August 01, 2026
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    धर्म संसार / शौर्यपथ / प्रभु यीशु के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस का त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह त्योहार कई मायनों में बेहद खास है। क्रिसमस को बड़ा दिन, सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता है। प्रभु यीशु ने दुनिया को प्यार और इंसानियत की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। प्रभु यीशु को ईश्वर का इकलौता प्यारा पुत्र माना जाता है। इस त्योहार से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
    क्रिसमस ऐसा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग उत्साह से मनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन लगभग पूरे विश्व में अवकाश रहता है। 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह त्योहार आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च में 6 जनवरी को मनाया जाता है। कई देशों में क्रिसमस का अगला दिन 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है। क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ को लेकर मान्यता है कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही सांता थे। वह गरीबों की हमेशा मदद करते थे उनको उपहार देते थे। क्रिसमस के तीन पारंपरिक रंग हैं हरा, लाल और सुनहरा। हरा रंग जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ईसा मसीह के रक्त और सुनहरा रंग रोशनी का प्रतीक है। क्रिसमस की रात को जादुई रात कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात सच्चे दिल वाले लोग जानवरों की बोली को समझ सकते हैं। क्रिसमस पर घर के आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। क्रिसमस ट्री को दक्षिण पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। फेंगशुई के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। पोलैंड में मकड़ी के जालों से क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा है। मान्यता है कि मकड़ी ने सबसे पहले जीसस के लिए कंबल बुना था।

    By- नरेश देवांगन 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। सरकार आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए भरसक प्रयास कर रही है, योजनाएं बन रही हैं, बजट खर्च हो रहा है—लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ गैर-जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों की कार्यशैली इन प्रयासों पर सवाल खड़े करती दिख रही है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं मानो जनता का पैसा और सरकारी मंशा, दोनों ही कागज़ों में बेहतर और जमीन पर कमजोर पड़ रहे हों। सबसे चिंताजनक यह है कि जिन अधिकारियों को जिले में निरीक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है, उन्हें भी यह सब या तो दिखाई नहीं दे रहा, या फिर प्राथमिकता में नहीं है।

    इसी क्रम में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र काकलूर से सामने आई जानकारियों ने व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर यह बात सामने आई है कि केंद्र में पदस्थ आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी द्वारा नियमित रूप से ड्यूटी का निर्वहन नहीं किया जा रहा है, जिससे मरीजों को निरंतर सेवाएं मिल पाना प्रभावित हो रहा है।

    मामले को और गंभीर बनाते हुए विभागीय सूत्रों का दावा है कि संबंधित महिला चिकित्सा अधिकारी महीने में एक बार आ जाएं तो ही “बहुत” माना जाता है, जबकि कभी-कभार तो वे लंबे समय तक अनुपस्थित रहती हैं। सूत्र यह भी बताते हैं कि उनके पति—जो स्वयं अन्य स्थान पर पदस्थ बताए जाते हैं—सप्ताह में एक बार आकर उपस्थिति रजिस्टर, ओपीडी रजिस्टर सहित अन्य आवश्यक प्रविष्टियां भरते नजर आते हैं। यदि यह तथ्यात्मक रूप से सही है, तो यह व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

    सूत्रों के अनुसार, यह सब संभव होने के पीछे स्थानीय स्तर पर “संरक्षण” की चर्चा भी है, जिसमें विकासखंड चिकित्सा अधिकारी की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, यह पहलू जांच का विषय है और आधिकारिक पुष्टि के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

    ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकारी स्वास्थ्य संस्थान अब जिम्मेदारी से अधिक “व्यवस्था के भरोसे” चल रहे हैं? और क्या निगरानी तंत्र केवल कागज़ों तक सीमित रह गया है? यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन है, बल्कि आमजन के विश्वास के साथ भी गंभीर समझौता है।

    अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं—क्या पारदर्शी जांच और कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगा।

    चेन्नई: तमिलनाडु की सियासत में इस वक्त जबरदस्त हलचल मची हुई है। राज्य में सरकार गठन को लेकर जारी रस्साकशी के बीच डीएमके (DMK) प्रमुख एमके स्टालिन ने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। बहुमत के जादुई आंकड़े को छूने की कोशिशों के बीच स्टालिन ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी, टीवीके (TVK) प्रमुख विजय की संभावित सरकार में अगले छह महीने तक कोई दखल नहीं देगी।

    संवैधानिक संकट टालने की कोशिश

    स्टालिन ने स्पष्ट किया कि डीएमके राज्य में किसी भी तरह के संवैधानिक संकट या समय से पहले चुनाव के पक्ष में नहीं है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी केवल स्थिति पर नजर रखेगी और नई सरकार को कामकाज का मौका देगी। राजनीतिक विश्लेषक इसे स्टालिन का एक सोची-समझी रणनीति के तहत चला गया 'मास्टरस्ट्रोक' मान रहे हैं।

