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खेल / शौर्यपथ / इंग्लैंड के सीनियर तेज गेंदबाज स्टुअर्ट ब्रॉड को वेस्टइंडीज के खिलाफ बुधवार (8 जुलाई) से शुरू होने वाले पहले टेस्ट क्रिकेट मैच की प्लेइंग इलेवन में जगह मिलने की संभावना नहीं है। इंग्लैंड का टीम प्रबंधन तेज गेंदबाजी के अगुआ जेम्स एंडरसन के साथ जोफ्रा आर्चर और मार्क वुड को प्लेइंग इलेवन में रखने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। 'द गार्डियन' की रिपोर्ट के अनुसार, ''ब्रॉड को आठ साल में पहली बार घरेलू टेस्ट मैच से बाहर होना पड़ सकता है, क्योंकि इंग्लैंड जोफ्रा आर्चर और मार्क वुड की तेज गेंदबाजी की जोड़ी को जल्द से जल्द मौका देने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
मार्क वुड और जोफ्रा आर्चर दोनों चोटों से परेशान थे, लेकिन अब वे फिट है। इंग्लैंड के दक्षिण अफ्रीकी दौरे के दौरान चोटिल होने वाले वुड अब खेलने के लिए तैयार है। टीम में ऑफ स्पिनर डोमिनिक बेस के रूप में केवल एक स्पिनर है और ऐसे में ब्रॉड को प्लेइंग इलेवन से बाहर रखा जा सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है, ''बुधवार से शुरू होने वाले मैच के लिए चुनी गई (13 सदस्यीय) टीम में कोई अतिरिक्त बल्लेबाज नहीं है और एक स्पिनर डॉम बेस है, ऐसे में मुख्य कोच क्रिस सिल्वरवुड और कार्यवाहक कप्तान बेन स्टोक्स को केवल तेज गेंदबाजी आक्रमण के बारे में ही सोचना होगा।''
यहां तक कि इंग्लैंड की टीम के बीच आपस में खेले गए अभ्यास मैच में अच्छा प्रदर्शन करने वाले क्रिस वोक्स को भी एजिस बॉउल में मौका मिलने की संभावना नहीं है। ब्रॉड को आखिरी बार 2012 में वेस्टइंडीज के खिलाफ ही घरेलू टेस्ट में विश्राम दिया गया था। उन्होंने अब तक 485 टेस्ट विकेट लिए हैं और इंग्लैंड की तरफ से एंडरसन के बाद सर्वाधिक विकेट लेने वाले दूसरे गेंदबाज हैं।
इंग्लैंड के मुख्य कोच सिल्वरवुड और कार्यवाहक कप्तान स्टोक्स हालांकि वुड को प्राथमिकता दे सकते हैं जो 90 मील प्रति घंटे की रफ्तार से गेंदबाजी करते हैं। इंग्लैंड को वेस्टइंडीज और पाकिस्तान के खिलाफ लगातार छह टेस्ट मैच खेलने हैं और ऐसे में तेज गेंदबाजों को तरोताजा बनाये रखने के लिए वह रोटेशन की नीति अपना सकता है।
इंग्लैंड की 13 सदस्यीय टीम : बेन स्टोक्स (कप्तान), जेम्स एंडरसन, जोफ्रा आर्चर, डोमिनिक बेस, स्टुअर्ट ब्रॉड, रोरी बर्न्स, जोस बटलर (विकेटकीपर), जॉक क्रॉली, जो डेनली, ओली पोप, डोम सिबली, क्रिस वोक्स, मार्क वुड।
मनोरंजन / शौर्यपथ / बॉलीवुड एक्टर रणवीर सिंह आज अपना 35वां जन्मदिन मना रहे हैं। ऐसे में उनकी ‘साली’, दीपिका पादुकोण की बहन अनीशा पादुकोण ने उन्हें विश करते हुए एक पोस्ट शेयर की है। रणवीर सिंह का डांसिंग जिफ इस्तेमाल करते हुए उन्होंने लिखा है जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं जीजा जी। इसके साथ ही अनीशा ने रणवीर सिंह को टैग भी किया है।
आपको बता दें कि रणवीर सिंह ने साल 2010 में फिल्म ‘बैंड बाजा बारात’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया था। इसके बाद से ही वह करियर में ऊंचाइयां छूने लगे थे। अपनी परफॉर्मेंस से उन्होंने लाखों-करोड़ों लोगों का दिल जीता। इनकी पर्सनैलिटी के कई लोग कायल हैं। बॉलीवुड टाउन के सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले एक्टर हैं। सोशल मीडिया पर फैन्स भी रणवीर सिंह को जन्मदिन की बधाई दे रहे हैं।
गौरतलब है कि रणवीर सिंह ने हाल ही में अपनी फिल्म ‘लूटेरा’ के सात साल पूरे किए हैं। इस मौके पर उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर दो वीडियो शेयर किए। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट हुई थी। रणवीर ने जब पोस्ट शेयर की तो दीपिका पादुकोण ने कॉमेंट करते हुए लिखा कि तुम्हारी सबसे शानदार परफॉर्मेंस अभी तक की।
बता दें कि रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की लव-स्टोरी किसी से छिपी नहीं है। दोनों की केमिस्ट्री लोगों को खूब पसंद आती है। रियल लाइफ में भी रणवीर आज भी दीपिका को इंप्रेस करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। दोनों 6 साल तक रिलेशनशिप में रहे। जब दोनों अपने करियर के टॉप पर थे तो इटली के लेक कोमो में इन्होंने ग्रैंड वेडिंग की। दोनों की शादी काफी पर्सनल अफेयर रही। केवल परिवार के लोग ही इसमें शामिल रहे। लव-स्टोरी की बात करें तो वह काफी दिलचस्प रही। हाल ही में फुटबॉलर सुनील छेत्री ने रणवीर सिंह संग लाइव चैट की, जिसमें उन्होंने बताया कि केवल 6 महीने में ही उन्होंने दीपिका से शादी करने का तय कर लिया था।
रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण ने रामलीला, पद्मावत और बाजीराव मस्तानी जैसी फिल्मों में साथ काम किया है। इनकी प्रेम कहानी रामलीला के दौरान से शुरू हुई थी। दीपिका और रणवीर दोनों फिल्म 83 में साथ नजर आने वाले हैं। इस फिल्म में रणवीर, कपिल देव का किरदार निभा रहे हैं। वहीं दीपिका फिल्म में कपिल देव की पत्नी रोमी का किरदार निभाने वाली हैं। गौरतलब है कि फिल्म में दीपिका के सीन्स कम होंगे।
मेरी कहानी / शौर्यपथ / उस पढ़ाई को छूट जाना था, जिसमें कामयाबी दूर-दूर तक नहीं दिख रही थी। मैट्रिक में दो बार फेल होकर समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे पास हुआ जाए? मन पढ़ाई में कैसे रमाया जाए? मन इतना चंचल था कि जिधर आवाज होती, उधर भाग लेता और एक बार भाग जाता, तो उसे लौटाने में बहुत जोर आता। अपनी पढ़ाई बोझिल और दुनिया के अन्य तमाम विषय दिलचस्प लगते थे। ले-देकर गणित की किताबों में मन ठहरता था, क्योंकि वहां डोर सुलझी हुई थी। एक बार तरीका पता चल गया, तो प्रश्न हल करते बढ़ते चलो, पर बाकी विषय पहाड़ थे। काश! एक ही विषय की परीक्षा होती, तो सफलता कदम चूमती, लेकिन यहां अनेक विषय मिलकर गणित की कमाई पर पानी फेर देते थे। छवि बन गई थी कि इस लड़के का मन पढ़ाई में नहीं लगता, गांव से शहर गया, लेकिन वहां भी फेल!
