिटी से संपर्क करने की सलाह दी। बख्तियार मान गए पर शर्त थी बिना किसी दवा के इस्लामिक तरीके से इलाज। वहां के आयुर्वेदाचार्य ने उन्हें कुरान भेंट की और उसे पढ़ने की सलाह दी। खिलजी पढ़ने लगे साथ ही उनके स्वास्थ्य में अभूतपूर्व सुधार आने लगा। जल्द ही वो हष्ट पुष्ट तंदरुस्त हो गए पर शक से भी घिर गए। अपने गुप्तचरों से जानकारी हासिल करने के बाद उनके पैरों तले जमीन खिसक गई जब उनको पता चला कि कुरान के पेजों पर आयुर्वेदिक दवा का लेप किया गया था। जिसे चाट कर पेज पलटने की आदत के कारण उनका स्वास्थ्य ठीक होता चला गया। ये सुनकर खिलजी का मिजाज बिगड़ गया और इस धरोहर इस भारतीय शक्ति जिसमे विश्वगुरु बनने की क्षमताएं थी उसे नष्ट करने का संकल्प लिया गया।
    कहते हैं बौध्य् भिक्षुओं, आचार्यो का कत्लेआम किया गया और नालंदा विश्वविद्यालय को आग लगा दी गई जो 6 महीने जलती रही अपने साथ 90 लाख किताबों का ज्ञान समेटे, राख में सिमट गई। शायद साँप को दूध न पिलाने का ज्ञान उस विश्व विद्यालय ने नही सिखाया था। ज्ञान की ये विरासत भारत से अरबों को और अरबों से यूरोपियनों को मिला। उसी आधार पर उनकी मेहनत ने एलोपैथी को विकसित किया जो आज के आधुनिक विज्ञान का आधार स्तंभ है।
    स्पष्ट है कि आयुर्वेद और एलोपैथी दो अलग अलग ज्ञान न होकर एक ही विज्ञान के अंश हैं। लेकिन कोई भी सभ्यता कोई भी ज्ञान स्वार्थियो और अधर्मियों से अछूता नही रह सका। चिकित्सा जब ज्ञान से व्यापार बनी तो धूर्त व्यावसायिक कंपनियों ने इसे ओवरटेक करना शुरू कर दिया।भारतीय आस्थाओं का दुरुपयोग करते हुए अब आयुर्वेद के नाम का फायदा उठाते हुए जबरदस्ती के दावों के दौर शुरू हो गया। सड़को पर बाबा बन लोग मजमा लगाकर दवा, जड़ीबूटी, विभूति, लिंग वर्धक यंत्र, ताबीज, भस्म सब बेचना शुरू कर दिया। आयुर्वेद का प्रचार कोई आयुर्वेदाचार्य करे पर योगगुरुओ ने भी आयुर्वेद पर अधिकार जमाना शुरू कर दिया और एलोपैथी को शून्य बताने का षड्यंत्र भी शुरू कर दिया।यह बात तय है कि इन्होंने याेग का परचम पूरी दुनिया में लहराया है,और जन जन में योग और व्यायाम के महत्व को पंहुचाया है ।लेकिन जब कल्पना से अधिक प्रसिद्धि, शोहरत और दौलत मिल जाय, तो उसे पचा नही पाते, और खुद को ईश्वर समझने लगते हैं, और उसी भावावेष में जिस दुनिया ने मान सम्मान दिया है, उसी का अपमान करना शरू कर देते हैं । अपने आपको बड़ा साबित करने के लिये दूसराें को छोटा साबित करना एक ओछापन है, बेशक आप अपनी लाईन बड़ी करिये, पर दूसरों की लाईन मिटाकर बड़ा बनने का ख्वाब मूर्खता की निशानी है, सम्हल जाओ बाबाजी, वरना आपका अहं ( सबकुछ मैं ही हूं ) आपको बरबाद कर देगा । क्योंकि वक्त की मार बहुत खतरनाक होती है, ये किसी को नही छोड़ती।
    यदि हर मर्ज की दवा खोजी जा चुकी होती किसी भी पैथी में, तो आज कोई अंधा कोई गूंगा कोई काना कोई बहरा नही होता। क्या भैंगेपन का इलाज आयुर्वेद में अब तक है बाबाजी? अगर कोरोनिल से कोरोना 3 दिन में ठीक हो सकता तो आपके पतंजलि के पदाधिकारियों की मृत्यु कोरोना से नही होती न 82 पॉजिटिव मिलते।
    पहले आयुष मंत्रालय से प्रमाणित कहा पर खंडन खुद आयुष मंत्रालय ने किया। फिर डब्लू एच ओ ने सर्टिफिकेट दे दिया कहा पर उसी ने ट्वीट कर मना किया। आखिर ऐसे झूठे दावों से सिवाय बदनामी के क्या हासिल होगा बाबाजी? क्यो आप आयुर्वेद और पतंजलि का नाम खराब करने में लगे हैं?
