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शौर्यपथ लेख /
डिजिटल मीडिया के दौर में पॉडकास्ट संवाद का एक सशक्त मंच बन चुके हैं, जहां जटिल सामाजिक विषयों पर खुलकर चर्चा होती है। लेकिन हाल ही में शुभांकर मिश्रा के पॉडकास्ट में शामिल हुईं लेखिका और मिथकशास्त्री सीमा आनंद के कुछ बयानों ने एक तीखा विवाद खड़ा कर दिया है। यह विवाद केवल किसी एक वक्तव्य तक सीमित नहीं, बल्कि सहमति, नैतिकता, नाबालिगों की सुरक्षा और यौन शिक्षा की जिम्मेदारी जैसे गहरे सवालों को सामने लाता है।
पॉडकास्ट के दौरान सीमा आनंद ने एक घटना साझा की, जिसमें उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष एक 15 वर्षीय लड़के ने उन्हें “अप्रोच” किया था। उन्होंने इस प्रसंग को सामान्य अनुभव के तौर पर रखा, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। कई लोगों ने इस बयान को ग्रूमिंग और नाबालिगों के प्रति असंवेदनशीलता से जोड़ते हुए सवाल उठाए कि क्या इस तरह की बातों को सार्वजनिक मंच पर कहना उचित है।
इसी बातचीत में सीमा आनंद ने “ग्रुप सेक्स” जैसे विषयों पर भी अपनी राय रखी और कहा कि किसी भी क्रिया को तब तक “अच्छा” या “बुरा” नहीं कहा जाना चाहिए, जब तक वह आपसी सहमति (Mutual Consent) से हो रही हो। यहीं से विवाद ने कानूनी और नैतिक मोड़ ले लिया। आलोचकों का कहना है कि 15 वर्ष का नाबालिग कानूनन सहमति देने में सक्षम नहीं होता, ऐसे में सहमति का तर्क इस संदर्भ में न केवल अवैध है, बल्कि सामाजिक रूप से भी अस्वीकार्य है। इस बहस ने यह स्पष्ट कर दिया कि सहमति की अवधारणा उम्र, संदर्भ और शक्ति-संतुलन से अलग नहीं की जा सकती।
सीमा आनंद लंदन स्थित एक जानी-मानी मिथकशास्त्री और कथावाचक हैं। वे स्वयं को “आनंद की संरक्षक” (Patron Saint of Pleasure) कहती हैं। उनकी चर्चित पुस्तकों में The Arts of Seduction और हालिया रिलीज Speak Easy: A Field Guide to Love, Longing and Intimacy शामिल हैं। वे अपने लेखन और वक्तव्यों में प्राचीन भारतीय ग्रंथों—विशेषकर कामसूत्र और अन्य कामुक साहित्य (Erotology)—का संदर्भ देती रही हैं।
सीमा आनंद का तर्क है कि प्राचीन भारत में यौन शिक्षा और आनंद को जीवन का स्वाभाविक और महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था, जिसे आधुनिक समाज ने नैतिकता के नाम पर कलंक बना दिया है। उनके अनुसार, खुली बातचीत और शिक्षा से ही स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि ऐतिहासिक संदर्भों की व्याख्या करते समय आधुनिक कानून और सामाजिक जिम्मेदारियों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
सीमा आनंद पहले भी यह बता चुकी हैं कि उन्हें अपने काम के कारण सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है, यहां तक कि उनके पति को लेकर भी टिप्पणियां की जाती हैं। लेकिन इस बार का विवाद अलग है। इसने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यौन शिक्षा पर बातचीत की सीमाएं क्या हों, और सार्वजनिक मंचों पर बोलते समय वक्ताओं की जिम्मेदारी कितनी होनी चाहिए।
यह विवाद किसी एक व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने से अधिक, एक व्यापक चेतावनी है। यह याद दिलाता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और कानूनी जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है—खासतौर पर तब, जब बात नाबालिगों, सहमति और संवेदनशील विषयों की हो।
डिजिटल युग में संवाद आवश्यक है, लेकिन उतना ही आवश्यक है संदर्भ, संवेदनशीलता और कानून की समझ। सीमा आनंद के बयानों ने भले ही तीखी बहस छेड़ दी हो, पर इस बहस का सबसे अहम परिणाम यही है कि समाज को अब यह तय करना होगा कि खुली चर्चा और जिम्मेदार अभिव्यक्ति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
शौर्यपथ लेख।
प्यार को अक्सर उम्र के तराजू पर तौला जाता है—जैसे भावनाएँ केवल जवानी की जागीर हों। लेकिन सच इससे कहीं ज़्यादा गहरा है। बड़ी उम्र की औरत का प्यार कोई क्षणिक आकर्षण नहीं, बल्कि अनुभव, समझ और आत्मिक स्थिरता से उपजा हुआ भाव होता है। यह प्यार दिखावे से दूर, भीतर तक उतरने वाला होता है—जो न सिर्फ़ रिश्ते को, बल्कि इंसान को भी संवार देता है।
अनुभव से उपजा भरोसा
ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव देख चुकी औरत जानती है कि रिश्ते शब्दों से नहीं, व्यवहार से टिकते हैं। वह जल्दबाज़ी नहीं करती, न ही हर बात पर शक का बोझ डालती है। उसका भरोसा आँख मूँदकर नहीं, बल्कि समझदारी से दिया गया होता है—और इसी वजह से वह भरोसा मज़बूत भी होता है।
देखभाल जो दिखती नहीं, महसूस होती है
उसका प्यार बड़े-बड़े वादों में नहीं, रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में दिखता है—समय पर पूछा गया हाल, थकान में दिया गया सुकून, और मुश्किल वक्त में बिना शोर किए खड़ा रहना। वह जानती है कि साथ निभाना क्या होता है, इसलिए उसका सहारा दिखावे का नहीं, स्थायी होता है।
भावनात्मक समझ की गहराई
बड़ी उम्र की औरत को हर बात कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वह आँखों की भाषा, खामोशी की आवाज़ और व्यवहार के उतार-चढ़ाव को पढ़ लेती है। बिना टोके, बिना जज किए—सिर्फ़ समझना और साथ देना—यही उसकी सबसे बड़ी खूबी है।
सम्मान और स्वीकृति
वह सामने वाले को बदलने की कोशिश नहीं करती। न उसे अपने साँचे में ढालना चाहती है, न ही तुलना के बोझ तले दबाती है। जैसा है, वैसा स्वीकार करना—यह उसकी परिपक्वता का सबसे सुंदर रूप है। ऐसे रिश्ते में इंसान को खुद होने की आज़ादी मिलती है।
स्थिरता जो समय के साथ बढ़ती है
उसका प्यार तेज़ हवा का झोंका नहीं, बल्कि धीमी बहती नदी की तरह होता है—जो समय के साथ और गहरी, और शांत होती जाती है। उसमें ड्रामा नहीं, भरोसा होता है; दिखावा नहीं, अपनापन होता है; और डर नहीं, सुरक्षा होती है।
कुल मिलाकर, बड़ी उम्र की औरत का प्यार शोरगुल वाला नहीं होता—वह सुकून देता है। यह ऐसा प्यार है जो रिश्ते को नहीं, इंसान को मज़बूत बनाता है। जो समय के साथ कम नहीं, बल्कि और निखरता जाता है।
ऐसा प्यार मिल जाए, तो उम्र मायने नहीं रखती—क्योंकि वहाँ दिल पूरी ईमानदारी से जुड़ता है।
श्री शैलेश कुमार सिंह
(लेखक भारत सरकार के ग्रामीण विकास विभाग में सचिव हैं)
शौर्यपथ लेख / लोकतंत्र में लोकनीति पर सार्वजनिक बहस स्वाभाविक ही नहीं, बल्कि जरूरी भी है। आजीविकाओं (खास तौर से ग्रामीण परिवारों के लिए) को आकार देने वाले कानूनों की कड़ाई से समीक्षा की ही जानी चाहिए। लेकिन इस तरह की समीक्षा नए कानून के प्रावधानों के सावधानी पूर्वक अध्ययन पर आधारित होनी चाहिए। यह पिछले फ्रेमवर्क से निकाले गए अनुमानों या नुकसान के भय पर आधारित नहीं होनी चाहिए। मगर विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून 2025 की ज्यादातर आलोचनाएं इस जाल में फंस जाती हैं। इनमें जल्दबाजी में पिछली नाकामियों का विश्लेषण कर उनका ठीकरा सुधार पर ही फोड़ दिया जाता है।
