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दुर्ग / शौर्यपथ / स्व. मोतीलाल जी वोरा वो एक नाम ही नहीं एक ऐसी शख्सियत है जिनको किसी पहचान की ज़रूरत नहीं आजीवन अविवादित रहे स्व. मोतीलाल जी वोरा के समाधी स्थल निर्माण में जिस तरह शासन के नियमो की अनदेखी हो रही उससे दुर्ग शहर की जनता में चर्चा का विषय है , खुल कर तो कोई नहीं कह रहा किन्तु अधिकाश लोगो का मत है कि जिस तरह निगम की शहरी सरकार के मुखिया और पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारियो द्वारा चुप चाप निर्माण कराया जा रहा है परदे के पीछे उससे जनता को ये तो अहसास हो गया कि शहरी सरकार सिर्फ अपने स्व हित का विचार कर रही .
स्व. मोतीलाल जी वोरा अपने जीवन काल में किसी के मोहताज़ नहीं रहे किसी विवाद से उनका नाता नहीं रहा वही स्थिति वर्तमान समय में दुर्ग विधायक और मोतीलाल जी वोरा के पुत्र अरुण वोरा के साथ है . भरे पुरे धनाड्य परिवार से है और अपने बाबूजी के चहेते ऐसे में निगम प्रशासन के अधिकारियों और चाटुकारों द्वारा यु समाधी स्थल निर्माण जिसकी अनुमति न तो शासन से मिली और ना ही निगम से कोई मद प्राप्त हुआ बिना अनुमति के निर्माणाधीन कार्य से शहर विधायक की छवि भी पुरे शहर में धूमिल हो रही है और आम जनता इसे सत्ता की ताकत का खेल समझ रही है . वही निगम के जिम्मेदार इंजिनियर चापलूसी की पराकाष्ठ को पार करते हुए अपने हित के लिए विधायक को खुश करने में लगे है किन्तु इन सबका असर ये हो रहा है कि प्रदेश ही नहीं देश की राजनीती में एक निर्मल छवि के रूप में पहचान बनाने वाले दुर्ग के सबसे सम्मानित नेता स्व. मोतीलाल जी वोरा का नाम अनचाहे रूप से सामने आ रहा है शायद ये स्वयं उनके पुत्रो अरविन्द वोरा , अरुण वोरा और उनके पोतो तथा दुर्ग के कम समय में सबसे ज्यादा प्रसिद्धि पाने वाले संदीप वोरा और सुमित वोरा को भी ये अच्छा नहीं लगेगा कि उनके परिवार के आदरणीय की समाधी स्थल बिना अनुमति के दान की जमीन पर बने .
अज कोई गरीब या आम जनता नाली के उपर एक फीट भी निर्माण कर लेती है या फिर बिना अनुमति भवन ( खुद की जमीन पर ) बनाने का कार्य शुरू कर देती है , या एक दो घंटे के लिए सडक के किनारे कोई प्रदर्शनी लगा लेती है तब नेता , जनप्रतिनिधि ज्ञान देना शुरू कर देते है , अधिकारी पुरे लाव लश्कर सहित तोड़फोड़ के लिए पहुँच जाते है किन्तु यहाँ मुक्तिधाम में निर्माणाधीन समाधि स्थल में निगम का टेंकर पानी सप्लाई कर रहा है निगम के इंजिनियर देख रेख कर रहे और एक ठेकेदार बिना किसी अनुमति के शासकीय भूमि वो भी मुक्तिधान की जहा लोग जाने के लिए मरते है ऐसी जगह पर निर्माण कार्य कर रहा है और शहर के विधायक मौन है , महापौर बाकलीवाल मौन है , पीडब्ल्यूडी प्रभारी मौन है , जिला प्रशासन मौन है आखिर क्या सत्ता की ताकत के आगे सब नत मस्तक है और नियम कानून सिर्फ आम जनता के लिए है क्या यही विचार को लेकर शहर के विधायक जगह जगह हमर दुर्ग लिखवा रहे है क्या दुर्ग शहर पर आम जनता का अधिकार नहीं है क्या हर जनप्रतिनिधि अपने सत्ता के ताकत से आम जनता के लिए बने स्थानों पर कब्ज़ा करते रहेगा भविष्य में क्योकि आज तो शुरुवात है , सत्ता बदलती है सत्ता का केंद्र बिंदु बदलता है और परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ता है . क्या जिला प्रशासन ऐसे अवैध निर्माण पर जिम्मेदार ठेकेदार के उपर कार्यवाही करेगा ? अगर नहीं कर सकता तो समाधी स्थल को विधिवत मान्यता देने का कार्य करे ताकि दुर्ग की शान कहे जाने वाले राजनीती के भीष्म पितामह स्व. मोतीलाल जी वोरा के नाम पर कोई दाग ना लगे ....
दुर्ग / शौर्यपथ / दुर्ग निगम आयुक्त इन्द्रजीत बर्मन जो दुर्ग निगम के सबसे युवा आयुक्त के रूप में जाने जाते है हालाँकि अब उनका ट्रांसफर कबीरधाम सयुक्त कलेक्टर के पद पर हो गया . आयुक्त बर्मन और दुर्ग निगम के मुखिया धीरज बाकलीवाल दोनों में आपसी सामंजस्य शुरू से ही नहीं बैठा या सीधे तौर पर कहा जाए तो दुर्ग के विधायक के अनुसार आयुक्त नहीं चले और दुर्ग निगम आयुक्त का ट्रांसफर हो गया . सत्ता पक्ष ख़ुशी मना रही है कि उनके लगातार शिकायतों का परिणाम रहा आयुक्त का ट्रान्सफर और इस बात को विधायक की हर बातो को बढ़ा चढ़ा कर समाचार बनाने वाले कुछ निजी वेब पोर्टल वालो ने भी लिखा और इस तरह लिखा कि विधायक वोरा से सामंजस्य नहीं बना पाने के कारण आयुक्त का स्थानान्तरण हो गया . वैसे आज आयुक्त बर्मन का स्थानान्तरण तो हो गया किन्तु उनके पद में कोई कटौती नहीं हुई जबकि ट्रांसफर कराने का दम भरने वाले कई छुटभैये नेता आज पद में है कल रहेंगे या नहीं ये भी निश्चित नहीं है .
वैसे आयुक्त बर्मन ने दुर्ग शहर को एक तरह से बर्बाद ही कर दिया था . जब से आयुक्त बर्मन ने दुर्ग निगम का पदभार संभाला निगम में फर्जी ठेकेदारों को लापरवाही से कार्य करने वाले ठेकेदारों को प्रतिबंधित किया वही गुपचुप ठेका पद्दति को खत्म करके ओपन ठेका चालू करवाया आयुक्त बर्मन के इस कार्य से चाटुकारों को काम मिलने में दिक्कत होने लगी जो कि सत्ताधारी नेताओ के चाटुकारिता के दम पर कार्य हांसिल करते थे . खैर अब एक बार फिर चाटुकारों को कार्य मिलने लगेगा और खुल कर कमीशन का खेल चलेगा पर इससे हमारे जनप्रतिनिधियों को क्या मतलब क्योकि चुनाव में अभी काफी समय है अभी तो अपने समर्थको का भला करना है .
आयुक्त की दूसरी गलती यह रही की जिस नाली और नालो की सफाई का कार्य लाखो के ठेका से होता था और जिसे चंद लोग ख़ास लोग लेकर लीपापोती करके बड़े बड़े बिल निकाल लेते थे उस कार्य को बिना खर्च किये निगम के कर्मचारियों से ही करा लिया . आखिर क्या फायदा हुआ आयुक्त बर्मन को इससे उलटे ठेकेदारों की लाखो की कमाई पर रोक लग गयी यक्त बर्मन को ऐसा नहीं करना चाहिए था क्योकि पैसा कोई उनकी जेब से तो जा नहीं रहा जनता के टेक्स का पैसा था जिसका भुगतान ठेकेदारों को करना था कम से कम कुछ चाटुकार ठेकेदारों का तो भला हो जाता चार घर की रोटी की व्यवस्था तो हो जाती . जनता के पैसे का क्या जनता तो है ही पिसने के लिए . आखिर अभी भी तो जनता के पैसे से कार्य हो रहा है और नाम हमारे सम्मानीय विधायक का लिखा जा रहा है . दुर्ग के लाडले विधायक जो तीन बार विधायक रह चुके है ये अलग बात है कि तीन बार हार भी हुई है किन्तु राजनीती में हार जीत लगी रहती है . वर्तमान में तो शहर में विकास की धारा बह रही है कहा बह रही ये सिर्फ पोस्टर में ही नजर आता है . वैसे वर्तमान समय में विकास की धारा शहर के मुक्तिधाम तक पहुँच चुकी है जहा दान की जमीन पर निगम मद से भव्य समाधी स्थल बन रहा है . अब ये अलग बात है कि समाधी स्थल बनाने की अनुमति अभी न तो निगम प्रशासन से मिली और ना जिला प्रशासन से मिली . वैसे भी जिला प्रशासन की जमीन तो है नहीं वो उसे भी किसी परिवार ने दान किया है ताकि आम जनता अपने मृत परिजनों का अंतिम संस्कार कर सके किन्तु भविष्य में अब एक समाधी स्थल दुर्ग में भी होगा जहां बड़े बड़े नेताओ की समाधी बनेगी . शुरुवात तो हो चुकी है तो मंजिल तक ज़रूर पहुंचेगी . आम जनता का क्या है मुक्ति धाम में जब समाधि स्थल की श्रृंखला तैयार हो जाएगी तो कही भी किसी एक कोने में परिजनों का अंतिम संस्कार कर देंगे . आम जनता और कीड़े मकोड़े में आज के जमाने में ज्यादा अंतर नहीं है . वैसे मैंने भी विचार किया था कि मेरे बेटे के नाम से किसी चौक का नाम रखा जाए किन्तु मई तो आम जनता हूँ मेरी क्या औकात किन्तु एक दिन खुद अपनी जमीन लेकर एक भव्य मूर्ति और सुन्दर बगीचा बनाने का वादा किया है मैंने शौर्य से जिसे जनता को समर्पित करूँगा आम जनता के लिए जिस तरह मुक्ति धाम की जमीन को एक परिवार ने आम जनता के लिए समर्पित किया है .