    एलोपैथी ने तो कभी सम्पूर्ण विजय का दावा नही किया चाहे वो दवा हो चाहे वैक्सीन। कई इलाजों का पहले प्रयोग किया चाहे वो प्लाज़्मा थेरेपी हो, अजिथ्रोमायसिन, ivermectin हो या ओवर use of स्टेरॉयड हो। एलोपैथी ने बार बार गलतियों में सुधार किया और बेहतर विकल्प तलाशा और आज भी तलाश रहे हैं।
    क्या यही विनम्रता आयुर्वेद में नही आ सकती? क्यो आप उसी दवा पर टिके हैं जिसकी खोज भी आपने नही की। अश्वगंधा, गिलोय और तुलसी का प्रयोग तो सदियों से किया जा रहा है। तो क्या पहले लोग मरते नही थे? कोरोनिल को संजीवनी बूटी की तरह प्रस्तूत करने के पीछे आपका व्यावसायिक हित हो या आपके ज्ञान की कमी पर डॉक्टर की मृत्यु का उपहास उड़ना आपके इंसानियत पर भी सवाल उठाता है। जिन फ्रंट लाइन कोरोना वारियर्स पर मोदी जी ने हैलीकॉप्टर से फूल बरसाए आपने उन्ही doctors को अपनी मौत का कारण उन्ही की दवाओं को बता दिया और उपहास किया? ऑक्सीजन नाक से लो कह दिया क्या ये उन मरीजों का मखौल नही जिन्होंने ऑक्सीजन की कमी से अपनी जान गवाँई?इम्युनिटी बूस्टर शब्द का पतंजलि ने खूब फायदा उठाया। कोरोना की इम्युनिटी बूस्टर क्या होता है??
    इसका शाब्दिक अर्थ तो कोरोना की ताकत बढ़ाना हुआ। डब्लू एच ओ की गाइड लाइन यही थी कि जो दवा इम्युनिटी बढ़ाये वो इम्युनिटी की दवा कहला सकती है उस बीमारी की दवा नही। फिर भी कानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर इसे कोरोना की दवा के रूप में स्थापित किया गया। भारतीय भावनाओ को दमित करने का साहस किसी मे नही इसलिए इसके रिलॉन्च पर खुद स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी शामिल थे। क्या इनका दायित्व दवा का प्रचार था? क्या ये सीधा सीधा कानून का उलंघन नही? जबकि वो सरकारी पद पर हैं। क्या ये सही समय है जब भारत कोरोना से बुरी तरह प्रभावित है, दोनो विज्ञान को मिलकर इस बीमारी से लड़ना चाहिए पर ये आपस मे भिड़े हुए हैं?
    अति सर्वत्र वर्जयेत। यदि किसी भी दवा का सेवन आवश्यकता से अधिक हो तो वो जहर बन जाती है।
    आयुर्वेदिक कंपनियों के फैलाये झूठ
    1 आयुर्वेद में एलर्जी या हानि नही पहुचती

    फैक्ट- एलर्जी व्यक्ति के शरीर मे ही उपस्थित होती है उसका प्राकृतिक या कृत्रिम होने से कोई संबंध नही होता। जहर भी प्राकृतिक होता है इसलिए हर वस्तु इसी आधार पर सुरक्षित नही हो जाती। व्यक्ति को दूध से भी एलर्जी हो सकती है( लैक्टोस इनटॉलेरेंस) शहद , आयोडीन से भी । अस्थमा का अलेरजेंट फूलों का पराग वो भी प्राकृतिक है।
    शुगर के मरीज शक्कर नही झेल पाते। इसलिए प्राकृतिक वस्तु होने के चलते अमृत बताना भी नुकसानदेह है। जड़ से इलाज वाली बात अब तक पुष्ट नही हुई पर देर से परिणाम आने की उम्मीद पर दुनिया आयुर्वेद पर कायम है। बाबाजी एक बात बताइए यदि कोई कोरोना मरीज सांस नही ले पा रहा, धड़कन बन्द हो रही, ऑक्सीजन की कमी है तो क्या कोरोनिल खिलाकर उसे ठीक किया जा सकता है यदि नहीं फिर क्यो आप Dr के ज्ञान को कटघरे में लाते हैं जब आपने खुद वो किताबें नही पढ़ी?
