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June 02, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

कोलकाता / शौर्यपथ / पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की 30 वर्षीय एक विवाहित महिला को पेट के निचले हिस्से में दर्द की शिकायत होने के बाद अस्पताल जाने पर पता चला कि वास्तव में वह ‘पुरुष'' है और उसके अंडकोष में कैंसर है. महिला पिछले नौ साल से विवाहित है और कुछ महीने पहले पेट में दर्द की शिकायत लेकर शहर के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अस्पताल गई थी, जहां डॉ. अनुपम दत्ता और डॉ सौमन दास द्वारा चिकित्सकीय परीक्षण करने पर महिला की “असली पहचान” सामने आई.
डॉ दत्ता ने कहा, “देखने में वह महिला है. आवाज, स्तन, सामान्य जननांग इत्यादि सब कुछ महिला के हैं. हालांकि, उसके शरीर में जन्म से ही गर्भाशय और अंडाशय नहीं है. उसे कभी माहवारी भी नहीं हुई.” उन्होंने कहा कि यह दुर्लभ स्थिति है और अमूमन 22,000 लोगों में से एक में पाई जाती है. आश्चर्यजनक रूप से उक्त महिला की 28 वर्षीय बहन की जांच में भी यही स्थिति सामने आई है, जिसमें व्यक्ति जेनेटिकली पुरुष होता है लेकिन उसके शरीर के सभी बाह्य अंग महिला के होते हैं. डॉ दत्ता ने कहा कि उक्त महिला की कीमोथेरेपी की जा रही है और उसकी हालत स्थिर है.

उन्होंने कहा, “वह महिला की तरह बड़ी हुई है और एक पुरुष के साथ लगभग एक दशक तक विवाहित जीवन जी चुकी है. इस समय हम मरीज और उसके पति की काउंसलिंग कर रहे हैं और समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि आगे भी वे उसी प्रकार जीवन बिताएं जैसे अब तक रहे हैं.” डॉक्टर ने कहा कि मरीज की दो अन्य रिश्तेदारों को भी अतीत में यही समस्या रही है, इसलिए यह जीन जनित समस्या जान पड़ती है.

 

नई दिल्ली / शौर्यपथ / थिम्पू भूटान ने मीडिया में आई उन खबरों को शुक्रवार को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें दावा किया गया था कि उसने असम में किसानों को सिंचाई के लिए जल की आपूर्ति रोक दी है. भूटान ने इन खबरों को पूरी तरह ‘‘बेबुनियाद'' बताया और कहा कि यह भारत के साथ गलतफहमी पैदा करने का निहित स्वार्थों से किया गया ‘‘सोचा समझा प्रयास'' है.
भूटान की शाही सरकार के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि 24 जून 2020 से भारत में प्रकाशित कई समाचार लेखों में आरोप लगाया गया है कि भूटान ने उन जल आपूर्ति माध्यमों को अवरुद्ध कर दिया है जो असम में बक्सा तथा उदलगुरी जिलों में भारतीय किसानों तक सिंचाई का जल पहुंचाते हैं.

बयान में कहा गया, ‘‘यह आरोप तकलीफदेह है और विदेश मंत्रालय स्पष्ट करना चाहता है कि समाचार आलेख पूरी तरह से निराधार हैं क्योंकि इस समय जल प्रवाह को रोकने का कोई कारण है ही नहीं.'' इसमें आगे कहा गया, ‘‘भ्रामक जानकारी फैलाने और भूटान तथा असम के मित्रवत लोगों के बीच गलतफहमी पैदा करने के लिए यह निहित स्वार्थों से किया गया सोचा-समझा प्रयास है.''

 

जीवन सैली /शौर्यपथ / लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती।
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती॥
नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है।
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है॥
मन का साहस रगों में हिम्मत भरता है।
चढ़ कर गिरना, गिर कर चढ़ना न अखरता है॥
मेहनत उसकी बेकार हर बार नहीं होती।
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती॥

हिन्दी के प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता की ये पंक्तियां "कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती" इसे आज भी हम जीवन में बहुत कुछ सीख सकते हैँ। परीक्षा के रूप में आई जीवन की पहली सीढ़ी पर मिली असफल हमें डरा नहीं सकती। कई बार देख गया कि 10वीं, 12वीं जैसी छोटी क्लासेस की परीक्षाओं में भी असफल होने या मन मुताबिक परिणाम न आने पर कई छात्र निराश हो जाते हैं। उन्हें लगने लगता है कि अब वह कुछ नहीं कर पाएंगे लेकिन ऐसे वक्त यदि हरिवंश राय बच्चन इस कविता जैसा पढ़ लें और अपने जीवन में अपनाने की कोशिया करें तो शायद आप अपने को पहले से और ज्यादा सशक्त महसूस करेंगे।

इसलिए देर क्या, छोटी सी प्रेरणा के साथ फिर शुरू करें बड़े लक्ष्य का एक मजबूत प्रयास।

पैरेंट्स की भी जिम्मेदारी: बोर्ड रिजल्ट किसी प्रतियोगी परीक्षा में आपकी लाड़ली/लाड़ले को आकांक्षा के अनुरूप परिणाम नहीं मिलता तो आपकी भी जिम्मेदारी है कि उसे गलतियों से सबक लेकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें न कि उसकी हमेशा कमियां निकालते रहें। ध्यान रखें कि बच्चों को ऐसा कुछ न कहें जिनसे उनका मनोबल टूटे।

 