दो दशक पहले बनाए गए रोजगार गारंटी कानून ने ग्रामीण आय को स्थिर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और संकट के वक्त सुरक्षा प्रदान की। कोविड की वैश्विक महामारी जैसे संकट के समय में इसके योगदान को स्वीकार किया गया है। लेकिन समय के साथ अनुभव से इसकी दीर्घकालिक ढांचागत कमियां भी उजागर हुई हैं। मजदूरी के भुगतान में बार-बार देरी हो रही थी। प्रक्रियात्मक अवरोधों ने बेरोजगारी भत्ते को अप्रभावी बना दिया था। विभिन्न राज्यों में इस योजना तक पहुंच में काफी अंतर था। प्रशासनिक क्षमता असमान थी तथा फर्जी जॉब कार्ड, उपस्थिति के रजिस्टर में हेरफेर और खराब गुणवत्ता वाली संपदाओं के सृजन से बड़े पैमाने पर धन की बर्बादी हुई। ये छोटी नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक खामियां थीं। इसलिए मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि क्या सुधार की जरूरत थी। मुद्दा यह है कि क्या नए फ्रेमवर्क में इन खामियों को सार्थक ढंग से दूर किया गया है।
आम दावा है कि नए कानून में बुनियादी कमियां तो बनीं रहीं और समूची बहस को संक्षिप्ताक्षरों की होड़ में समेट दिया गया। लेकिन हकीकत में इसका उलट ही सच के ज्यादा करीब है। नया कानून डिलीवरी की उन कमियों को दूर करने पर केंद्रित है जिनकी वजह से पिछले फ्रेमवर्क की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा था। कमजोर परंपरागत प्रणालियों की जगह सत्यापित कामगार पंजीकरण ने ले ली है। देरी के लिए स्वतः मुआवजे के प्रावधान के साथ मजदूरी भुगतान की वैधानिक समय सीमाएं तय की गई हैं। अयोग्यता के उन प्रक्रियात्मक प्रावधानों को खत्म कर दिया गया है जिनकी वजह से बेरोजगारी भत्ता अप्रभावी बन गया था। स्पष्ट समयसीमा और जवाबदेही के साथ शिकायत निवारण को मजबूत किया गया है। ये दिखावटी बदलाव नहीं हैं। ये उन खामियों को दूर करते हैं जिनसे कामगारों का विश्वास टूटता था।
एक अन्य आलोचना यह है कि रोजगार गारंटी को खत्म कर दिया गया है। इनके अनुसार नई योजना में पुरानी कमजोरियां बनी हुई हैं। इस तरह की आलोचना सही नहीं है। वेतन रोजगार के कानूनी अधिकार को बरकरार और न्यायसंगत रखा गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि रोजगार की वैधानिक पात्रता को 100 दिनों से बढ़ाते हुए 125 दिन कर दिया गया है। बदलाव क्रियान्वयन की संरचना में किया गया है। पुराने कानून का मॉडल टुकड़ों में बंटा हुआ और प्रतिक्रियात्मक था। यह अक्सर संकट शुरू हो जाने के बाद ही हरकत में आता था। नए कानून का फ्रेमवर्क योजनाबद्ध और लागू करने योग्य है। इसे पूर्वानुमान के आधार पर कार्य सौंपे जाने के लिए डिजाइन किया गया है। वैधानिक सुधार के जरिए क्रियान्वयन की नाकामियों को दूर किए जाने को दोहराव नहीं, बल्कि संशोधन माना जाना चाहिए।
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे अधिक गरीब आबादी वाले राज्यों को पहले के फ्रेमवर्क के तहत सबसे कम लाभ मिलने के सम्बन्ध में जो चिंताएं जताई गईं हैं, वे सही हैं लेकिन यह बात सुधार की जरूरत को और मजबूत करती है, न कि उसे कमजोर करती है। इन राज्यों में मनरेगा का लाभ कम पहुंचा यह योजना की एक बड़ी विफलता थी। बिना किसी ठोस योजना के सिर्फ मांग के आधार पर चलने वाला मॉडल उन राज्यों के पक्ष में रहा जिनकी प्रशासनिक क्षमता बेहतर थी, जबकि अधिक जरूरत और पलायन वाले राज्य पिछड़ गए। नया फ्रेमवर्क सीधे तौर पर इस असंतुलन को दूर करता है, यह रोजगार पैदा करने के काम को 'विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं' से जोड़ता है, जहाँ स्थानीय मांग और कामों की पहले से मंजूरी को सुनिश्चित फंडिंग के साथ मिलाया जाता है। असमान वितरण ही सुधार की ज़रूरत की असली वजह थी; पुरानी व्यवस्था को बनाए रखने का मतलब केवल मौजूदा असमानताओं को और बढ़ाना होता। इसके अलावा, निष्पक्ष मानकों पर आधारित आवंटन से राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे में अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता आएगी।
आलोचना का एक पक्ष यह भी है कि 125 दिनों का रोजगार देने का विस्तार केवल दिखावा है, क्योंकि अब राज्यों को भी खर्च का एक हिस्सा उठाना होगा। यह तर्क पहले के उदाहरणों और सुरक्षा उपायों दोनों को नज़रअंदाज़ करता है। केंद्र और राज्यों के बीच खर्च बांटने का यह तरीका केंद्र-प्रायोजित योजनाओं के पुराने नियमों के अनुसार ही रखा गया है। वहीं, उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों तथा जम्मू-कश्मीर के लिए 90:10 के अनुपात (जहाँ केंद्र 90 और राज्य 10 प्रतिशत खर्च उठाते हैं) को जारी रखा गया है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि योजना बनाकर काम करने से पैसों का बेहतर इस्तेमाल होता है, जिससे अनिश्चितता खत्म होती है और योजना को लागू करने में कम रुकावटें आती हैं। अधिकारों का दायरा बढ़ाना और साझा जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल को दर्शाता है, न कि कमज़ोरी को। ग्रामीण सड़कों से लेकर, आवास और पीने के पानी जैसे कई सफल राष्ट्रीय कार्यक्रम भी इसी तरह की व्यवस्था के तहत काम करते हैं।
आर्थिक रूप से कमज़ोर राज्यों को अक्सर नए फ्रेमवर्क का संभावित शिकार बताया जाता है। लेकिन सिर्फ़ आर्थिक कमज़ोरी ही राज्यों के बाहर होने का कारण नहीं है। पिछली व्यवस्था के तहत, राज्यों का इस योजना से बाहर होना अक्सर खराब प्लानिंग, सरकारी मशीनरी की कम क्षमता और काम करने के तरीके में आने वाली रुकावटों की वजह से था। नया कानून पहले से की गई तैयारी, जनता की भागीदारी और प्रौद्योगिकी के जरिये जोखिमों को कम करने की कोशिश करता है। नयी व्यवस्था में एक बार योजना मंजूर होने के बाद, काम देने से मना करने की अधिकारियों की शक्ति को कम किया गया है और पारदर्शिता तथा जवाबदेही को मजबूत किया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासनिक खर्च को 6% से बढ़ाकर 9% कर दिया गया है जिससे राज्य अपनी जमीनी क्षमता को कार्यक्रम की विशालता के अनुरूप मजबूत बना सकें। किसी राज्य विशेष की अपनी चुनौतियाँ उस राष्ट्रीय सुधार को गलत साबित नहीं करतीं, इसका उद्देश्य पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को ठीक करना है।
आलोचक यह भी कहते हैं कि पहले के फ्रेमवर्क के तहत कई ज़रूरतमंद राज्यों में रोज़गार के सबसे कम दिन मिले, और बहुत कम परिवार ही कानूनी सीमा तक पहुँच पाए। यह बात सुधार के तर्क को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे और भी मजबूत बनाती है। नया फ्रेमवर्क, दर्ज की गई मांग को मंजूर किए गए कामों, तय समय सीमा में पूरा करने और बेरोजगारी भत्ते को सुनिश्चित करेगा। इसका मकसद सीधा है: कानूनी हक को असल और भरोसेमंद रोज़गार के दिनों में बदलना, खासकर उन इलाकों में जहाँ पहले सुविधाओं की कमी थी।
पुरानी 'मांग-आधारित' योजना और नई 'आपूर्ति-आधारित' योजना के बीच के अंतर को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। व्यवहार में, यह अंतर इतना बड़ा नहीं है। नया फ्रेमवर्क डिमांड को कम नहीं करता; बल्कि यह योजना के माध्यम से इसे एक संस्थागत रूप देता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मांगी गई मांग को पूरा भी किया जा सके। संसाधनों के भरोसे के साथ की गई एक नियोजित मांग, उस सैद्धांतिक अधिकार से कहीं ज्यादा सशक्त है जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता।