    आज अमेरिका ने वैक्सीन लगाए लोगो को मास्क फ्री घोषित कर दिया क्या कोरोना विजय पर आपको शुभकामनाओं से भी परे रखा है आपके पूर्वाग्रह ने?
    रामलीला मैदान अनशन के बाद आप खुद एम्स में भर्ती थे। आचार्य बालकृष्ण का भी इलाज वही हुआ था पर बाहर आकर आप उनको ही ठग बताते हैं। क्या अश्वगंधा, गिलोय, तुलसी का खर्च इतना है कि कोरोनिल का रेट 500 रखा गया? आपदा में अवसर तो आपने भी खोजा, ब्लैक में जो बिका उसकी चर्चा व्यर्थ है। यदि आप स्वदेशी के समर्थक होते तो पूर्णतः स्वदेशी टेक्निक से बनी देश की वैक्सीन को- वैक्सीन को आप नकारते नही। पर आपने लेने से ही इनकार कर दिया। आपको लोग भारतीयता और आध्यात्मिक गुरु मानते हैं पर कई इंटरव्यू पर आपने वास्तुशास्त्र, ज्योतिष और ब्राम्हणवाद को जमकर कोसा। क्या ये भारतीय परंपराओं का अपमान नही? क्या सिर्फ भगवा वस्त्र धारण करना ही सनातनी परंपरा का सबूत है?

    आयुर्वेद की आड़ में मूर्ख बनाने की बानगी-

    क्या आपके टूथपेस्ट में नमक है?
    नींबू की शक्ति वाला विम बार
    हल्दी और चंदन का गुण समाए संतूर
    दाने दाने में केसर का दम राजश्री इलायची, विमल बोलो जुबां केसरी
    वैद्यराज धनवंतरी का बनाया च्यवनप्राश
    नीम की शक्ति
    इम्युनिटी बूस्टर आईल
    चारकोल(कोयले) वाला फेसवाश और पेस्ट
    विको टर्मरिक नही कॉस्टमैटिक
    मर्दों की त्वचा के लिए अलग क्रीम
    गंगा के पानी से बना गंगा साबुन
    जब भारत के मार्केट में उतरना होता है तो भारतीय मनोविज्ञान का फायदा उठाना जरूरी हो जाता है। हमारे दादी माँ के नुस्खों की किताबों को पढ़ना जरूरी हो जाता है। पर स्थिति कैसे जानलेवा हो जाती है बानगी देखिए
    1 एक प्रतिष्ठित हॉस्पिटल में तब हड़कंप मच गया जब एक मरीज का ऑक्सीजन लेवल 65 पर पहुँच गया। वो व्यक्ति मास्क निकालकर कपूर सूंघ रहा था क्योकि उंसने व्हाट्सअप पर ये इलाज पढ़ा था ऑक्सीजन बढ़ाने का।
    2 एक व्यक्ति की फ़ोटो वायरल हुई जो पीपल के पेड़ पर ऑक्सीजन लेने चढ़ जाता था। हालांकि वेदों में भी रात्रि को पीपल के पास जाना भी प्रतिबंधित है क्योंकि जब पौधा किसी दूसरे पेड़ पर एपिफ़ाइट की तरह उगता है तो जरूर रात को ऑक्सीजन देता है पर मिट्टी में उगाया गया वृक्ष नही।
    3 गोबर जलाकर ऑक्सीजन बनाने के वैज्ञानिक प्रयोग भी किये गए पर केमिकल इंजीनियर्स ने इसे भ्रांति ही बताया।
    चोट पर गोबर लगा लेना या बिना आयुर्वेदाचार्य की सलाह और मात्रा के गो मूत्र का सेवन कर लेना ऐसी कुछ समस्याएं है जो कोरोना काल मे नजर आई है।
    जब बाबाजी की देखा देखी लौकी का रस रोजाना पीने वाले महानुभाव की मृत्यु के बाद बाबाजी को इंटरव्यू कर कडुई लौकी को इस्तमाल न करने की सलाह देना पड़ गया था।
    भारत कृषि प्रधान हो न हो धर्म प्रधान जरूर है। चाहे सुमैया तारे की अफवाह हो या नमाज पढ़ने से रक्षा ये सभी धर्म अनुयायियों की मान्यताएं है पर जिस समस्या से देश जूझ रहा है उसका मुकाबला हमारे फ्रंट लाइन कोरोना योद्धाओं का मनोबल बढ़ाकर, उनकी गाइड लाइन का पालन कर ही किया जा सकता है।