आयुक्त बर्मन एक प्रशासनिक अधिकारी है आज उनका ट्रांसफर जरुर हुआ है पर क्या नए आने वाले आयुक्त विधायक से सामंजस्य बैठा पायेंगे क्योकि महापौर से सामंजस्य बैठना उतना जरुरी नहीं जितना विधायक से सामंजस्य बैठाना ज़रूरी है क्योकि सारा कार्य विधायक की मंशा के अनुरूप होता है . वैसे दुर्ग की जनता के साथ अक्सर यही होता आया है अभी तक पूर्व की भाजपा सरकार के समय यही कांग्रेस पूर्व महापौर को कठपुतली के रूप में प्रचारित करते थे ये अलग बात है कि पूर्व महापौर के प्रेस विज्ञप्ति में मंशारूप शब्द में किसी का नाम नहीं होता था अब तो खुले आम मंशारूप चल रहा है जब सब कुछ मंशारूप चल रहा तो महापौर क्या शहर में सिर्फ शासकीय संसाधनों के उपभोग के लिए है जब उनका कोई लक्ष्य ही नहीं उनकी कोई सोंच ही नहीं तो क्यों शासकीय संसाधनों पर हक जता रहे . खैर दुर्ग की जनता सब जानती है इसलिए निगम के किसी भी उथल पुथल का जिम्मेदार महापौर को नहीं मानती महापौर एक शालीन व्यक्ति है सभी के जज्बातों को समझते है सभी का आदर करते है घमंड नाम का कोई स्थान नहीं है उनके अंदर एक साफ़ और निर्मल छवि के युवा महापौर के रूप में बाकलीवाल को पाकर जनता यहाँ तक की विपक्ष भी उनके व्यवहार की कायल थी किन्तु हस्तक्षेप में मौन रहने के आज उन पर भी कठपुतली का आरोप लगने लगा और निगम के बदहाल व्यवस्था पर आम जनता सवाल उठाने लगी . बात आम जनता तक रहती तो सही था किन्तु अब तो कई कांग्रेसी भी अंदर ही अंदर चिन्न भिन्न है सिवाय उनके जिनके पास शौचालय साफ करने की लम्बी फेहरिस्त है , चखना सेंटर चलाने का मौन स्वीकृत है , निगम के ठेके में जिनका बड़ा योगदान है , राशन दुकानों की भरमार है . ये अलग बात है कि ऐसी सुविधा सिर्फ चंद लोगो के पास है फिर भी ये सब राजनीती का हिस्सा है . आज जीत जनप्रतिनिधि की हुई है आयुक्त का क्या आज यहाँ कार्य कर रहे कल कही और कार्य करेंगे उन्हें तो कही ना कही कार्य करना है किन्तु जनप्रतिनिधि का क्षेत्र सिमित होता है ऐसे में कोई उनकी बात ना सुने ये तो गलत बात है . अब तो बस यही दुआ है कि नए आयुक्त ऐसे आये जो हमारे शहर के लाडले , मृदु भाषी , सरल हृदयी विधायक की मंशा के अनुरूप चले जैसा कि महापौर जी आदरणीय धीरज बाकलीवाल जी चलते है ताकि शहर में विकास की गंगा बहे और एक बार फिर शहर के नालो की सफाई का कार्य लाखो की निविदा से शुरू हो , निगम के कार्यो का ठेका रिंग बना कर हो , कार्यकर्ताओ का भला हो , अधिकारियों की मनमानी चले ताकि पुरे निगम में एक खुशनुमा वातावरण बना रहे और चौतरफा जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक मुखिया का गुणगान होता रहे . जनता का क्या है वो तो पिछले १० सालो से कठपुतली महापौर को देख रही है ५ साल और सही जब जनता ही चाहती है कि यही सब चलता रहे तो फिर मेरे विचार से ऐसा ही होना चाहिए ताकि कोई मुद्दा ही नहीं रहे विपक्ष का क्या वो तो छोटी छोटी बात का भी विरोध करेगी और अपना राजनितिक धर्म निभाएगी .
दुर्ग / शौर्यपथ / आरएसएस के कार्यकर्ता डॉ दीप चटर्जी भिलाई के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता के साथ साथ सोसल मिडिया में अपनी बेबाक टिपण्णी के लिए जाने जाते है . कल की जो घटना उनके साथ हुई वह निंदनीय है किसी भी लोकतंत्र प्रधान देश में इस तरह की घटना के लिए कोई स्थान नहीं इस बात में कितनी सच्चाई और किसकी गलती ये जाँच का मुद्दा है किन्तु अब यह घटना धीरे धीरे भाजपा के आंतरिक कलह के साथ राजनितिक रंग भी लेने लगी है . घटना के अभी २४ घंटे भी पुरे नहीं हुए कई तरह के अलग अलग ब्यान आने लगे है .
मामला एक फेसबुक टिप्पणी को लेकर शुरू हुआ जिसमे डॉ. चटर्जी द्वारा ५० हजार वापसी की मांग की गयी और इसे शाही दशहरा के आयोजक समिति से जोड़ा गया . डॉ. चटर्जी के अनुसार भाजपा कार्यालय के लिए दिए चंदे के गलत उपयोग पर मामला शुरू हुआ वही चारुलता पाण्डेय के अनुसार वो ना तो भाजपा की सदस्य है और ना ही कार्यकर्त्ता बिना किसी प्रमाण के शाही दशहरा और चंदे की बात पर हुए विवाद में डॉ. चटर्जी ने बीती रात अपने ब्यान में छत्तीसगढ़ पुलिस की और भिलाई के कांग्रेस नेताओ की तारीफ़ की साथ ही कहा यह आंतरिक मामला है इसलिए सहयोग के लिए धन्यवाद वही अब इस मामले पर दुर्ग लोकसभा के सांसद विजय बघेल सरकार आर और छत्तीसगढ़ पुलिस पर भेदभाव का अओप लगा रहे है जबकि पुलिस प्रशासन जाँच के बाद कार्यवाही की बात कह रही है .
घटना हुए अभी २४ घंटे नहीं हुए और पीड़ित डॉ. चटर्जी के ब्यान एवं सांसद विजय बघेल के ब्यान में इतना विरोधाभास क्या मामले को राजनितिक दिशा में धकेलने का प्रयास है खैर जो भी होगा आगे स्पष्ट हो जाएगा किन्तु इन सब घटना से ये साफ उजागर हो गया कि आने वाले समय में दुर्ग / भिलाई भाजपा में जबरदस्त आंतरिक कलह देखने को मिलेगा जिसका असर होने वाले निगम चुनाव में साफ़ दिखेगा .
दुर्ग / शौर्यपथ विशेष /
दुर्ग का नाम राजनीती के क्षेत्र में जब भी पुरे भारत में लिया जाएगा तो उस कड़ी में स्व. मोतीलाल वोरा जी का नाम जरुर याद किया जाएगा . स्व. मोतीलाल जी वोरा दुर्ग कांग्रेस के ही नहीं अपितु देश के सभी राजनितिक दलों में अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए थे . कांग्रेस के सच्चे सिपाही स्व. मोतीलाल वोरा दशको तक गाँधी परिवार के करीबी रहे . विगत 22 दिसंबर 2020 को स्व. मोतीलाल वोरा जी ने अंतिम साँस ली . स्व. मोतीलाल जी वोरा का पूरा जीवन निर्विवाद रहा किन्तु अब उनके मरणोपरांत दुर्ग में कुछ ऐसी घटनाएं निर्मित हुई जिसमे स्व. मोतीलाल जी वोरा के नाम का भी कई संगठनों , समाज के लोगो ने विरोध किया .
सबसे पहले मामला आया ठगडा बाँध का जैसा की सभी को मालुम है कि कई सालो पहले ठगडा दाऊ ने जनहित को देखते हुए इस जमीन को शासन को दान कर दिया था ताकि आम जनता के पानी की निस्तारी सम्बन्धी जरूरते पूरी हो सके .वर्तमान में ये दुर्ग निगम क्षेत्र में आता है ऐसे में दुर्ग निगम परिषद् जिसमे वर्तमान समय में कांग्रेस की सत्ता है . कांग्रेस की सत्ता होने के कारण सत्ताधारी दल ने एमआईसी परिषद् में प्रस्ताव पारित कर दिया कि ठगडा बाँध का नाम स्व. मोतीलाल जी वोरा के नाम पर रखा जाए . बात खुलते ही ठगडा दाऊ के परिवार सहित अन्य समाज के लोगो द्वारा इसका पुरजोर विरोध हुआ कई लोगो ने निगम प्रशासन में आपत्ति स्वरुप शिकायत भी दर्ज कराई .