    कल्याणकारी योजनाओं पर टिकी नजर

    पूर्व मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई कि नई सरकार डीएमके शासनकाल की प्रमुख योजनाओं को बंद नहीं करेगी। उन्होंने विशेष रूप से दो योजनाओं का जिक्र किया:

    स्कूली बच्चों के लिए मुफ्त नाश्ता योजना

    महिलाओं के लिए ₹1000 मासिक सहायता योजना

    स्टालिन ने कहा, "हमने 2021 के घोषणापत्र के 90 प्रतिशत वादे पूरे किए हैं। जो अधूरे रहे, वे केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में होने के कारण रुके। जनता के हित की योजनाओं का भविष्य अब नई सरकार के हाथों में है।"

    टीवीके के वादों पर उठाए सवाल

    जहाँ एक ओर स्टालिन ने नरम रुख दिखाया, वहीं टीवीके के चुनावी वादों पर चुटकी लेने से भी नहीं चूके। उन्होंने कहा कि चुनाव में बड़े-बड़े वादे करना आसान है, लेकिन उन्हें धरातल पर लागू करना एक बड़ी चुनौती होगी।

    सियासी गलियारों में चर्चा:

    अब सवाल यह है कि क्या विजय की पार्टी इस 'छह महीने की मोहलत' का फायदा उठाकर अपनी स्थिति मजबूत कर पाएगी? या फिर तमिलनाडु की राजनीति में किसी नए गठबंधन का उदय होगा? फिलहाल, सबकी नजरें राजभवन की गतिविधियों और अगले कुछ घंटों में होने वाले राजनीतिक घटनाक्रमों पर टिकी हैं।

    बर्खास्तगी के खिलाफ टीएमसी का बड़ा दांव, अगले कुछ दिनों में सुप्रीम कोर्ट में हो सकती है सुनवाई

    कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में अभूतपूर्व संवैधानिक संकट के बीच पूर्व मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने अपनी सरकार की बर्खास्तगी और चुनाव परिणामों को चुनौती देने का फैसला किया है। 7 मई 2026 को राज्यपाल द्वारा मंत्रिमंडल को बर्खास्त किए जाने के तुरंत बाद तृणमूल कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी शुरू कर दी है।

    सूत्रों के अनुसार, यह याचिका मई 2026 के दूसरे सप्ताह में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आ सकती है। मामले की गंभीरता और संवैधानिक प्रभाव को देखते हुए टीएमसी की कानूनी टीम “अर्जेंट मेंशनिंग” के जरिए जल्द सुनवाई की मांग करेगी।

    ममता और चंद्रिमा खुद लड़ेंगी कानूनी लड़ाई

    जानकारी के मुताबिक, Mamata Banerjee और पूर्व मंत्री Chandrima Bhattacharya स्वयं वकील के रूप में इस संवैधानिक लड़ाई में पक्ष रख सकती हैं। पार्टी का दावा है कि राज्य में लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनादेश को नजरअंदाज किया गया है।

    हालांकि फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक कॉज लिस्ट में इस मामले की सुनवाई की कोई तारीख तय नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक घटनाक्रमों को देखते हुए अगले 2-3 कार्य दिवसों के भीतर इस पर सुनवाई होने की संभावना जताई जा रही है।

    पहले भी मिल चुके हैं कानूनी झटके

    चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मामलों में टीएमसी को हाल ही में अदालत से राहत नहीं मिल सकी थी।

    2 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मतगणना के लिए केंद्रीय कर्मचारियों की नियुक्ति को वैध ठहराते हुए टीएमसी की याचिका खारिज कर दी थी।

    वहीं अप्रैल 2026 में चुनाव आयोग द्वारा अधिकारियों के तबादलों को लेकर दायर याचिका पर भी अदालत ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था।

    बीजेपी सरकार के शपथ ग्रहण की तैयारी तेज

    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 207 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। नई सरकार का शपथ ग्रहण 9 मई 2026 को Brigade Parade Ground में प्रस्तावित है।

    राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, ममता बनर्जी की याचिका का मुख्य उद्देश्य नई सरकार के गठन की प्रक्रिया पर रोक लगाना या चुनाव परिणामों को चुनौती देकर चुनाव निरस्त कराने की मांग करना हो सकता है।

    राजनीतिक गलियारों में बढ़ी हलचल

    राज्य में तेजी से बदलते राजनीतिक हालात के बीच अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर टिक गई है। यदि अदालत इस मामले में त्वरित सुनवाई स्वीकार करती है, तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में आने वाले दिन बेहद निर्णायक साबित हो सकते हैं।

    दुर्ग / शौर्यपथ

    भीषण गर्मी से जूझ रहे दुर्ग शहर में जहां आम नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान हैं, वहीं जनहित के लिए लगाए गए वाटर एटीएम अब कथित तौर पर “जल व्यापार” का माध्यम बनते नजर आ रहे हैं। इंदिरा मार्केट स्थित वाटर एटीएम संचालक पर पानी की कालाबाजारी और मनमाने दामों पर बिक्री के गंभीर आरोप लगे हैं।