शौर्यपथ / पहली जुलाई से सनातन धर्मावलंबियों के शादी-ब्याह के शुभ मुहूर्त पर चातुर्मास के चलते चार महीने का ब्रेक लग जायेगा। पहली जुलाई को हरिशयन एकादशी है। मान्यता है कि इस एकादशी से प्रभु श्री हरि शयन को चले जाते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास शुरू हो जाता है।

चातुर्मास में सनातन धर्मावलंबियों के शादी ब्याह के शुभ मुहूर्त नहीं बनते हैं। हालांकि बनारसी पंचांगों में हरिशयन एकादशी से पहले 26 से 30 जून तक शादी-ब्याह के पांच शुभ मुहूर्त बचे हैं। दूसरी ओर मिथिला पंचागों के हिसाब से शादी-ब्याह के शुभ मुहूर्त 17 जून को ही समाप्त हो गये हैं। बनारसी पंचांग के हिसाब से चातुर्मास के बाद 25 नवंबर से शादी-ब्याह के शुभ मुहूर्त शुरू होंगे। वहीं मिथिला पंचांगों के मुताबिक 1 दिसंबर से शुभ विवाह के मुहूर्त शुरू होंगे।

वैदिक ज्योतिषी धीरेंद्र कुमार तिवारी ने महावीर और हृषीकेश पंचांगों के हिसाब से बताया कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष में 30 जून दशमी तिथि तक ही शादी-ब्याह के शुभ मुहूर्त हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी बुधवार एक जुलाई को हरिशयन और चातुर्मास शुरू हो जाएगा। हरिशयनी एकादशी के बाद अगला विवाह विवाह मुहूर्त 25 नवंबर से शुरू हो रहा है। हरि प्रबोधिनी एकादशी भी 25 नवंबर को है। इसी दिन से अगले विवाह मुहूर्त शुरू हो रहे हैं।

मिथिला पंचांग में इस वर्ष अब केवल छह शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य डा.राजनाथ झा ने मिथिला पंचांगों के हवाले से बताया कि इस वर्ष अब केवल छह शुभ मुहूर्त बचे हैं। मिथिला पंचांगों में चातुर्मास के समाप्त होने के बाद नवंबर माह में एक भी शुभ विवाह मुहूर्त नहीं हैं। हालांकि 25 नवंबर कोही चातुर्मास समाप्त हो जाता है। जबकि दिसंबर माह में केवल छह शुभ विवाह के मुहूर्त हैं 14 दिसंबर तक।

इस वर्ष अब 17 शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य पीके युग ने बनारसी पंचांगों के हवाले से बताया कि इस वर्ष शादी ब्याह के अब 17 शुभ मुहूर्त ही बचे हैं। इसमें जून में पांच,नवंबर में दो और दिसंबर में 10 शुभ विवाह मुहूर्त हैं। इस वर्ष चातुर्मास समाप्त होने के बाद 25 नवंबर से 14 दिसंबर तक केवल 12 शुभ विवाह मुहूर्त हैं।

जून में शुभ विवाह के मुहूर्त
(महावीर और ऋषिकेश पंचांग, बनारस के अनुसार)
शुक्रवार 26 जून, शनिवार 27 जून,रविवार 28 जून
सोमवार 29 जून, मंगलवार 30 जून.

नवंबर में विवाह मुहूर्त
(बनारसी पंचांगों के अनुसार)
25 नवंबर, 30 नवंबर

दिसंबर में विवाह मुहूर्त (बनारसी पंचांग)
1, 2 , 6 ,7 , 8 ,9 ,10 ,11,13 ,14

मिथिला पंचांग के अनुसार ,शुभ विवाह मुहूर्त:
दिसंबर में :2, 6, 7, 10, 11, 14

 

मनोरंजन / शौर्यपथ / आज बॉलीवुड में अपनी एक अलग पहचान बना चुके अभिनेता अर्जुन कपूर अपना 35वां जन्मदिन मना रहे हैं। अर्जुन कपूर का जन्‍म 26 जून 1985 को मुंबई में हुआ था। आज अर्जुन उस मुकाम पर पहुंचे हुए हैं कि उनकी फैन फॉलोइंग बहुत है। लड़कियां उनकी दीवानी है। उनकी पर्सनैलिटी देखकर लड़कियां दिल दे बैठती हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि अर्जुन के भी लाइफ में कई ऐसे उतार चढ़ाव सामने आए, जिसे लेकर अर्जुन लोगों से दूरियां बनानी शुरु कर दी थी, लेकिन उन्होंने बाद में बिगड़ते हुए हालातों को सुधारा और अपनी मंजिल तय कर आगे बढ़ें। आज अर्जुन के जन्मदिन के अवसर हम 'इश्कजादे' एक्टर के पर्सनल लाइफ से जुड़ी कुछ अनकही बातों के बारें बताएं, जिसे शायद ही आप जानते हो...।
अर्जुन ने साल 2012 में आई फिल्म इशकज़ादे से अपने करियर की शुरुआत की थी, जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। बॉलीवुड में बतौर एक्टर आने से पहले अर्जुन असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया था। वह 'कल हो ना हो' में निखिल आडवाणी को असिस्ट कर चुके हैं। इसके साथ ही 'सलाम-ए-इश्क', 'वॉन्टेड' और 'नो एंट्री' में भी अर्जुन ने असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया था। अर्जुन ने अब तक इशकज़ादे, औरंगजेब, गुंडे, 2 स्टेट्स, फाइंडिंग फैनी, तेवर, की एंड का और हाफ गर्लफ्रैंड, 'इंडियाज मोस्ट वॉन्टेड', जैसी फिल्मों में काम किया है। अब अर्जुन की आने वाली फिल्म पानीपत है, जिसकी शूटिंग शुरू गई है।
बता दें कि, अर्जुन अपनी मां मोना कपूर के बेहद करीब थे। उन्होंने अपनी मां के लिए दाएं हाथ की कलाई पर 'मां' नाम का टैटू भी बनवा रखा है। अर्जुन ने साल 2012 में फिल्म 'इश्कजादे' से बॉलीवुड में डेब्यू किया था। इस फिल्म में अर्जुन के अपोजिट एक्ट्रेस परिणीति चोपड़ा थी। इस फिल्म के लिए अर्जुन को बेस्ट मेल डेब्यू का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला था। लेकिन, फिल्म रिलीज से पहले ही कैंसर की बीमारी के चलते अर्जुन की मां का निधन हो गया था। वे अपने बेटे की पहली फिल्म नहीं देख पाई थीं। अर्जुन को इस बात की बेहद अफसोस रहता है।