ये बड़े ही आश्चर्य और दु:ख की बात है कि जिस मोतीलाल वोरा जी के जीवन काल में उनका किसी ने भी विरोध नहीं किया ऐसे व्यक्तित्व का इस तरह विरोध होना कही से भी सही नहीं है . परिषद् की जल्दबाजी का नतीजा रहा जिसके कारण मामला तूल पकड़ा जबकि इस बारे में स्व. मोतीलाल वोरा जी के पुत्र विधायक वोरा ने किसान नेता राजकुमार गुप्त के विरोध के बाद कहा की निगम परिषद् ने बिना पूझे ही फैसला लिया . स्वयं विधायक अरुण वोरा भी नहीं चाहते कि स्व. मोतीलाल वोरा के नाम का किसी भी रूप में विरोध हो .
ऐसे में अब एक नया मामला सामने आ गया जिस पर किसी के पास जवाब नहीं . बात हो रही मुक्ति धाम में निर्मित समाधी स्थल की जहा स्व. मोतीलाल वोरा जी का अंतिम संस्कार किया गया था . शिवनाथ नदी तट पर स्थित मुक्तिधाम की जमीन शर्मा परिवार द्वारा दान की हुई जमीन है वही मुक्ति धाम के पीछे निर्मित पुष्पवाटिका का भी कुछ ऐसा ही हाल है जिसमे एक बड़ा हिस्सा शर्मा परिवार का है इस पुष्प वाटिका और मुक्तिधाम के बीच एक जमीन का टुकड़ा खसरा न. 373 व 374 पटेल परिवार का है जिन्होंने इस भूमि को शासन को मुक्तिधाम के लिए दान दे दिया .चुकी शहर लगातार बड़ा होता जा रहा है और ऐसे में शहर में शिवनाथ नदी के तट पर स्थित एकमात्र मुक्तिधाम है जिसके संधारण के लिए राज्यसभा सांसद सरोज पाण्डेय द्वारा एक करोड़ की राशी दी गयी ताकि शहर में स्थित मुक्तिधाम में सुविधाओ की ज़रूरत पूरी हो सके ऐसे में इस मुक्तिधाम के एक बड़े हिस्से में स्व. मोतीलाल वोरा का समाधी स्थल बनाया जा रहा है बड़ी बात यह है कि समाधी स्थल किस मद से बनाया जा रहा है इसकी भी जानकारी निर्माण करने वाले ठेकेदार सराफ द्वारा नही दी गयी सिर्फ इंतना कहा गया कि ट्रस्ट से अनुमति मिली है .
बड़ा सवाल यह है कि जिस खसरा न. में मुक्ति धाम बन रहा है पहले तो उसकी पटेल परिवार द्वारा एग्रीमेंट के तहत एक ग्राहक से दुसरे और फिर तीसरे तक सौदा हुआ किन्तु बाद में पटेल परिवार के सभी सदस्यों द्वारा शपथ पत्र देकर यह जमीन मुक्तिधाम के लिए शहरवासियो की सुविधा को ध्यान में रखते हुए शासन को दे दी गयी जब इसका मालिकाना हक शासन के पास है तो फिर कोई ट्रस्ट कैसे अनुमति दे सकता है वही दूसरा पहलु यह है कि इस निर्माण में दुर्ग निगम के इंजीनियरों की निगाह है उन्ही के निरिक्षण में कार्य हो रहा है ऐसा मुक्तिधाम के आस पास के लोग कह रहे है .
इस बारे में जब दुर्ग निगम आयुक्त से चर्चा की गयी तो उनका कहना है कि उनके पास मुक्तिधाम में समाधी स्थल बनाने के लिए अनुमति पत्र जरुर आया था जिसे उनके द्वारा जिलाधिष कार्यालय पंहुचा दिया गया मार्गदर्शन के लिए किन्तु अभी तक जिला कार्यालय से किसी भी तरह की कोई अनुमति प्राप्त नहीं हुई है . जब निगम के अधीन संचालित मुक्तिधाम में निर्माण हो और इसकी कोई जानकारी निगम प्रमुख को भी ना हो वही निर्माण कार्य भी तीव्र गति से चल रहा हो किन्तु निर्माण किस मद से हो रहा कौन करा रहा इसकी जानकारी कही से भी नहीं हो रही .
ऐसे में तो कुछ सालो में नए मुक्तिधाम की आवश्यकता होगी
मुक्तिधाम जहाँ हिन्दुओ द्वारा अपने मृत परिजनों का अंतिम संस्कार किया जाता है .पहले शहर छोटा था तो शिवनाथ नदी और शिक्षक नगर मुक्तिधाम प्रयाप्त था किन्तु शहर तेजी से बढ़ रहा है जनसँख्या का विस्तार हो रहा ऐसे में अगर भविष्य में किसी और राजनितिक हंस्तियो द्वारा मुक्तिधाम में समाधी स्थल बनाने की प्रथा को आगे बढाया जाने लगेगा तो भविष्य में दुर्ग शहर को नए मुक्तिधाम की तलाश करनी होगी क्योंकी आम जनता तो मजबूर है सिर्फ मौन विरोध कर सकती है और सत्ता के दम पर ऐसे समाधी स्थल बनते रहे तो शहर में आने वाले समय में जिसकी भी सरकार रहेगी वो इस प्रथा को आगे बढ़ाएगा और आम जनता देखती ही रह जाएगी क्योकि आम जनता का काम सिर्फ पांच साल में एक बार ही होता है वोट देने का उसके बाद सिर्फ इंतज़ार एक नई सुबह का जो जाने कब आएगी ...
शौर्य की बातें ( चाणक्य निति )/ चाणक्य की चाणक्य नीति कहती है कि जिस व्यक्ति के पास इन दो चीजों का सुख प्राप्त है उसके लिए धरती पर ही स्वर्ग है. आइए जानते हैं आज की चाणक्य नीति.
चाणक्य के अनुसार सुख और दुख सभी इसी धरती पर है. इसी प्रकार से स्वर्ग और नरक भी पृथ्वी पर ही हैं. चाणक्य ने अपना संपूर्ण जीवन लोगों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया था. चाणक्य का संबंध विश्व के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय तक्षशिला से था. जिसकी ख्याति उस दौर में संपूर्ण विश्व में थी. चाणक्य ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की और बाद में वे इसी तक्षशिला विश्वद्यिालय के आचार्य भी बनें. चाणक्य की विशेष बाते ये है कि वे योग्य शिक्षक होने के साथ साथ कूटनीति शास्त्र के भी मर्मज्ञ थे. चाणक्य को कौटिल्ये नाम से भी जाना जाता है.
चाणक्य की चाणक्य नीति मनुष्य को एक जिम्मेदार और श्रेष्ठ नागरिक बनने के लिए भी प्रेरित करती है. यही कारण है इतने साल बीत जाने के बाद भी चाणक्य नीति की लोकप्रियता कायम है. चाणक्य नीति की शिक्षाएं जीवन के हर मोड पर काम आती हैं. चाणक्य की शिक्षाएं व्यक्ति को जीवन में किन चीजों को अपनाना चाहिए और किन चीजों का त्याग करना चाहिए इस पर भी प्रकाश डालती हैं.
ऐसा पुत्र और जीवनसाथी जिनके पास है वे कभी दुखी नहीं होते हैं
चाणक्य के अनुसार स्वर्ग की कामना व्यर्थ है. चाणक्य की मानें तो पुत्र आज्ञाकारी, पत्नी वेदों के अनुसार जीवन जीने वाली और अपने वैभव से जो संतुष्ट है उसके लिए स्वर्ग यहीं है. चाणक्य की इस बात का मर्म ये है कि जिसका पुत्र आज्ञाकारी होता है. उसका जीवन धन्य हो जाता है. वहीं पत्नी अगर वेदों को पढ़ती है, और वेदों की शिक्षाओं पर अमल करती है वहां सुख, शांति और समृद्धि स्थाई होती है. चाणक्य कहते हैं कि इसी प्रकार जब अपने कार्यों और उपलब्धियों से संतुष्ट होता है उसका जीवन दुख और कष्टों से पूरी तरह से मुक्त होता है. जिसके पास ये सुख है उसके लिए यह धरती ही स्वर्ग के समान है. अन्य स्वर्ग की कामना उसके लिए व्यर्थ है.