ऊपर से भाग्य ने भी पीठ दिखा दी, असमय ही पिता का साया उठ गया। गांव लौटना पड़ा। उम्र में 18वां साल लग चुका था और दिखने लगा था कि अब आगे की पढ़ाई पर पूर्ण विराम लग जाएगा। शहर में रहने, आने-जाने और परीक्षा फीस इत्यादि का बोझ भारी था। ये ऐसे बड़े खर्चे थे, जिनके सामने घुटने टेक देना तय लग रहा था। पर एक दिन मां अपना पूरा उत्साह समेटे सामने आ खड़ी हुई, ‘चल, बांध अपना सामान। परीक्षा के दिन आ रहे हैं, इस बार तुझे सफल होना ही है’।
बेटा स्तब्ध था। मां ने आंचल से रुपये निकाले और बेटे की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘ले तेरी यात्रा का खर्च और परीक्षा की फीस’।
सवाल वाजिब था, ‘अम्मा, कहां से आए पैसे?’
मां ने अपने को समेटते हुए नजरें झुकाए कहा, ‘मैंने अपने बचे हुए गहने बेच दिए, तेरी पढ़ाई सबसे जरूरी है’।
पिता के गुजर जाने के बाद टूटी हुई मां की सूनी आंखों में झांकते हुए बेटा भाव में बह चला। उसके दो बार फेल होने के बावजूद मां का विश्वास कायम है। वह अपनी सबसे गाढ़ी पूंजी बेटे की पढ़ाई पर लगा रही है। मां का यह रूप देख बेटा मानो हठात् नींद से जाग गया। वह ऐसी प्यारी मां की उम्मीद को दो बार से तोड़ रहा है और अब भी उलझनें इतनी हैं कि तीसरी बार भी तोड़ने की तैयारी लगती है। मां अपने जेवर बेचकर खड़ी है कि बेटा पास कर जाए, आगे पढ़ाई करके कुछ बन जाए और बेटा है कि अपने मन को काबू में नहीं रख सकता। जहां पूरी जिंदगी दांव पर लगी हो, वहां एक परीक्षा परेशान कर रही है? बेटे का मन धिक्कार उठा। कुछ पल की भाव-प्रबल खामोशी के बाद मन ने ठान लिया और बोल पड़ा, ‘अम्मा, मुझे नाम कमाना होगा, तभी मेरा जीवन सार्थक होगा।’
बेटे की अच्छी पढ़ाई के लिए मां का समर्पण नया नहीं था। अब बेटे की समझ में आ रहा था कि कैसे वह घर से भाग रहा था। पांच साल पहले, दूर काशी पहुंचकर केले बेच पैसे कमाने की योजना थी। स्कूल से लौटने में देरी हुई, तो मां खोज में दौड़ पड़ी थी और भागते बेटे को पकड़ लाई थी और समझाया था कि गरीबी से मत घबरा, सिर्फ पढ़ाई से मन लगा। तब बात बेटे की समझ में नहीं आई थी, पर जब मां ने अपने गहने बेच दिए, तब बेटे का हौसला इतना फौलादी हो गया कि जिंदगी में कभी फेल होने या कभी हारने की गुंजाइश ही नहीं बची। कामयाबी का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले मैट्रिक और उसके बाद मेडिकल कॉलेज, लेकिन दुर्भाग्य ने भी पीछा नहीं छोड़ा। उष्णकटिबंधीय स्पू्र नामक छोटी आंत में होने वाली बीमारी की वजह से पहले बडे़ भाई और फिर छोटे भाई की जान गई। दृढ़ता और बढ़ी कि मेडिकल की पढ़ाई और शोध के जरिए इस बीमारी का इलाज खोजना है। भारत में रिसर्च की सुविधा नहीं थी। विदेश जाना मजबूरी थी। 1923 में मां के लाल येल्लाप्रगडा सुब्बाराव निकल चले कुछ कर गुजरने।
अमेरिका में जहां एक ओर संघर्ष का कारवां था, वहीं दूसरी ओर था, उपलब्धियों का चमकदार सिलसिला। पहले फोलिक एसिड, एंटी-फोलिक एसिड, एटीपी-एनर्जी फॉर लाइफ, फोसफॉस मैथड, फिलारियासिस, विटामिन बी12 इत्यादि अनेक आधारभूत उपलब्धियों को सुब्बाराव (1895-1948) ने अंजाम दिया। प्रचार से हमेशा दूर रहने वाले संकोची सुब्बाराव 25 वर्ष लगातार अमेरिका में विज्ञान की सेवा करते रहे। भाइयों को जो रोग दुनिया से ले गया था, उसके इलाज की खोज के साथ ही कैंसर के इलाज- कीमोथेरेपी की भी बुनियाद सुब्बाराव के खाते में दर्ज है। वह भारत लौटने का सपना संजोए महज 53 की उम्र में दुनिया से चले गए। उनके निधन के बाद एक अखबार ने लिखा, ‘वह सदी के सबसे प्रख्यात चिकित्सा दिमागों में से एक थे’, तो किसी ने भारत मां के उस लाल को सम्मान से नवाजते हुए दर्ज किया, ‘बौनों के बीच कद्दावर’।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याययेल्लाप्रगडा सुब्बाराव, प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक
जीना इसी का नाम है /शौर्यपथ/ मैंने अपनी पूरी जिंदगी अफसरों के दरवाजे खोले। मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चों के लिए भी कोई दरवाजे खोले। वे भी इस मुकाम तक पहुंचें। वे भी अफसर बनें।- ये अल्फाज उस पिता के थे, जिनके पास अपने बच्चों की फीस भरने तक के पूरे पैसे न थे, मगर लायक बेटी ने इस अल्फाज के हर हर्फ पर अपना ईमान रख दिया। और आज वह पाकिस्तानी ईसाई समुदाय की पहली सीएसएस हैं। यानी देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा की अफसर- राबेल केनेडी!