    स्थानीय व्यापारियों और नागरिकों के अनुसार, जिस वाटर एटीएम से पहले ₹10 में पूरा केन भर जाता था, अब ₹15 से ₹20 डालने के बाद भी केन पूरा नहीं भर पा रहा। आरोप है कि एटीएम संचालक के कर्मचारी अंदर से पाइप के माध्यम से बड़े केनों में पानी भरकर ई-रिक्शा के जरिए दुकानों तक पहुंचा रहे हैं और एक केन ₹30 से ₹40 तक में बेचा जा रहा है।

    शौर्यपथ टीम के पास इस पूरे मामले के वीडियो फुटेज मौजूद हैं, जिसमें कथित तौर पर वाटर एटीएम से बड़े पैमाने पर पानी भरकर निजी बिक्री किए जाने के दृश्य कैद हैं।

    जनहित की योजना या निजी कमाई का जरिया?

    नगर निगम द्वारा शहर में वाटर एटीएम आम जनता को राहत देने और लागत मूल्य पर स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लगाए गए थे। लेकिन आरोप है कि ठेकेदारों की मनमानी ने इस योजना की मूल भावना को ही प्रभावित कर दिया है।

    व्यापारियों का कहना है कि पिछले दो महीनों से यह खेल लगातार चल रहा है और प्रतिदिन सैकड़ों केन पानी निजी रूप से बेचा जा रहा है। इससे निगम प्रशासन को लाखों रुपए के संभावित राजस्व नुकसान की आशंका भी जताई जा रही है।

    जल विभाग भी हुआ सख्त

    मामले में जब जल विभाग प्रभारी से चर्चा की गई तो उन्होंने इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए नाराजगी जताई। विभागीय प्रभारी ने वीडियो फुटेज मांगते हुए मामले की जांच और सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है।

    अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या निगम प्रशासन और जल विभाग इस मामले में केवल नोटिस जारी कर औपचारिकता निभाएंगे, या फिर वास्तव में निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार ठेकेदार पर कठोर कार्रवाई होगी।

    भ्रष्टाचार पर कार्रवाई या फिर लीपापोती?

    प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव लगातार भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर कड़ी कार्रवाई की बात कर रहे हैं। ऐसे में दुर्ग निगम प्रशासन और शहरी सरकार के सामने अब यह एक बड़ी परीक्षा बन गई है कि जनहित की योजना में कथित गड़बड़ी करने वालों पर वास्तव में सख्त कदम उठाए जाते हैं या फिर मामला नोटिस और चेतावनी तक सीमित रह जाता है।

    भीषण गर्मी के बीच पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता पर मुनाफाखोरी का यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि आम जनता के अधिकारों पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।

    दुर्ग।

    ग्राम पंचायत समोदा में अफीम कांड के खुलासे को लेकर सुर्खियों में आए सरपंच अरुण गौतम अब खुद कानूनी शिकंजे में फंस गए हैं। पंचायत चुनाव में दिए गए शपथ-पत्र में आपराधिक मामलों की जानकारी छुपाने के आरोप में उनका निर्वाचन न्यायालय द्वारा शून्य घोषित कर दिया गया है। यह फैसला न सिर्फ समोदा बल्कि पूरे जिले की पंचायत राजनीति में बड़ा संदेश लेकर आया है।

    ⚖️ कोर्ट का सख्त रुख, निर्वाचन हुआ शून्य

    अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) एवं विहित प्राधिकारी, दुर्ग द्वारा 5 मई 2026 को जारी आदेश में स्पष्ट किया गया कि अरुण गौतम ने नामांकन के दौरान दाखिल शपथ-पत्र (प्ररूप-4-ख-01) में अपने विरुद्ध लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी जानबूझकर छुपाई।

    इसे छत्तीसगढ़ पंचायत निर्वाचन नियम 1995 के नियम 31(क) का उल्लंघन मानते हुए उनका चुनाव रद्द कर दिया गया।

    ? याचिका से खुला मामला

    यह पूरा मामला याचिकाकर्ता श्रीमती भुनेश्वरी देशमुख द्वारा दायर चुनाव याचिका से सामने आया। उन्होंने आरोप लगाया कि:

    गौतम ने आपराधिक प्रकरणों को छुपाकर मतदाताओं को भ्रमित किया

    नामांकन प्रक्रिया में गलत जानकारी देकर चुनाव लड़ा

    कोर्ट में प्रस्तुत दस्तावेजों में थाना पुलगांव के कई गंभीर मामलों का उल्लेख किया गया, जिनमें हत्या के प्रयास (धारा 307 IPC) जैसे आरोप भी शामिल हैं।

    ? कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां

    रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा पहले आपत्ति खारिज करना नियम विरुद्ध पाया गया

    सुनवाई के दौरान तथ्य स्पष्ट रूप से प्रमाणित हुए

    शपथ-पत्र में जानकारी छुपाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ छल माना गया

    ? अब क्या होगा आगे?