रोजगार गारंटी का अधिकार-आधारित स्वरूप, कमजोर होने के बजाय और मजबूत हुआ है। काम के दिनों को बढ़ाकर 125 दिन करना, मजदूरी भुगतान के लिए कानूनी रूप से लागू समय-सीमा, देरी होने पर अपने-आप मिलने वाला मुआवजा, हक छीनने वाली शर्तों को हटाना, और शिकायत निवारण के लिए अपील की सुविधा—ये सब मिलकर 'काम के अधिकार' की व्यावहारिक उपयोगिता को बढ़ाते हैं। अधिकार सबसे ज़्यादा तब मायने रखते हैं जब उनका प्रशासनिक बाधाओं के बिना इस्तेमाल किया जा सके।
यहां तक कि आलोचक भी मानते हैं कि योजना को लागू करने की विफलताएं—जैसे भ्रष्टाचार, फर्जी जॉब कार्ड, उपस्थिति रजिस्टर में हेरफेर और खराब गुणवत्ता वाली संपदाओं का निर्माण, पुराने फ्रेमवर्क की सबसे बड़ी कमजोरियां थीं। यह सुधार इन्हीं विफलताओं को दूर करने की कोशिश करता है, जिसके लिए सत्यापित लाभार्थी प्रणाली, मजबूत ऑडिट और अन्य योजनाओं के साथ मिलकर संपदा निर्माण का सहारा लिया गया है। पिछली विफलताओं को स्वीकार करना ही इस सुधार का ठोस आधार है, न कि इसके खिलाफ कोई तर्क।
योजना को कुछ समय के लिए रोकने को लेकर जो चिंताएं हैं, उन्हें सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह श्रम-बाजार के लिए एक सुरक्षा कवच है जिसे इसलिए बनाया गया है ताकि खेती के सबसे व्यस्त सीजन के दौरान श्रमिकों की कमी न हो और बाजार का संतुलन न बिगड़े। यह प्रावधान 125 दिनों के कानूनी अधिकार को कम नहीं करता है। यह प्रावधान सोची-समझी आर्थिक समझदारी को दिखाता है और उत्पादक कृषि रोज़गार को कमज़ोर किए बिना मजदूरों की आय की रक्षा करता है।
कुल मिलाकर, ज़्यादातर की जा रही आलोचनाएं पुराने फ्रेमवर्क की कमियों को बताती हैं और फिर उन कमियों का कारण खुद सुधारों को बताती हैं। विकसित भारत–रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम रोज़गार गारंटी को खत्म नहीं करता है बल्कि यह इसे और मजबूत और व्यापक बनाता है। खासकर उन कमज़ोरियों पर ध्यान देता है जहाँ ज़्यादा ज़रूरत वाले इलाकों और कमज़ोर मज़दूरों के बीच योजना के प्रभाव को सीमित कर दिया था। यहाँ सुधार का अर्थ सामाजिक सुरक्षा से पीछे हटना नहीं है; बल्कि यह काम के वादे को वास्तविक, भरोसेमंद और गरिमापूर्ण बनाने का एक प्रयास है।
भिलाई। शौर्यपथ विशेष
भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुश्री सरोज पाण्डेय और उनके भाई, छत्तीसगढ़ शासन में दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री राकेश पाण्डेय , प्रदेश की राजनीति में अलग-अलग मोर्चों पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। जहां सरोज पाण्डेय केंद्रीय राजनीति में एक मुखर, प्रभावशाली और अनुभवी नेता के रूप में पहचान बना चुकी हैं, वहीं राकेश पाण्डेय संगठन से निकलकर भिलाई में जमीनी राजनीति के मैदान में सक्रिय दिखाई दे रहे हैं।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में भिलाई में पहली बार पंडित धीरेंद्र शास्त्री महाराज की श्री हनुमंत कथा का आयोजन हुआ। आयोजनकर्ता के रूप में राकेश पाण्डेय का यह प्रयास संगठनात्मक और व्यवस्थागत दृष्टि से सफल माना जा सकता है। पांच दिनों तक चली कथा गरिमामय वातावरण में संपन्न हुई, श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या ने सहभागिता की और स्वयं आयोजक राकेश पाण्डेय ने पूरे आयोजन के दौरान किसी भी विवादित बयान या आक्रामक राजनीतिक संकेत से दूरी बनाए रखी। उन्होंने इस आयोजन को लगातार "शुद्ध धार्मिक कार्यक्रम" के रूप में प्रस्तुत किया।
इसी तरह, भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होने के बावजूद सुश्री सरोज पाण्डेय ने भी इस आयोजन के दौरान एक संयमित और संतुलित भूमिका निभाई । मंचीय उपस्थिति और सार्वजनिक वक्तव्यों में विवाद से बचने का प्रयास साफ दिखाई दिया। कुल मिलाकर, नेतृत्व के स्तर पर यह आयोजन राजनीतिक शालीनता और परिपक्वता का उदाहरण बन सकता था।
लेकिन यहीं से कहानी का दूसरा, और शायद ज्यादा महत्वपूर्ण, पहलू सामने आता है।
जहां नेता सौम्य, वहां समर्थक आक्रामक
इस पूरे आयोजन में एक बात जिसने सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी, वह थी कट्टर समर्थकों का व्यवहार। एक ओर राकेश पाण्डेय का सौम्य आचरण, संवादशीलता और संयम दिखा, वहीं दूसरी ओर उनके और सुश्री सरोज पाण्डेय के कुछ समर्थकों का दमदारी, घमंड और अहंकार से भरा रवैया न सिर्फ आम जनता, बल्कि स्वयं भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच भी चर्चा का विषय बन गया।
कई लोग जिन्होंने इस आयोजन को नजदीक से देखा, उनका कहना है कि नेताओं और आम श्रद्धालुओं के बीच एक अदृश्य लेकिन कठोर दीवार खड़ी नजर आई—और यह दीवार नेताओं ने नहीं, बल्कि उनके कट्टर समर्थकों ने बनाई। प्रवेश, संवाद, व्यवस्था और व्यवहार—हर स्तर पर यह अहसास हुआ कि नेता तक पहुंच आसान नहीं, क्योंकि बीच में समर्थकों की "फौज" खड़ी है।
दुर्ग की राजनीति और पुराना अनुभव
दुर्ग-भिलाई की राजनीति में यह कोई नई स्थिति नहीं है। यहां पहले भी देखा गया है कि चुनावी मौसम या सामान्य परिस्थिति में जब आम जनता नेता से सीधे संवाद करना चाहती है, तब अति-उत्साही और कट्टर समर्थक उस संवाद को बाधित कर देते हैं। परिणाम यह होता है कि जनता का असंतोष सीधे नेता तक पहुंचने से पहले ही रास्ते में दम तोड़ देता है—और वही असंतोष चुनाव के दिन चुपचाप अपना असर दिखाता है।
इसी संदर्भ में एक पुरानी कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है—
"नेता को सबसे बड़ा नुकसान विरोधी नहीं, उसके कट्टर समर्थक पहुंचाते हैं।"
राजनीतिक भविष्य की राह में चेतावनी
इसमें कोई संदेह नहीं कि सुश्री सरोज पाण्डेय एक परिपक्व, अनुभवी और राष्ट्रीय स्तर की नेता हैं, और राकेश पाण्डेय संगठन से निकलकर जमीनी राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन श्री हनुमंत कथा का यह आयोजन एक संकेत भी दे गया—कि यदि समर्थकों का अहंकार नियंत्रित नहीं हुआ, तो यही लोग आने वाले समय में नेताओं और आम जनता के बीच न टूटने वाली दीवार बन सकते हैं।
राजनीति में जीत का रास्ता मंच, आयोजन या शक्ति-प्रदर्शन से नहीं, बल्कि जनसंपर्क, विनम्रता और संवाद से बनता है। अगर नेता जमीन पर खड़े रहकर जनता की बात सुनना चाहते हैं, तो उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनके आसपास खड़े लोग जनता को दूर न भगाएं।
भिलाई की श्री हनुमंत कथा धार्मिक आयोजन के रूप में सफल रही, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इसने एक अहम सवाल छोड़ दिया—
क्या कट्टर समर्थकों का घेरा, नेताओं के बड़े राजनीतिक भविष्य के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन रहा है?
यदि समय रहते इस पर आत्ममंथन नहीं हुआ, तो आने वाले चुनावी मौसम में यह "समर्थन" ही सबसे भारी बोझ साबित हो सकता है।
दुर्ग । शौर्यपथ । न्यायपालिका की भाषा में प्रयुक्त प्रत्येक शब्द का अपना संवैधानिक और कानूनी महत्व होता है। इनमें से दो शब्द—“आरोपी” और “दोषी”—ऐसे हैं, जो किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा, कानूनी स्थिति और पूरे जीवन की दिशा बदल सकते हैं। अक्सर सार्वजनिक विमर्श, मीडिया रिपोर्टिंग और राजनीतिक बयानबाज़ी में इन शब्दों का गलत या लापरवाह प्रयोग देखा जाता है, जो न केवल व्यक्ति के अधिकारों का हनन करता है, बल्कि संविधान की मूल भावना के भी विरुद्ध जाता है।
आरोपी कौन होता है?
