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धर्म संसार /शौर्यपर्थ / आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष त्रयोदशी के दिन माता पार्वती को समर्पित जया-पार्वती व्रत किया जाता है। विशेष रूप से महिलाओं द्वारा किए जाने वाले इस व्रत के प्रभाव से अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान प्राप्त होता है। अविवाहित लड़कियों द्वारा इस व्रत के रहने से शीघ्र ही विवाह होता है और भरा पूरा परिवार मिलता है। सुखमय जीवन के लिए विवाहित स्त्रियों को यह व्रत अवश्य रखना चाहिए। इस पावन व्रत का पुण्य वट सावित्री व्रत के समान माना जाता है। इस व्रत को विजया पार्वती व्रत भी कहा जाता है।
मान्यताओं के अनुसार इस व्रत का रहस्य भगवान विष्णु ने मां लक्ष्मी को बताया था। इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की विधि विधान से पूजा अर्चना करें। मां पार्वती का ध्यान कर सुख-सौभाग्य और गृह शांति के लिए सच्चे मन से प्रार्थना करें। घर के मंदिर में भगवान शिव-माता पार्वती की मूर्ति स्थापित करें। इस व्रत में नमक का सेवन पूरी तरह से वर्जित माना जाता है। व्रत में गेहूं का आटा, सब्जियां भी नहीं खानी चाहिए। व्रत के दौरान फलाहार कर सकते हैं। इस व्रत के प्रभाव से संतान की प्राप्ति होती है। श्रद्धापूर्वक जया पार्वती व्रत का विधि-विधान से पालन करने से माता पार्वती प्रसन्न होती हैं और हर मनोकामना पूर्ण करती हैं। व्रत समाप्ति के एक रात पहले रात्रि जागरण करना चाहिए। इसे जयापार्वती जागरण कहते हैं।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / कहते हैं आप जीवन के किसी भी कठिन दौर से क्यों न गुजर रहे हो लेकिन आपको संभालने के लिए उम्मीद की एक किरण ही काफी है। जैसे, आपका मूड कितना भी खराब क्यों न हो लेकिन कुछ विचार या छोटी-छोटी बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर हमारी उदासी हट जाती है और हम सकारात्मकता से भर जाते हैं। एक नजर डालते हैं ऐसे ही ऊर्जावान विचारों पर जो जीवन की किसी भी तरह की निराशा हावी होने पर आपको सकारात्मकता से भर देगी-
आपकी कल्पना ही आपकी सीमा है
कहते हैं आपको जब तक कोई नहीं रोक सकता जब तक कि आप अपनी सीमा निर्धारित न कर लें। ऐसे में आपको अपनी कल्पनाओं में हमेशा कुछ बड़ा सोचना है, जिससे कि आपमें कुछ अच्छा करने और आगे बढ़ने की ललक बने रहे।
छोटी-छोटी चीजें आपके अच्छे दिन लाती हैं
आज जो काम आपको छोटा लग रहा है, वो एक दिन आपको दुनिया भर में पहचान दिलाएगा।ऐसे में छोटे-छोटे प्रयासों को बिल्कुल बंद न करें। हमेशा जीवन की छोटी-छोटी चीजों को पूरा करते हुए बड़े अर्थ साधें।
संघर्ष में अपनी ताकत तलाशें
आप जीवन में संघर्षों को परेशानियां नहीं बल्कि अपनी ताकत तलाशने के मौकों के रूप में देंखे। आप पाएंगे कि हर संघर्ष को पार करने के बाद आपका व्यक्तित्व काफी अच्छा हो जाएगा।
बीते हुए कल को आज पर हावी न होने दें
आपको बीते हुए कल को आज पर हावी नहीं होने देना है। हरिवंशराय बच्चन की कविता ‘जो बीत गई वो बात गई’ पर अमल करते हुए नए सिरे से हर दिन जीवन की नई शुरुआत करें।
चिकन या मटन बिरयानी तो आपने कई बार खाई होगी, अब अपनी बिरयानी डिश में कुछ नई रेसिपीज को जोडऩा चाहते हैं, तो आप फिश बिरयानी भी ट्राई कर सकते हैं। आइए, जानते हैं इसकी रेसिपी-
सामग्री :
मछली 750 ग्राम,
बासमती चावल 500 ग्राम (30 मिनट तक भीगे हुए),
दही– 01 कप (फेंटा हुआ),
प्याज 04 (बारीक कटा हुआ),
हरी मिर्च 06 (बारीक कटे हुए),
हरी धनिया 01 गड्डी (कटी हुई),
नींबू का रस 01 छोटा चम्मच,
अदरक-लहसुन पेस्ट 02 छोटे चम्मच,
तेल आवश्यकतानुसार।
विधि :
फिश बिरयानी बनाने के लिए सबसे पहले मछली को अच्छी तरह से साफ करके धो लें। उसके बाद आधा दही एक बाउल में निकालें और उसमें नींबू का रस और अदरक लहसुन का पेस्ट मिला लें। तैयार मिश्रण को मछलियों के ऊपर डाल कर उसे अच्छी तरह से लपेट लें और ढक कर रख दें।
अब भीगे हुए चावल को धो कर एक बर्तन में निकाल लें। उसमें जरूरत भर का पानी और थोड़ा सा नमक मिलाएं और उसे 75 त्न तक पका लें।
एक कड़ाही में थोड़ा सा तेल डाल कर उसे गर्म करें। तेल गर्म होने पर उसमें प्याज डालें और सुनहरा होने तक भून लें। इसके बाद कड़ाही में टमाटर और बचा हुआ दही डालें और पांच मिनट तक पका लें।