सियालकोट के जॉन केनेडी का यह ख्वाब कितना दुस्साहसिक था, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता था। अव्वल तो वह मसीह बिरादरी, यानी अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं और फिर उनकी नौकरी भी ऐसी थी कि उससे घर के ही सारे खर्च पूरे न हों। मगर सपने ऊंचे न देखे जाएं, तो नजीर कैसे कायम होगी? जॉन फेडरल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू, यानी एफबीआर में ड्राइवर हैं। साल 1985 में उन्हें इस महकमे में नौकरी मिली और तब से लाहौर, गुजरांवाला और सियालकोट में वह अलग-अलग अफसरों की खिदमत करते रहे हैं।
कहते हैं, सोहबत का असर आपकी सीरत में जरूर दिखता है। जॉन के भीतर भी वह हसरत इसी सोहबत की वजह से उठी थी। जिस किसी अफसर के साथ उनकी ड्यूटी पड़ती, वह उसकी शख्सियत के खूबसूरत पहलुओं को अपने बच्चों के लिए समेट लाते। राबेल कहती हैं, ‘मेरे वालिद जब भी किसी सीएसएस अफसर के साथ टूर पर जाते, तो वहां से लौटकर हमें उनकी तमाम खूबियों, उनके इल्म के बारे में काफी कुछ बताते। उनकी बातों से हम भाई-बहन काफी मुतासिर होते थे।’
सीएसएस का ख्वाब आहिस्ता-आहिस्ता पिता की आंखों से उतर राबेल के मन में जा बसा था। मगर इसके लिए अच्छी तालीम बहुत जरूरी थी। जॉन और उनकी बीवी सबीहा ने अपनी सारी ख्वाहिशें बच्चों पर कुर्बान कर दीं। करीब दो साल तक उन दोनों ने अपने लिए कुछ भी नहीं खरीदा, बस बच्चों की जरूरतों को वे जीते रहे। इस कोशिश में सियालकोट के जीसस ऐंड मैरी कॉन्वेंट का बड़ा साथ मिला। स्कूल ने राबेल और बाकी के चार भाई-बहनों की फीस आधी माफ कर दी थी।
पढ़ाई में राबेल का प्रदर्शन शानदार रहा। वह लगातार ऊंचे नंबरों के साथ पोजिशन लेती रहीं। बेटी की प्रतिभा देख पिता की उम्मीदें भी मजबूत होती गईं। वह हर कदम पर राबेल का हौसला बढ़ाते रहे। जीसस ऐंड मैरी कॉन्वेंट से मैट्रिक करने के बाद वह सियालकोट के ही स्टैंडर्ड कॉलेज पहुंचीं, जहां से उन्होंने जूलॉजी में मास्टर्स की डिग्री ली। पर राबेल को अब तक बखूबी इल्म हो चुका था कि उन्हें सामाजिक-आर्थिक मोर्चे के साथ-साथ ‘क्लास’ और अल्पसंख्यक होने के दबाव से भी लड़ना है।
मास्टर्स करने के साथ-साथ राबेल कुछ ऐसा करना चाहती थीं, जिससे पिता का आर्थिक बोझ कुछ कम हो सके और छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई में भी मदद हो पाए। सिविल सर्विसेज की किताबें और अन्य सामग्रियों के लिए भी पैसे चाहिए थे। राबेल अपने उसी स्कूल में दरख्वास्त लिए पहुंचीं, जहां से उन्होंने मैट्रिक्युलेशन किया था। स्कूल उनकी प्रतिभा से अच्छी तरह वाकिफ था। बहैसियत शिक्षक उनका नया सफर शुरू हो गया। शुरू में 12 हजार रुपये तनख्वाह थी, जो बढ़ते-बढ़ते 24 हजार हो गई।
मगर राबेल की असली मंजिल तो कुछ और थी। इरादा भी बुलंद था, हालांकि उलझनें भी कम न थीं। सबसे बड़ी परेशानी तो यही थी कि सीएसएस इम्तिहान के लिए कौन-कौन से विषय चुने जाएं? यह उनका पहला प्रयास था। इससे उबरने में पिता के साहबों ने उनकी काफी मदद की। उन्होंने राबेल को न सिर्फ विषयों के चयन, बल्कि किस तरह से तैयारी करनी चाहिए, इसके बारे में गहराई से बताया। तजुर्बेकार लोगों की सलाहों ने इस इम्तिहान से जुड़ी तमाम गांठों को खोल दिया। उन्हें बस अब जुट जाना था।
आखिरकार, फरवरी 2019 में सीएसएस इम्तिहान की तारीख भी आ गई। तैयारी मुकम्मल थी, खुद पर भरोसा भी पूरा था, पूरे आत्मविश्वास के साथ इंटरव्यू भी दिया था, मगर नतीजा तो किसी और को तय करना था, सो एक बेकली भी बनी रही। बीते 17 जून को भाई से सूचना मिली कि सीएसएस का रिजल्ट आ गया है। रिजल्ट देखने के लिए जब बहन-भाई ने वेबसाइट को खोला, तो वह ओवरलोडेड थी। सबकी धड़कनें बढ़ने लगी थीं, तभी तैयारी में रहनुमाई करने वाले एक सज्जन ने फोन करके मुबारकबाद दी। तब से बधाइयों का सिलसिला जारी है। राबेल पाकिस्तान विदेश सेवा के लिए चुनी गई हैं। उनके दो और भाई-बहन इस वर्ष की परीक्षा में बैठे हैं। यकीनन, राबेल की कामयाबी ने उनका हौसला बढ़ाया होगा।
मुल्क के विदेश मंत्री ने जब जॉन केनेडी को फोन करके कहा कि आपकी परवरिश पर पूरे मुल्क को नाज है, तो पिता की आंखों के कोर भीग गए। तालीम और किताबों से अपनी जिंदगी में वंचित रह गए जॉन को लायक बेटी ने पूरे पाकिस्तान में मशहूर कर दिया है।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंहराबेल केनेडी, पाकिस्तानी ईसाई सीएसएस