किसी व्यक्ति के विरुद्ध जब पुलिस या जांच एजेंसी किसी मामले में उसका नाम दर्ज करती है, तब वह व्यक्ति आरोपी कहलाता है। इसका सीधा और स्पष्ट अर्थ है कि वह व्यक्ति जांच की प्रक्रिया में है। आरोपी होने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि उसने अपराध किया ही है।
संविधान और कानून की दृष्टि में आरोपी के संबंध में यह मान्यता सर्वोपरि है कि—जब तक माननीय न्यायालय द्वारा सभी तथ्यों, साक्ष्यों और दलीलों की जांच के बाद कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया जाता, तब तक उस व्यक्ति को दोषी नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि संविधान की भाषा में उसे केवल और केवल आरोपी कहा जाता है।
दोषी कब कहलाता है व्यक्ति?
दोषी शब्द का प्रयोग तब होता है, जब न्यायपालिका यह तय कर देती है कि संबंधित व्यक्ति ने भारत के संविधान और कानून व्यवस्था की अवहेलना की है और वह कानून के विरुद्ध अपराध का दोषी पाया गया है।
दोषी करार दिए जाने से पहले न्यायालय:
उपलब्ध सभी साक्ष्यों की गहन जांच करता है,अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुनता है,कानून की कसौटी पर तथ्यों को परखता है। इन सभी प्रक्रियाओं के पूर्ण होने के बाद यदि न्यायालय सजा देता है, तभी व्यक्ति दोषी कहलाता है। यदि सजा नहीं दी जाती, तो वही व्यक्ति निर्दोष माना जाता है।
निर्दोषता की संवैधानिक धारणा
भारतीय संविधान और न्यायिक प्रणाली का एक मूल सिद्धांत है—निर्दोषता की धारणा (Presumption of Innocence)। इसका अर्थ है कि जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए, तब तक प्रत्येक व्यक्ति निर्दोष माना जाता है। यह सिद्धांत नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है और किसी भी व्यक्ति को जल्दबाज़ी में अपराधी ठहराए जाने से रोकता है।
शब्दों की लापरवाही और उसके दुष्परिणाम
आरोपी को दोषी कह देना केवल शब्दों की गलती नहीं, बल्कि यह व्यक्ति की सामाजिक छवि को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकता है,निष्पक्ष जांच को प्रभावित कर सकता है,न्यायालयीन प्रक्रिया पर दबाव बना सकता है और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है।
इसीलिए मीडिया, राजनेताओं और सार्वजनिक मंचों पर बोलने वालों से अपेक्षा की जाती है कि वे न्यायपालिका की भाषा का सम्मान करें और निर्णय आने से पहले किसी को दोषी घोषित न करें।
हाल ही देखा गया है कि बलोदा बाजार आगजनी की घटना जो अभी माननीय न्यायालय में विचाराधीन है इस पर माननीय न्यायालय का कोई फैसला नहीं आया है ऐसे में मिडिया संस्था/ संस्थाओ द्वारा विधायक देवेन्द्र यादव को दोषी करार देना कही ना कही संविधान से प्राप्त अधिकारों का हनन माना जा सकता है
न्याय, भाषा और जिम्मेदारी
आरोपी और दोषी के बीच का अंतर केवल कानूनी नहीं, बल्कि संवैधानिक, नैतिक और मानवीय भी है। आरोपी वह है, जिस पर अभी निर्णय आना बाकी है; दोषी वह है, जिसे न्यायपालिका ने अपराध सिद्ध होने के बाद सजा दी है। एक जिम्मेदार समाज वही होता है, जो न्यायालय के फैसले का इंतजार करता है, कानून की प्रक्रिया में विश्वास रखता है और शब्दों के प्रयोग में संयम बरतता है। यही लोकतंत्र की मजबूती और संविधान के सम्मान की सच्ची पहचान है।
मतदान का प्रतिफल या मौन की सजा?
दुर्ग विधानसभा और सांसद विजय बघेल की राजनीतिक जिम्मेदारी पर बड़ा सवाल
शौर्यपथ राजनैतिक / लोकतंत्र में मतदाता की सबसे बड़ी ताकत उसका मत होता है। यही मत किसी व्यक्ति को जनप्रतिनिधि बनाता है और वही मत उससे जवाबदेही की अपेक्षा भी करता है। किंतु जब यह मत विकास के बजाय उपेक्षा में बदल जाए, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। दुर्ग विधानसभा क्षेत्र के मतदाता आज ठीक ऐसे ही सवालों के बीच खड़े हैं।
दुर्ग विधानसभा की जनता ने लोकसभा चुनावों में सांसद के रूप में विजय बघेल को न सिर्फ एक बार, बल्कि दो बार अपना बहुमूल्य मत देकर संसद तक पहुंचाया। वर्ष 2019 में रिकॉर्ड मतों से जीत दिलाने में दुर्ग विधानसभा की भूमिका निर्णायक रही। तब यह उम्मीद जगी थी कि दुर्ग शहर और विधानसभा क्षेत्र को एक ऐसा सांसद मिलेगा, जो केंद्र में अपनी मजबूत उपस्थिति के माध्यम से क्षेत्र के विकास को नई दिशा देगा।
परंतु 2019 से 2024 तक के पूरे कार्यकाल में दुर्ग विधानसभा क्षेत्र में सांसद के रूप में विजय बघेल की कोई ठोस, दूरगामी या पहचान बनाने वाली पहल सामने नहीं आई। कुछ सीमित व्यक्तिगत या चुनिंदा लाभार्थियों तक सिमटे कार्यों को छोड़ दें, तो दुर्ग विधानसभा के लिए ऐसा कोई विकास कार्य नहीं दिखता जिसे सांसद की उपलब्धि के रूप में गिनाया जा सके।
इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में दुर्ग की जनता ने एक बार फिर विजय बघेल को मौका दिया। यह निर्णय सांसद के व्यक्तिगत कार्यों से अधिक केंद्र में नरेंद्र मोदी को पुनः प्रधानमंत्री बनाने की भावना से प्रेरित माना गया। छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों में से केवल दो—दुर्ग और राजनांदगांव—में ही पुराने सांसद दोबारा चुने गए। राजनांदगांव में सांसद संतोष पांडे के कार्यों की चर्चा होती है, लेकिन दुर्ग में विजय बघेल के दूसरे कार्यकाल के डेढ़ वर्ष बीत जाने के बाद भी दुर्ग विधानसभा की ओर कोई उल्लेखनीय विकास पहल दिखाई नहीं देती।
आज दुर्ग शहर में यह चर्चा आम हो चली है कि जनता ने सांसद को नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री के नाम पर वोट दिया। यह चर्चा केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत का प्रतिबिंब बनती जा रही है। यदि सांसद के छह-साढ़े छह वर्षों के कार्यकाल को देखा जाए, तो ऐसा कोई “मील का पत्थर” नजर नहीं आता जो दुर्ग शहर के विकास की दिशा और दशा बदलने वाला हो।
ऐसे में एक बड़ा और गंभीर प्रश्न खड़ा होता है—क्या आज सांसदों का अस्तित्व केवल प्रधानमंत्री के नाम तक सीमित रह गया है? क्या क्षेत्रीय विकास, स्थानीय समस्याएं और जनता की अपेक्षाएं केवल चुनावी घोषणाओं तक सिमट कर रह गई हैं?
दुर्ग विधानसभा की जनता अब यह महसूस करने लगी है कि उनका मत विकास का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता तक पहुंचने का साधन भर बन गया है। चुनाव के समय किए गए वादे, चुनाव परिणाम के बाद स्मृति से ओझल होते दिख रहे हैं। यही कारण है कि “मतदान की सजा” जैसी भावना आज दुर्ग विधानसभा के मतदाताओं के बीच जन्म ले रही है।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि का मूल्यांकन भावनाओं से नहीं, कार्यों से होता है। दुर्ग विधानसभा क्षेत्र आज सांसद विजय बघेल से सवाल पूछ रहा है—क्या दो बार दिया गया जनादेश केवल चुनाव जीतने के लिए था, या क्षेत्र के समग्र विकास के लिए भी?