ऐसी खबरें भी सामने आई थी कि पिता की दूसरी शादी से अर्जुन बोनी-श्रीदेवी से काफी नाराज रहते थे। लेकिन 24 फरवरी 2018 श्रीदेवी के अचानक निधन के बाद अर्जुन के विचारों में काफी बदलाव आया। खासकर पिता बोनी के प्रति और अपनी दोनों सौतेली बहनों जाह्नवी और खुशी कपूर को लेकर अर्जुन काफी इमोशनल हो गए। इतना ही नहीं श्रीदेवी के निधन के बाद जाह्नवी और खुशी कपूर का पूरा ध्यान रखने लगे। अब अर्जुन कभी भी अपनी बहनों के बारे में कुछ गलत नहीं सुनना पसंद नहीं करते हैं। खुशी जान्हवी को लेकर अर्जुन काफी प्रोटेक्टिव हैं।
एक इंटरव्यू के दौरान अर्जुन ने जाह्नवी और खुशी के साथ अपने रिश्ते पर कहा था कि 'जब श्रीदेवी के निधन की खबर मिली तब मैं पंजाब में था। मैंने अपनी मौसी और बहन तो तुरंत फोन किया। मैंने वही किया जो मुझे उस समय सही लगा। मेरी मां भी यही चाहती कि मैं अपने पापा और परिवार का साथ दूं।' अर्जुन ये भी कहा था कि 'मैं एक अच्छा बेटा और भाई बन सकता हूं तो क्यों ना बनूं। मेरे लिए तो अच्छा है कि मुझे 2 और बहनें मिल गईं। वहीं अपने पिता की मदद करके मुझे बहुत राहत भी मिली।' इतना ही नहीं जाह्नवी-खुशी के साथ अपने रिश्ते पर अर्जुन ने बताया था कि हम लोग एक दूसरे के साथ कम्फर्टेबल हैं। हमारे रिश्ते की शुरुआत अच्छे से हुई। मुझे डर था कि ज्यादा बात करने से नजर न लगे। आज हम एक दूसरे से कम्फर्टेबल होकर बात करते हैं। मैं और अंशुला हमेशा उनके साथ हैं।'

 