    साभार - डॉ. सिद्धार्थ शर्मा ( सुपेला भिलाई )

    शौर्य कीबातें / कॉरोना महामारी के बाद से दुनिया बदल गई,इसमें करोड़ों लोगों की नौकरियां चली गई, कई लोग हमें छोड़ कर चले गए है।इस महामारी ने करोड़ों युवाओं, बच्चो और परिवारों के सदस्यों के सपनों को चकनाचूर कर दिया है।लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है।कोई भी लड़ाई निराशा से नहीं जीती जा सकती ।
    हम जहां है जैसे है वहीं से हमें फिर से शुरुआत करनी चाहिए।कुछ दिनों बाद कई एग्जाम होने वाले है, आप लोगों को फिर से सकारात्मक सोच के साथ तैयारी में जुट जाना चाहिए ।
    "सफलता तब मिलती है,जब आप सफल लोगों जैसे काम लगातार करते रहते हैं।"
    मेहनत सफलता का ईंधन है,
    इसलिए मेहनत करना जरूरी है
    यदि मेहनत नहीं करोगे,तो सफलता की गाड़ी कभी भी प्लेटफॉर्म से आगे नहीं बढ़ पाएगी।इसलिए महत्वाकांक्षी बनिए,महत्वकांक्षा प्लेटफॉर्म और मंजिल के बीच का सफर तय करने में काम आती हैं । सफलता का मूल्य मेहनत है,
    और काम में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने के बाद जीतने और हारने का मौका भी आपके हाथों में है।
    संगति अच्छी चुनिए
    यदि आप भेड़ियों की संगति करते हैं,
    तो गुर्राना ही सीखेंगे।
    और यदि आप गरुड़ों के साथ रहते हैं,
    तो शिखरों को छूना सीखेंगे।
    आयना तो आदमी का केवल चेहरा दिखाता है मगर उसकी असली पहचान तो उसके चुने गए दोस्तों से होती है।
    जुझारू बनिए
    जुझारू लोग वहीं से अपनी सफलता की शुरुवात करते हैं, जहां दूसरे लोग हार मान लेते हैं। इसलिए उस पत्थर तोड़ने वाले की तरह बनिए, जो चट्टान पर लगातार वार करता है और चट्टान के दो टुकड़े कर देता है। आपका जुझारू होना जरूरी है।
    जुनून जरूरी है
    जुनून का होना सफलता की कुंजी है, क्योंकि यह एक ऐसा गुण है, जो आपके लिए सफलता के द्वार खोल देता है और हर चीज को संभव बना देता है,जुनून होने पर सामान्य व्यक्ति भी शिखर पर पहुंच सकता है। यानी सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती है कि आप क्या करते हैं और क्या प्राप्त करते हैं, बल्कि इस बात पर ज्यादा निर्भर करती हैं की आपके अंदर जुनून कितना है l
    कॉरोना महामारी के बाद से दुनिया बदल गई,इसमें करोड़ों लोगों की नौकरियां चली गई, कई लोग हमें छोड़ कर चले गए है।इस महामारी ने करोड़ों युवाओं, बच्चो और परिवारों के सदस्यों के सपनों को चकनाचूर कर दिया है।लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है।कोई भी लड़ाई निराशा से नहीं जीती जा सकती ।
    हम जहां है जैसे है वहीं से हमें फिर से शुरुआत करनी चाहिए।कुछ दिनों बाद कई एग्जाम होने वाले है, आप लोगों को फिर से सकारात्मक सोच के साथ तैयारी में जुट जाना चाहिए ।