जब टमाटर नरम हो जाए, उसमें मछली के पीस और हरी मिर्च डाल दें और आंच को धीमी करके चलाते हुए पकाएं। जब मछली अच्छी तरह से सिक जाए, कड़ाही को गैस से उतार कर अलग रख दें।
अब एक पैन लेकर उसे गैस पर धीमी आंच पर रखें। पैन में सबसे पहले एक तिहाई पका हुआ चावल डालें। उसके ऊपर से आधी मछली और आधी धनिया की पत्ती डालें और बराबर फैला दें। फिर उसके ऊपर से एक तिहाई चावल की लेयर बना कर डाल दें।
अब चावल के ऊपर बची हुई मछली डाल कर ऊपर से बचे हुए चावल की लेयर लगा दें। अब पैन को ढक कर लगभग 15 मिनट तक पकाएं उसके बाद बिरयानी को अच्छी तरह से चला कर मिक्स कर लें और गैस को बंद कर दें।
आपकी आपकी बिरयानी तैयार है। बस इसे हरी धनिया से गार्निश करें और अचार अथवा चटनी के साथ गर्मा-गरम परोसें।
सेहत /शौर्यपथ / कब्ज एक छोटा-सा शब्द है लेकिन जिन लोगों को अक्सर कब्ज की समस्या रहती है, वो बेहतर तरीके से जानते हैं कि यह किस तरह आपकी लाइफ डिस्टर्ब करती है। पेट साफ न होने से शारीरिक परेशानियों के साथ कई स्किन प्रॉब्लम्स भी हो जाती हैं। ऐसे में आपको अपना ख्याल रखने के लिए अपनी कुछ आदतों में सुधार करना चाहिए। कुछ ऐसी आदते होती हैं जिसकी वजह से आपको कब्ज की परेशानी होती रहती है। कब्ज की बात करें, तो आम कब्ज से लेकर गंभीर तरह की कब्ज की बीमारी इसमें शामिल है. जैसे कभी-कभार होने वाला कब्ज, क्रॉनिक कॉन्स्टिपेशन (कब्ज बहुत ज्यादा बढ़ जाने पर), यात्रा या उम्र से संबंधित कब्ज। कब्ज में हमारी आंतें मल को छोड़ नहीं पातीं। कब्ज होने के आम कारण हैं-
खानपान
खानपान में किसी भी तरह का बदलाव कब्ज का कारण बन सकता है, जैसे अचानक बहुत ज्यादा तैलीय खाना खाने या वजन घटाने के लिए खाने पर नियंत्रण करने की वजह से भी कब्ज हो जाता है। इसके अतिरिक्त यदि आप बहुत ज्यादा वसायुक्त चीजें पसंद करते हैं या शराब और कॉफी पीते हैं तो भी कब्ज के शिकार हो सकते हैं।
कम पानी पीना
कुछ लोग बहुत कम पानी पीते हैं। ऐसे लोग मानते हैं कि दिन में दो गिलास पानी पी लें तो भी उनका काम चल जाएगा, लेकिन इससे हमारे पाचन तंत्र और शरीर की जरूरतें पूरी नहीं होतीं।
व्यायाम
क्या आप रोजाना कसरत करते हैं? रोजाना न सही, सप्ताह में चार दिन तो करते होंगे। नहीं? पाचन तंत्र के बिगडऩे या कब्ज होने की यह सबसे बड़ी वजह है। शारीरिक व्यायाम के अभाव में हमारा मेटाबॉलिज्म खराब हो जाता है। मेटाबॉलिज्म के कमजोर पड़ते ही हमारी पाचन क्रिया गड़बड़ हो जाती है।
दवाएं
कुछ दवाओं के सेवन से भी कब्जियत हो जाती है। ज्यादातर मामले पेन किलर्स की वजह से देखने को मिले हैं। कुछ विटामिन और आयरन की खुराक से भी यह समस्या हो जाती है। ऐसे में डॉक्टर से राय लेकर आप इन दवाओं के साथ स्टूल सॉफ्टनर दवाएं ले सकते हैं।
यह है उपचार
नीबू पानी
नीबू हमारे शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है। अगर कभी कब्ज हो जाए तो एक गिलास गर्म पानी में एक नीबू का रस और शहद मिलाएं और पी लें।
दूध और दही
कब्ज की समस्या को दूर करने के लिए पेट में अच्छे बैक्टीरिया का भी होना जरूरी है। सादे दही से आपको प्रोबायोटिक मिलेगा, इसलिए आप दिन में एक से दो कप दही जरूर खायें। इसके अलावा यदि बहुत परेशान हैं तो एक गिलास दूध में एक से दो चम्मच घी मिला कर रात को सोते समय पिएं, लाभ होगा।
आयुर्वेद
सोने से पहले दो या तीन त्रिफला टैबलेट गर्म पानी के साथ लें। त्रिफला हरड़, बहेड़ा और आंवले से बना होता है। ये तीनों पेट के लिए लाभकारी हैं। त्रिफला रात में अपना काम शुरू कर देता है।
खाने में फाइबर
एक दिन में एक महिला को औसतन 25 ग्राम फाइबर की जरूरत होती है, वहीं एक पुरुष को 30 से 35 ग्राम फाइबर की आवश्यकता होती है। अपने पाचन तंत्र को दोबारा ट्रैक पर लाने के लिए आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आप हर दिन अपनी जरूरत के अनुसार फाइबर की खुराक ले रहे हैं।
खेल / शौर्यपथ / कोरोना वायरस काल या इसके बाद क्रिकेट में कोई हाई फाइव्स, हग्स, हेड का एक-दूसरे रब करना नहीं होगा। अब केवल कोहनी और स्माइल से ही एक-दूसरे से संपर्क करना होगा और सेलिब्रेशन मनाना होगा। हाल ही में इंग्लैंड के अभ्यास सत्र में टीम स्टोक्स और टीम बटलर के बीच हुए मैच में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। न्यूजीलैंड में चोटिल होने के बाद पहली बार मैदान में लौटे तेज गेंदबाज जेम्स एंडरसन ने विकेट सेलिब्रेशन टीममेट से कोहनी से कोहनी टकराकर किया।