दुर्ग /शौर्यपथ / शहर में पीडीएस के राशन की कालाबाजारी थमने का नाम ही नहीं ले रही है . शहर की ऐसी कई दुकाने होंगी जहां पीडीएस का राशन मिल जाता है किन्तु इस पर अभी तक खाद्य विभाग द्वारा कही कोई बड़ी कार्यवाही की गयी हो कहि नजर नहीं आता . अभी हाल में ही पीडीएस चावल की कालाबाजारी पर कार्यवाही जिला पुलिस द्वारा हुई वही लॉक डाउन के समय भी ऐसी ही कार्यवाही भी जिला पुलिस की सक्रियता से हुई इन सब बातो में ख़ास बात यह है कि पीडीएस के चावल आखिर खुले बाज़ार में कैसे आ जाते है इतनी बड़ी मात्र में . राशन कार्ड धारक के पास महीने में ३५ किलो चावल ही मिलता है अगर वो उसे बेचता है तो खरीददार मौजूद रहते है तभी बेच सकता है . जबकि पीडीएस के चलाव की खरीदी बिक्री खुले बाज़ार में प्रतिबंधित है बावजूद इसके यह व्यापार जोर पर है और जिम्मेदार विभाग मौन है .
इस मामलो में अगर मय सबुत शिकायत की जाए तो जिला खाद्य अधिकारी और उसकी जाँच टीम तुरंत खानापूर्ति में लग जाती है और राशन दूकान वाले अपने इस दो नंबर के व्यापार में फिर सक्रीय हो जाते है . अगर किसी मामले को संज्ञान में लेकर जाँच की बात कही जाती है तो अधिकारियों और उनकी टीम द्वारा समय का अभाव / व्यवस्तता का बहना बनाया जाता है . जबकि खाद्य अधिकारियों का कार्य ही है कि कालाबाजारी पर रोक लगाए किन्तु शायद ही ऐसा कोई मामला आया हो जिसमे खाद्य अधिकारी द्वारा कोई कार्यवाही की गयी हो .
राशन दूकान संचालको की चोरी पर विभाग का मौन समर्थन ?
ऐसे ही एक मामला आया था जनवरी २०२० में जिसमे राशन दूकान संचालिका द्वारा फर्जी तरीके से फोटो के द्वारा हितग्राही का राशन का आहरण कर लिया गया था जिस पर हितग्राही द्वारा जब संचालिका से इस पर बात की तो संचालिका द्वारा हितग्राही से दुर्व्यवहार कर भगा दिया गया था तब हितग्राही ने वार्ड पार्षद भारद्वाज की मदद से मामले की शिकायत जिलाधीश को की उपरान्त खाद्य विभाग हरकत में आया और फिर सम्बंधित अधिकारी श्रीमती नेहा तिवारी सोसायटी पहुंची एवं जाँच का जिम्मा नायब तहसीलदार सत्येन्द्र शुल्क के द्वारा किया गया . जाँच में ये स्पस्ट हो गया कि संचालिका द्वारा फर्जी तरीके से राशन का आहरण किया गया . ऐसा नहीं कि एक ही फोटो से ऐसा कार्य हुआ है . अगर तकनिकी रूप से देखा जाए तो हितग्राही के अंगूठे का निशाँन तीन बार में भी मैच नहीं होता तब फोटो का आप्शन खुलता है और इस कार्य में तकरीबन २ मिनट का समय लग ही जाता है किन्तु वार्ड नम्बर ११ के राशन दूकान जिसकी संचालिका मिश्रा है के दूकान में शासकीय दस्तावेजो की माने तो १० मिनट के समय में १२-१४ हितग्राहियों के राशन का आहरण हुआ है जो कि जाँच का विषय है .
मामले को शौर्यपथ ने उठाया तब हुई जाँच
मामले का पता चलते ही शौर्यपथ समाचार पत्र द्वारा प्रमुखता से उठाया गया था और खाद्य अधिकारी से कम समय में ज्यादा हितग्राहियों के राशन आहरण के मुद्दे पर बात की गयी थी तब अधिकारी द्वारा मामले की जाँच की बात कही गयी थी .
मिलीभगत की शंका ...
शिकायतकर्ता और वार्ड पार्षद द्वारा मामले की प्रगति पर लगातार संपर्क किया जाता रहा किन्तु अधिकारियों द्वारा जाँच जारी की बात कही जाती रही फिर लॉक डाउन का काल में सब कार्य ठन्डे बस्ते में चला गया . जब एक बार फिर वार्ड पार्षद द्वारा मामले की जानकारी ली गयी तो कार्यालय से बताया गया कि जाँच पूरी हो गयी और ५००० रूपये का जुर्माना लगाया गया जांच कब पूरी हुई इस बारे में गोल मोल जवाब मिलता रहा फिर विभाग से जवाब मिला कि मार्च में ही जांच और जुर्माने की कार्यवाही हो गयी . सबसे बड़ा सवाल यह है कि मामले की लगातार जानकारी मांगने पर आखिर सम्बंधित अधिकारियों द्वारा क्यों अँधेरे में रखा जाता रहा . फर्जी तरीके से हितग्राहियों के राशन का आहरण करने वाले संचालक के पुराने रिकार्ड की जाँच क्यों नहीं की जा रही . इस बारे में अधिकारी श्रीमती नेहा तिवारी का कहना है कि आप जिसकी जिसकी शिकायत करेंगे जांच की जायेगी . तो क्या सिर्फ शिकायत का इंतज़ार कर रहे है अधिकारी क्या मामले के संदेहास्पद स्थिति में स्वयं संज्ञान लेने से क्यों पल्ला झाड रहे है क्या इस तरह एक स्वस्थ कार्य पद्दति की कल्पना की जा सकती है अधिकारियों से जो मामले के संदेहास्पद होने के बाद भी शिकायत का इंतज़ार करते हुए समय बिता रहे है क्या ऐसे ही छत्तीसगढ़ी मुखिया के गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ को साकार करेंगे या फिर शासन को गुमराह करते हुए कार्य को अंजाम देते रहेंगे ...