    "सफलता तब मिलती है,जब आप सफल लोगों जैसे काम लगातार करते रहते हैं।"
    मेहनत सफलता का ईंधन है,
    इसलिए मेहनत करना जरूरी है
    यदि मेहनत नहीं करोगे,तो सफलता की गाड़ी कभी भी प्लेटफॉर्म से आगे नहीं बढ़ पाएगी।इसलिए महत्वाकांक्षी बनिए,महत्वकांक्षा प्लेटफॉर्म और मंजिल के बीच का सफर तय करने में काम आती हैं । सफलता का मूल्य मेहनत है,
    और काम में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने के बाद जीतने और हारने का मौका भी आपके हाथों में है।
    संगति अच्छी चुनिए
    यदि आप भेड़ियों की संगति करते हैं,
    तो गुर्राना ही सीखेंगे।
    और यदि आप गरुड़ों के साथ रहते हैं,
    तो शिखरों को छूना सीखेंगे।
    आयना तो आदमी का केवल चेहरा दिखाता है मगर उसकी असली पहचान तो उसके चुने गए दोस्तों से होती है।
    जुझारू बनिए
    जुझारू लोग वहीं से अपनी सफलता की शुरुवात करते हैं, जहां दूसरे लोग हार मान लेते हैं। इसलिए उस पत्थर तोड़ने वाले की तरह बनिए, जो चट्टान पर लगातार वार करता है और चट्टान के दो टुकड़े कर देता है। आपका जुझारू होना जरूरी है।
    जुनून जरूरी है
    जुनून का होना सफलता की कुंजी है, क्योंकि यह एक ऐसा गुण है, जो आपके लिए सफलता के द्वार खोल देता है और हर चीज को संभव बना देता है,जुनून होने पर सामान्य व्यक्ति भी शिखर पर पहुंच सकता है। यानी सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती है कि आप क्या करते हैं और क्या प्राप्त करते हैं, बल्कि इस बात पर ज्यादा निर्भर करती हैं की आपके अंदर जुनून कितना है l

    लेख - अशोक गुप्ता (अध्यक्ष
    शपथ फाऊंडेशन भिलाई)

    लेख /शौर्यपथ / क्रूर कोरोना का कोड़ा सभी को बड़ी बेरहमी से सटासट पीट रहा है। महूवा खा के नशे में मदमस्त भयानक भालू की तरह रात -दिन लोगों को उठा -उठा कर पटक रहा है।बीते दिनों मैं भी क्रूर कोरोना के फंदे में फंस गया।तब हमारे घर में कोहराम मच गया। मुझे मेरी अर्धांगिनी जी तरह तरह के काढ़ा यूं जबरिया पीलाने लगी जैसे जानवरों के डाक्टर बांस की पूंगी में दवाई भरकर गाय भैस के मुंह में ठेल देते हैं।साथ ही साथ वो अपनी उंगलियों को चटकाते हुए कोरोना को श्रापने लगी। कलमुंहा कोरोना तूअकाल मौत मरे,तेरा खानदान कुलवंश का नाश हो।तब मैं
    उसे समझाया कि घर में शांति पूर्वक रहो ,मास्क पहनों , जिंदगी बंचाने का यही कारगर उपाय है। मेरी बात सुन के वो एक टोकरी भर मास्क उठा लाई और पटकते हुए बोली- ए लो कितना मास्क पहनना है पहन लो।माता कालिके जैसे उसके रौद्र रूप के आगे मैं बली के बकरे की भांति हो चला था, पर साहस दिखाते फिर बोला-मनू की मम्मी, यूं गुस्सा करना ठीक नहीं है। आज के समय में मास्क ही प्राण रक्षक है।इसे ऐसे नहीं पटकना।