कोरोना वायरस महामारी के दो माह बाद शुरू हुए फुटबॉल में भी कोहनी से कोहनी टकराकर खुशी मनाने की नई अभिव्यक्ति शुरू हुई। क्रिकेट में सेलिब्रेशन अब कैसे होंगे यदि इसमें कोई संदेह है तो बुधवार के इंग्लैंड के अभ्यास सत्र को देख सकते हैं। इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के बीच तीन टेस्ट मैचों की सीरीज तीन माह के बाद शुरू होने वाली है। यह सीरीज 8 जुलाई से खेली जाएगी। इससे पहले इंग्लैंड और वेस्टइंडीज की टीमों ने अलग-अलग प्रैक्टिस मैच खेला।
इंग्लैंड क्रिकेट ने अपने ऑफिशियल टि्वटर हैंडल पर एक वीडियो शेयर किया है। इसमें जेम्स एंडरसन जो डेनले का विकेट लेने के बाद कोहनी से कोहनी टकराकर विकेट सेलिब्रेट कर रहे हैं। विकेटकीपर बेन फोक्स हाईफाइव के लिए स्वभावतः अपना हाथ ऊपर उठा रहे हैं। यह मैच इंग्लैंड के ट्रेनिंग दल को दो टीमों में बांटकर कराया जा रहा है।
टीम स्टोक्स ने टॉस जीतकर पहले फील्डिंग करने का फैसला किया था। टीम स्टोक्स के लिए खेलते हुए एंडरसन ने 18 ओवर में 49 रन देकर 2 विकेट लिए। एंडरसन को बार-बार सैनेटाइजर का प्रयोग करते भी देखा जा सकता है।
टीम बटलर ने तीन दिवसीय अभ्यास मैच में टीम बटलर ने अपनी पहली पारी 90 ओवर में पांच विकेट पर 287 रन बनाकर घोषित कर दी थी। जेम्स ब्रासी और डेन लारेंस ने अर्द्धशतक बनाए। बेन स्टोक्स के नेतृत्व में इंग्लैंड की टीम पहले टेस्ट में साउथम्पटन में वेस्टइंडीज का सामना 8 जुलाई को करेगी। नए नियमों के साथ यह पहला इंटरनेशनल टेस्ट मैच होगा। इसमें गेंद को चमकाने के लिए मुंह की लार का प्रयोग नहीं किया जाएगा।
टीम बटलर की तरफ से ओपनर रोरी बर्न्स ने 21, ओपनर जेम्स ब्रेसी ने 85, जो डेनले ने 48, डैन लॉरेंस ने 58, ओली पोप ने 25 और कप्तान जोस बटलर ने नाबाद 24 रन बनाए। टीम स्टोक्स की तरफ से जेम्स एंडरसन और क्रेग ओवर्टन ने दो-दो विकेट लिए।
शौर्यपथ / बॉलीवुड इंडस्ट्री की मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान के निधन से मजोरंजन जगत को तगड़ा झटका लगा है। उन्हें सांस लेने की तकलीफ के चलते 20 जून को मुंबई के बांद्रा में स्थित गुरु नानक हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, लेकिन डॉक्टर्स की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें नहीं बचाया जा सका। सरोज को शुक्रवार सुबह मलाड के कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। इस दौरान उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए उनके परिवारवाले और कुछ रिश्तेदार ही मौजूद थे। सरोज खान के प्रति शोक प्रकट करने के लिए प्रार्थना सभा तीन दिन बाद होगी।
सरोज खान डायबिटीज और इससे संबंधित बीमारियों से जूझ रही थीं। इसके चलते उन्होंने बीच में अपने काम से एक लंबा ब्रेक लिया था। साल 2019 में सरोज ने 'कलंक' और 'मणिकर्णिकाः द क्वीन ऑफ झांसी' में एक-एक गाने को कोरियॉग्राफ किया था। 'कलंक' में उन्होंने 'तबाह हो गए' गाने को कोरियोग्राफ किया था, जिसमें माधुरी दीक्षित ने बेहतरीन डांस कर सभी का दिल जीत लिया था।
गौरतलब है कि सरोज खान पिछले 40 साल में दो हजार से भी ज्यादा गानों को कोरियोग्राफ किया था। उन्होंने फिल्म देवदास के गाने 'डोला रे डोला', 'श्रृंगारम' के सारे गाने, 'जब वी मेट' के 'ये इश्क हाये' के लिए नैशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। फिल्म 'गुरु', 'देवदास', 'खलनायक', 'हम दिल दे चुके सनम', 'बेटा', 'सैलाब', 'चालबाज' और 'तेजाब' के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है।
सरोज के निजी जीवन की बात करें उन्होंने 13 साल की उम्र में इस्लाम धर्म कबूल कर 43 साल के बी. सोहनलाल से शादी कर ली थी। दोनों की उम्र में 30 साल का फासला था। सरोज ने हालांकि सोहनलाल की ये दूसरी शादी थी। पहली शादी से उनके चार बच्चे थे। एक इंटरव्यू में सरोज ने बताया था कि मैंने अपनी मर्जी से इस्लाम धर्म कबूल किया था। उस वक्त मुझसे कई लोगों ने पूछा कि मुझ पर कोई दबाव तो नहीं है लेकिन ऐसा नहीं था। मुझे इस्लाम धर्म से प्रेरणा मिलती है।
निधन से भावुक हुईं माधुरी दीक्षित, ट्वीट कर कहा- मैं बिखर गई हूं