नजरिया / शौर्यपथ /अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फिर से चुने जाने की संभावना हाल के दिनों में धूमिल हुई है। उन्होंने खुद इस बात को स्वीकार किया, जब फॉक्स न्यूज के एंकर सीन हैनिटी के साथ इंटरव्यू के दौरान वह भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि जो बिडेन ‘आपके राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं, क्योंकि कुछ लोग मुझे प्यार नहीं करते’। रियलक्लियर पॉलिटिक्स के सर्वे के मुताबिक, ट्रंप 9.3 अंकों से बिडेन से पीछे चल रहे हैं, जबकि फाइवथर्टीएट के सर्वे के मुताबिक, वह 9.6 अंकों से पीछे हैं। वह विस्कॉन्सिन, मिशिगन, पेंसिल्वेनिया और फ्लोरिडा जैसे राज्यों में भी पीछे हैं, जिनकी गिनती स्विंग स्टेट्स (अस्पष्ट चुनावी रुझान वाले राज्यों) में होती है और जहां 2016 में उन्होंने जीत हासिल की थी। जॉर्जिया और एरिजोना में वह दौड़ में हैं, जहां हरेक राष्ट्रपति चुनाव में कमोबेश रिपब्लिकन को ही वोट मिलता रहा है। टेक्सास की भी तस्वीर यही है, जहां के मतदाता मुख्य रूप से रिपब्लिकन पार्टी को ही चुनते रहे हैं।
जब से ट्रंप राष्ट्रपति बने हैं, तब से गॉलअप पोल की अनुमोदन रेटिंग में उन्हें कभी भी 49 फीसदी के ऊपर जाते नहीं देखा गया। पर अभी उनकी छवि को बट्टा इसलिए लगा है, क्योंकि अपने कार्यकाल की दो सबसे बड़ी मुश्किलों से ठीक से निपटने में वह सफल नहीं माने गए हैं। इसमें से पहला संकट कोविड-19 महामारी है, जिससे अब तक 1,28,000 से अधिक अमेरिकियों की जान जा चुकी है और करीब 28 लाख लोग संक्रमित हैं। दूसरी मुश्किल जाहिर तौर पर नस्लवाद-विरोधी आंदोलन है, जो देश में गहराई तक फैल गया है।
कोरोना वायरस को ट्रंप ने अनाधिकार प्रवेश करने वाला खतरा माना, जो उनके कार्यकाल की सबसे बेशकीमती उपलब्धि और दूसरे कार्यकाल का टिकट चुरा बैठा है। उनकी वह कीमती उपलब्धि थी, मुल्क की बढ़ती अर्थव्यवस्था। और फिर, देश में अधिक ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने विरोध-प्रदर्शनों का इस्तेमाल किया, ताकि नवंबर के चुनाव में वह अपने समर्थकों को एकजुट कर सकें । मगर अभी समय है। लुढ़कने से पहले अपने कदम वापस खींचने के लिए ट्रंप खूब जाने जाते हैं। अक्तूबर, 2016 के ‘एक्सेस हॉलीवुड टेप’ को याद कीजिए, जिसमें ट्रंप किस तरह महिलाओं के खिलाफ अशालीन टिप्पणी करते हुए डींगें मार रहे थे। तब उनके चुनाव अभियान में जुटे कई लोगों ने हार मान ली थी। लेकिन वह 2016 का ‘अक्तूबर सरप्राइज’ था, यानी ऐसा अप्रत्याशित घटनाक्रम, जो चुनावी गुणा-गणित को पलटने में सक्षम हो। ऐसा इसलिए, क्योंकि जिस प्रत्याशी पर आरोप लगते हैं, उसे इससे उबरने या इसका तोड़ निकालने के लिए पूरा समय नहीं मिल पाता। यह शब्द अमेरिकी चुनाव में बतौर मुहावरा खूब इस्तेमाल होता है। पर हम सभी जानते हैं कि ट्रंप इससे बखूबी बच निकले।
भारत में भी इसके अगले महीने कुछ इसी तरह का घटनाक्रम रहा। उसका कोई नाम तो नहीं है, लेकिन इसे ‘इंडियाज नवंबर सरप्राइज’ कहा जा सकता है। यह 9 नवंबर को ट्रंप के अप्रत्याशित चयन से सामने आया, क्योंकि हिलेरी क्लिंटन की जीत को लेकर भारत आश्वस्त था। इसी खुमारी में भारतीय राजनयिक परेशान थे कि किसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बधाई फोन ट्रंप तक पहुंचे। हालांकि जल्द ही वे यह बताने में सफल रहे कि मोदी उन वैश्विक नेताओं में एक थे, जिन्होंने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को पहले फोन किया था। यहां महत्वपूर्ण बात बधाई फोन कॉल नहीं, क्योंकि वह 10 नवंबर की सुबह भी लग सकती थी, खास बात यह है कि नई दिल्ली को जो बिडेन के साथ भी अपने संपर्क के रास्ते खुले रखने चाहिए। यदि अब तक ऐसा नहीं किया गया है, तो इसकी जरूरत पड़ सकती है।
बिडेन भारत के लिए अजनबी भी नहीं हैं। भारत को समर्थन देने का उनका लंबा रिकॉर्ड है। इसमें बतौर सीनेटर असैन्य परमाणु समझौता का समर्थन शामिल है। वह 2013 में उप-राष्ट्रपति के रूप में भारत आ चुके हैं और तब उन्होंने भारत में अपने रिश्तेदार के होने की बात कही थी, जिनसे वह अपना उपनाम साझा करते हैं। इससे भी अच्छी बात यह है कि इस हफ्ते की शुरुआत में उन्होंने कहा है कि यदि वह राष्ट्रपति बनते हैं, तो भारत के साथ अपने संबंध को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे और एच-1बी वीजा निलंबन को रद्द कर दिया जाएगा। बिडेन कदम बढ़ा चुके हैं। ऐसे में, अब भारत क्या करेगा?