यदि इन सवालों के उत्तर समय रहते नहीं मिले, तो यह असंतोष आने वाले समय में राजनीतिक विमर्श की दिशा ही नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही की परिभाषा भी तय करेगा। दुर्ग विधानसभा की जनता अब मौन नहीं, बल्कि उत्तर चाहती है।
लेकिन इस बार समीकरण बदले हैं।
चार दशक बाद पहली बार दुर्ग कांग्रेस संगठन ने बंगले की छाया से बाहर निकलकर स्वतंत्र पहचान की दिशा में ठोस कदम बढ़ाया है। यह बदलाव केवल एक कार्यालय परिवर्तन भर नहीं है, बल्कि पूरी संगठनात्मक संस्कृति में हो रहे परिवर्तन का संकेतक है।
दुर्ग ग्रामीण, भिलाई शहर और दुर्ग शहर—तीनों क्षेत्रों में नए अध्यक्षों की नियुक्ति ने कार्यकर्ताओं के मन में उत्साह का संचार किया। उम्मीदें तब और मजबूत हुईं जब तीनों अध्यक्षों ने कांग्रेस कार्यालय में भव्य समारोह के साथ पदभार ग्रहण किया और यहीं से अपना दैनिक कार्य प्रारंभ किया।
सालों बाद पहली बार यह कार्यालय वास्तव में ‘आबाद’ दिखाई दिया।
यह दृश्य कार्यकर्ताओं के लिए महज़ औपचारिकता नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि अब संगठन की पहचान किसी व्यक्तिगत निवास पर नहीं, बल्कि अपने आधिकारिक भवन की छत के नीचे बनेगी।
राजनीतिक विज्ञान में संगठनात्मक ढांचे की मजबूती को किसी भी पार्टी की रीढ़ माना गया है।
जहाँ छत सबको एक साथ जोड़ती है, वहीं उसका अभाव सभी को बिखेर भी सकता है।
दुर्ग में भी यही स्थिति थी—
कागज़ों में सैकड़ों पदाधिकारी, लेकिन जमीनी स्तर पर गिनती के सक्रिय कार्यकर्ता।
गुटबाजी का बोलबाला, किन्तु समाधान का कोई साझा मंच नहीं।
लेकिन अब जब संगठन एक स्वतंत्र छत के नीचे सक्रिय दिख रहा है, तो यह केवल स्थान परिवर्तन नहीं बल्कि सत्ता केंद्रण से सामूहिक निर्णयवाद की ओर बढ़ते कदमों का सूचक है। पर्दे के पीछे चल रही मनमानी और मतभेद अब खुले में विमर्श के माध्यम से सुलझाए जाएंगे। यह बदलाव केवल संरचनात्मक नहीं, बल्कि मानसिकता का परिवर्तन भी है।
वर्षों तक संगठन का दायरा इतना सीमित था कि आम जनता और कार्यकर्ताओं के लिए कांग्रेस मतलब बंगला हो गया था। यही राजनीतिक असंतुलन संगठन की जड़ें कमजोर कर रहा था।
आज जब कार्यकर्ता अपने कार्यालय में सक्रियता देख रहे हैं, तो उनमें अपनत्व की भावना जागृत हो रही है। संगठन और कार्यकर्ता के बीच की दूरी अब कम होती दिखाई दे रही है।
यह परिवर्तन कुछ लोगों को जरूर असहज कर रहा है—क्योंकि व्यक्तिगत सत्ता का परिदृश्य सिमट रहा है—लेकिन बहुसंख्य कार्यकर्ताओं के लिए यह लंबे समय से प्रतीक्षित सकारात्मक बदलाव है।
यह सही है कि केवल कांग्रेस ही नहीं, हर राजनीतिक दल में गुटबाजी का अस्तित्व रहता है।
परंतु महत्वपूर्ण यह है कि
संगठन वह मंच होता है जहाँ अलग-अलग विचारधाराएँ, अलग-अलग व्यक्तित्व और अलग-अलग मत एक ही छत के नीचे खड़े होकर पार्टी की दिशा तय करते हैं।
दुर्ग कांग्रेस में यह मंच वर्षों तक निष्क्रिय रहा।
अब जबकि कार्यालय केंद्रित संरचना विकसित हो रही है, उम्मीद की जा रही है कि नेतृत्व सामूहिक रणनीति, सामूहिक निर्णय और सामूहिक मेहनत की दिशा में कार्य करेगा।
तीनों अध्यक्षों पर अब एक बड़ी जिम्मेदारी है—
संगठन को बंगले की राजनीति से दूर रखते हुए, कार्यकर्ताओं में विश्वास, पारदर्शिता और समन्वय स्थापित करना।
यह बदलाव स्थायी बनेगा या फिर समय के साथ वापस पुराने ढर्रे पर लौटेगा—यह आने वाले दिनों में तय होगा। किंतु वर्तमान परिदृश्य यह स्पष्ट करता है कि दुर्ग कांग्रेस अब परिवर्तन की राह पर अग्रसर है। संगठन सक्रिय है, कार्यकर्ता आशान्वित हैं और लंबे समय से स्थिर पड़ी राजनीतिक ऊर्जा अब गति पकड़ती दिख रही है।
दुर्ग विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस वर्तमान में विपक्ष की भूमिका में है।
ऐसे में संगठन की सक्रियता केवल आंतरिक मजबूती ही नहीं, बल्कि मजबूत विपक्ष के रूप में जनता के मुद्दों को उठाने की क्षमता भी प्रदान करेगी।
नई नेतृत्व टीम यदि इसी सामूहिक सोच के साथ आगे बढ़ी, तो संगठन न केवल अपने अंदरूनी ढांचे को मजबूत करेगा, बल्कि राजनीतिक परिदृश्य में भी प्रभावी भूमिका निभा सकेगा।
चार दशक बाद दुर्ग कांग्रेस में आया यह परिवर्तन केवल कार्यालय परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति में एक बड़े बदलाव का संकेत है।
मनमानी की राजनीति के बजाय सामूहिक नेतृत्व की ओर बढ़ते कदम—यह वही बदलाव है जिसकी कार्यकर्ताओं को वर्षों से प्रतीक्षा थी।
अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि यह नया ढांचा भविष्य में संगठन को किस दिशा में ले जाएगा।
लेकिन एक बात तय है—
दुर्ग कांग्रेस की यह नई शुरुआत न केवल उत्साहजनक है, बल्कि इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज होने योग्य भी है।
शौर्यपथ लेख / जीवन की भाग-दौड़ और तनाव से भरे दौर में फिटनेस बनाए रखना हर किसी के लिए चुनौती है। लेकिन एक घटना ने इस बात को बेहद खूबसूरती से उजागर किया है, जब एक अधिकारी ने अपने सहयोगी के विषय में हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि वे पिछले 26 वर्षों से एक ही पैंट पहन रहे हैं। यह बात थोड़ी हंसी-मजाक में कही गई, लेकिन इसमें छुपा संदेश काफी गहरा था।
26 साल पहले जो पैंट वे पहनते थे, आज भी वही फिट उन्हें सूट करता है। इस छोटे से तथ्य ने उनके स्वस्थ और अनुशासित जीवनशैली की गवाही दी। आज की व्यस्त और दबाव वाली दुनिया में, जहां अधिकतर लोग वजन बढ़ने या फिटनेस खोने की समस्या से जूझ रहे हैं, इस अधिकारी का स्थिर रहना और स्वास्थ्य के प्रति सजगता अद्भुत उदाहरण है।
यह अधिकारी भिलाई नगर के सीएसपी सत्य प्रकाश हैं, जिन्होंने 26 वर्षों से लगातार अपने स्वास्थ्य और कार्य के प्रति समर्पण बनाए रखा है। उनके इस नजरिए से यह स्पष्ट होता है कि चाहे जीवन में कितनी भी चुनौतियाँ आएं, यदि व्यक्ति अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखे और अनुशासन बनाए रखे तो वह लंबे समय तक फिट और सक्रिय रह सकता है।
यह कहानी उन सभी के लिए प्रेरणा है जो अपने दैनिक जीवन के तनाव और भागदौड़ के बीच स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर देते हैं। 26 साल से एक ही पैंट में फिट रहने का यह उदाहरण हमें सिखाता है कि निरंतर स्वास्थ्य के प्रति सजगता और नियमबद्ध जीवनशैली जीवन में कितनी महत्वपूर्ण होती है।
स्वास्थ्य अच्छी हो तो जीवन की हर चुनौती आसान हो जाती है, और सीएसपी सत्य प्रकाश के सेहत के विषय में यह सरल लेकिन प्रभावशाली संदेश हमें याद कराता है कि छोटी-छोटी बातें भी जीवन में बड़ा फर्क डाल सकती हैं।
लेखक के निजी विचार -