    पटकूं नहीं तो क्या चूमते चाटते गले लगा लूं। कलमुंहा कोरोना के संग आए इसे एक वर्ष से ऊपर हो गया ।मुंह को ढंकते -ढंकते इस मास्क ने हमारे मुंह को भी बंदरिया जैसे बना दिया है।ए देखो आधा मुंह लाल और आधा सफेद हो गया है।ऐसा कहते-कहते श्रीमती जी ने मुंह में लगे मास्क को यूं नोचना शुरू किया जैसे कोई गिद्ध अपने पंजे में दबे गिरगिट को बेदर्दी से नोचता है। फिर फटे पंतंग की भांति हो चले मास्क को फेक कर पैर पटकते श्रीमती जी वहां से चली गई।
    अपनी अर्धांगिनी के ऐसे "कोरोना छाप" रूप को देख कर मैं भी चूहे की तरह बिस्तर में जा दुबका। तभी अधपकी नींद में मुझे ढेर सारे लोगों के रोने की आवाज सुनाई दी। मैं किसी अनहोनी की आशंका से पसीना- पसीना हो गया।हिम्मत करके उठकर खिड़की से बाहर झांका तो भौंचक रह गया। मैंने देखा कि रात के अंधेरे में पीपल पेड़ के नीचे बड़ी संख्या में तरह तरह के मास्क जमा हैं,और एक दूसरे से लिपट लिपट कर रो रहे हैं।
    इसे देखकर मेरा मन दया के सागर में गोते खाने लगा। मैंने उन्हें शांत कराने के लिए चिल्लाकर कहा- मास्क भाइयों चुप हो जाव जी।रात को यूं रोना अच्छी बात नहीं है।मेरी बात सुनते साथ एक लाल रंग का मास्क आंखे तरेरते हुए बोला- खबरदार बुड्ढा, हमें समझाने का तुझे हक नहीं है,क्यों कि तुम्हारे दुष्कर्मों का फल हमें भोगना पड़ रहा है।
    हां भाई ,एकदम सही कह रहे हो कहते एक नीले रंग के मास्क ने कहा- अरे बुड्ढे, तुम लोगों की जान बंचाने हम रात -दिन लगे हैं,पर तुम लोग मास्क का मान रखने बजाए मजाक उड़ाते रहते हो।
    क्या मजाक उड़ाते है, हमेशा कान में लादे लादे तो फिरते हैं और क्या करेंगे कहते हूए मैंने खिड़की के दुसरे पल्ले को झटके से खोलकर प्रश्न किया।तब एक काले रंग का मास्क मेरे करीब आकर मुंह बिचकाते बोला -कितने लोग पान गुटका मुंह में भरे रहते हैं।बीड़ी दारू गांजा पीए रहते हैं, फिर भी उनके बदबूदार मुंह को हम शांति पूर्वक ढंके रहते हैं। कभी बाप जनम में तुम लोगों ने मास्क नहीं पहना है, इसीलिए होश तक नहीं रहता।कल एक छोकरा पान खा के पच्च से थूक दिया।वो भूल गया कि मुंहू में मास्क पहना है ।क्या बताऊं भइया पूरे पान की पीक से मैं सराबोर हो गया।
    सच कह रहे हो भाई इंसानों के चक्कर में मास्क परिवारों की जि़न्दगी नर्क बन गई है कहते हुए एक चितकबरा मास्क अपने मुंह को ढके ढके सामनेआकर बोला- मेरी तो और भी दुर्गति हो गई है।एक डेढ़ होशियार छोकरे ने मास्क पहनकर कुछ खाते- पीते नहीं बनता सोचकर मुझे बीचो बीच गोल काट दिया है।ए दे देख लो कहते हूए उसने जब अपना हाथ हटाया तो सबने देखा कि उस बेचारे मास्क के बीचों-बीच का हिस्सा गोल कटा हुआ है।
    उस मास्क को देख के मैं हंस पड़ा। मुझे हंसते देख के एक सफेद रंग की लेडीस मास्क गरजते हुए बोली - सुन बुड्ढे , तूम्हारे घर परिवार के फैशनेबुल महिलाओं के कारण तो हमारा मरना हो गया है।वो खुद तो लाल लाल लिपस्टिक होंठ में लगाती हैं और मास्क लगाने से लिपिस्टिक के मिट जाने पर गुस्सा उतारते हूए कहती हैं कि ए मरी मास्क तो सौतन जैसे हम पर सवार है। पता नहीं कब इससे हमारा पीछा छूटेगा?