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / नस्लभेद एक ऐसी खामी है, जो इंसानी समाज का पीछा नहीं छोड़ रही है। दुनिया में एक समय रंग के आधार पर इंसानों की खरीद-फरोख्त से लेकर आज अमेरिका में उठते नस्लवादी जुमलों तक अनेक ऐसे स्याह पहलू हैं, जो न केवल दुखद, बल्कि शमर्नाक हैं। भले ही 17वीं सदी से एक नस्लीय विज्ञान खड़ा करने की कोशिश हुई है, जिसके तहत किसी नस्ल को रंग के आधार पर श्रेष्ठ, तो किसी को कमतर बताने का उपक्रम रहा है। लेकिन धीरे-धीरे यह सिद्ध होता गया है कि इंसानों के बीच कोई खास फर्क नहीं है। रंग के आधार पर किसी नस्ल को कमतर या श्रेष्ठ नहीं बताया जा सकता। त्वचा का बदलता रंग एक विकासवादी प्रक्रिया का हिस्सा है।
त्वचा के रंग की विविधता पर हाल ही में एक ऐतिहासिक अध्ययन सामने आया है। जीन के विकास का पता लगाने में जुटी टीम ने यह जांचा कि जीन दुनिया भर में कैसे यात्रा करते हैं। टीम इस नतीजे पर पहुंची है कि अफ्रीकी मूल के लोगों के एक बडे़ हिस्से में जीन में ऐसे बदलाव हुए, जो उनकी त्वचा के रंग के लिए जिम्मेदार हैं। साइंस जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि दो जीन, एचईआरसी 2 और ओसीए 2, यूरोपीयों की हल्की त्वचा, आंखों और बालों से जुड़े हैं। वास्तव में, अफ्रीका एक ऐसा महादेश है, जहां हर रंग के लोग पाए जाते हैं। अत: यह नहीं कहा जा सकता कि रंग के आधार पर उनमें कोई किसी से श्रेष्ठ या कमतर है। त्वचा का रंग एक जैविक प्रक्रिया मात्र है। कोई तुक नहीं कि नस्लवाद जारी रखा जाए।
18वीं शताब्दी में स्वीडिश प्रकृतिवादी कोरोलस लिनिअस ने इंसानों को चार समूहों में बांटा था, यूरोपीय, अमेरिकी, एशियाई और अफ्रीकी। 19वीं सदी के पहले दशक में अमेरिका में एक मानव विज्ञानी सैमुअल जॉर्ज मॉर्टन हुए, जो दुनिया भर से मिली खोपड़ियों को मापते रहे और यह बताया कि रंग व श्रेष्ठता का रिश्ता मस्तिष्क के आकार से जुड़ा है। वह बताना चाहते थे कि श्वेत लोगों की खोपड़ी बड़ी होती है और इसीलिए वे श्रेष्ठ होते हैं, जबकि सच यह कि खोपड़ी के आकार से श्रेष्ठता का कोई लेना-देना नहीं है। अश्वेतों की भी खोपड़ी बड़ी होती है और श्वेतों में भी छोटी खोपड़ी पाई जाती है। पहले भी ऐसे वैज्ञानिक थे, जो बड़ी खोपड़ी और श्रेष्ठता के बीच किसी रिश्ते को खारिज करते थे, पर ऐसे वैज्ञानिकों को नजरंदाज कर दिया जाता था। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि श्वेत श्रेष्ठ हैं, इसलिए वे अश्वेतों पर राज करने के अधिकारी हैं और इसी गलत विचार का परिणाम है कि आज भी श्वेत पुलिस वाले निर्दोष अश्वेत के गले पर सवार हो उसके प्राण ले लेते हैं। अनेक वैज्ञानिक यह मानते रहे हैं कि दुनिया में करीब 63 नस्ल के इंसान रहते हैं, लेकिन श्रेष्ठता नस्ल से तय नहीं होती। 1990 से 2003 के बीच हुए डीएनए अनुसंधान के तहत आनुवंशिकी के साथ मानव वंश को डिकोड करने के बाद पाया गया कि सभी मानव समान हैं, उनमें असाधारण रूप से 99.9 प्रतिशत साम्यता है। जो 0.1 प्रतिशत अंतर है, वह सिर्फ हमारे वातावरण और कुछ अन्य बाहरी कारकों से तय होता है। वैज्ञानिक आईक्यू या बौद्धिक स्तर के आधार पर भी नस्लभेद को खारिज कर चुके हैं। संदेश स्पष्ट है, यदि हर इंसान को एक तरह का पालन-पोषण, शिक्षा और परिवेश मिले, तो इंसानों के बीच कोई असमानता नहीं रह जाएगी।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / लॉकडाउन के कारण प्रवासी मजदूर घर वापस आ गए थे, लेकिन अब राजनीतिक हथियार की तरह उपयोग होने के बाद धीरे-धीरे उन्हीं शहरों में लौटने लगे हैं, जहां से उन्होंने वापसी की थी। मजदूरों की वापसी की मजबूरी समझी जा सकती है, क्योंकि जिस वक्त वे अपने घर लौटे थे, तब सरकार सहित तमाम संस्थानों ने उनको अपने ही राज्य में कुशलता के आधार पर रोजगार देने की बात कही थी, लेकिन मजदूरों के हाथ खाली ही रहे। अब जब सब कुछ धीरे-धीरे खुल रहा है, तो इन मजदूरों के लिए दो वक्त की रोटी जुटा पाना भी मुश्किल हो रहा है। परिवार के भरण-पोषण के लिए वे फिर परदेश का रुख करने लगे हैं, जबकि वहां इस बात की गारंटी कोई लेने को तैयार नहीं है कि यदि इस प्रकार की विपदा फिर आती है, तो क्या उन्हें सरकार पर भरोसा करना चाहिए? ऐसे में, क्या यह अच्छा नहीं होगा कि हुनर के हिसाब से उनको अपने राज्यों में ही काम मिले, ताकि उन्हें फिर से प्रवासी बनने की पीड़ा न भुगतनी पड़े?