    अरुण गौतम का सरपंच पद तत्काल प्रभाव से समाप्त

    जनपद पंचायत दुर्ग को उप-चुनाव (Bye-election) की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश

    राज्य निर्वाचन आयोग को रिपोर्ट भेजी जाएगी

    याचिकाकर्ता को 500 रुपये की प्रतिभूति राशि वापस करने का आदेश

    ?️ पृष्ठभूमि: कड़ा मुकाबला, अब पूरा उलटफेर

    2025 के पंचायत चुनाव में अरुण गौतम को 869 वोट मिले थे, जबकि भुनेश्वरी देशमुख को 741 वोट प्राप्त हुए थे।

    चुनाव परिणाम के बाद ही शपथ-पत्र को लेकर विवाद खड़ा हुआ, जिसे बाद में हाईकोर्ट के निर्देश पर पुनः सुनवाई में लिया गया और अब यह बड़ा फैसला सामने आया।

    ⚠️ राजनीतिक और सामाजिक संदेश

    यह निर्णय स्पष्ट संकेत देता है कि पंचायत चुनावों में भी पारदर्शिता और सच्चाई से कोई समझौता नहीं होगा।

    शपथ-पत्र में जानकारी छुपाना अब सिर्फ तकनीकी गलती नहीं, बल्कि लोकतंत्र के साथ धोखा माना जा रहा है।

    ? अपडेट

    अरुण गौतम की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, आगे इस फैसले को चुनौती देने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

    ? निष्कर्ष:

    समोदा का यह मामला अब एक मिसाल बन गया है—जहां सच छुपाने की कीमत सत्ता गंवाकर चुकानी पड़ी। पंचायत स्तर से लेकर बड़े चुनावों तक, यह फैसला आने वाले समय में प्रत्याशियों के लिए एक कड़ा संदेश है।

    कोलकाता | विशेष संवाददाता पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई 2026 की तारीख एक युगांतकारी परिवर्तन की गवाह बनी है। राज्य विधानसभा चुनाव के नतीजों ने न केवल सत्ता का समीकरण बदला है, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के 15 साल पुराने अभेद्य दुर्ग को भी ढहा दिया है। भाजपा ने 206 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल कर बंगाल के राजनीतिक मानचित्र पर अपनी ऐतिहासिक उपस्थिति दर्ज कराई है। वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी महज 80 सीटों पर सिमट कर रह गई है।

    भवानीपुर में बड़ा उलटफेर: शुभेंदु बने 'जायंट किलर'

    इस चुनाव का सबसे चौंकाने वाला परिणाम ममता बनर्जी के अपने गढ़ भवानीपुर से आया, जहाँ भाजपा के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें पटखनी देकर यह साबित कर दिया कि बंगाल में सत्ता विरोधी लहर (Anti-Inumbency) कितनी गहरी थी। उत्तर बंगाल से लेकर जंगलमहल तक भगवा लहर ने टीएमसी के संगठनात्मक ढांचे को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है।

    भ्रष्टाचार पर भारी पड़ा परिवर्तन का संकल्प

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चिटफंड मामले और भर्ती घोटालों के गंभीर आरोपों ने जनता के भरोसे को हिलाकर रख दिया था। 92.93% के रिकॉर्ड तोड़ मतदान ने स्पष्ट कर दिया कि बंगाल की जनता नीतिगत स्पष्टता और 'डबल इंजन' सरकार की आकांक्षा रख रही थी। इस जीत का सीधा असर 2029 के लोकसभा चुनावों पर पड़ेगा, जहाँ पूर्वी भारत अब भाजपा के लिए एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरेगा।

    क्या बंगाल को मिलेगी पहली भाजपाई महिला मुख्यमंत्री?

    वर्तमान राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा मुख्यमंत्री के नाम को लेकर है। जहाँ शुभेंदु अधिकारी जीत के सबसे बड़े नायक के रूप में उभरे हैं, वहीं दिल्ली के राजनीतिक गलियारों से एक नई सुगबुगाहट सुनाई दे रही है।

    महिला कार्ड से मास्टरस्ट्रोक की तैयारी: > महिला आरक्षण विधेयक के क्रियान्वयन और देश की आधी आबादी को नेतृत्व देने के संकल्प के बीच, भाजपा के पास पश्चिम बंगाल में किसी महिला चेहरे को मुख्यमंत्री बनाकर देश को एक बड़ा संदेश देने का सुनहरा अवसर है। इस दौड़ में अग्निमित्रा पॉल का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है, जिन्होंने आसनसोल दक्षिण में अपनी पकड़ मजबूत रखी है। यदि भाजपा नेतृत्व किसी महिला पर दांव लगाता है, तो यह 'नारी शक्ति' के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता का सबसे बड़ा वैश्विक विज्ञापन होगा।