    उस मास्क की बात सुनकर एक खाकी रंग का मास्क पुलिसिया अंदाज मेंअकड़ते हुए गरज उठा - पढ़े लिखे होने बाद भी तुम लोगों ने असभ्य गंवारों की तरह अपनी हरकतों को बना रखा है। बेचारे पुलिस वाले तुम्हें मास्क पहनो, मास्क पहनो की हिदायत देते रहते हैं, लेकिन तुम्हारे कानों में जूं तक नहीं रेंगता।जब वे जुर्माना करते हैं तो तुम लोग मास्क पर गुस्सा उतारते हुए कहते हो- साला, हथेली भर का मास्क पांच सौ रूपए का चुना लगा दिया।
    सभी मास्क की पीड़ा सुन सुन के मेरा मन भी दु:खी हो गया। मैं उन्हें समझाते हुए बोला मास्क भाइयों सब दिन एक जैसे नहीं होते हैं।धीरज रखो। तुम्हारी छत्र छाया में ही तो इसानों की जान बच रही है। हाथ जोड़ कर मेरी विनती है, इंसानों का साथ मत छोडऩा।एक न एक दिन उन्हें अपनी भूल का अहसास होगा। देर सबेर उनकी आंख जरूर खुलेगी। कहते हैं न कि कुत्ते की आंख तो इक्कीस दिन में खुलती है पर आदमी कीआंख खुलने में इक्कीस साल लग जाते हैं।मेरी बात सुन के सभी मास्क सिर झुका कर बोले-सौ बात की एक बात बोले हैं बाबा,पर अपनी बिरादरी के लोगों को बताव कि ए समय सजग रहने का है।तभी कोरोना भागेगा।खैर रात बहुत हो गई है। जाइए सो जाइए शुभ रात्रि।मास्क मित्रों से विदा लेकर मैं नई सुबह की आस में गहरी नींद में सो गया।
    विजय मिश्रा "अमित"
    अतिरिक्त महाप्रबंधक (जनसंपर्क), छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कम्पनी

    शौर्यपथ / आज अचानक आसमान की तरफ नजर उठाकर मैने देखा,
    आसमान की काली स्याह बादलों के बीच नजर आने लगी एक आशा की रेखा।
    कई दिनों से चारो ओर जो मुसीबत के बादल छाए थे
    उनको कमजोर पढ़ते देखकर हम मन ही मन मुस्कुराए।
    मन कहने लगा कि चलो अब ये मुसीबत के दिन टल जाएंगे।
    मुरझाए हुए थे जो जीवन के फूल वो फिर से खिल जाएंगे।
    तभी आसमान से एक आवाज ने मुझे टोका
    कहने लगा कि आखिर तुम किसको दे रहे हो धोखा।
    तुम्हारी मुसीबतों को मिलने वाला यह एक छोटा सा विराम है।
    तुम्हारी सावधानियों में ही तुम्हारे जीवन का समाधान है।
    मुझे मालूम है तुम कभी बदल नही सकते।
    जीवन की सच्चाई में कभी ढल नही सकते।
    तुम्हे तो बस दौडऩा है, भागना है और प्रकृति को उजाडऩा है।
    इस धरा के नियम को तुमको अपने तौर तरीके से बनाना और बिगाडऩा है।
    आज क्रंकीट के सड़को पर तुमको सरपट दौडऩा है।
    और धरती माता के गर्भ से एक एक बूंद पानी भी निचोडऩा है।
    बस अब भी वक्त है थम जाओ,
    अपने जीवन की सात रंगों में ही रंग जाओ।
    जो उजाड़ा है उसे बसाने की अपने मन ठान लो।
    और अपने जीवन के हरपल को तुम फिर से संवार लो।
    नही तो मैं फिर आऊंगा जलजला बनकर,कहर बनकर
    और चीखती हुई लाशों का शहर बनकर।
    मुझसे जैसा सुलूक करोगे वैसा ही तुमको लौटाऊंगा।
    चंद हरियाली के बदले तुम पर हर खुशी लुटाऊंगा।
    कुमार नायर

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