साल 2020 में बॉलीवुड के कई सितारे दुनिया को अलविदा कहकर चले गए। शुक्रवार को कोरियोग्राफर सरोज खान का निधन हो गया है। वह काफी समय से बीमारी चल रही थीं। हाल ही में उन्हें बांद्रा स्थित हॉस्पिटल में ए़डमिट कराया गया था, जहां पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से बॉलीवुड को गहरा सदमा लगा है। 2000 गानों को कोरियोग्राफ कर चुकी सरोज को बॉलीवुड सेलेब्स श्रद्धांजलि दे रहे हैं। अब एक्ट्रेस माधुरी दीक्षित ने अपना दुख बयां किया है।
माधुरी ने ट्विटर अकाउंट पर एक पोस्ट शेयर किया है। उन्होंने लिखा, ''मैं दोस्त और गुरु सरोज खान के निधन से बिखर गई हूं। डांस में अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने में मेरी मदद करने के लिए मैं हमेशा उनकी आभारी रहूंगी। दुनिया ने आज एक अद्भुत प्रतिभाशाली इंसान को खो दिया। मैं आपको बहुत मिस करूंगी। परिवार के प्रति संवेदना प्रकट करती हूं।''
इसके अलावा जेनेलिया डिसूजा, रितेश देशमुख, मनोज बाजपेयी, सुनील ग्रोवर, निमरत कौर ने सरोज खान को याद करते हुए इमोशनल ट्वीट किया है। मशहूर कोरियोग्राफर रेमो डिसूजा ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर सरोज खान के साथ अपनी कुछ तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा, ''मैं बहुत खुशनसीब हूं कि मुझे आपके साथ डांस करने का मौका मिला। मुझे इतना सबकुछ सिखाने के लिए आपको दिल से शुक्रिया। आपको हमेशा याद किया जाएगा। आप हमेशा हमारे दिल में रहेंगी।
रितेश देशमुख ने ट्वीट किया कि रेस्ट इन पीस सरोज खान जी। यह नुकसान बॉलीवुड और फिल्म प्रेमियों के लिए अकल्पनीय है। मुझे फिल्म अलादीन में आपने द्वारा कोरियोग्राफ किए जाने का सुख मिला। जेनेलिया डिसूजा ने लिखा, आरआईपी सरोज जी। मैं भगवान की शुक्रगुजार हूं कि मुझे आपके द्वारा कोरियोग्राफ किए जाने का मौका मिला। भगवान इस दुख की घड़ी में आपके परिवार को ताकत दें। वहीं, एक्टर सुनील ग्रोवर ने ट्वीट करते हुए लिखा, ''सरोज खान जी की निधन की खबर से शॉक्ड हूं। उनके जाने से एक युग का अंत हो गया। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।
नजरिया / शौर्यपथ / हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और बीमा नियामक ‘आईआरडीएआई’ से पूछा है कि मानसिक रूप से बीमार लोगों को स्वास्थ्य बीमा के दायरे में क्यों नहीं लाया गया? कोर्ट में याचिका दायर करके कहा गया है कि मानसिक स्वास्थ्य को ‘स्वास्थ्य बीमा’ के दायरे में न रखा जाना संविधान के समता मूलक व भेदभाव न करने संबंधी कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन है। गौरतलब है कि मानसिक स्वास्थ्य कानून 2017 की धारा 21(4) में बीमा पॉलिसी में मानसिक रोगों को भी शामिल किए जाने का प्रावधान है।
जिस तरह से पिछले दो-तीन दशकों में मानसिक बीमारियों में वृद्धि हुई है, उसे देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि इनसे जूझ रहे लोगों को आर्थिक संरक्षण मिले, ताकि वे बेहतर तरीके से अपना इलाज करा सकें। दरअसल, इस समस्या के मूल में वह मिथक है, जिसे शायद बीमा कंपनियां भी अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करती हैं कि मानसिक बीमारियां लाइलाज होती हैं। इसी से ये उपेक्षा का शिकार रही हैं। अभी हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने विश्व-समुदाय से आग्रह किया है कि ‘बढ़ते दबावों का सामना कर रहे लोगों की रक्षा करने के लिए और ज्यादा प्रयास करने होंगे। उनके मुताबिक, तथाकथित सामाजिक कलंक और भेदभाव का शिकार होने से अक्सर यह पीड़ा और ज्यादा गहरी हो जाती है।’
यह एक कटु सत्य है कि मानसिक रोगों को सामाजिक कलंक के रूप में देखे जाने के कारण ज्यादातर लोग अपनी मानसिक परेशानियों में पेशेवर मदद हासिल करने से परहेज करते हैं। मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ने के पीछे यह एक बड़ी वजह है। दिसंबर 2019 में लांसेट द्वारा जारी एक रिपोर्ट में भारत में 1990 से 2017 तक मानसिक स्वास्थ्य को लेकर क्या स्थिति रही, उसका विश्लेषण किया गया है। लांसेट के आंकड़ों के अनुसार, 2017 तक भारत में हर सात में से एक व्यक्ति किसी न किसी तरह के मानसिक रोग से पीड़ित है।