दुर्ग । शौर्यपथ । देश और प्रदेश में आम जनता बजट का इंतजार करती है ऐसे ही अब दुर्ग निगम के बजट का इंतज़ार आम जनता को है । महापौर बाकलीवाल इस बार दुर्ग निगम के बजट के लिए खास तैयारी में लगे हुए है । वैसे तो हर साल निगम का बजट आता है और कार्य की प्राथमिकता के अनुसार बजट तैयार होता है बजट की घोषणा होते ही आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला भी शुरू हो जाता है किंतु इस बार निगम की बजट के लिए महापौर बाकलीवाल कुछ ऐसी तैयारी कर रहे कि आरोप प्रत्यारोप की गुंजाइश ना के बराबर हो जाएगी । निगम की कांग्रेस सरकार के मुखिया इन दिनों बजट को लेकर शहर के हर क्षेत्र के विकास को लेकर सिर्फ दस्तावेजो पर भरोसा ना करके स्वयं जमीनी हकीकत जानने का प्रयास कर रहे है । महापौर बाकलीवाल इस बार के बजट को नया रूप निर्विरोध रूप देने के लिए पिछले कुछ दिनों से वित्त प्रभारी दीपक साहू के साथ कार्यालय में बैठ कर दस्तावेजो का निरीक्षण करने के बजाए निगम के सभी 60 वार्डो का भ्रमण कर रहे है । सभी 60 वार्डो के पार्षदों से वार्ड में जा कर मुलाकात तो कर ही रहे साथ ही वार्ड की अति आवश्यक मूलभूत ज़रूरतों के बारे में वार्ड की जनता से व वार्ड पार्षद से जानने की भी कोशिश कर रहे । ऐसा करने से ये तो निश्चित है कि जमीनी हकीकत से रूबरू हो रहे महापौर वार्ड की जनता के करीब आ कर उनकी समस्याओं को समझ भी रहे साथ ही ज़रूरतों को पूरा करने बजट में प्रावधान लाने को भी अग्रसर है । अभी तक पूर्व के महापौर द्वारा सिर्फ वार्ड पार्षद के कार्यो के पत्र के आधार पर विकास की बात से एक कदम आगे बढ़ते हुए ज़मीनी हकीकत को देखने की इस पहल से निगम क्षेत्र की जनता अपने आप को महापौर के करीब महसूस कर रही है । इस नई पहल के बारे में वित्त प्रभारी दीपक साहू का कहना है कि महापौर की इस पहल से सभी वार्डो के आवश्यक कार्यो को प्राथमिकता से करने में मदद मिलेगी साथ ही शहर के विकास में क्षेत्र विशेष से आगे बढ़ते हुए सारे निगम क्षेत्र का समान रूप से विकास करने की महापौर की सोंच को एक दिशा मिलेगी । दुर्ग निगम के सम्पूर्ण क्षेत्र में विकास ही कांग्रेस सरकार की सोंच है और उसी दिशा में यह एक प्रयास है । महापौर बाकलीवाल के इस प्रयास की चर्चा इन दिनों सभी वार्डो में चल रही वही विपक्षी दल एवम निर्दलीय पार्षद भी महापौर बाकलीवाल के हर वार्ड में भ्रमण कर आवश्यक कार्यो को बजट में प्राथमिकता देने की पहल का स्वागत कर रहे है सभी वार्डो में महापौर के भ्रमण से वार्ड पार्षद भी अपने वार्ड की समस्या और मूलभूत ज़रूरत को जमीनी रूप से अवगत करा रहे है । साथ ही वार्डो में भी यह संदेश जा रहा है कि वर्तमान सरकार मूलभूत समस्यायों के निराकरण की एक सार्थक पहल कर रही है और इस सार्थक पहल का परिणाम निगम के बजट में देखने को मिलेगा यही कारण है कि इस बार दुर्ग की जनता निगम के बजट का बेसब्री से इंतजार कर रही है और महापौर के प्रयासों की सराहना कर रही है ।
दुर्ग / शौर्यपथ लेख / कांग्रेस जो एक समय देश की सबसे बड़ी पार्टी हुआ करती थी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है देश में कांग्रेस की स्थिति क्या है ये किसी से छुपी नहीं है असंतोष और आपसी गुटबाजी की मार झेल रही राष्ट्रिय कांग्रेस अपने अस्तित्व को बचाने का निरंतर प्रयास कर रही है . छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस के रास्ट्रीय नेत्रित्व की जीत के बजाये भूपेश नेत्रित्व की जीत ज्यादा रही प्रदेश में १५ साल की भाजपा सत्ता के खिलाफ मुखर हुए तो भूपेश बघेल ही हुए जिसका नतीजा रहा प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी . प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाने में सबसे ज्यादा अहम् भूमिका किसी की रही तो वो तात्कालिक प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल और टी.एस.सिंहदेव की मेहनत और सक्रियता का परिणाम रहा सभी को लेकर आगे बढने की निति रही गुटबाजी खत्म करते हे सबके साथ चलने का परिणाम रहा प्रदेश में कांग्रेस की सरकार का सत्ता में काबिज होना .
किन्तु अगर हम क्षेत्र की बात करे तो आज दुर्ग की ऐसी स्थिति है कि दुर्ग में कांग्रेस के कार्यकर्ताओ को महत्तव नहीं दिया जाता यहाँ महत्तव दिया जाता है वोरा के करीबी लोगो को . दुर्ग में आज भी सत्ता आने के बाद कांग्रेसी कार्यकर्त्ता कही ना कही उपेक्षित से है .दुर्ग कांग्रेस में ऐसे लोगो को ही महत्तव दिया जा रहा है जो कांग्रेस के नहीं वोरा के करीबी है . ऐसा नहीं है कि दुर्ग में कांग्रेस नेताओ की कमी है . लक्ष्मण चंद्राकर , प्रतिमा चंद्राकर , राजेन्द्र साहू ,मदन जैन जैसे नेता भी है जिन्होंने अपनी जिन्दगी कांग्रेस के लिए गुजार दी किन्तु आज सत्ता होने के बाद भी कही ना कही ऐसी स्थिति सामने आ ही जाती है जिससे ये आभास हो जाता है कि दुर्ग में कांग्रेस कार्यकर्ता होने से ज्यादा जरुरी है वोरा का करीबी होना . बस वोरा गुट के करीबी हो जाओ फिर पद,कार्य , महत्तव सब मिल जायेगा इसके लिए कांग्रेस का करीबी होना कोई महत्तव नहीं रखता अगर आप वोरा गुट के करीबी है तो आपकी बल्ले बल्ले अगर नहीं तो फिर सर रैली में भीड़ का हिस्सा ही बने रह सकते है . यह बात इस लिए कह सकते है कि पूर्व में ऐसे कई प्रकरण सामने आये है जिसमे कांग्रेस से बढ़कर वोरा गुट हावी रहा . आइये ऐसे कुछ घटनाक्रम देखते है जो पिछले दिनों दुर्ग में हुए जिससे अनुमान लगाना आसान होगा कि दुर्ग में कांग्रेस की भूपेश सरकार की नहीं वोरा गुट की मनमानी चलती है ..
निगम की सत्ता के कंधे में स्वर वोरा गुट
दुर्ग निगम में महापौर के चयन में वोरा गुट ने सभी अनुभवी लोगो को दरकिनार कर पहली बार सक्रीय राजनीती में आये धीरज बाकलीवाल को महापौर की खुर्सी दिला कर वोरा गुट ने निगम के रस्ते शहर में अपने अस्तत्व को बचा लिया आज दुर्ग निगम में नाली के उद्घाटन से लेकर सडक के उद्घाटन में विधायक का निर्देश अनुशंषा रहती है हर कार्य विधायक के निर्देश पर होता है यहाँ तक की कार्य के बंटवारा में भी वोरा बंगले का पूरा हस्तक्षेप रहता है अगर कांग्रेस का कार्यकर्त्ता वोरा बंगले से दूर है तो वो कोई काम का नहीं जिसका परिणाम आज यह है कि विधायक के बंगले के करीबी रहने वाले आज एल्डरमैन भी है , ठेकेदार भी है और निजी कार्यो में सर्वेसर्वा भी है ये अलग बात है कि उनका सक्रीय राजनीती से कोई लेना देना नहीं . वोरा बंगले के करीबी आज एमआईसी प्रभारी भी है ठेकेदारी भी कर रहे है साथ ही किसे कार्य देना है किसे नहीं ये भी निश्चित कर रहे है . आज निगम में सत्ता का यहाँ तक ईस्तमाल हो रहा है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को भी कई मामलो में दरकिनार करने की असफल कोशिश हो रही है जिसका एक छोटा सा उदाहरण २३ अगस्त को ही देखने को मिला . २३ अगस्त प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का जन्मदिन इस दिन दुर्ग ही नहीं पुरे प्रदेश में मुख्यमंत्री के जन्मदिन के बधाई सन्देश लगे थे बड़े बड़े फ्लेक्स बेनर में जिसमे कार्यकर्ताओ ने लाखो खर्च किये किन्तु २४ अगस्त की सुबह शहर से ऐसे सारे पोस्टर बेनर गायब हो गए जिसमे विधायक वोरा के फोटो नहीं थे . तब ये चर्चा रही कि किसी ने होरी कर लिए होंगे अगर चोरी हुए तो ये गजब का ईतिफाक है कि शहर के ऐसे पोस्टर ही गायब हुए जिसमे विधायक के फोटो नहीं थे तो गजब का ईतिफाक है . क्योकि ऐसे ही ईतिफाक भिलाई विधायक देवेन्द्र यादव के पोस्टर के साथ भी हुए वही विधायक वोरा के जन्मदिन के पोस्टर महीनो लगे रहे पर चोरी नहीं हुए लगता है चोर भी मुख्यमंत्री और दुसरे नेताओं से खफा है और विधायक का ख़ास समर्थक . खैर ये ईत्तिफाक कई बार हो चुके है . कई बार तो ऐसा ईतिफाक भी होता है कि निगम का अतिक्रमण दस्ता शहर की साफ़ सफाई और अवैध पोस्टर बैनर निकालने के नाम पर शहर में कार्यवाही करता है तब भी अतिक्रमण दस्ता को दुसरे सारे नेताओ के पोस्टर नजर आते है जिन्हें उतार लिया जाता है किन्तु अवैधानिक तरीके से लगे विधायक के पोस्टर का तेज ऐसा रहता है जो दिखाई नहीं देता .