नजरिया / शौर्यपथ / भारत और चीन के बीच 15 जून की झड़प ने आखिरकार हिमालयी सीमा पर शांति के चार दशक के रिकॉर्ड को तोड़ दिया। चीन द्वारा हड़पी गई जमीन को खाली कराने से लेकर शीत युद्ध के आह्वान तक प्रतिक्रियाएं तीखी रही हैं। साल 1950 से न सही, इधर दो दशकों से चीन की बढ़त की चर्चा चल रही है। भारत-चीन संबंधों ने बहुत कुछ देखा है, जुड़ाव से लेकर वर्ष 1959 के नाटकीय अलगाव तक। 1962 में एक छोटा, पर घातक युद्ध हुआ और उसके बाद के दशकों में न युद्ध-न शांति की स्थिति रही। आखिरकार 1988 में दोनों देशों को कूटनीतिक सफलता मिली और संबंधों में एक सलीका बना, जिसके तहत सीमा विवादों को सुलझाए बिना आगे बढ़ने की राह बनी। मूल आधार यह था कि शांतिपूर्ण दायरे में संबंधों में विकास की रफ्तार रहेगी, मगर 15 जून की झड़प से दोनों देशों के बीच रही सहमति पर चोट पड़ी है।
स्पष्ट है, रिश्ते का अगला चरण एक शांतिपूर्ण सीमा पर निर्भर है, मगर इसका अर्थ सिर्फ यथास्थिति की बहाली नहीं होनी चाहिए। यदि यथास्थिति से हमारा आशय दो परमाणु संपन्न बड़े देशों से है, जो फिर से आक्रामक कवायद शुरू कर रहे हैं, तो यह स्थिति ज्यादा नहीं टिकने वाली। अब समीक्षा और एक नए संघर्ष-प्रबंधन ढांचे को लागू करने का समय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस विवाद को क्यों नहीं सुलझा सकते? चीनी विद्वान यूं सन ने समाधान में बाधा डालने वाली प्रमुख समस्या का एक सारांश पेश किया, ‘चीन के साथ सीमा समाधान में भारत जो रियायतें चाहता है, वे कठोर प्रतिबद्धताएं हैं, जिन्हें बाद में पलटा नहीं जा सकता। इसके विपरीत, चीन अमेरिका-चीनी रणनीतिक प्रतिस्पद्र्धा में भारत की तटस्थता चाहता है, जो अल्पकालिक और आसानी से समायोज्य है।’
रणनीतिक इरादों में अनिश्चितता की इस समस्या का निकट भविष्य में कोई कारगर समाधान नहीं है। हालांकि नए मानदंडों के जरिए सीमा स्थिर करना दोनों देशों के हित में संभव है। सबसे विवादास्पद है सीमा पर अनेक स्थानों पर बफर जोन में रचनात्मक दृष्टि रखना और हिंसक झड़पों से बचने के लिए समन्वय के साथ गश्ती की व्यवस्था करना। नई व्यवस्था बनाने के लिए यह जरूरी है। उत्साह या बड़बोलेपन में कई लोगों ने भारत-चीन संबंधों के टूटने की घोषणा तक कर दी। हमें ऐसे अतिरेक या आक्रामकता से बचना है। दोनों देशों के बीच रिश्ते कोई अचानक मुश्किल में नहीं पड़े हैं, इसके संकेत कुछ समय से स्पष्ट मिल रहे थे।
वास्तव में, हमारी चीन नीति असम्मत रही है। बेल्ट रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) से नौसेना सुरक्षा और 5-जी की उच्च तकनीक तक, दिल्ली अपनी बयानबाजी व कार्यों में मुखर रही है। यहां तक कि भू-राजनीतिक क्षेत्र में अमेरिका को जोड़ने में भी भारत नाकाम ही हुआ है। एशिया में भी दिल्ली चीन के पड़ोसियों को भविष्य की बाधा के रूप में आंकती रही है। पारंपरिक सहयोगी रूस के साथ भी हाल के वर्षों में सरकार की नीति पुरानी भू-रणनीति की याद दिलाती है। हमारे नीति-निर्माताओं की इस बात के लिए आलोचना की जा सकती है कि वे विश्वसनीय रणनीति के बिना ही चीन के संदर्भ में प्रतिस्पद्र्धात्मक कदम उठाते रहे। नई दिल्ली की असली नाकामी यह है कि व्यापक विदेश नीति के ढांचे में उसकी नीतिगत कथनी और करनी मेल नहीं खा रही हैं। चीन के साथ निरंतर जुड़ाव बहुध्रुवीय दुनिया में अग्रणी शक्ति के रूप में उभरने की एक भव्य रणनीति का हिस्सा था। इसकी बजाय, दिल्ली ने खुद को खाली खजाने व अप्रत्याशित साझीदारों के साथ चीन के खिलाफ कर लिया है। इतिहास बताता है, जब बड़ी ताकतों के साथ भारत के सकारात्मक व सशक्त संबंध थे, तब उसे चीन गंभीरता से लेता था। इतिहास यह भी दर्शाता है कि भारत के लिए शक्ति का संतुलन किस हद तक फायदेमंद हो सकता है।
भारत-अमेरिका और भारत-सोवियत (रूस) संबंधों ने भारत-चीन संबंधों को स्थिर रखने का काम किया और तभी भारत अपने हितों को पहचानने व आगे बढ़ाने में मजबूती से बना रहा। ऐसा तभी हुआ, जब स्थितियां भारत के अनुकूल थीं और वह चीन के साथ परस्पर लाभप्रद संबंधों को आकार देने में सक्षम था। तभी अंतरराष्ट्रीय माहौल का चतुराई से लाभ उठाने और एक परिष्कृत चीन नीति बनाए रखने में भी भारत ज्यादा सक्षम था।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) जोरावर दौलत सिंह, फेलो, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, दिल्ली

 