भारत में मानसिक रोगों में सबसे ज्यादा भागीदारी अवसाद की हैै। यूं तो विश्व भर में मानसिक रोगियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, लेकिन पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों के उलट हमारे यहां मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता और चेतावनी की व्यवस्थाओं का अभाव है। वैसे इस बीमारी के कारणों को लेकर कई अध्ययन हुए हैं। फ्रांस की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्सेल्स सेंट क्वेंटिन एन वैलेंस के शोधकर्ताओं ने इंग्लैंड में 16 से 69 साल के 25,000 लोगों पर किए गए अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि वहां आम तौर पर होने वाली दिमागी परेशानी का संबंध अकेलेपन से है। विश्व भर में दिमागी बीमारियों को लेकर किए गए अमूमन सभी शोध इसी निष्कर्ष के इर्द-गिर्द घूमते हैं। भारत की भी यही स्थिति है। ऐसे में, विचार का विषय यह है कि उन रास्तों को ढूंढ़ा जाए, जिनसे इस समस्या का हल मिल सके।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग 7.5 प्रतिशत आबादी मानसिक रोगों से जूझ रही है। बावजूद इसके यहां मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए धन का आवंटन बहुत कम है। भारत में हर दस लाख आबादी पर सिर्फ तीन मनोचिकित्सक हैं। मनोवैज्ञानिक सलाहकारों का अनुपात तो इससे भी कम है। आज जब तरह-तरह का दबाव हमारे ऊपर बढ़ रहा है, हम इस रोग की उपेक्षा नहीं कर सकते।
इस संबंध में हम जिम्बाब्वे का मॉडल अपना सकते हैं। जिम्बाब्वे के मनोवैज्ञानिक डिक्सन चिबांदा ने अवसादग्रस्त लोगों की मदद के लिए नायाब तरीका निकाला। मनोचिकित्सकों की कमी का तोड़ निकालने के लिए उन्होंने साल 2006 से आज तक 400 बुजुर्ग महिलाओं को प्रशिक्षण देकर एक ‘ग्रैंड मदर्स क्लब’ का गठन किया है। जब डिक्सन ने पाया कि अस्पतालों में जगह कम है, तो उन्होंने इसका हल ‘फ्रेंडशिप बेंच’ के रूप में निकाला। सार्वजनिक पार्कों में ऐसी बेंचें लगाई गईं, जहां ये बुजुर्ग महिलाएं लोगों से उनकी भाषा में बात करती हैं। डिक्सन का यह प्रयास असरदार साबित हुआ। आज दादियों-नानियों की मदद से अवसाद के इलाज के कार्यक्रम कई देशों में चलाए जा रहे हैं। मानसिक बीमारी हमारे लिए भी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इसे लेकर गहन चिंतन व प्रयासों की जरूरत है। इस प्रयास में ‘फे्रंडशिप बेंच’ एक बेहतर विकल्प हो सकती है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)ऋतु सारस्वत, समाजशास्त्री
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / विश्व मंच पर चीन की भारत विरोधी हरकतें जितनी पुरानी हैं, उतनी ही दुखद और निंदनीय भी। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर चीन फिर एक बार इस साजिश में लगा था कि पाकिस्तान के पक्ष में और परोक्ष रूप से भारत के खिलाफ एक निंदा प्रस्ताव पारित हो जाए। पाकिस्तान की ओर से चीन द्वारा पेश प्रस्ताव में विगत दिनों कराची में हुए आतंकी हमले के लिए भारत को इशारों में ही घेरने की साजिश थी। यह प्रस्ताव खुद चीन ने तैयार किया था। वैसे तो किसी भी आतंकी हमले की संयुक्त राष्ट्र के मंच से निंदा सही है, लेकिन इस मंच का नाजायज फायदा किसी को उठाने नहीं देना चाहिए। खुशी की बात है, भारत के समर्थक देश सजग थे और पहले जर्मनी ने इस प्रस्ताव को रोका और फिर अमेरिका भी आगे आया, इससे चुपचाप इस प्रस्ताव को पारित करा ले जाने की चीनी-पाकिस्तानी साजिश नाकाम हो गई। भारत के लिए चिंता की बात यह थी कि पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्री और उसके बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी कराची आतंकी हमले के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं। इसलिए ऐसे आतंकी हमले की निंदा का चुपचाप प्रस्ताव करना और उसके लिए किसी निर्दोष देश की ओर इशारा करना चीन जैसे कथित वीटो पावर प्राप्त देश को कतई शोभा नहीं देता।
बहरहाल, चीन की ऐसी हरकतों के प्रति केवल भारत ही नहीं, अब दुनिया के अन्य महत्वपूर्ण देश भी सजग हो गए हैं। दुनिया में कहीं भी आतंकी हमला हैवानियत से कम नहीं, लेकिन ऐसे किसी हमले के जरिए कूटनीति और राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश भी हैवानियत से कम नहीं है। अपने यहां जायज आवाज उठाने वालों को भी आजीवन करावास देने वाला चीन न जाने कैसे पाकिस्तानी आतंकियों का खुलकर बचाव करता रहा है? जमीनी रूप से आतंकवाद के पोषण में पाकिस्तान की हरसंभव मदद करने से लेकर संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की पक्षधरता तक चीन का कोई भी पहलू दुनिया से छिपा नहीं है। अब खबर आई है कि म्यांमार में अरकान नामक हथियारबंद संगठन को चीन धन और हथियार दे रहा है, ताकि वे भारतीय इलाकों में अशांति फैला सकें।