    9 मई को शपथ ग्रहण, बाज़ार में उत्साह

    नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह 9 मई 2026 को होने की संभावना है। इस ऐतिहासिक जीत की धमक दलाल स्ट्रीट पर भी सुनाई दी, जहाँ कोलकाता आधारित कंपनियों के शेयरों में भारी उछाल देखा गया। निवेशकों को उम्मीद है कि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होने से बंगाल में औद्योगिक क्रांति का नया अध्याय शुरू होगा।

    मुख्य आकर्षण:

    प्रचंड बहुमत: भाजपा 206 सीटें, टीएमसी 80 सीटें।

    ऐतिहासिक मतदान: बंगाल के इतिहास में पहली बार 92.93% वोटिंग।

    चेहरा कौन? शुभेंदु अधिकारी, अग्निमित्रा पॉल और दिलीप घोष रेस में सबसे आगे।

    बाज़ार का रुख: नीतिगत स्पष्टता की उम्मीद में शेयर बाज़ार में रिकॉर्ड बढ़त।

    कोलकाता/शौर्यपथ।

    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के परिणामों और चुनाव बाद उभरे राजनीतिक तनाव के बीच एक बड़ा संवैधानिक घटनाक्रम सामने आया है। कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टीएस शिवगणनम ने स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) अपीलीय ट्रिब्यूनल के पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने त्यागपत्र में “व्यक्तिगत कारणों” का उल्लेख किया है, लेकिन इस्तीफे के समय और पृष्ठभूमि ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    क्या था SIR ट्रिब्यूनल का उद्देश्य?

    SIR यानी Special Intensive Revision प्रक्रिया के तहत पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण किया गया था। इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। जिन लोगों ने इस कार्रवाई को चुनौती दी, उनकी अपील सुनने के लिए एक विशेष अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किया गया था, जिसकी जिम्मेदारी जस्टिस शिवगणनम संभाल रहे थे।

    90 लाख नाम हटने का दावा, 27 लाख अपीलें

    सूत्रों और चुनावी बहसों में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, SIR प्रक्रिया के दौरान 90 लाख से अधिक नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जबकि लगभग 27 लाख लोगों ने इस निर्णय के खिलाफ अपील दाखिल की। विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर बड़ा प्रहार बताते हुए प्रक्रिया की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठाए थे।

    “चार साल लग जाएंगे” — काम के बोझ पर जताई थी चिंता

    इस्तीफे से पहले जस्टिस शिवगणनम ने कथित रूप से यह चिंता व्यक्त की थी कि जिस गति और तरीके से अपीलों की जांच हो रही है, उस हिसाब से केवल कोलकाता क्षेत्र की अपीलों को निपटाने में ही लगभग चार वर्ष लग सकते हैं। इससे यह संकेत मिला कि ट्रिब्यूनल के सामने मामलों का अत्यधिक बोझ था और पूरी प्रक्रिया प्रशासनिक तथा कानूनी चुनौती बन चुकी थी।

    चुनाव बाद हिंसा के बीच आया इस्तीफा

    यह इस्तीफा ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणामों के बाद कई जिलों से हिंसा, राजनीतिक झड़पों और तनाव की खबरें आ रही हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में एक वरिष्ठ न्यायिक व्यक्ति का इस्तीफा राजनीतिक और संवैधानिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।

    विपक्ष ने उठाए नए सवाल

    विपक्षी दलों का कहना है कि यह इस्तीफा केवल “व्यक्तिगत कारणों” तक सीमित नहीं माना जा सकता। विपक्ष का आरोप है कि यदि लाखों मतदाताओं की अपीलें लंबित हैं और ट्रिब्यूनल प्रमुख स्वयं प्रक्रिया की गति पर सवाल उठा चुके हैं, तो इससे पूरी SIR प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

    कई सामाजिक संगठनों और चुनावी अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी मांग की है कि मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया और अपील निपटान की संपूर्ण व्यवस्था की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए।

    लोकतंत्र और मताधिकार पर बहस तेज

    विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटना और उसके बाद अपीलों का वर्षों तक लंबित रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय हो सकता है। चुनावी पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा को लेकर अब बहस और तेज होने की संभावना है।

    फिलहाल जस्टिस टीएस शिवगणनम के इस्तीफे ने बंगाल की चुनावी राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है, जिसके दूरगामी राजनीतिक और संवैधानिक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।

    शौर्यपथ विशेष विश्लेषण

    भारतीय राजनीति में कई बार ऐसे क्षण आते हैं जब अदालत, राज्यपाल और विधानसभा की संवैधानिक सीमाएं एक-दूसरे से टकराती हुई दिखाई देती हैं। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार का पतन और पश्चिम बंगाल की संभावित संवैधानिक स्थिति को लेकर उठ रहे सवाल इसी बहस के केंद्र में हैं।