अनुभवी जनप्रतिनिधि को दरकिनार - निगम की सत्ता की चाबी कहने को तो धीरज बाकलीवाल के हाँथ में है किन्तु सिर्फ नाम के महापौर बन कर रह गए धीरज बाकलीवाल क्योकि शहर के हर कार्य का निर्देश विधायक वोरा ही देते है . आज दुर्ग भी भिलाई की तरह हो गया है जैसे भिलाई में विधायक एवं महापौर देवेन्द्र यादव लिखा जाता है और हर कार्य की अनुशंषा या सोंच एक ही व्यक्ति की रहती है ठीक उसी तरह दुर्ग निगम का हाल है हर कार्य की अनुशंषा या सोंच विधायक वोरा की ही रहती है महापौर धीरज बाकलीवाल सिर्फ एक नाम है और कुछ भी नहीं ऐसा हम नहीं कहते ऐसा कहने वाले दुर्ग के कई कांग्रेसी है कई जनप्रतिनिधि है जो ये बात कहते आम देखे जा सकते है . धीरज बाकलीवाल जो महापौर बनने से पूर्व एक व्यापारी थे जिनका सक्रीय राजनीती से कम ही वास्ता रहा एक मिलनसार और हंसमुख व्यक्ति की छवि रही जो सालो से कांग्रेस के नहीं वोरा परिवार के करीबी रहे है आज वोरा बंगले के कारण ही प्रतम बार चुनावी रण में विजयी होकर महापौर की खुर्सी पर विराजित है ऐसे में स्वाभाविक है कि वोरा गुट को ज्यादा महत्तव देंगे .
दुर्ग का निष्क्रिय संगठन कार्यकर्ताओ की लगातार उपेक्षा - दुर्ग कांग्रेस में संगठन की बात करे तो संगठन के नाम पर कुछ नाम जरुर है किन्तु ये ऐसे नाम है जो कभी सक्रीय राजनीती में कोई अहम् भूमिका नहीं निभा पाए सिर्फ वोरा बंगले के करीबी होने का फायदा उठाये है अनुभवहीनता आज दुर्ग कांग्रेस संगठन में साफ देखि जा सकती है . संगठन की बात करे तो दुर्ग कांग्रेस में अध्यक्ष की खुर्सी ऐसे हाँथ में है जो सक्रीय राजनीती से दूर ही है बात गया पटेल की है जो आज दुर्ग कांग्रेस के अध्यक्ष है किन्तु सिर्फ नाम के अध्यक्ष संगठन स्तर पर ऐसी कोई छाप नहीं छोड़ पाए है जैसी छाप पूर्व महापौर आर.एन.वर्मा ने छोड़ी थी . उसी कड़ी में आज एक ऐसे युवा कांग्रेस को अध्यक्ष बनाया गया है जिसे दुर्ग के कई कांग्रेसी जानते भी नहीं अगर पहचान है तो इतनी कि विधायक परिवार के करीबी के टूर पर महापौर बाकलीवाल के नजदीकी के टूर पर यहाँ बात हो रही है दुर्ग युवा कांग्रेस अध्यक्ष आयुष शर्मा कि जबकि दुर्ग युवा कांग्रेस की बात करे तो ऐसे कई चेहरे है जो सालो से सक्रीय राजनीती में है किन्तु दुर्ग में कांग्रेस अब बचा ही कहा यहाँ सिर्फ वोरा कांग्रेस की छाप ही है . अगर कांग्रेस का कोई अस्तित्व बचा होता तो दुर्ग के अनुभवी कांग्रेसियों के मन में असंतोष की जो धारा आज बह रही है वो नहीं बह रही होती . आज अनुभवी पार्षद जो सालो से कांग्रेस के साथ है न कि वोरा के सिर्फ पार्षद ही बनकर रह गए उनमे से मदन जैन , राजकुमार नारायणी वो मुख्य नाम है जो सिर्फ इसलिए दरकिनार है क्योकि वो कांग्रेसी है अगर वो वोरा गुट के कांग्रेसी होते तो आज कही और होते . कुछ ऐसी ही हालत सभापति राजेश यादव के साथ भी रही शुरू शुरू में सभापति को भी दरकिनार करने का कई बार असफल प्रयास हुआ किन्तु राजेश यादव के साथ सभापति का पद जुडा होने के कारण दरकिनार करना मुश्किल हो गया .
क्या वोरा कांग्रेस का ये अंतिम कार्यकाल - इन दिनों शहर में ऐसी चर्चा जोरो पर है कि जिस तरह से वोरा गुट शहर में मनमानी कर रहा है चाहे वो कार्य विभाजन की बात हो , चाहे वो चखना सेंटर आबंटन की बात हो , चाहे राशन दुकान वितरण की बात हो , चाहे वो सनागाथान के कार्यो की बात हो , चाहे शहर में विकास कार्यो के नाम पर दिखावा हो ऐसे कई कारण है जिससे शहर के आम जनता ही नहीं कई कांग्रेसी भी आतंरिक रुप से आक्रोशित है और ढाई साल बाद होने वाले चुनाव में मतदान के रूप में अपना फैसला सुनाने का इंतज़ार कर रहे है . वैसे अगर देखा जाए तो जिस तरह से वर्तमान हालत है चुनाव के बाद ऐसे कांग्रेसी कार्यकर्त्ता मिलना मुश्किल ही होगा जो समाज के बीच अपनी पैठ बनाकर वोट मांगने जा सकेगा .जिस तरह से आज कई कांग्रेसी कह रहे है कि इतनी उपेक्षा भाजपा शासन में नहीं हुई जितनी खुद की सरकार होते हुए हो रही कोई बड़ी बात नहीं कि भविष्य में एक बार फिर सालो दुर्ग में भाजपा का शासन रहेगा .
शौर्य की बातें / सम्पादकीय / दुनिया की सबसे उत्तम रचना नारी को माना जाता है कभी बेटी , कभी बहन , कभी दोस्त , कभी अर्धांग्नी , कभी हमदर्द , कभी बहु , कभी माँ , कभी सहकर्मी ऐसे कई रूप है जो एक ही जीवन में नारी का जीवन यापन होता है . अपनी हर जिम्मेदारी प्रत्येक रूप में कुशलता से पूर्ण करने वाली आदि शक्ति की उत्तम रचना नारी ही है खुद की पीड़ा को भूलकर अपनी समस्त जिम्मेदारियों को निभाने की जो कला नारी में होती है वो किसी और में नहीं हो सकती . पुरानो में भी नारी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है . सभी की उम्मीद की किरण नारी के अलग अलग रूप है किन्तु इन सभी रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने वाली इस देवी को क्या कभी खुद के लिए दो पल निकालने का भी समय मिल पाया . नारी के जीवन की आज के युग में कुछ ऐसी व्यथा है जिसे जानते तो सब है किन्तु स्वीकार नहीं कर पाते क्या आज के इस युग में नारी को आराम करने का हक नहीं है क्या हम और आप इस व्यथा पर कोई पहल नहीं कर सकते . आइये देखे कि बालपन से वृद्धावस्था तक नारी की चाह को कैसे पूरी करे कैसे दो पल का सुकून दे सके ...
"माँ मुझे थोडा आराम करना है.."
स्कूल, क्लास, पढ़ाई से थक कर बेटी ने माँ से कहा।
"अरी बिटिया अच्छी पढ़ाई कर, बाद मे आराम ही तो करना है .."
बिटिया उठी , पढ़ने बैठी और फिर आराम करनातो रह ही गया। ..*
"माँ मुझे थोडा समय दो.. दो घडी आराम कर लू" ऑफिस से थक कर आयी बिटिया ने कहा.." मैं थक गई हू"....
अरी शादी कर ले और सेटल हो जा.. फिर आराम ही करना है ..
बिटिया शादी के लिए तैयार हो गई और.. आराम करना तो रह हीगया.*
"अरे इतनी क्या जल्दी है.. एकाध साल रुकते है ना.."
"अरी समय के साथ बच्चे हो जाए तो टेंशन नहीं , फिर आराम ही आराम है ..."
बिटिया माँ बन गई और आराम करना तो रह हीगया..*
"तुम माँ हो.. तुम्हें ही बच्चे के साथ जागना पड़ेगा.. मुझे सुबह ऑफिस जाना है ..बस थोडे दिन.. बच्चे बड़े हो जाए फिर आराम ही आराम है.....