यह बात भी छिपी नहीं है कि हम चुपचाप उसकी साजिशें झेलते रहे हैं। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है, जब भारत ने मजबूर होकर अपनी नीतियों में परिवर्तन शुरू किया है। लंबे अरसे बाद भारत की खामोशी टूटी है और उसने जेनेवा में मानवाधिकार संबंधी परिषद की बैठक में हांगकांग का मुद्दा उठाया है। हांगकांग में भारतीय मूल की आबादी भी बड़ी संख्या में रहती है, अत: भारत ने कहा है कि वह इस मामले पर नजर रखे हुए है। भारत का इतना कहना भी पर्याप्त है। चीन को समझ लेना चाहिए कि आम तौर पर तिब्बत से ताइवान और यहां तक कि भारतीय इलाकों में चीनी दावों के प्रति भी अपेक्षाकृत शालीनता बरतने वाला भारत अब नई दिशा में बढ़ चला है। भारत के खिलाफ लगातार साजिशें करने की चीनी नीति को अब जवाब मिलने लगा है। दुनिया का सबसे विशाल लोकतांत्रिक देश भारत अपनी कूटनीति के प्रति सजग है। चीन के प्रति केवल भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका और ब्रिटेन में भी बड़ी नाराजगी है। कोई भी देश चीन की अतार्किक मनमानी या हस्तक्षेप को झेलना नहीं चाहेगा। विश्व मंच पर चीन को वह फसल अब काटनी पडे़गी, जो वह भारत और अन्य देशों में बोता रहा है।
ओपिनियन / शौर्यपथ / इस हफ्ते की शुरुआत में, जब भारत सरकार ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर टिक टॉक सहित 59 चीनी एप पर पाबंदी लगाई, तब देश भर में हर्ष और विलाप, दोनों तरह के स्वर सुनाई दिए। कुछ के लिए सरकार की यह पहल चीन के साथ हुए सीमा-संघर्ष के खिलाफ एक वाजिब प्रतिक्रिया थी, तो अन्य लोगों ने पेटीएम, जोमैटो जैसी भारतीय कंपनियों में शामिल चीन के शेयरधारकों के खिलाफ भी दंडात्मक प्रतिबंध लगाने का आह्वान किया। मगर एक सच यह भी है कि सरकार के इस फैसले से भारतीय डिजिटल उद्यमियों की पूरी पीढ़ी राहत महसूस कर रही है, बावजूद इसके कि उपरोक्त किसी भी तर्क से वह बेशक इत्तिफाक न रखती हो।
देशों का द्विपक्षीय रिश्ता एक जटिल मसला है, विशेष रूप से कटुता के लंबे इतिहास वाले पड़ोसियों के बीच। इसमें आपसी व्यापार, विदेशी संबंध और अंतरराष्ट्रीय संचार को प्रभावित करने के लिए मुद्दों का मूल-बिंदु से विस्तार किया जा सकता है। भारत में चीनी एप पर प्रतिबंध ठीक ऐसा ही मामला है। यह सामने वाले को महज तकलीफ पहुंचाने वाला कदम है, जो भविष्य की वार्ताओं में मोलभाव का हमारा हथियार बन सकता है। इससे दोनों देशों के बीच लद्दाख में जारी तनातनी का कतई हल नहीं निकलेगा। इसे चीन के पूर्ण बहिष्कार का संकेत समझने की गलती भी नहीं की जानी चाहिए। फिर भी, इस प्रतिबंध का भारत के घरेलू डिजिटल सेवा उद्योग के लिए गहरा निहितार्थ है।
दरअसल, पिछले कुछ दशकों से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) की तरफ ही हमारी आर्थिक नीतियों का जोर रहा है। भारत की विशाल, नौजवान और आकांक्षी आबादी स्वाभाविक तौर पर सभी प्रकार की विदेशी वस्तुओं और सेवाओं के लिए एक आकर्षक बाजार है। अपने दरवाजे विदेशी कारोबारियों के लिए कुछ-कुछ खोलकर सरकारों ने वर्षों से इस अवसर को भुनाया भी है। हालांकि, इस रुख की वजह से भारतीय कंपनियों को भी विदेशी प्रतियोगियों के खिलाफ मैदान में उतरने में मदद मिली है। मगर, भारत कोई अकेला देश नहीं है, जो अपने बाजार पर नियंत्रण रखता है। औद्योगिकीकरण की अपनी यात्रा में यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया व अधिकांश विकसित देशों ने भी ऐसा किया है। बाजार-पहुंच और विदेशी स्वामित्व की बाधाएं दुनिया भर में हैं और तमाम तरह के चलन, व देशों के बीच व्यापार को व्यवहार-कुशल बनाने के एकमात्र उद्देश्य के साथ विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) भी अस्तित्व में है।
हालांकि, भारत में दूरसंचार लाइसेंस, फ्रीक्वेंसी के आवंटन और नीलामी के इर्द-गिर्द ही बहसें सिमटती गई हैं, आधुनिक दूरसंचार की सहायता से होने वाले कारोबार की तरफ बहुत कम ध्यान दिया गया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि नई पीढ़ी की डिजिटल सेवाओं के कामकाज के बारे में बहुत से लोगों को पता नहीं है। भारत के उपभोक्ता बाजार में विदेशी कंपनियों का कितना दखल हो, यह व्यापार और राजनीति में तीखी बहस का विषय रहा है। नागरिक उड्डयन, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, बीमा, बैंकिंग, खुदरा, रेलवे, यहां तक कि आउटसोर्सिंग भी ऐसे उद्योग हैं, जिनके लिए विदेशी निवेश और बाजार में पहुंच को मंजूरी बारीक जांच-पड़ताल के बाद ही मिली है। मगर अब तक इस पर शायद ही गंभीर चर्चा हुई है कि एक अरब से अधिक डिजिटल उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाने के लिए विदेशी कंपनियों को कितना अधिकार देना चाहिए। स्थिति को और बेहतर समझने के लिए विमानन उद्योग से इसकी तुलना कर सकते हैं।