अभिनव त्रिपाठी
बेल्थरा रोड, बलिया
उकसावे में नेपाल
आजकल भारत और नेपाल के बीच तनाव चल रहा है। बिगड़ते आपसी रिश्ते की वजह नेपाल में बढ़ता राष्ट्रवाद है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तमाम घरेलू मुद्दों पर असफल हो चुके हैं। अपनी सरकार बचाने के लिए वे लोगों में राष्ट्रवादी सोच भरना चाहते हैं। राष्ट्रवाद का होना अच्छी बात है, लेकिन जब यह साम्राज्यवाद के साथ मिल जाता है, तब बहुत खतरनाक हो जाता है। ऐसा हमें यूरोप में देखने को मिला था, जब साम्राज्यवाद से जुड़कर राष्ट्रवाद 1914 में यूरोप को महाविपदा की ओर ले गया। नेपाल का राष्ट्रवाद भी इसी कदम पर बढ़ता दिख रहा है, जो उसे महाविपदा की ओर ले जाएगा।
चेतन कुमार कर्ण
साथ दे विपक्ष
लोकतंत्र में विपक्ष की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उसका काम सरकार को सलाह देना, गलत निर्णय का विरोध करना और सही फैसले का स्वागत करना है। विपक्ष का काम यह नहीं है कि वह सरकार के अच्छे कामों का भी विरोध करे। वर्तमान परिस्थिति में विपक्ष सरकार को सुझाव दे, न कि विकास के कामों को रोकने का प्रयास करे। जैसे, चीन के मुद्दे पर विपक्ष को सरकार और सेना के साथ चलना चाहिए। साथ ही सेना की कार्यशैली पर उसे सवाल नहीं उठाना चाहिए। मगर विपक्ष के ऐसा न करने से जनता को परेशानी का सामना करना पड़ता है। सत्ता पाने के लिए हर हद तक उतर जाना राजनीतिक दलों को शोभा नहीं देता।
रितेश आनंद, गोड्डा, झारखंड
सावधानी जरूरी
विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख के अनुसार, कोरोना महामारी का अभी सबसे बुरा समय आना बाकी है। यहां उल्लेखनीय है कि चीन में लगभग छह महीने पहले कोविड-19 का पहला मामला सामने आया था। तब अनुमान लगाया गया था कि इससे अधिकतम आठ सौ लोग मारे जाएंगे, लेकिन आज कोरोना से एक करोड़ से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और पांच लाख से ज्यादा लोगों की जान यह वायरस ले चुका है। एक कहावत है कि अगर आप गीदड़ का शिकार करने जा रहे हैं, तो तैयारी शेर के शिकार की होनी चाहिए। लेकिन अपने यहां जन-सामान्य में कोविड-19 को लेकर उल्टा ही ट्रेंड दिख रहा है। बिना मास्क के घूमना, दो गज की दूरी का पालन न करना और इस बीमारी को हल्के में लेना इसके संक्रमण के ग्राफ को प्रतिदिन नई ऊंचाइयां दे रहा है। सरकार ने विगत तीन महीने में जागरूकता पैदा कर दी है, लेकिन कुछ लोग अपनी ही धुन में हैं। वे अपनी और अपने परिवार के लोगों के लिए तो संकट बुला ही रहे हैं, समाज और देश का भी अहित कर रहे हैं।
मनोज कुमार शर्मा, स्याना
ओपिनियन /शौर्यपथ / बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ, जब अमेरिका ने चीन की संचार कंपनी हुआवेई पर पाबंदी लगा दी थी। यहां तक कि अमेरिकी कंपनियों को भी उससे कोई संबंध रखने से रोक दिया गया। हुआवेई के स्मार्टफोन जो दुनिया भर में खासे लोकप्रिय हो रहे थे, उन पर अब गूगल प्ले स्टोर की सुविधा खत्म कर हो गई है। हुआवेई को सबसे ज्यादा झटका 5जी सेवा के मामले में लगा है। इसकी तकनीक विकसित करने के मामले में वह सबसे आगे है और अमेरिका को छोड़कर अभी तक जहां-जहां भी 5जी सेवा शुरू हुई है, ज्यादातर जगह हुआवेई की तकनीक ही इस्तेमाल हो रही है। अमेरिका का तर्क है कि हुआवेई चीन सरकार से नजदीकी रिश्ते रखने वाली कंपनी है, और वह चीन के लिए जासूसी का काम भी करती है। अमेरिका ने यही आरोप एक और चीनी कंपनी जेडटीई पर भी लगाए हैं और उस पर भी पाबंदी लग चुकी है। यह भी माना जाता है कि अमेरिका ने जो आरोप लगाए हैं, उसके पुख्ता सुबूत न होने के बावजूद इतने कड़े कदम उठाए गए हैं। ये कदम भी तब उठाए गए हैं, जब चीन और अमेरिका के बीच या तो व्यापारिक तनाव हैं या राजनयिक।
इसके मुकाबले अगर हम भारत द्वारा 59 चीनी मोबाइल एप पर पाबंदी को देखें, तो यह न तो उतना बड़ा कदम ही दिखता है और न ही उतना कड़ा। वह भी तब, जब चीन भारत से एक बहुत बड़े सामरिक तनाव में उलझा हुआ है। ऐसे मौकों पर इस तरह की पाबंदियां कोई नई बात नहीं हैं, इसलिए पूरी दुनिया ने भी इसे सहजता से ही लिया है। यूं भी इन दिनों अक्सर कहा जाता है कि पूरी दुनिया में युद्ध का सबसे बड़ा हथियार डाटा ही है, इसलिए भी ऐसे मौकों पर उन रास्तों को बंद करना जरूरी हो जाता है, जिनसे एक देश का डाटा दूसरे देश में पहुंच सकता है। फिर यह कदम भी उस चीन के खिलाफ उठाया गया है, जो इस तरह की पाबंदियों के मामले में सबसे आगे रहा है। वाट्सएप जैसे तमाम एप पर वहां पहले से ही पाबंदी है।