वो बच्चों के लिए कई रातें जागी और आराम करनातो रह ही गया..*
"सुनो जी.. बच्चे अब स्कूल जाने लगे है.. अब तो दो घडी बैठने दो आराम से..
"बच्चों की तरफ ध्यान दो , उनको पढ़ा लो फिर आराम ही आराम है"।
बच्चों का प्रोजेक्ट बनाने बैठी.. और आराम करनातो रह ही गया..*
" बच्चे पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़े हो गए ,अब कुछ आराम कर लू ."
"अब बच्चों की शादी करनी है.. ये जिम्मेवारी पार पडे के फिर आराम ही आराम है ."
उसने हिम्मत जुटाई.. बच्चों की शादी का काम निपटाया.. और फिर आराम करना तो रह हीगया..* .
"बच्चों का अपना संसार चलने लगा ,अब मैं ज़रा आराम कर लू .."
"अरी अब अपनी बिटिया माँ बनने वाली है , पहला बच्चा मायके मे होगा ना.. चलो तैयारी करे ."
हमारी बिटिया की डिलीवरी हो गई और आराम करना रह ही गया..
"चलो, ये जिम्मेदारी भी पूरी हुई , अब आराम "
"माँ जी, मुझे नोकरी पर वापस जाना होगा ..तो आप आरव को सम्भाल लेंगी ना ?"
नाती के पीछे दौड़ते दौड़ते थक गई और आराम करना रह ही गया ..
"चलो नाती भी बड़ा हो गया अब.. सारी जिम्मेदारियाँ खत्म... अब मैं आराम करूंगी.."
"अरी सुनती हो , गुठने दुख रहे है मेरे , मुझसे उठा नही जा रहा ..Bp भी बढ़ गया है शायद , डायबिटीस है सो अलग ..डॉकटर ने परहेज़ करने को कहा है .."
पति की सेवा मे बचा-खुचा जीवन गुज़र गया ..और.. आराम करना तो रह ही गया ..
एक दिन भगवान खुद धरती पर आए और कहा.." आराम करना है ना तुझे ? उसने हाथ जोड़े और भगवान उसे ले गए ..आखिरकार उसे आराम मिल ही गया ,
हमेशा के लिए ..!!!
( शरद पंसारी - सम्पादक शौर्यपथ दैनिक समाचार )
शौर्य की बातें / सेल्फी लेना , फोटो खिंचवाना जैसे गुजरी बात हो गयी जब तक निक्की था सेल्फी लेना फोटो खिंचवाना बहुत अच्छा लगता था छोटे या बड़े किसी भी उत्सव / त्यौहार में फोटो की झड़ी लग जाती थी किन्तु अब सब सूनापन नजर आता है अपनी ही तस्वीर से आंख मिलाने की हिम्मत नहीं होती . १६ जनवरी को मेरे भतीजे के जन्मदिन में जाने के लिए मेरी लाडो निक्की की प्यारी बहना तैयार हुई मै घर से निकल रहा था कि मन किया सिद्धि के साथ फोटो खिंचवाऊ . दो साल हाँ लगभग दो साल हो गए बेटी के साथ फोटो लिए हुए . जब फोटो को गौर से देखा तब मेरे आँखों की उदासी तो चश्मे के कारण नजर नहीं आयी किन्तु सिद्धि का दमकता चेहरा ये अहसास करा गया कि मेरी जिन्दगी चाहे जितनी भी वीरान हो सिद्धि को उसके हिस्से की हर ख़ुशी देनी है गम के आंसू छुपाये उसे मुस्कुराने की वजह देनी है . ये मात्र एक फोटो नही है ये एक पिता की बेटी के प्रति प्यार और अधिकार के साथ ईश्वर द्वारा दी गई जिम्मेदारी के निर्वाहन का स्वरूप है । जब मेरा लाल मुझसे बिछड़ गया तो जीने का कोई मकसद ही नही रह जिंदगी वीरान सी हो गई कि बार दिल ने कहा कि निक्की के पास चले जाएं मेरी रत्ना ने भी साथ देने का वादा किया किन्तु तब एक चेहरा सामने आया वो था सिद्धि का मासूमियत भरा मुखड़ा उसे किसके सहारे छोड़ के जाते हमारे सिवा है ही कौन जो उसे पलको में बिठा के रखे मेरा लाल उसके आने पर खुश था बहुत खुश सिद्धि उसकी जान थी आज भी जो जिंदगी गुजार रहे वो उधार की बस ईश्वर से यही प्रार्थना है कि जल्दी समय का पहिया घूमे सिद्धि काबिल बने अपनी जिम्मेदारी निभाये और हम अपने निक्की के पास जाए । ( शरद पंसारी - सम्पादक , शौर्यपथ दैनिक समाचार )
दुर्ग । शौर्यपथ । दुर्ग निगम की प्रशासनिक व्यवस्था की बात करे तो कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रशासनिक व्यवस्था का खामियाजा दुर्ग की जनता को ही चुकाना पड़ रहा है । दुर्ग निगम कभी भी फायदे में नही रहा किन्तु कुछ काम ऐसे हो रहे है जिससे यह साफ संकेत देता है कि दुर्ग निगम की इस प्रशासनिक व्यवस्था के कारण निगम प्रशासन जानबूझकर ऐसा कार्य करते है जिससे निगम को आर्थिक हानि हो । कहने को बात बहुत छोटी सी है किंतु अगर देखा जाए तो इस छोटी सी बात से ही दुर्ग निगम को लाखों का नुकसान हो रहा है । इस ओर न तो जनप्रतिनिधि ध्यान दे रहे है और न ही अधिकारी । निगम की इस व्यवस्था से उन्हें आर्थिक हानि तो हो ही रही है साथ ही उनके इस व्यवस्था से आम जनता को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है । मामला है दुर्ग निगम के अंतर्गत आने वाले पार्किंग व्यवस्था की । इन दिनों दुर्ग निगम के अंतर्गत तीन स्थानों में पार्किंग व्यवस्था की सुविधा है जिसमे से एक इंदिरा मार्किट दूसरा नया बस स्टैंड तीसरा समृद्धि बाजार ये तीनो जगहों पर निगम द्वारा पार्किंग की व्यवस्था की गयेई ताकि बाजार सुव्यवस्थित राह सके साथ ही पार्किंग के ठेके से निगम की आमदनी बढ़े किन्तु वर्तमान में समृद्धि बाजार में पार्किंग सुना और सड़कों पर वाहन जिससे आर्थिक हानि तो है ही चरमराती यातायात व्यवस्था के कारण गंभीर दुर्घटना का संशय हमेशा बना रहता है वही इंदिरा मार्केट की बात करे तो कहने को निगम के चार नियमित कर्मचारी यहां पर तैनात है किंतु इनकी तैनाती सिर्फ स्वयं के आय के लिए होती है । निगम के इस पार्किंग में दिनभर में गिरी से गिरी हालत में छोटे बड़े वाहन मिलाकर तकरीबन 400 - 500 वाहन का आना जाना होता है किंतु बड़े ही आश्चर्य की बात है कि 12 - 14 घंटे में निगम के 4 कर्मचारी की तैनाती जिनका मासिक वेतन औसतन 25 से 30 हजार के हिसाब से लाख रुपये से ऊपर होता है और ये कर्मचारी निगम के पार्किंग से औसतन 500 रुपये रोज रसीद काट कर निगम कोष में जमा करते है इस तरह निगम सिर्फ 15 हजार के लगभग आया के लिए लाख रुपये से ऊपर खर्च कर रहा है यही स्थिति बस स्टैंड पार्किंग की भी है । स्वयं ही अंदाजा लगा लिजीये की लाखों खर्च कर निगम हजारों कमा रहे साथ ही यातायात व्यवस्था पर भी ग्रहण लग रहा । किन्तु निगम प्रशासन इस पर मौन , जनप्रतिनिधि मौन क्योकि जो आर्थिक नुकसान हो रहा वो उनकी निजी संपत्ति नही आम जनता के टेक्स का पैसा है ...