शरद पंसारी (संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार )
विशेष लेख
दुर्ग। शौर्यपथ।
आज के समय में प्रतिष्ठा, पद और प्रोटोकॉल अक्सर व्यक्ति को आम जनजीवन से दूर ले जाते हैं। लेकिन जब कोई व्यक्तित्व अपने उच्च पदों, सत्ता-संबंधों और सामाजिक प्रतिष्ठा से ऊपर उठकर सरलता, सादगी और मानवीयता को अपनाए — तो वह केवल सम्मान ही नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत बन जाता है।
ऐसी ही एक प्रेरणादायी मुलाकात बीती रात दुर्ग सर्किट हाउस में हुई, जब ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशन की टीम का सामना देश की एक अत्यंत विशिष्ट, परंतु उतनी ही विनम्र और सरल शख्सियत से हुआ —
डॉ. कमल रामकृष्ण गंवई,जिन्हें देश पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) की माता, तथा पूर्व राज्यपाल (बिहार और सिक्किम) आर. एस. गवई की धर्मपत्नी होने के नाते जानते हैं।उनका व्यक्तित्व पद से बड़ा है — और उनका व्यवहार हर पद से ऊँचा।
परिवार स्वयं न्यायपालिका का शिखर—फिर भी जमीन से जुड़े लोग
डॉ. कमल गंवई का परिवार देश की न्यायपालिका और प्रशासनिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है—
उनके पति आर. एस. गवई, भारत के बिहार व सिक्किम के राज्यपाल रह चुके हैं।
उनका बेटा भूषण रामकृष्ण गंवई, देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे।
उनकी बेटी बॉम्बे हाई कोर्ट में न्यायाधीश हैं।
इतने उच्च और प्रभावशाली पदों से जुड़े परिवार की माता का व्यवहार यदि एक साधारण गृहिणी की तरह सरल, सहज और सत्संगी हो — तो यह आज के समाज के लिए एक मूल्यवान सीख है।सर्किट हाउस में किसी प्रकार का प्रोटोकॉल, सुरक्षा या विशेष व्यवस्था न देखकर ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशन की पूरी टीम भावुक हो उठी।वे एक सामान्य नागरिक की तरह बैठीं, सुना, समझा और मुस्कराकर हर बात का उत्तर दिया—यही उनकी महानता है।
ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशन की टीम ने किया सम्मान
संगठन के विस्तार और जनसेवा से जुड़े कार्यों पर उनसे सार्थक चर्चा हुई । हल्की मुस्कान और सहज व्यवहार में उन्होंने टीम को दिशा-निर्देश भी दिए। संगठन ने उन्हें शाल और मोमेंटो प्रदान कर सम्मानित किया,और सभी सदस्यों ने उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।इस अवसर पर उपस्थित थे—अध्यक्ष जितेंद्र हासवानी,उपाध्यक्ष जे. सूफी रूमी,महासचिवडी. मोहन राव,सचिव मनोज राय,जावेद भाई, पीयूष वासनिक और संदीप बामबूढ़े।
समाज को बड़ा संदेश: पद बड़ा नहीं, व्यक्तित्व बड़ा होता है
आज जब छोटे-से पद पर आसीन लोग भी भारी-भरकम प्रोटोकॉल, विशेष सुरक्षा और लाइमलाइट की चाह में रहते हैं । वहीं न्यायपालिका के सर्वोच्च पद से जुड़े परिवार की माता का इतना सहज, सादगीपूर्ण और निर्व्याज व्यवहार समाज को यह याद दिलाता है कि—
“अहंकार पद से आता है, परंतु सम्मान व्यवहार से।”
“असर ओहदों का नहीं होता, व्यक्तित्व का होता है।”
एक ऐसी माता, जिसने राष्ट्र को उच्चतम स्तर की न्यायिक सेवा देने वाले पुत्र का संस्कार दिया —उनकी विनम्रता ही बताती है कि महानता कैसी दिखती है।
दुर्ग सर्किट हाउस में डॉ. कमल रामकृष्ण गंवई से हुई यह मुलाकात सिर्फ एक औपचारिक मुलाकात नहीं थी बल्कि सरलता, सादगी और मानवता की जीवंत पाठशाला थी।
उनके शांत व्यक्तित्व और विनम्र व्यवहार ने यह सिद्ध किया कि—"प्रोटोकॉल से नहीं, व्यवहार से मन जीते जाते हैं।”ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशन की टीम के लिए यह निस्संदेह एक अविस्मरणीय क्षण रहा —और समाज के लिए एक प्रेरक संदेश।
चार दशक से बदलती राजनीति नहीं, बल्कि स्थिरता की कड़वी सच्चाई — कार्यकर्ताओं का समर्पण सलाम-योग्य, पर पार्टी में उनके लिए उन्नति का रास्ता कहीं खो गया।
दुर्ग / शौर्यपथ / जिस शहर ने कभी कांग्रेस को स्थानीय कांग्रेसियों के दम पर नई राह दिखाई थी, वही शहर आज 40 साल से उसी राजनीतिक ठहराव की गूँज सुनाता है। जहां एक ओर नित नए चेहरे, परंपरागत परिवारों के साये और पार्टी के भीतर सीमित अवसरों की वजह से तमाम कामकाजी कांग्रेसी वही पुराने ओहदे-संरचना में जमे हुए हैं — और जनता अब मुखर होकर पूछने लगी है: क्या दुर्ग कांग्रेस का भविष्य हमेशा केवल कार्यकर्ता स्तर तक ही सीमित रहेगा?
चार दशक की कहानी को समझने के लिए हमें जमीनी हकीकत देखनी होगी। 40 साल पहले अरुण वोरा ने दुर्ग शहर से विधायक के रूप में अपना राजनीतिक सफर शुरू किया — और आज वही नाम, वही शख्स संगठन में जिलाध्यक्ष जैसी जगहों के लिए फिर से उभर रहा है। यही संकेत देता है कि संगठन में नेताओं का चक्र लगभग लगातार वही पुरानी राह पकड़ता आया है। जबकि पार्षद, ब्लॉक अध्यक्ष, और बुनियादी स्तर के कार्यकर्ता दशकों से अपनी भूमिकाएँ बखूबी निभा रहे हैं, पर उनमें से बहुत से लोग संगठन के उच्च ओहदों तक नहीं पहुँच पाए — क्योंकि जो नियंत्रण और निर्णय शक्ति है, वह अक्सर कुछ सीमित हाथों में ही केंद्रित रहती है।
यह कोई सनक या अतिशयोक्ति नहीं कि पिछले 40 सालों में दुर्ग कांग्रेस का संगठन एक स्थिर जल की तरह रहा — ऊपर से हल्की हलचल दिखती रही पर भीतर कोई गहरा परिवर्तन नहीं हुआ। पार्षद वही रहे, कार्यकर्ता वही रहे, और कुछ अपवादों को छोड़ कर कोई नेता विधायक या उससे ऊपर के पायदान तक नहीं पहुंच पाया। ब्लॉक स्तर पर समय-समय पर थोड़े बहुत बदलाव दिखाई देते हैं, पर अधिकतर बार वे भी “रिमोट कंट्रोल” जैसा ठहराव लिए हुए होते हैं — परिवर्तन का नहीं, केवल पदों का नामांतरण लगता है।
इसी ठहराव का परिणाम ये होता है कि चुनाव की मोहब्बत और संगठन के प्रति निष्ठा रखने वाले हजारों कांग्रेसी जिनका जज़्बा और समर्पण असली है, वे भी बार-बार वही भूमिका निभाते रहे — झंडा उठाना, रैलियों में हिस्सा लेना, विरोध-आंदोलन की अगुवाई करना — पर सत्ता के ठीक फायदे, शक्तियों और निर्णायक भूमिकाओं का लाभ चंद लोगों तक ही सिमटा रहता है। जनता भी अब इस असंतुलन को देख रही है और सवाल उठा रही है कि क्या परिवारवाद और पुराने किले ही संगठन के भविष्य का निर्धारण करेंगे?
अरुण वोरा का फिर से जिला अध्यक्ष पद के लिए आवेदन चर्चा की आग में घी डालने जैसा हुआ — न केवल इसलिए कि एक पुराना नाम वापस आया है, बल्कि इसलिए कि यह पुरानी परंपरा का प्रतीक बन चुका है: वही नेता, वही पथ। यही वजह है कि कार्यकर्ता समुदाय में बेचैनी और असंतोष बढ़ रहा है — वे पूछते हैं: क्या पूरी जिंदगी सिर्फ कार्यकर्ता बने रहने के लिए ही है? क्या किसी को संगठन के अंदर आगे बढ़ना है तो उसे किस ‘एनिवर्सरी पास’ या ‘परिवार के नाम’ की मोहर चाहिए?