सम्पादकीय / शौर्यपथ / देश के जिस चमकदार हिस्से को आदर्श बनकर चमकना था, वहां कोरोना संक्रमण का सबसे ज्यादा फैल जाना दुखद और चिंताजनक है। किसी भी देश की राजधानी में आबादी ज्यादा होती है, लेकिन इसके बावजूद उसे खुद को तमाम कमियों से बचना-बचाना पड़ता है, ताकि उस पर विश्वास कायम रहे। राजनीति से परे भी राजधानी का अपना महत्व है और यह महत्व वहां मौजूद सुविधाओं-संसाधनों की वजह से ही आकार लेता है। यह दुखद तथ्य है कि दिल्ली ने कोरोना के मामलों में उस मुंबई को पछाड़ दिया है, जो विगत लगभग दो महीने से सबसे आगे चल रही थी। मुंबई में जहां रोज आ रहे मामलों की संख्या में भारी कमी आई है, वहीं दिल्ली में एक दिन में 3,788 मामलों का सामने आना चिंता को बहुत बढ़ा देता है। यह दिल्ली के लिए पहले से कहीं ज्यादा ईमानदारी और मुस्तैदी से सोचने-करने का वक्त है। आने वाले दिनों में कई देशों से हवाई उड़ानें शुरू हो जाएंगी और एक राजधानी के रूप में दिल्ली की जो व्यापक जिम्मेदारियां हैं, उनसे बचना नामुमकिन है। कोरोना की चेन तोड़ने के लिए सरकार को युद्ध स्तर पर प्रयास करने चाहिए। अर्थव्यवस्था के लिए लॉकडाउन खुलना जरूरी है, पर ऐसा न हो कि संक्रमण इतनी तेजी से फैले कि अनलॉक होने का नुकसान ज्यादा और फायदे कम हो जाएं। उधर, लॉकडाउन खोलने के बाद महानगर चेन्नई की भी हालत खराब हो गई थी, तो वहां फिर 12 दिन का संपूर्ण लॉकडाउन लगाना पड़ा है। कोलकाता में भी राहत नहीं है, पश्चिम बंगाल सरकार ने लॉकडाउन को 31 जुलाई तक के लिए बढ़ा दिया है। दिल्ली में अभी लॉकडाउन का इरादा किसी नेता ने नहीं जताया है, पर संक्रमण को नहीं संभाला गया, तो कोरोना व लॉकडाउन की राजनीति शुरू करने का इंतजार करने वाले भी कम नहीं होंगे। राजनीति का अपना मिजाज है, जिसमें एक दोषी या आरोपी खोजा जाता है, लेकिन कोरोना के समय ऐसा कोई प्रयास करने की बजाय सकारात्मक ढंग से सोचना चाहिए।
अव्वल तो दिल्ली में परस्पर समन्वय बढ़ाना सबसे जरूरी है। निर्णायक नेताओं को रोष, राजनीति छोड़कर फैसले लेने होंगे। जनता देख रही है कि कौन क्या कर रहा है। अत: नेताओं को अपनी सामूहिक जिम्मेदारी का एहसास गहराई से होना चाहिए। मरीज घर में रहे या अस्पताल आए, जैसे विषय पर विवाद का समय नहीं है। बहुत से लोग होंगे, जिनके घर में जगह या सुविधाएं नहीं होंगी, तो उनका अस्पताल आना विवशता है। अत: दोनों ही तरह कर सुविधाओं के साथ सरकार को चलना होगा। यह मरीजों के अनुकूल राह निकालने का समय है।
बहरहाल, दिल्ली सरकार ने घर-घर जांच का जो बीड़ा उठाया है, वह सराहनीय है। 15,000 से ज्यादा टीमें बन रही हैं, जिनमें 55 हजार से ज्यादा चिकित्सा सेवक शामिल होंगे, जो 34 लाख से अधिक घरों में जाकर लोगों की जांच करेंगे। ऐसे बड़े अभियान के समय लोगों की भी जिम्मेदारी है कि वे स्वयं आगे बढ़कर जांच कराएं। संभव है, घर-घर जांच से कोरोना के मामलों की संख्या बढ़ जाए, पर तब भी 6 जुलाई तक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और उसके बाद की रणनीतियों के साथ भी दिल्ली को तैयार रहना चाहिए। इस तैयारी की बुनियाद निर्णायकों के परस्पर समन्वय पर निर्भर है और जो थोड़े-बहुत मतभेद रह भी जाएं, तो उनका असर जांच या चिकित्सा टीमों पर नहीं पड़ना चाहिए।

 

मेलबॉक्स /शौर्यपथ / स्वामी रामदेव द्वारा पेश कोरोना की दवा पर हंगामा मचा है। संभव है, योग गुरु ने इस प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन किया हो, लेकिन नियमों की शर्तें पूरी भी कराई जा सकती थीं। बहरहाल, सरकार ने दवाई के प्रचार-प्रसार पर रोक लगा दी है, लेकिन यदि यह दवा कारगर मिलती है, तो इसे स्वीकृति दी जानी चाहिए, अन्यथा इस पर प्रतिबंध लगा देना ही उचित होगा। निस्संदेह, आयुर्वेद भारत की पुरानी चिकित्सा पद्धति है। आज भी दूरदराज के गांवों में देसी हकीम और वैद्य ही ग्रामीणों का इलाज करते हैं। इतिहास भी साक्षी है कि हमारे वैद्य हर बीमारी का इलाज करने में सक्षम थे। मगर एलोपैथी के सामने यह पुरातन विद्या नेपथ्य में चली गई। देखा जाए, तो कोई भी पैथी अपने आप में संपूर्ण नहीं है। कोरोना के मामले में भी एलोपैथी अब तक विफल साबित हुई है। ऐसे में, यदि आयुर्वेद में आशा की किरण जगी है, तो उस पर मंथन जरूरी है, ताकि मानव समाज को कोरोना से राहत मिल सके।
रणजीत वर्मा, फरीदाबाद

फैसले पर आपत्ति
अमेरिकी राष्ट्रपति के पास कुछ विशेष अधिकार होते हैं। इस अधिकार का प्रयोग करके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरे देश के कामगारों को रोजगार के नाम पर मिलने वाली खास वीजा दिसंबर तक निलंबित कर दी है। राष्ट्रपति का कहना है कि इससे अमेरिका में रह रहे लोगों को रोजगार मिलने में सुविधा होगी। यह बात सच है कि वहां के लोगों को इसका फायदा मिलेगा, लेकिन ट्रंप कहीं न कहीं इस बात को नजरंदाज कर रहे हैं कि अमेरिका को यदि आज वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र माना जाता है, तो इसमें दक्षिण-पूर्व एशिया (खासकर भारत) से आने वाले लोगों का बड़ा योगदान है। इसी वजह से कई लोग इस फैसले पर आपत्ति जता रहे हैं।
जीवन वर्मा, परसाबाद, कोडरमा