दुर्ग / शौर्यपथ लेख / राजनीती की जब भी बात आएगी तो मोतीलाल वोरा का नाम जरुर आएगा . कांग्रेस की राजनीती में एक विनम्र और बेदाग़ छवि के लिए जाना जाने वाला नाम है मोतीलाल वोरा . ५ दशक की लम्बी राजनीती में पार्षद से देश के मुख्य राजनीती दल कांग्रेस में मोतीलाल वोरा का नाम सदैव के लिए अमिट हो गया साथ ही इतिहास के पन्नो में दर्ज़ हो गया २१ दिसंबर का दिन . किन्तु जिस तरह पिछले दिनों शहर के एक तालाब का नाम मोतीलाल वोरा के नाम किये जाने का निगम ने प्रस्ताव पारित किया उससे उनके नाम को जरुर कुछ आघात लगा .शहर का ठगडा बाँध जो ठगडा दाऊ की सम्पाती थी जिसे उनके द्वारा जनहित में दान किया गया और एक बड़े तालाब का निर्माण इन दिनों चल रहा है ठगडा दाऊ के नाम से बने इस तालाब का नाम अंग्रेज शासन में भी नहीं बदला ऐसे में अब बदलना कहा तक सही है . . मोतीलाल वोरा एक ऐसी सोंच के व्यक्ति थे जो अपनी राह स्वयं बनाते थे अपनी मंजिल ऐसे तय करते जिससे किसी को आघात ना हो किसी को शर्मिदा ना होना पड़े . अपने जीवन काल में शायद ही कोई ऐसा होगा जिनका दिल मोतीलाल वोरा ने दुखाया हो , सदा विनम्र रहने वाले काम को ही पूजा समझने वाले व्यक्ति के रूप में पहचान बनाने वाले मोती लाल वोरा किस नाम के मोहताज नहीं थे किसी का नाम का सहारा लेकर आगे बढ़ना मोतीलाल वोरा को कभी गवारा नहीं था ऐसे में आज जब वो इस दुनिया में नहीं है उनके नाम को किसी और के नाम के सहारे अमिट करना स्व. मोतीलाल वोरा जी के नाम का ही अपमान है . ठगडा दाऊ की एक अलग पहचान है स्व. मोतीलाल वोरा की एक अलग पहचान है . चौक चौराहो में स्व. मोतीलाल वोरा की फोटो लगाने से क्या लोग उन्हें याद रखेंगे ऐसा बिलकुल भी नही है . दुर्ग की राजनीती में प्रदेश की राजनीती में देश की राजनीती में उनका नाम किसी फोटो का मोहताज़ नहीं उनको किसी नाम के सहारे अपना नाम अमिट करने की चाह कभी नहीं रही होगी उनके कर्म ही ऐसे है कि दुर्ग की जनता के दिलो में उनकी छवि है ऐसे में दुर्ग में ठगडा बाँध के नाम को मोतीलाल वोरा के नाम से करने से अच्छा यह है कि उनके नाम से शहर में कुछ ऐसा नव निर्माण हो जिससे जनता के मन में उनके लिए आदर और बढे . उनके जीवन काल में उनके नाम से दुर्ग में कभी कोई प्रतिरोध नहीं हुआ किन्तु वर्तमान में ठगडा बाँध के नाम को परिवर्तन कर मोतीलाल वोरा का नाम दिए जाने के प्रस्ताव पारित होने से भाजपा सहित छत्तीसगढ़ मंच व कई अन्य सामाजिक लोगो द्वारा जो विरोध हो रहा है वह जरुर उनकी आत्मा को तकलीफ दे रहा होगा क्योकि जिस व्यक्ति ने अपनी मंजिल पाने के लिए किसी का सहारा नहीं लिया अब उनके नाम के लिए प्रतिरोध क्या सही है ?
ठगडा दाऊ की उनके नाम की अपनी अहमियत है वैसे ही स्व. मोतीलाल वोरा के नाम की भी अपनी अहमियत है . ये विवाद उठते ही दुर्ग विधायक और स्व. मोतीलाल वोरा के पुत्र अरुण वोरा को ही तुरंत सामने आ कर इस विवाद का पटाक्षेप करना चाहिए . भले ही आज सत्ता कांग्रेस की है और निगम में सरकार उनकी है आज ठगडा बाँध का नाम मोतीलाल वोरा के नाम से कर दिया जाएगा लाख विरोध के बाद भी तो क्या इस बात की गांरंटी है कि सत्ता परिवर्तन के बाद भी ये प्रक्रिया को विराम लग जायेगा . ये राजनीती है हो सकता है कल को भाजपा या कोई अन्य मंच निगम की सत्ता में बैठे और एक बार फिर इस बाँध को ठगडा बाँध के नाम से करने का प्रस्ताव पारित कर दे तब ज्यादा तकलीफ होगी स्व. मोतीलाल वोरा के समर्थको को उनके चाहने वालो को .
मेरे विचार से स्व. मोतीलाल वोरा के नाम के लिए सरकार कोई ऐसा नव निर्माण करे जो अविवादित हो ताकि भविष्य तक उस नवनिर्माण सोंच का नाम स्व. मोतीलाल वोरा के नाम पर ही रहे ना कि दुसरे के नाम पर काबिज निर्माण . अज भले ही सरकार ये कह दे कि ठगडा बाँध उनके प्रयासों से निर्मित हो रहा है किन्तु निर्माण की राशी उनकी नहीं है जनता की है जनहित के लिए जनता के पैसो से निर्माण हो रहा है . जब जमीन सरकार (ठगडा दाऊ द्वारा दान की हुई जमीन पर निर्मित है ठगडा बाँध ) की नहीं पैसा किसी व्यक्ति विशेष का नहीं तो फिर ये नाम बदलने का खेल क्यों अगर ये खेल शुरू हुआ तो आगे भी बढेगा और भविष्य में फिर नाम परिवर्तन की आशंका रहेगी . क्या ऐसी ही सच्ची श्रधान्जली देना चाहती है दुर्ग निगम की सरकार और निविवाद जननेता रहे स्व. मोतीलाल वोरा के नाम से वर्तमान में चल रहे विवाद पर क्यों मौन है दुर्ग विधायक वोरा ...
शौर्य की बातें । मोहनी हाँ यही नाम दिया था जब पहली बार गोद मे लिया था मेरे निक्की को उसके नाना ने । जिंदगी में पल पल तकलीफ झेलते हुए भी ना किसी से कोई शिकायत की ना किसी को जिम्मेदार ठहराया हर पल गम के साये में रहकर भी सदा मुस्कुराते हुए ईश्वर को ध्यान करते हुए जिंदगी जी रहे थे मेरे अर्धांगनी के पिता । 22 साल के बेटे को खो देने के बाद 3 बेटियों की शादी की ससम्मान तीनो को विदा किया । मुझे याद है वो पल जब मैंने कहा बाबूजी अब आप हमलोगों के साथ रहिए अपनी जन्मभूमि को छोड़ते हुए एक पल भी नही सोंचा और साथ आ गए । आज की दुनिया मे जब कोई अपना एक खोटा सिक्का भी छोड़ने के लिए दस बार सोंचता है बाबूजी ने बिना एक पल सोंचे अपनी जन्मभूमि छोड़ दी । सालो से साथ रह रहे थे न कोई शिकायत की ना कोई फरमाइश हर हाल में खुश और शांत । जब मेरा निक्की हमसे बिछड़ गया तो सहारा दिया पल पल साथ रहे मेरे साथ , मेरे अर्धांगनी के साथ मेरी लाडो के साथ एक मजबूत चट्टान की तरह ना कुछ कहते न कोई शिकायत बस एक निस्वार्थ साथ । मेरी रत्ना उनकी जान थी उसे देखते और उसी में अपनी दुनिया तलाशते किन्तु ये कैसी दुनिया है ये कैसा लोक मेरी रत्ना को अपना सब कुछ मानने वाला मेरी रत्ना का जन्मदाता ही मेरी रत्ना की गोद मे अंतिम सांस लिया उन्होंने तो अपनी मौत में भी खुशी पा ली होगी पर अब मेरी रत्ना का क्या होगा पहले भाई को खोया फिर बेटे को खोया और अब अपने पापा को । ईश्वर ये क्या किया तूने ये तेरा कैसा इंसाफ है अब मैं कैसे जिंदगी के पल काटूंगा । मेरा लाल तो मेरे सीने में जो दर्द दिया वो अब तक ताज़ा है अब मेरी रत्ना के दुख को कैसे देख पाऊंगा कैसे सामना कर पाऊंगा । तू कोई ऐसा चमत्कार कर दे ईश्वर की हम सब तेरी शरण मे आ जाये क्या करेंगे ऐसी जिंदगी का जिसमे ना कोई खुशी ना कोई लक्ष्य ना कोई उमंग है बस सुबह उठने के बाद रात का इंतजार और रात के बाद सुबह का । यही रात दिन की जिंदगी काटते हुए इस लोक में जी रहे है कितनी परीक्षा लेगा अब तो पास कर दे और हमे अपने पास बुला ले सबको बुला ले हम सब साथ रहेंगे । मैं , रत्ना , सिद्धि अम्मा , बाबूजी और मेरा निक्की सब साथ रहेंगे वही जगह हमारे लिए स्वर्ग होगी भूखे रहे प्यासे रहे चाहे जैसे भी रहे साथ रहेंगे तो खुश रहेंगे । तू तो सब कर सकता है अपने बच्चो के लिए हम भी तेरे बच्चे है क्यो हमे भूल गया ... बाबूजी तुम बहुत याद आ रहे हो निक्की बेटा तेरे नाना तेरे पास आ गए रे अब हमारी बारी जल्दी हमे भी बुला ले रे ..