कई तरह से भारत का डाटा चीन के सर्वरों में पहुंच रहा है, यह कोई ऐसी जानकारी नहीं है, जिसकी भनक हाल-फिलहाल में ही लगी हो। इन्हीं 59 में से एक एप यूसी ब्राउजर पर तो कुछ समय पहले भी भारत में पाबंदी लगाई गई थी, लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया। तर्क तब भी डाटा का ही था। इसलिए डाटा के मामले में अभी जो चीन पर सर्जिकल स्ट्राइक की बात हो रही है, वह राजनयिक और कई भावनात्मक कारणों से जरूर महत्वपूर्ण हो सकती है, पर इससे आगे जाकर उससे कोई बड़ी उम्मीद फिलहाल नहीं बांधी जा सकती।
दुनिया के कारोबार में डाटा बड़ी टेढ़ी चीज है। किन्हीं एक-दो देशों के एप या सर्वरों पर पाबंदी लगाकर भी आप यह नहीं सोच सकते कि इससे डाटा का प्रवाह रुक जाएगा। डाटा का बाजार इस समय शायद दुनिया का सबसे जटिल बाजार है, जिसमें कौन-सा कहां पैदा हो रहा है, कहां जा रहा है, कहां जमा हो रहा है, कहां बिक रहा है और कहां उसका इस्तेमाल हो रहा है, उसके बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। मोबाइल एप, ईमेल सर्वर और वेबसाइट आपको जो मुफ्त सेवा देते हैं, उसके बदले वे आपकी जरूरत, पसंद-नापसंद, जान-पहचान, पूछताछ, खरीदारी, आदतों से जुड़े आंकड़े जमा करते हैं और इसके पहले कि आपका अगला दिन शुरू हो, उन्हें कई जगह बेचा जा चुका होता है। डाटा के इस बाजार में विक्रेता भी हैं, उनका भंडारण करने वाले, विश्लेषण करने वाले भी हैं, उनके दलाल भी हैं, उनके खरीदार भी हैं और चोर-उचक्के भी।
यह माना जाता है कि साइबर युग में डाटा का महत्व उतना ही है, जितना औद्योगिक क्रांति के बाद के युग में पेट्रोल का था। डाटा ही वह ईंधन है, जिससे इंटरनेट की दुनिया और इंटरनेट की कंपनियां चलती हैं। यह डाटा ही है, जिसके कारण गूगल दुनिया के बाजार में कोई भी सामान बेचे बगैर 66 अरब डॉलर के सालाना कारोबार वाली ऐसी कंपनी बन गई है, जिसकी कुल संपत्तियां 131 अरब डॉलर से भी ज्यादा हैं। डाटा से कमाई करने वाली कंपनियां आज जिस जगह पर पहुंच चुकी हैं, पेट्रोलियम का कारोबार करने वाली कोई भी कंपनी आज उसके आस-पास भी नहीं दिखती। और इस समय, जब पेट्रोलियम का बाजार लगातार उतार-चढ़ाव के झटकोंके बीच डोल रहा है, डाटा का कारोबार लगातार ऊपर की ओर जा रहा है।
ऐसे में, यह उम्मीद व्यर्थ है कि महज चंद पाबंदियों से डाटा का प्रवाह पूरी तरह रुक जाएगा, जिसने एक तरफ तो हार्डवेयर के जरिए हमारे बाजार के एक बड़े हिस्से पर कब्जा जमा रखा है, और दूसरी तरफ, वह डाटा कारोबार का बड़ा खिलाड़ी भी बन चुका है। और अगर हम भारत से चीन की ओर जाने वाले सभी तरह के डाटा पर जैसे-तैसे पूरी तरह पाबंदी लगा भी दें, तब भी इसे खुले बाजार से खरीदने का रास्ता उसके पास हमेशा रहेगा। पिछले कुछ समय में चीनी सर्वरों के जरिए जिस तरह से ऑस्ट्रेलिया में हैकिंग की लगातार कई कोशिशें हुई हैं, वह यह भी बताता है कि चीन ने साइबर डकैती की क्षमताएं भी हासिल कर ली हैं।
इस मामले में भी चीन से मुकाबले का रास्ता वही है, जो अन्य क्षेत्रों में है। चीन पर निर्भरता कम करने के लिए बडे़ पैमाने पर आधुनिक मैन्युफेक्चरिंग को भारत में स्थापित करने की बात की जाती रही है, यह बात अलग है कि यह काम कभी पूरे दिल से नहीं हुआ। इसी तरह, दवा उद्योग में कच्चे माल के लिए आधुनिक रसायन उद्योग में बड़ी कोशिशों की चर्चा पिछले कुछ समय में चलनी शुरू हुई है। यही काम हमें डाटा उद्योग में भी करना होगा। इस कारोबार का बड़ा खिलाड़ी बने बगैर हम साइबर अर्थव्यवस्था में पिछडे़ ही रहेंगे।
आत्म गौरव के क्षणों में अक्सर हम भारत को सॉफ्टवेयर उद्योग का सुपर पावर कह देते हैं, लेकिन सच यही है कि अच्छी कमाई के बावजूद हम इस क्षेत्र में अभी तक आउटसोर्सिंग हब बनने से बहुत आगे नहीं बढ़ सके हैं। मामला सिर्फ चीन का विकल्प बनने का नहीं है, कारोबार की उस मंजिल को पकड़ने का है, जिसकी ओर दुनिया बढ़ रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार
होनी चाहिए निष्पक्ष जाँच ...