    हाल के दिनों में राजनीतिक और सोशल मीडिया मंचों पर यह तुलना तेजी से सामने आई है कि यदि ममता बनर्जी चुनाव परिणामों को चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट जाती हैं, तो क्या उन्हें भी उद्धव ठाकरे जैसी संवैधानिक स्थिति का सामना करना पड़ सकता है? इस प्रश्न को समझने के लिए पहले महाराष्ट्र मामले के सुप्रीम कोर्ट के फैसले और फिर पश्चिम बंगाल की वास्तविक संवैधानिक स्थिति को समझना आवश्यक है।


    उद्धव ठाकरे मामला: सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

    11 मई 2023 को सुप्रीम Court की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने महाराष्ट्र राजनीतिक संकट मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। इस फैसले में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को व्यक्तिगत राहत नहीं मिली, लेकिन अदालत ने कई संवैधानिक टिप्पणियां कीं जो भविष्य की राजनीति के लिए मिसाल बन गईं।

    फैसले के प्रमुख बिंदु

    1. इस्तीफा बना सबसे बड़ा कारण

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट का सामना किए बिना स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया था। इसलिए अदालत उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री पद पर बहाल नहीं कर सकती।

    मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की थी कि यदि ठाकरे इस्तीफा नहीं देते और फ्लोर टेस्ट का सामना करते, तो अदालत स्थिति को पहले जैसी (status quo ante) बहाल करने पर विचार कर सकती थी।

    2. राज्यपाल की भूमिका पर सवाल

    अदालत ने माना कि तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पास ऐसा कोई ठोस संवैधानिक आधार नहीं था जिससे यह सिद्ध हो सके कि उद्धव ठाकरे सरकार ने वास्तव में बहुमत खो दिया था। केवल बागी विधायकों के बयानों के आधार पर फ्लोर टेस्ट बुलाना उचित नहीं माना गया।

    3. शिंदे गुट के व्हिप को लेकर टिप्पणी

    सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष द्वारा शिंदे गुट के व्हिप को मान्यता देने की प्रक्रिया पर भी गंभीर आपत्तियां दर्ज कीं और उसे कानूनसम्मत प्रक्रिया के अनुरूप नहीं माना।

    4. लेकिन सरकार क्यों नहीं गिरी?

    यहीं सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक बिंदु सामने आया। अदालत ने कहा कि चूंकि उद्धव ठाकरे पहले ही इस्तीफा दे चुके थे, इसलिए अदालत के पास उन्हें पुनः बहाल करने का आधार सीमित हो गया। इसी कारण शिंदे-फडणवीस सरकार को तत्काल राहत मिली।


    पश्चिम बंगाल की स्थिति: क्या वास्तव में मुख्यमंत्री का पद स्वतः समाप्त हो जाता है?

    पश्चिम बंगाल विधानसभा के कार्यकाल और चुनावी विवादों को लेकर कई दावे किए जा रहे हैं। लेकिन संवैधानिक स्थिति को सटीक रूप से समझना आवश्यक है।

    विधानसभा का कार्यकाल और मुख्यमंत्री की स्थिति

    संविधान के अनुच्छेद 172 के अनुसार किसी राज्य विधानसभा का सामान्य कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। पांच वर्ष पूर्ण होने पर विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाता है या उसे भंग माना जाता है।

    लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मुख्यमंत्री उसी क्षण स्वतः पदमुक्त हो जाते हैं। भारतीय संसदीय परंपरा में मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद सामान्यतः तब तक पद पर बने रहते हैं जब तक नई सरकार शपथ नहीं ले लेती। इस अवधि में वे कार्यवाहक (caretaker) सरकार के रूप में कार्य करते हैं।

    अर्थात केवल विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाने से मुख्यमंत्री का पद तत्काल शून्य नहीं हो जाता।


    क्या राज्यपाल तुरंत बर्खास्त कर सकते हैं?

    संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार राज्यपाल के पास मुख्यमंत्री को हटाने का अधिकार केवल विशेष परिस्थितियों में होता है, जैसे:

    • मुख्यमंत्री सदन का विश्वास खो दें,
    • बहुमत परीक्षण में असफल हो जाएं,
    • या संवैधानिक प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लंघन हो।

    यदि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो चुका हो और नई विधानसभा के गठन की प्रक्रिया जारी हो, तो सामान्यतः मौजूदा मुख्यमंत्री कार्यवाहक रूप में बने रहते हैं। इसलिए यह कहना कि कार्यकाल समाप्त होते ही मुख्यमंत्री स्वतः बर्खास्त हो जाएंगे, पूरी तरह सटीक संवैधानिक व्याख्या नहीं मानी जाती।