छत्तीसगढ़ सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर संभागों, जिलों, विकासखंडों में फोटो-प्रदर्शनियां
हजारों लोगों ने उपलब्धियों को देखा, योजनाओं को समझा और सराहा
निरक्षरों तक भी सहज रूप से पहुंच रही हैं जानकारियां
लेख / शौर्यपथ / एक अच्छी तस्वीर में लाखों शब्दों की ताकत होती है। तस्वीरों की इसी ताकत का इस्तेमाल जनसंपर्क विभाग ने शासन की योजनाओं को दूरदराज के गांवों तक पहुंचाने के लिए किया है। विभाग ने संभागीय मुख्यालयों से लेकर जिलों और विकासखंड मुख्यालयों तक फोटो-प्रदर्शनी के आयोजनों का जो सिलसिला शुरु किया है, उसका अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की भीड़ इन प्रदर्शनियों में देखी जा रही है। तस्वीरों के जरिये योजनाओं की जानकारी उन लोगों तक भी पहुंच रही है, जिन तक अब तक साक्षरता की रौशनी नहीं पहुंच पाई।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ सरकार के दो वर्ष पूरे होने के अवसर पर जनसंपर्क विभाग ने 17 दिसंबर से फोटो प्रदर्शनियों का आयोजन शुरु किया है। इन प्रदर्शनियों को योजनाओं की जानकारियों के साथ-साथ दो साल की उपलब्धियों पर भी केंद्रित किया गया है। प्रदर्शनी में आए लोगों को जानकारी परक प्रचार सामाग्री का भी वितरण किया जा रहा है। प्रदर्शनी की थीम गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ रूबात हे स्वाभिमान के छत्तीसगढ़ के अभिमान के रखी गई है। इस आयोजन की खासियत यह भी है कि प्रदर्शनी के माध्यम से लोगों को विभिन्न शहरों और जिलों की ऐतिहासिकता से भी जोड़ा गया। मसलन, राजधानी रायपुर में प्रदर्शनी का आयोजन ऐतिहासिक बूढ़ातालाब स्थित स्वामी विवेकानंद उद्यान परिसर में किया गया तो जगदलपुर के सिरहासार भवन के ठीक सामने टाउन क्लब में प्रदर्शनी आयोजित की गई। धमतरी में मकई गार्डन में फोटो प्रदर्शनी का आयोजन किया गया तो बीजापुर के सांस्कृतिक भवन में यह आयोजित हुई। जशपुर के बाजार डांड में प्रदर्शनी लगाई गई, बिलासपुर में के रिवर व्यू रोड में चार दिनों तक लोगों ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस प्रदर्शनी के माध्यम से सांसदों, विधायकों, महापौरों समेत तमाम जनप्रतिनिधियों ने भी जनसामान्य के साथ संवाद किया। छत्तीसगढ़ में विगत दो वर्षों में हुए विकास कार्यों, नवाचारों और शासन की लोक हितैषी नीतियों की जानकारी लेकर लोगों द्वारा इसे सराहा गया। प्रदर्शनी में मुख्यमंत्री हाट बाजार क्लीनिक योजना, मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान, डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना, राजीव गांधी किसान न्याय योजना, गोधन न्याय योजना, मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना, ऐतिहासिक बूढ़ातालाब का निखरा स्वरूप, रायपुर शहर का विकास और सौंदर्यीकरण, बिजली बिल हाफ योजना, राम वन गमन पर्यटन परिपथ का विकास, वन आश्रितों के कल्याणकारी योजनाओं, नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी, ग्रामीण विकास, दाई-दीदी क्लीनिक, सार्वभौम पीडीएस, गढ़ कलेवा योजना, पौनी पसारी योजना, साफ पेयजल की आपूर्ति हमारा लक्ष्य, पढ़ई तुंहर दुआर आदि योजनाओं से संबंधित तस्वीरें प्रदर्शित की जा रही हैं।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली सरकार के 2 वर्ष पूरे होने के अवसर पर सोशल मीडिया पर #CGSwabhimaanKe2Saal लगातार ट्रेन्ड करता रहा। फोटो प्रदर्शनी के अवलोकन के बाद सुशील प्रकाश ने कहा-फोटो प्रदर्शनी के माध्यम से राज्य में चल रहे विकास कार्यों की जानकारी मिली है। आगे भी ऐसी प्रदर्शनियां आयोजित होते रहनी चाहिए। तुषार देवांगन ने कहा की राज्य की जनहितैषी योजनाओं से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है। गोधन न्याय योजना अपनी तरह की अनूठी योजना है जिससे लोगों के जीवन में परिवर्तन आया है। राकेश पाटले ने कहा कि उन्हें मुख्यमंत्री स्लम स्वास्थ्य योजना की जानकारी नहीं थी, इस प्रदर्शनी के माध्यम से योजना की जानकारी मिली। अजीत साहू ने कहा कि सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों को जनता तक पहुंचाने का यह अच्छा माध्यम है। उन्होंने कहा कि वे मुख्यमंत्री बघेल की रेडियो वार्ता लोकवाणी भी सुनते हैं। विनोद प्रजापति ने कहा कि प्रदर्शनी तो बढ़िया है ही, ब्रोशर और पांपलेट भी बहुत उपयोगी हैं।
अब तक छत्तीसगढ़ के सभी पांच संभागीय मुख्यालयों, सभी 28 जिला मुख्यालयों में प्रदर्शनी का आयोजन हो चुका है। अब क्रमश सभी विकासखंड मुख्यालयों में प्रदर्शनियां लगाई जा रही है।
आलेखः- श्री घनश्याम केशरवानी
बिलासपुर / शौर्यपथ / बिलासपुर में कई दिनों के बाद ऐसा हुआ कि प्रदेश के मुख्यमंत्री 2 दिन बिलासपुर में है । और 428 करोड़ की लागत के शिलान्यास तथा लोकार्पण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया । लोकार्पण उन योजनाओं का होगा जिनका शिलान्यास पिछले शासन में हुआ था और शिलान्यास उन योजनाओं का होगा जो इस शासन के हैं। मुख्यमंत्री बिलासपुर आए और राजनैतिक कयास न लगे ऐसा नहीं हो सकता पिछले एक माह में कई बार निगम मंडलों में नियुक्ति का कयास लगाया जा रहा है।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मरकाम ने दिसंबर माह में 15 दिनों के भीतर नियुक्ति का वादा किया था पर यह वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ है। दिसंबर माह में ही कांग्रेस ने अपनी सत्ता में वापसी का त्यौहार मनाया और इस त्यौहार के बाद से ही कार्यकर्ताओं को यह लगने लगा है कि अब सरकार चुनाव वोट पर आ गई है।
भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी जिस तरह से अपने प्रदेश संगठन पर ध्यान दिया है उससे लगता है कि भाजपा ने भी चुनाव के लिए भी तैयारी शुरू कर दी है, और भाजपा का यह इतिहास है कि जब वह केंद्र में शासन में होती है और किसी भी राज्य में चुनाव की तैयारी करती है तब राज्य सरकार से उसके संबंध लगातार खट्टे होते जाते हैं । इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी ऐसा दिखाई दे रहा है जानकारों की माने तो केंद्र और राज्य के बीच यह खटास अब बढ़ती ही जाएगी। जिसका सीधा अर्थ है की छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का अधिकतर समय केंद्र के साथ मतभेद निपटाने में लगेगा एक तरफ से यह मुख्यमंत्री बघेल के लिए चुनौती भी रहेगा कि वे केंद्र से किस तरह के संबंध रखें, ममता जैसा टकराव या फिर एक परिपक्व नेता की तर्ज पर अपनी जनता का हित देखकर रोज अपना काम निकालने का रास्ता प्रदेश का मुख्यमंत्री होने के नाते जनता तो उनसे यही उम्मीद करेगी कि वे वैसा मार्ग निकालें जिससे उन्होंने अपने घोषणा पत्र में जो वादे किए हैं उसे पूरा कर सकें ।
जबकि भाजपा पग पग पर उन्हें धोखेबाज मुख्यमंत्री के रूप में प्रचारित कर रही हैं। और अब भाजपा के नेताओं की जुबान भी तीखी होती जाएगी इस बीच में भाजपा संगठन के दोनों बड़े नेता छत्तीसगढ़ में लगातार दौरा कर रहे हैं । और उनका लक्ष्य सीधे कार्यकर्ताओं से बात करना है जबकि कांग्रेसी नेताओं के पास दो काम है जनता के हित करने वाली योजनाओं को लागू करना और अपने ही कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ रहे असंतोष पर काबू पाना । भूपेश सरकार के मंत्रिमंडल में रविंद्र चौबे, टी एस सिंह देव, मोहम्मद अकबर जैसे दिग्गज नाम के मंत्री तो हैं किंतु वे अपने विभागों के साथ प्रभावी नजर नहीं आते। जिला पंचायत के कार्यक्रमों के दम पर सरकार जनता के हित में काम करती नजर तो आती है किंतु इस विभाग का मंत्री प्रभावी तौर पर खड़ा नहीं दिखाई देता कारण योजनाओं का श्रेय सीएम अपने खाते में डालते हैं यही हाल स्वास्थ्य विभाग का है पिछला 1 साल कोविड-19 से जूझते हुए बीता पर यहां भी इस विभाग का मंत्री वैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाया जैसा उम्मीद थी खेती किसानी के मुद्दे पर भी बघेल मंत्रिमंडल के सदस्य मीडिया में प्रभाव छोड़ते नहीं दिख रहे हैं। कांग्रेस का मीडिया प्रभारी रायपुर छोड़ किसी भी अन्य जिले में प्रभावी नहीं है लोकार्पण और शिलान्यास विज्ञापन की दम पर कुछ घंटे प्रभाव दिखाया जा सकता है किंतु इससे नए छत्तीसगढ़ की संकल्पना कैसे पूरी होगी, और अपने आखरी कार्यकाल में यही गलती विश्वसनीय छत्तीसगढ़ के नाम पर डॉक्टर रमन ने की थी।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