मामले पर जिस तरह परिवार के सदस्य एक दुसरे पर आरोप लगा रहे है और यहाँ तक कि पीडित भरत गौर को पूर्ण स्वस्थ बता रहे है . मामले में आखिर भरत गौर को क्यों बिमारी का सहारा लेकर इस तरह जिला पुलिस अधीक्षक के कार्यालय पहुंचना पडा और आखिर मामले में कौन प्रताडि़त है , कौन वो शख्स है जिसे कांग्रेस नेता बता रही है पूजा कौर जो सत्ता की ताकत दिखा रहा है मामले की सच्चाई का सबके सामने आने से ही असलियत पता चलेगी कि पूजा गौर सही कह रही है या भरत गौर ...
दुर्ग / शौर्यपथ / पीडि़त कितना असहाय है ये दिखाने के लिए कई बार पीडि़त अपने आपको लाचार और बेसहारा बताने कई तरह के उपाय करते है और प्रशासन की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करने का असफल प्रयास भी करते है किन्तु सच्चाई आज नहीं तो कल खुल ही जाती है . कुछ ऐसा ही मामला उजागर हुआ जिसमे खाट में पुलिस अधीक्षक कार्यालय आने वाला शख्स कब्ज़े की जमीन के हक के लिए पुलिस प्रशासन की ओर अपना ध्यान खींचने में सफल भी हो गया .
बता दे कि शनिवार के दिन छावनी से एक शख्स भरत गौर जिला पुलिस अधीक्षक के कार्यालय पहुंचा . आम स्थिति में पहुँचता तो अलग बात थी किन्तु भरत गौर खाट में पुलिस अधीक्षक के कार्यालय पहुंचा जिसके कारण पुलिस प्रशासन हतप्रत हो गया और तुरंत सिटी एसपी विवेक शुक्ला द्वारा मामले को संज्ञान में लेकर पीडि़त भरत गौर को जिला चिकित्सालय दुर्ग पहुँचाया गया . खबर शहर में आग की तरह फ़ैल गयी .
पीडि़त भरत गौर का आरोप है कि उसके बड़े भाई के परिवार ने किसी जमीन पर कब्ज़ा किया हुआ है और भरत गौर लगातार 3 साल से मामले के विवाद के कारण प्रताडि़त हो रहा है .
मामले की खबर लगते ही शौर्यपथ टीम ने पीडि़त को परेशान करने वाले परिवार जो पीडि़त भरत गौर के बड़े भाई है उनसे संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया . इस प्रयास के तहत चौकाने वाले मामले का खुलासा हुआ . पीडि़त भरत गौर की भतीजी पूजा से जब मामले की जानकारी ली गयी तो ज्ञात हुआ भरत गौर पूर्ण स्वस्थ है और जिस जमीन के विवाद की बात कह रहा है वो जमीन वर्तमान में कमला गौर जो भरत की भाभी के नाम पर है जिसमे भरत गौर का कोई हक नहीं है साथ ही इस मामले पर कुछ दिनों पहले ही छावनी एसडीएम ने फैसला कमला गौर के पक्ष में दिया था . जिसके कारण भरत गौर मामले को टूल देने खाट पर पुलिस अधीक्षक के कार्यालय पहुँच गया . जबकि सीसी टीवी सहित ऐसे कई प्रमाण है जिससे ये साबित किया जा सकता है कि शनिवार की सुबह भरत गौर पूर्ण स्वस्थ था और अपने घर के कार्य में लगा हुआ था साथ ही पूजा गौर ने एक विडिओ भी भेजा जिसमे भरत गौर पानी भरते हुए एवं कुत्ता घुमाते हुए नजर आ रहा है . भरत गौर सब्जी बजने का कार्य करता है और दोनों भाइयो में ( भरत गौर व उसके बड़े भाई ) में किसी भी पैत्रिक संपत्ति का कोई विवाद नहीं है .
पूर्व में भी की फर्जी शिकायत ..
पूजा गौर का कहना है कि पूर्व में भी भरत गौर द्वारा फर्जी तरीके से झूठी शिकायत की गयी जिसके कारण समाज में बहुत बदनामी भी हुई किन्तु पुलिस जाँच में शिकायत फर्जी पाना साबित हुआ . भरत गौर द्वारा लगातार भिन्न भिन्न तरीको से परेशां किया जा रहा है कहते हुए पूजा गौर ने कहा कि भरत गौर के सेल द्वारा जो कांग्रेस का नेता है के द्वारा भी परेशां किया जाता रहा है .
राजनांदगांव / शौर्यपथ / जिले के खैरागढ़ इलाके में दर्जनों ग्रामीणों से रकम दोगुनी करने का झांसा देकर लाखों रुपए की ठगी करने के मामले में पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए खैरागढ़ भाजपा मंडल अध्यक्ष कमलेश कोठले समेत चार लोगों को हिरासत में लिया है। वहीं इस पूरे मामले का मास्टर माईंड तरूण साहू समेत तीन फरार हैं। खैरागढ़ के ग्रामीण इलाकों में करीब 10 साल के भीतर चिटफंड कंपनी के जरिए आरोपियों ने बड़ी रकम लोगों से ऐंठ ली है। रकम वापस करने की मियाद पूरी होने से पहले ही कंपनी ने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया। लाखों रुपए का चपत लगने के बाद लोगों ने पुलिस में मामले की शिकायत की।
मिली जानकारी के मुताबिक खैरागढ़ भाजपा मंडल अध्यक्ष कमलेश कोठले और उसके साथी तरूण साहू (अर्जुंदा-बालोद), राजकुमार साहू (खैरागढ़), चम्मनदास साहू (अर्जुन्दा बालोद), सत्यपाल वर्मा (चीचा दुर्ग), रंजीत सोनकर (बालाघाट), राजेन्द्र स्वान्सी (रांची) ने सर्वोदय मल्टीट्रेड लिमिटेड कंपनी के अधीन माईक्रो इन्वेसमेंट का डायरेक्टर बनकर खैरागढ़ क्षेत्र में लोगों से मासिक, छैमासी, सालाना, पांच वर्ष तथा 15 वर्ष के लिए अलग-अलग ब्याज दरों पर रकम जमा कराया।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