    हाँ, यदि कोई असाधारण संवैधानिक संकट उत्पन्न हो, सरकार प्रशासन चलाने में असमर्थ हो, या चुनाव परिणामों को लेकर ऐसी स्थिति बने जिससे शासन व्यवस्था ठप हो जाए, तब राज्यपाल रिपोर्ट भेज सकते हैं और अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की संभावना बन सकती है। लेकिन यह अंतिम संवैधानिक विकल्प माना जाता है।


    ममता बनर्जी की संभावित कानूनी रणनीति

    राजनीतिक बयानबाजी के बीच ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की ओर से चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

    उनकी ओर से जिन बिंदुओं को उठाया जा रहा है, उनमें शामिल हैं:

    • ईवीएम में कथित तकनीकी गड़बड़ी,
    • बैटरी चार्जिंग प्रतिशत में असामान्य अंतर,
    • मतदान प्रक्रिया में कथित अनियमितताएं,
    • और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल।

    यदि इन आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर होती है, तो अदालत मुख्यतः निम्न प्रश्नों पर विचार कर सकती है:

    1. क्या चुनाव प्रक्रिया में कोई वास्तविक संवैधानिक या तकनीकी त्रुटि हुई?
    2. क्या आरोपों के समर्थन में पर्याप्त प्रमाण हैं?
    3. क्या चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाला कोई ठोस आधार मौजूद है?

    भारतीय न्यायपालिका सामान्यतः चुनाव परिणामों में हस्तक्षेप करते समय अत्यंत सावधानी बरतती है और ठोस प्रमाणों को प्राथमिकता देती है।


    उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी: सबसे बड़ा संवैधानिक अंतर

    यहीं दोनों मामलों के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है।

    मुद्दा उद्धव ठाकरे मामला संभावित ममता बनर्जी स्थिति
    संकट का कारण दल-बदल और बहुमत संकट चुनाव परिणाम विवाद
    मुख्य संवैधानिक प्रश्न फ्लोर टेस्ट की वैधता चुनावी प्रक्रिया की वैधता
    इस्तीफे की भूमिका इस्तीफे से कानूनी राहत सीमित हुई यदि इस्तीफा न दें तो कार्यवाहक भूमिका संभव
    राज्यपाल की भूमिका फ्लोर टेस्ट का आदेश नई सरकार गठन प्रक्रिया
    सुप्रीम कोर्ट का दायरा बहुमत परीक्षण और राज्यपाल की शक्ति चुनावी विवाद और प्रमाणों की जांच

    क्या उद्धव ठाकरे की तरह ममता बनर्जी को भी नुकसान हो सकता है?

    संवैधानिक दृष्टि से सबसे बड़ा सबक यही माना जा रहा है कि किसी भी मुख्यमंत्री के लिए समय से पहले इस्तीफा देना अदालत में उपलब्ध संभावित राहत को सीमित कर सकता है। महाराष्ट्र मामले में यही हुआ था।

    लेकिन पश्चिम बंगाल की परिस्थिति अलग प्रकृति की है क्योंकि वहां मामला बहुमत परीक्षण का नहीं बल्कि चुनाव परिणामों की वैधता और चुनावी प्रक्रिया पर उठे प्रश्नों का हो सकता है।

    यदि कोई मुख्यमंत्री अदालत जाने से पहले इस्तीफा दे देता है, तो व्यावहारिक रूप से उसकी स्थिति कमजोर पड़ सकती है। वहीं यदि वह संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर बने रहते हुए कानूनी चुनौती देता है, तो अदालत के पास स्थिति पर विचार करने का अधिक व्यापक अवसर रहता है।


    निष्कर्ष

    महाराष्ट्र संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीति में संवैधानिक समय-निर्धारण (timing) अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। उद्धव ठाकरे के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की कार्रवाई पर प्रश्न उठाए, लेकिन इस्तीफे ने उनकी संभावित कानूनी वापसी का रास्ता बंद कर दिया।

    पश्चिम बंगाल को लेकर चल रही चर्चाओं में भी यही प्रश्न केंद्र में है कि यदि चुनाव परिणामों को चुनौती दी जाती है, तो संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किस प्रकार होगा। हालांकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी मुख्यमंत्री सामान्यतः कार्यवाहक रूप में बने रह सकते हैं, जब तक नई सरकार का गठन न हो जाए।

    अंततः किसी भी राजनीतिक संकट का समाधान अदालत, संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया—तीनों के संतुलन से ही निकलता है।

    16 जिलों के समाजजन पहुंचे दुर्ग, पटेल चौक पर चक्का जाम… देवालय खोलने और नए अध्यक्ष को भवन सौंपने की मांग

    दुर्ग। केंद्रीय गोंडवाना धमधागढ़ देवालय एवं गोंडवाना भवन को लेकर आदिवासी समाज में लंबे समय से चल रहा विवाद सोमवार को खुलकर सड़क पर दिखाई दिया। समाज के आस्था केंद्र माने जाने वाले इस देवालय में तालाबंदी की कार्रवाई के विरोध में 16 जिलों से पहुंचे समाजजनों ने पहले जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा और बाद में अचानक पटेल चौक पर चक्का जाम कर दिया।