थमती खेल गतिविधियां
कोविड-19 महामारी का प्रकोप थमता नहीं दिख रहा है। दुनिया भर में संक्रमित मरीजों की संख्या एक करोड़ तक पहुंचने वाली है। इसकी चपेट में राजनेता और फिल्म जगत के लोगों के साथ-साथ खिलाड़ी भी आने लगे हैं। पाकिस्तान के कई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खिलाड़ियों के साथ ही टेनिस दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी नोवाक जोकोविच भी कोरोना से संक्रमित पाए गए हैं। समूचा विश्व इस महामारी से पिछले तीन महीनों से जूझ रहा है। खेल गतिविधियों को फिर से शुरू करने की उम्मीद जगी ही थी कि कुछ खिलाड़ियों के संक्रमित होने की खबर आ गई। इससे हाल-फिलहाल में खेल गतिविधियां थमी हुई ही नजर आ रही हैं।
शिवम सिंह, बिंदकी, उत्तर प्रदेश

बढ़े दाम से हलकान
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम घटने के बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। इसका खामियाजा सिर्फ गरीब और निम्न मध्यमवर्ग को भुगतना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि पहली बार डीजल की कीमत पेट्रोल से ज्यादा हो गई। डीजल की कीमत के बढ़ने का मतलब है, सब कुछ महंगा हो जाना। एक तरफ कोरोना का कहर लगातार जारी है, बेरोजगारी चरम पर है, लोगों से आय के साधन छिन रहे हैं और दूसरी तरफ पेट्रो पदार्थों के दाम बढ़ाकर महंगाई बढ़ाई जा रही है। इससे तो यही जाहिर होता है कि सरकारें अपना खजाना भरने के लिए आम आदमी की जेब काट रही हैं। ऐसी स्थिति में जरूरी है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों पर रोक लगाकर लोगों को राहत दी जाए। इसके साथ ही, जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के मूल्य में वृद्धि नहीं होती, अपने राजस्व बढ़ाने के लिए सरकार इस रास्ते का इस्तेमाल न करे। पेट्रोल-डीजल के दामों में जल्द ही कमी लानी चाहिए, ताकि गरीब तबके के लोगों को राहत मिल सके।
संजय कुमार सिंह
धनबाद, झारखंड

 