साल 2014 में हवाई यात्रा करने वाले भारतीयों की संख्या 17 करोड़ थी, जो 2019 में दोगुनी हो गई। इस क्षेत्र में वर्तमान और पिछली सरकारों ने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश बढ़ाने की तरफ पर्याप्त ध्यान दिया और हर वर्ष यहां विदेशी कंपनियों को अनुमति दी गई। मगर भारतीय डिजिटल दुनिया को कीमती नहीं माना गया, जबकि अपने यहां टिक टॉक के अनुमानित 12 करोड़ उपभोक्ता हैं और वाट्सएप के 40 करोड़। यह हर साल हवाई यात्रा करने वाले भारतीयों की संख्या से कहीं अधिक है।
अब इसकी तुलना जरा चीन से करें। चीन का चर्चित ‘ग्रेट फायरवाल’ नियमों और तकनीक का ऐसा मजबूत संयोजन है कि चीन में सूचना, सामग्री और डाटा का स्वतंत्र आवागमन संभव ही नहीं है। इसी वजह से चिनगारी (टिक टॉक का भारतीय संस्करण) जैसे एप के लिए अपना मालिकाना हक चीनी हाथों में सौंपे बिना चीन की आभासी दुनिया में काम करना असंभव होगा। वाट्सएप पर तो वर्षों से वहां पाबंदी लगी हुई है। वहां स्थानीय एप वीचैट के एक अरब से अधिक उपयोगकर्ता हैं और इसमें वाट्सएप को आसानी से टक्कर दे सकने की संभावना है। यही नहीं, चीन फेसबुक, यू-ट्यूब, गूगल, इंस्टाग्राम, स्पॉटिफाई, विकिपीडिया, गूगल मैप्स जैसी अन्य सेवाओं का भी उपयोग नहीं करता, जबकि इन पर हमारी रोजाना की निर्भरता है। इन जैसी सेवाओं के लिए वहां स्थानीय एप हैं, जिनमें से कई तो अपेक्षाकृत बडे़ उपभोक्ता-आधार वाले और बेहतर हैं। यहां तक कि कनाडा, फ्रांस और यूरोपीय संघ के देशों में भी कुछ सख्त नियम-कानून हैं, जिससे उन्होंने बड़ी डिजिटल कंपनियों को भी खास रियायत देने के लिए मजबूर किया है। लिहाजा, भारत सरकार द्वारा लगाए गए इस प्रतिबंध को दुनिया व्यापक तौर पर समझेगी।
आधुनिक दुनिया में क्लाउड पर सूचनाओं को जमा करके रखने का चलन बढ़ा है, इसलिए भौगोलिक सीमाएं अब काफी हद तक बेमानी हो गई हैं। बेहतर व विकसित अर्थव्यवस्थाओं से आने वाली बड़ी कंपनियों को मुफ्त और पूरे भूगोल तक पहुंच से पर्याप्त लाभ मिलती रही है, जबकि छोटी कंपनियों के लिए मुकाबला समान नहीं रह पाता है। स्थानीय कंपनियों का समर्थन करना देशों के लिए सामान्य बात है। बड़ी डिजिटल कंपनियों को पता है कि इसी कारण स्थानीय निवेश के नियम जटिल हो सकते हैं। भारतीय स्टार्टअप्स में भी तभी तक चीनी निवेश की अनुमति होनी चाहिए, जब तक कि उस पर नियमबद्ध प्रभावी नियंत्रण बना रहे। मुफ्त बाजार का हिमायती होने के नाते मेरा यह भी मानना है कि इस तरह के नियम लंबे समय में प्रभावहीन हो जाएंगे। लिहाजा, हालिया प्रतिबंध भारतीय उद्यमियों के लिए एक अच्छा मौका है कि वे बाजार में बन आए खालीपन को तेजी से भरें। उन्हें जल्द ही यह करना होगा, क्योंकि वक्त बीत रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)ज्योतिर्मय साहा, संस्थापक सीईओ, ऑगस्ट मीडिया
शौर्यपथ लेख / शरद पंसारी / पिछले दिनों सीमा पर 20 जवानो की शहादत के बाद भारतीयों का खुल खौल उठा हर तरफ से बदला लेने की आवाज़ उठने लगी . पेट्रोल डीजल के बढ़ते दामो पर कई ज्ञानियों ने तथ्य पेश किये कि युद्ध हो सकता है असला बारूद की जरुरत पड़ेगी , कई महाज्ञानियो ने तर्क दिया कि पहले के पाप है अब धो रहे है , कई महा पंडितो ने तो भारत के कुछ राजनितिक पार्टी के नेताओ को दलाल भी बता दिया . ऐसा माहौल बन गया कि कोरोना से बाद में निपटेंगे पहले चीन से निपट ले चीन को मजा चखाएंगे . कुछ अत्यधिक प्रेमी देश भक्तो ने तो चाइना कम्पनी के साइन बोर्ड भी तोड़ दिए ये अलग बात है कि जेब में रखे चाइना कम्पनी के मोबाइल में मोबाइल गार्ड लगा लिए ताकि चाइना कम्पनी के मोबाइल की लाइफ दुगनी हो जाए और लगाए भी क्यों नहीं देशभक्ति एक तरफ खुद की संपत्ति एक तरफ . क्योकि ऐसे देशभक्तों की देशभक्ति चाइना सामान के ईस्तमाल करने वाले दुसरो पर पाबंदी लगाने की है नुक्सान करने की है . खुद ईस्तमाल करे तो उनका दुधभात है ....