    बताया जा रहा है कि केंद्रीय गोंडवाना धमधागढ़ देवालय गोंडवाना समाज का एक प्रमुख धार्मिक एवं सामाजिक केंद्र है, जहां वर्षों से समाज के धार्मिक, सांस्कृतिक और संगठनात्मक कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं। पिछले लगभग 20 वर्षों तक संस्था के अध्यक्ष रहे एम.डी. ठाकुर हाल ही में हुए चुनाव में पराजित हो गए थे, जिसके बाद कमलेश ध्रुव नए अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

    हालांकि चुनाव संपन्न होने के बाद भी भवन और देवालय के संचालन को लेकर विवाद समाप्त नहीं हो सका। समाज के लोगों का आरोप है कि कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक पेचीदगियों का हवाला देकर गोंडवाना भवन एवं देवालय में तालाबंदी कर दी गई, जिससे समाज की धार्मिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।

    इसी मुद्दे को लेकर बड़ी संख्या में समाजजन जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और देवालय को तत्काल खोलने तथा भवन का संचालन नव-निर्वाचित अध्यक्ष को सौंपने की मांग करते हुए ज्ञापन सौंपा।

    स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब समस्या का तत्काल समाधान नहीं निकलता देख समाज के लोगों ने अचानक पटेल चौक पर चक्का जाम कर दिया। देखते ही देखते क्षेत्र में यातायात प्रभावित हो गया और पुलिस प्रशासन को मोर्चा संभालना पड़ा।

    पुलिस एवं जिला प्रशासन के अधिकारी लगातार समाज के प्रमुख लोगों से चर्चा कर स्थिति को सामान्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं। प्रशासन की ओर से समाज के प्रतिनिधियों के एक समूह को चर्चा के लिए कलेक्टर कार्यालय बुलाया गया है।

    समाचार लिखे जाने तक प्रशासन और समाज के प्रतिनिधियों के बीच वार्ता जारी थी, जबकि पटेल चौक पर प्रदर्शन और चक्का जाम की स्थिति बनी हुई थी।

    समाज के लोगों में पूर्व अध्यक्ष एम.डी. ठाकुर के प्रति नाराजगी स्पष्ट रूप से दिखाई दी। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि समाज की आस्था से जुड़े इस केंद्र को विवाद और तालेबंदी से मुक्त कर नए निर्वाचित नेतृत्व को सौंपा जाना चाहिए, ताकि समाज की गतिविधियां सामान्य रूप से संचालित हो सकें।

    फिलहाल पूरे मामले पर जिला प्रशासन की नजर बनी हुई है और सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि वार्ता के बाद समाधान किस दिशा में आगे बढ़ता है।

    मृणेन्द्र चौबे

    राजनांदगांव/शौर्यपथ /

    शासकीय शिक्षक को “नक्सली” कहे जाने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। जिला राजपूत समाज एवं राष्ट्रीय करणी सेना के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर आरोपी सुरेश जैन के खिलाफ तत्काल आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग की है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि समय पर कार्रवाई नहीं हुई तो उग्र आंदोलन किया जाएगा।

    ज्ञापन में बताया गया कि स्टेशन पारा स्थित शासकीय मिडिल स्कूल में पदस्थ शिक्षक सतीश सिंह, डी.पी.एड. प्रशिक्षण पूर्ण कर कार्यभार ग्रहण करने पहुंचे थे। इस दौरान वहां मौजूद बाहरी व्यक्ति सुरेश जैन ने कथित रूप से शासकीय कार्य में बाधा डालते हुए उन्हें धमकाया और स्वयं को पत्रकार बताते हुए दबाव बनाने का प्रयास किया। घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग भी होने का दावा किया गया है। प्रतिनिधिमंडल का आरोप है कि सोशल मीडिया ग्रुप में भी सुरेश जैन द्वारा सतीश सिंह को “नक्सली” और “आतंक फैलाने वाला” कहकर आपत्तिजनक टिप्पणी की गई, जिससे न केवल संबंधित शिक्षक बल्कि पूरे समाज की भावना आहत हुई है।

    ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि सतीश सिंह नक्सल हिंसा से पीड़ित परिवार से आते हैं और खेल के क्षेत्र में राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं। ऐसे में उनके खिलाफ इस तरह की टिप्पणी को गंभीर और निंदनीय बताया गया है। समाज के पदाधिकारियों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही यह भी पूछा गया है कि बाहरी व्यक्ति को विद्यालय परिसर में हस्तक्षेप की अनुमति कैसे दी गई। राजपूत समाज ने स्पष्ट किया है कि यदि प्रशासन ने जल्द कार्रवाई नहीं की, तो समाज सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने के लिए बाध्य होगा, जिसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।

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