ओपिनियन / शौर्यपथ / देश में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या पांच लाख के करीब पहुंच गई है। सुर्खियों में दिल्ली है, जहां 70 हजार से अधिक मामले सामने आ चुके हैं और 2,365 मौत की खबर है। इस तरह, अब राष्ट्रीय राजधानी संक्रमण के मामले में मुंबई से आगे निकल चुकी है, जहां 68 हजार से ज्यादा मरीज हैं और मौत का आंकड़ा 3,900 को छू रहा है। दिल्ली में हुई यह बढ़ोतरी चिंता की बात है, और इसीलिए यहां सुधारात्मक उपायों की दरकार है। इसकी जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि केंद्र ने कहा है कि देश में प्रति लाख आबादी में एक मरीज की मौत हो रही है और राष्ट्रीय मृत्यु-दर वैश्विक औसत 6.04 के मुकाबले बहुत कम है, लेकिन मुंबई, बेंगलुरु और दिल्ली जैसे शहरों में मृत्यु-दर परेशानी की वजह बनी हुई है।
इस महामारी को लेकर भारत का अनुभव यह भी है कि बडे़ शहर इसकी चपेट में ज्यादा आए हैं। विशेषकर पुरानी बसाहट के शहरों और झुग्गी-झोपड़ियों की घनी आबादी में संक्रमण अपेक्षाकृत अधिक फैल रहा है। जाहिर है, इसने शहरी स्वास्थ्य तंत्र, और खासतौर से नगरपालिका सेवाओं को बेपरदा कर दिया है, जबकि बड़े शहरों में ऐसी सेवाएं अमूमन मजबूत मानी जाती हैं। इससे दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों की चुनौतियां समझी जा सकती हैं। उनको संक्रमण का विस्तार होने पर कहीं अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने काफी संजीदगी से काम किया है, जिसका प्रमाण ‘धारावी मॉडल’ की सफलता है। बीएमसी ने ‘केरल मॉडल’ के दो प्रमुख उपायों पर खासा ध्यान दिया- तकनीकी क्षमता और विश्वास। यहां तक कि जब मरीजों की संख्या में कमी आने लगी, तब भी संक्रमित इलाकों में फीवर क्लीनिक और संस्थागत क्वारंटीन जैसी सुविधाएं बढ़ाई जाती रहीं। इसके अलावा, निजी चिकित्सकों को भी जिम्मेदारी दी गई, घर-घर सर्वे किए गए, ऑक्सीमीटर व मोबाइल वैन समय पर उपलब्ध कराए गए। इन सबके साथ-साथ उसने लोगों का दिल जीतने के लिए असाधारण और अभिनव तरीकों का भी इस्तेमाल किया।
सवाल यह है कि दिल्ली में आखिर गलती कहां हुई, जबकि मुख्यमंत्री खुद इसमें नेतृत्व करते दिख रहे थे? निस्संदेह, दिल्ली सरकार ने सक्रिय शुरुआत की थी और ऐसा लग रहा था कि स्थिति संभाल ली जाएगी। देश के अन्य राज्यों की तुलना में यहां सबसे अधिक टेस्ट किए जा रहे थे, मगर पिछले चार हफ्तों से इसमें तेजी से कमी आने लगी। दिल्ली में निजी जांच केंद्रों को काफी पहले लाइसेंस दे दिया गया था और ऐसा महसूस हुआ कि अस्पताल की सेवाएं भी मजबूत हो गई हैं। कंटेनमेंट जोन की व्यवस्था भी बेहतर काम कर रही थी, पर अब लगता है कि दिन बीतने के साथ-साथ सरकार संक्रमित मरीजों के संपर्क में आने वालों को खोजने में शिथिल पड़ती गई।
इसी तरह, अस्पतालों में बेड की उपलब्धता को लेकर विरोधाभासी रिपोर्टें आती रहीं। निजी क्षेत्र के अस्पतालों का प्रबंधन, खासकर उनके कीमती इलाज को घटाने के प्रयास काफी आलोचना के बाद किए गए। टेस्टिंग की राज्य सरकार की अपनी नई गाइडलाइन सुर्खियों में रही, जिसमें केवल लक्षण वाले संदिग्धों की जांच के निर्देश दिए गए थे। दिल्ली सरकार पर कोविड-19 से मरने वाले लोगों की संख्या छिपाने के भी आरोप लगे, और अस्पताल में लाश के करीब ही संक्रमित मरीजों के इलाज के दहलाने वाले दृश्य भी सामने आए। सुप्रीम कोर्ट तक ने दिल्ली सरकार के बारे में प्रतिकूल टिप्पणियां कीं और राष्ट्रीय राजधानी में स्थिति को ‘भयावह और दयनीय’ बताया। हालांकि, अब दिल्ली 10,000 बेड के अस्थाई अस्पताल बनाने, घर-घर सर्वे करने और बहुतायत में स्क्रिनिंग के लिए कमर कसती हुई दिख रही है।
सवाल है कि आखिर हालात को पटरी पर कैसे लाया जाए? निश्चित ही कोविड-19 एक अभूतपूर्व महामारी है और इसे संभालना कोई सरल बात नहीं है। मगर हमारे देश में ही कई मॉडल सफल भी हुए हैं। हालांकि, सवाल मॉडल का नहीं, बल्कि पूरी संजीदगी के साथ नियमों के पालन का है, क्योंकि वही मॉडल सफल होते हैं, जिन्हें गंभीरता से जमीन पर उतारा जाता है।
इस काम में ‘इन्सिडेंट मैनेजमेंट’ यानी घटना प्रबंधन कारगर है, जो पिछली घटनाओं में हुई गलतियों से सबक लेकर तैयार किया जाता है। कोविड-19 के संदर्भ में, महामारी विज्ञानियों की योग्यता और उनके कौशल का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। रोकथाम के उपायों को अमली जामा पहनाने के ये उपाय तब भी किए जा सकते हैं, जब विषाणुजनित महामारी के बारे में बहुत जानकारी उपलब्ध न हो और उससे लड़ने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण, बचाव व नियंत्रण के उपायों को सुधारने, संसाधनों में इजाफा करने, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने, बाह्य-संपर्क तेज करने जैसे अतिरिक्त कदम उठाने की दरकार हो। इस तंत्र में कमांड सरंचना काफी मायने रखती है, और इसके लिए महामारी विज्ञानियों को खासतौर से प्रशिक्षित किया जाता है। मगर मुश्किल यह है कि अपने देश में इस काम के लिए अमूमन नौकरशाहों पर भरोसा किया जाता है।
एक बात और। दिल्ली में केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों की तमाम एजेंसियां सक्रिय हैं। उनमें कई तरह के सियासी और अन्य मतभेद कायम हैं। मगर इस शहर ने हैजा, प्लेग, डेंगू, सार्स जैसी पिछली महामारियों का बखूबी सामना किया है। इसने काफी अरसे पहले एक सफल पोलियो उन्मूलन अभियान भी शुरू किया था, जबकि उस समय देश में इसका कोई ठोस मॉडल नहीं था। यह स्थिति तब थी, जब यहां की विभिन्न एजेंसियों में राजनीतिक व अन्य तरह के मतभेद होते रहते थे और केंद्र व दिल्ली के संबंध इतने ही जटिल थे।
स्वास्थ्य-देखभाल और सूचना-संचार प्रणाली में आज काफी सुधार हुआ है, इसलिए कोविड-19 के मोर्चे पर दिल्ली की विफलता त्रासद है। यहां पूर्व में सफलता इसलिए मिलती रही, क्योंकि तब केंद्र, राज्य व स्थानीय निकायों के बीच तालमेल बन जाता था और स्थानीय निकायों द्वारा पोषित मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य-तंत्र का फायदा तब की सरकारों को मिला करता था। आज स्थानीय निकायों की ढांचागत कमजोरी और ‘इन्सिडेंट मैनेजमेंट सिस्टम’ की विफलता का नतीजा साफ-साफ दिख रहा है। तो क्या हम फिसल रहे हैं? इसका जवाब तो वक्त के पास है, लेकिन यदि हम समन्वय की बुनियादी सोच पर नहीं लौटे, तो हमें शायद ही कोई बचा सकेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) राजीव दासगुप्ता, प्रोफेसर (कम्युनिटी हेल्थ) जेएनयू

 

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