दुर्ग की सियासत में यह ठहराव केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है; परन्तु विशेष रूप से दुर्ग कांग्रेस के लिए यह चिंताजनक है क्योंकि एक मजबूत स्थानीय पार्टी का मतलब ही होता है—तन-मन से जुड़े कार्यकर्ता जिनमें नेतृत्व कौशल विकसित होने पर वे पार्टी को नए ऊँचाई पर ले जा सकें। पर जब नेतृत्व और निर्णय सीमित तब प्रतिभा दबकर रह जाती है, नए विचारों का मार्ग बंद होता है और युवा/नवोदित कार्यकर्ता निराश होते हैं।
क्या है विकल्प?
यहाँ कुछ आवश्यक कदम हैं जिन्हें लागू कर के दुर्ग कांग्रेस अपने संगठनात्मक स्वास्थ्य और जनता के भरोसे को फिर से हासिल कर सकती है — (निम्न सुझाव जरूरी हैं पर उपयुक्त नीति-रूप देने का काम संगठन पर निर्भर करेगा):
पदोन्नति व संसाधन आवंटन में पारदर्शिता: स्थानीय स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन व सेवा को मापकर उन्हें आगे बढ़ाने का स्पष्ट मार्ग बनाना।
युवा और नए चेहरों के लिए आरक्षण/प्रोत्साहन: ताकि पार्टी में नयापन आए और परिवारवाद के आरोप कम हों।
समय-सीमित नेतृत्व और रोटेशन पॉलिसी: लंबे समय तक एक ही नामों का प्रभुत्व खत्म करके नए नेतृत्व को मौका।
कार्यकर्ता-केन्द्रित प्रशिक्षण और राजनीतिक विकास कार्यक्रम: ताकि पार्षद, ब्लॉक अध्यक्ष व अन्य कार्यकर्ता नेतृत्व की योग्यता विकसित कर सकें।
स्थानीय जनभागीदारी और संवाद: जनता व कार्यकर्ताओं की आशाओं को सुनने और नीति में शामिल करने का सशक्त मंच।
दुर्ग कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का हौसला और समर्पण काबिले-तारीफ है — वे 40 साल से जिन जिम्मेदारियों के साथ पार्टी के प्रति वफादार रहे, वे शहर की राजनीतिक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। पर सवाल यह है कि क्या पार्टी उन पर भी भरोसा कर सकेगी कि वे संगठन का भविष्य हों? या फिर वही पुराना सिलसिला चलता रहेगा — कुछ नाम ऊपर, बाकियों के लिए वही कार्यकर्ता जीवन? जनता और पार्टी के अंदर के लोग दोनों अब जवाब की मांग कर रहे हैं। यदि दुर्ग कांग्रेस सचमुच रचनात्मक बदलाव चाहती है तो उसे इन वर्षों की असंतुलता को पहचान कर उसकी जड़ में जाकर परिवर्तन लागू करना होगा—वरना 40 साल का यह ठहराव और भी लंबा चल सकता है।
पुल-कोट: “यदि केवल कुछ ही नेता सत्ता के लाभ उठा सकें और बाकी जीवनभर ‘कार्यकर्ता’ बने रहें — तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर पड़ती हैं; दुर्ग को अब जमीनी बदलाव चाहिए, न कि केवल नामों का फेर।”
शौर्यपथ सम्पादकीय / प्रदेश की जनता के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने एक बार फिर संवेदनशील सोच और दूरदर्शी नीति का परिचय दिया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में लागू की गई "बिजली बिल आधा" योजना मध्यम, निम्नवर्गीय और आम नागरिक परिवारों के लिए राहत की किरण लेकर आई है। 200 यूनिट तक बिजली खपत पर आधा बिल भुगतान की यह नीति न केवल जनहितकारी है, बल्कि ऊर्जा संरक्षण की दिशा में एक व्यावहारिक कदम भी है।
यह योजना प्रदेश के हर उस परिवार को सीधी आर्थिक सहायता प्रदान करेगी, जिसकी खपत 200 यूनिट तक रहती है। जो परिवार इससे अधिक बिजली खर्च करते हैं, उन्हें 200 यूनिट तक रियायत और शेष बिल का पूरा भुगतान करना होगा।
इस विभाजन से दो लाभ एक साथ मिलेंगे—एक ओर आम जनता को राहत मिलेगी, तो दूसरी ओर बिजली की मितव्ययिता को भी प्रोत्साहन मिलेगा। व्यर्थ उपयोग करने वालों के लिए यह योजना चेतावनी का भी काम करेगी, क्योंकि आर्थिक अनुशासन अब ऊर्जा उपयोग से सीधे जुड़ा रहेगा।
आज जब ऊर्जा खपत तेजी से बढ़ रही है और बिजली उत्पादन महंगा होता जा रहा है, ऐसे समय में यह कदम प्रदेश के आर्थिक संतुलन को संभालने में भी मदद करेगा।
सरकार की यह नीति यह संदेश देती है कि सामाजिक न्याय का अर्थ सिर्फ सहयोग नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण उपयोग और समान अवसर भी है।राज्य की अर्थव्यवस्था को सशक्त करने, आमजन को राहत देने और पर्यावरणीय जिम्मेदारी निभाने का यह संगम सचमुच उल्लेखनीय है।
यह योजना साबित करती है कि सरकार का उद्देश्य केवल मुफ्तखोरी नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिकता के साथ सामूहिक प्रगति है।
शरद पंसारी - संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार
दुर्ग / शौर्यपथ /
दीपावली का पर्व रोशनी और खुशियों का प्रतीक है, पर कभी-कभी यही रोशनी किसी घर के लिए अंधकार बन जाती है। दुर्ग जिले में पटाखों की चपेट में आकर घायल हुए दस वर्षीय अभिषेक यादव का मामला ऐसी ही एक घटना है जिसने प्रशासन, समाज और राजनीति — तीनों की संवेदनशीलता को एक साथ परखा है।
घटना के बाद जब वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन को सूचना मिली, तो उन्होंने तत्काल हस्तक्षेप कर घायल बालक को बेहतर चिकित्सा सुविधा दिलाने की पहल की। सेक्टर 9 अस्पताल के बर्न यूनिट में भर्ती कराने की प्रक्रिया से लेकर जिला अस्पताल के डॉक्टरों से समन्वय तक — हर स्तर पर उन्होंने व्यक्तिगत रूप से सक्रियता दिखाई।
वैशाली नगर विधायक की सक्रियता की खबर सोशल मिडिया में वाइरल होने और उनकी पहल एक ऐसे विधान सभा क्षेत्र में जो उनके कार्य क्षेत्र में नहीं आता बावजूद संज्ञान लेना और मदद की ओर आगे हाथ बढ़ाना जिसकी खूब तारीफ़ हुई जिसके बाद स्थानीय विधायक और प्रदेश सरकार के मंत्री समर्थक भी मदद के लिए आगे आये और दुसरे दिन हॉस्पिटल जाकर परिजनों की मदद की जिसका वीडियो बनकर विरल भी किया गया जिस्मेमंत्री से वार्ता भी शामिल रही . दोनों जनप्रतिनिधियों के प्रयास से उपचार में तेजी आई और अंतत: अभिषेक सुरक्षित घर लौट सका।
परंतु, इस मानवीय प्रयास के बीच राजनीतिक स्वर भी गूंजने लगे। सोशल मीडिया पर कुछ समूहों ने आरोप लगाया कि गजेंद्र यादव केवल अपने विधानसभा क्षेत्र तक सीमित रहे, जबकि वैशाली नगर के विधायक ने व्यापक दृष्टिकोण से मदद की। जो कि "राजनीति" से प्रेरित आलोचना ने मानवीय पहल की गरिमा को आहत किया।
यह राजनितिक चर्चा एक गहरी सच्चाई की ओर संकेत करता है —
हमारा समाज संवेदनशील तो है, पर संवेदनशीलता को भी राजनीतिक चश्मे से देखने की आदत बना चुका है। जब मदद की नीयत पर भी प्रश्न उठने लगें, तो यह केवल राजनीति की नहीं बल्कि समाज की मानसिकता की भी परीक्षा बन जाती है।
रिकेश सेन का त्वरित कदम और मंत्री गजेंद्र यादव समर्थकों का सहयोग, दोनों ही मानवता के उदाहरण हैं। लेकिन यह सवाल अब भी प्रासंगिक है — क्या किसी बच्चे की पीड़ा को भी क्षेत्र और पार्टी के आधार पर मापा जाना चाहिए? क्या मदद का कार्य भी प्रचार का विषय बनना चाहिए?