ये सत्य है कि भारत एक बड़ा बाज़ार है किन्तु साथ ये भी सत्य है कि अधुरा बहिष्कार पतन का कारण भी बन सकता है . चाइना सामन का बहिष्कार करने वाले सोशल मिडिया पर एक्टिव है और पुरे देशभक्ति के साथ चाइना मोबाइल के बहिष्कार की बात चाइना मोबाइल से ही फारवर्ड कर रहे है देश में लगभग ६०-७० प्रतिशत स्मार्ट फोन चाइना के है और रोज बिक्री हो रहे है . पर पता नहीं ये देशभक्त चाइना मोबाइल की सार्वजनिक होली क्यों नहीं जला रहे है क्या सिर्फ दिखावा कर आम जनता को गुमराह करने की सोंचे है .
ऐसे महाज्ञानी लोग कहा थे जब सरहद पर २० जवान शहीद हुए २०१४ के पहले ये लोग १ के बदले १० सर लाने की बात करते थे अब क्यों मौन है . महंगाई पर सड़क पर नाचते थे और चिल्लाते थे अब क्यों मौन है . स्थिति अलग अलग समय में अलग कारणों के कारण जानी जाती है . ये हकीकत है कि वर्तमान समय में स्थिति बेहद विकत है ऐसे समय में आम जनता पेट की चिंता करे कि देशभक्ति कि परिवार की चिंता करे कि देश कि . क्या कोई ऐसा बाप होगा जो सामने परिवार मुसीबत में है और प्रदर्शन करने वो चौक पर है .ऐसा करना किसी भी परिवार के मुखिया के लिए असंभव है और यही जीवन है . इंसान पहले , परिवार फिर देश की सोंचता है . एक फौजी भी देश की सेवा करता है तो परिवार की सुरक्षा के लिए ही क्या कोई बड़े से बड़ा अधिकारी सुनने में आया है कि देश सेवा बिना मेहनताना के सेलेरी के कर रहा हो क्या कोई ऐसा जनप्रतिनिधि नजर आया जो सिर्फ सेवा कर रहा हो और सरकारी सुविधा का त्याग किया हो ऐसा कोई नहीं मिलता जो मिलते है वो इतिहास में दर्ज हो जाते है . ऐसा नहीं है कि देश में पुरानी सरकारों ने सीमा की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया ऐसा नहीं है कि पूर्व की सरकारों को देश की चिंता नहीं थी .
सोशल मिडिया में खूब देशभक्त मिलेंगे जो पुरानी सरकारों के काम काज का उल्लेख घोटालो से करते नजर आ जाते है लाखो करोडो के घोटालो को पेश करते है अगर ये देशभक्त सही है तो वर्तमान सरकार ६ साल में ऐसे लोगो को अभी तक जेल में क्यों नहीं डाल पा रही है क्यों सोशल मिडिया के देशभक्तों के पोस्ट को संज्ञान में नहीं ले रही है . कुछ मामलो को छोड़ कर सारी बाते सिर्फ हवा हवाई है आरोप लगाना बहुत आसान है तथ्य भी पेश करते है फलां नेता जमानत पर है , फला नेता पर केस दर्ज है . क्या वो विश्वास से बोल सकते है कि fir दर्ज करने के लिए प्रमाण की जरुरत होती है शासन की शक्ति की नहीं सभी जानते है कि शासन की शक्ति के आगे fir दर्ज करना कोई बड़ी बात नहीं थी . अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ में ३ दिनों तक सरकारी एजेंसी राजधानी में डेरा डाले रही क्या हुआ एक fir तक नहीं हुई मामले का अभी तक कुछ पता नहीं चला जबकि सोशल मीडिया में करोडो रूपये जब्ती के पोस्ट फोटो सहित आ गए थे कहा है अब वो ...
साहब शहीदों की शहादत का बदला कोई एप्प नहीं , कोई सामान नहीं कोई बहिष्कार नहीं . शहीदों का बदला एक के बदले दस सर है जिसका आम जनता को इंतज़ार है .....
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