राजनीति में प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, पर मानवता की सीमा से परे प्रतिस्पर्धा असंवेदनशीलता में बदल जाती है। अभिषेक यादव का उपचार भले ही सफल रहा हो, लेकिन इस घटना ने समाज को यह सोचने पर विवश किया है कि हमें सहायता के क्षणों को प्रचार के मंच में बदलने से बचना होगा।
दुर्ग की यह घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि एक संदेश है —
जब जीवन संकट में हो, तब राजनीति मौन रहनी चाहिए और मानवता बोलनी चाहिए।
सच्ची सेवा वही है जो शोर के बिना की जाए, और सच्चा नेतृत्व वही जो हर बच्चे को अपना मानकर कार्य करे।
क्योंकि अंतत:, एक मासूम की मुस्कान — किसी भी राजनीतिक विजय से कहीं अधिक कीमती होती है।
दुर्ग। शौर्यपथ लेख ।
राजनीति केवल सत्ता या पद का प्रतीक नहीं, बल्कि जनसेवा का वह माध्यम है जिसके माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग तक संवेदना और सहायता पहुँचे — यही लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप है। परंतु दुर्ग जिले की हाल की घटनाएँ बताती हैं कि आज भी राजनीति में संवेदनशीलता और व्यवहारिक जिम्मेदारी के दो बिल्कुल अलग स्वरूप विद्यमान हैं।
दीपावली के अवसर पर मालवीय नगर के एक बालक के साथ हुई दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने पूरे शहर को स्तब्ध कर दिया। घटना की जानकारी मिलते ही, जिले से बाहर रहते हुए भी एक जनप्रतिनिधि ने मानवता की मिसाल पेश की — उन्होंने न केवल स्वयं पहल कर बच्चे को सेक्टर-9 अस्पताल के बर्न यूनिट में भर्ती कराया, बल्कि उसके संपूर्ण इलाज का खर्च वहन करने की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर ली। यह कदम राजनीति से ऊपर उठकर मानवीयता की गूंज बन गया।
वहीं, इसी जिले में एक अन्य जनप्रतिनिधि, जो कि कहीं अधिक प्रभावशाली पद पर आसीन हैं, उनके समक्ष पत्रकारों का एक प्रतिनिधिमंडल पहुँचा। प्रतिनिधिमंडल ने एक पत्रकार के बच्चे के इलाज हेतु मुख्यमंत्री सहायता कोष से सहयोग की विनम्र अपील की। महीनों बीत गए, परंतु किसी प्रकार की पहल नहीं हुई। यह घटना इस बात का प्रतीक है कि जनप्रतिनिधि का पद भले बड़ा हो, लेकिन यदि संवेदना का भाव अनुपस्थित है तो वह जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित रह जाती है।
जनप्रतिनिधियों के इन दो विपरीत चेहरों ने जिले की राजनीति को एक गहरा प्रश्न खड़ा कर दिया है — क्या जनसेवा अब व्यक्ति विशेष की मनोदशा पर निर्भर हो गई है? एक ओर जहाँ कोई प्रतिनिधि अपने क्षेत्र से परे जाकर भी मानवता की जिम्मेदारी निभा रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे हैं जो अपने ही क्षेत्र की पीड़ा से अनजान बने बैठे हैं।
यह लेख किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल विशेष पर टिप्पणी नहीं, बल्कि राजनीतिक आचरण और संवेदनशीलता के उस अंतर को रेखांकित करता है जो आज की राजनीति को दो हिस्सों में बाँटता दिख रहा है —
एक पक्ष जो जनसेवा को धर्म मानता है, और दूसरा जो इसे केवल अवसर का माध्यम समझता है।
कहा भी गया है —
"रात में एक दीपक भी यदि जलता है, तो उसकी रोशनी दूर-दूर तक फैलती है।"
इसी प्रकार जब कोई जनप्रतिनिधि सच्चे भाव से कार्य करता है, तो उसकी मानवता पूरे समाज में आशा की किरण जगाती है। पर जब संवेदनहीनता राजनीति में जगह बना लेती है, तो जनता के मन में अविश्वास और निराशा पनपने लगती है।
आज आवश्यकता है कि जनता ऐसे प्रतिनिधियों को पहचानें, जो केवल मंचों पर नहीं बल्कि कठिन समय में भी जनता के साथ खड़े हों। क्योंकि राजनीति का मूल्य पद नहीं, बल्कि आचरण से तय होता है।
✍️ संपादकीय विश्लेषण
दुर्ग। लोकतंत्र की जड़ें तभी मजबूत होती हैं जब सत्ता में बैठे लोग जनसेवा को प्राथमिकता दें और नैतिकता को अपना आदर्श बनाएं। परंतु विडंबना यह है कि आज राजनीति में नैतिकता का स्थान स्वार्थ ने ले लिया है। चुनाव के समय नेता जनता के द्वार पर हाथ जोड़कर सेवा का वादा करते हैं, लेकिन पद मिलते ही वही नेता जनसेवा के वादों को भुलाकर सरकारी तंत्र और संसाधनों के दुरुपयोग में लग जाते हैं।
सरकारी बंगले, जो प्रशासनिक जरूरतों और सार्वजनिक सेवा से जुड़े पदाधिकारियों के लिए आरक्षित होते हैं, आज राजनीतिक रसूख की पहचान बन गए हैं। नेताओं के लिए बंगले केवल निवास नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन के प्रतीक बन चुके हैं। और यही प्रवृत्ति लोकतंत्र की आत्मा पर सबसे गहरा आघात करती है।
? दुर्ग का उदाहरण: सम्मानित नाम के पीछे उठते सवाल
दुर्ग शहर का राजनीतिक इतिहास साक्षी है कि स्वर्गीय हेमचंद यादव का नाम आज भी सम्मान और सेवा के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। उनका मिलनसार स्वभाव, सरल व्यक्तित्व और जनता से जुड़ाव ने उन्हें जननेता के रूप में स्थापित किया था।
परंतु अफसोस की बात यह है कि उनके जाने के वर्षों बाद भी, उनके नाम पर आवंटित सरकारी बंगले पर आज भी उनके परिजनों का कब्जा बना हुआ है — जबकि कोई संवैधानिक या सरकारी पद उनके पास नहीं है।
यह स्थिति केवल एक बंगले की नहीं, बल्कि नैतिकता की दीवारों में लगी दरार का प्रतीक है।
क्योंकि जहां जनता के लिए उपलब्ध सुविधाएं सीमित हैं, वहीं सत्ता की निकटता से लाभान्वित परिवार सरकारी संपत्ति को निजी उपयोग में बनाए रखते हैं।
⚖️ जब एक पूर्व मंत्री ने दी थी मिसाल...
प्रदेश की राजनीति में पूर्व गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू ने एक बार नैतिक उदाहरण प्रस्तुत किया था। विधायक रिकेश सेन द्वारा उनके बंगले के आवंटन की प्रक्रिया शुरू होते ही उन्होंने बिना किसी विवाद या टकराव के बंगला तत्काल खाली कर दिया।
यही वह राजनीतिक संस्कार था जो दिखाता है कि लोकतंत्र में पद से बड़ा नैतिक कर्तव्य होता है।
लेकिन आज जब जीत हेमचंद यादव जैसे युवा नेता, जिनकी पहचान अभी भी स्वर्गीय हेमचंद यादव की विरासत पर टिकी है, उसी सरकारी बंगले पर कब्जा बनाए रखते हैं, तो यह सवाल उठना लाजिमी है —
क्या यह वही "नैतिकता" है जिसकी बातें नेता जनता के सामने करते हैं?
?️ बंगला या प्रतीक — राजनीति का असली चेहरा
सरकारी बंगले की दीवारें केवल ईंट-पत्थर की नहीं होतीं, वे जनता के विश्वास की नींव होती हैं।
जब कोई नेता सरकारी संपत्ति पर पद छोड़ने के बाद भी कब्जा जमाए रखता है, तो यह जनता के विश्वास का दुरुपयोग है। यह वही जनता है जिसने उन्हें सम्मान, पहचान और पद सब कुछ दिया।
यदि जीत हेमचंद यादव वास्तव में अपने पिता की प्रतिष्ठा और सम्मान को जीवित रखना चाहते हैं, तो उन्हें चाहिए कि वे नैतिकता के आधार पर बंगले को स्वयं मुक्त करें।
यही कदम यह साबित करेगा कि वे अपने पिता की राजनीतिक विरासत को केवल नाम से नहीं, बल्कि आचरण से भी जीवित रखे हुए हैं।
?️ निष्कर्ष:
लोकतंत्र में नैतिकता और आदर्श केवल भाषणों का विषय नहीं होने चाहिए, बल्कि वह आचरण में उतरने चाहिए।
सरकारी संपत्तियों पर कब्जा, चाहे किसी भी दल या व्यक्ति द्वारा किया गया हो, जनता के संसाधनों का दुरुपयोग है — और यह जनसेवा नहीं, सत्ता-सेवा का प्रतीक है।
आज जरूरत है कि जीत हेमचंद यादव जैसे युवा नेता उदाहरण पेश करें —
और दिखाएं कि नैतिकता की बात केवल कहने के लिए नहीं, निभाने के लिए होती है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
