February 05, 2026
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धर्म संसार / शौर्यपथ / प्रभु यीशु के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस का त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह त्योहार कई मायनों में बेहद खास है। क्रिसमस को बड़ा दिन, सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता है। प्रभु यीशु ने दुनिया को प्यार और इंसानियत की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। प्रभु यीशु को ईश्वर का इकलौता प्यारा पुत्र माना जाता है। इस त्योहार से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
क्रिसमस ऐसा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग उत्साह से मनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन लगभग पूरे विश्व में अवकाश रहता है। 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह त्योहार आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च में 6 जनवरी को मनाया जाता है। कई देशों में क्रिसमस का अगला दिन 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है। क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ को लेकर मान्यता है कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही सांता थे। वह गरीबों की हमेशा मदद करते थे उनको उपहार देते थे। क्रिसमस के तीन पारंपरिक रंग हैं हरा, लाल और सुनहरा। हरा रंग जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ईसा मसीह के रक्त और सुनहरा रंग रोशनी का प्रतीक है। क्रिसमस की रात को जादुई रात कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात सच्चे दिल वाले लोग जानवरों की बोली को समझ सकते हैं। क्रिसमस पर घर के आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। क्रिसमस ट्री को दक्षिण पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। फेंगशुई के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। पोलैंड में मकड़ी के जालों से क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा है। मान्यता है कि मकड़ी ने सबसे पहले जीसस के लिए कंबल बुना था।

भिलाई | विशेष संवाददाता

भिलाई ट्रक ट्रेलर ट्रांसपोर्टर्स एसोसिएशन, दुर्ग परिवहन विभाग एवं यातायात पुलिस के संयुक्त तत्वावधान में सड़क सुरक्षा माह के अंतर्गत आयोजित जागरूकता अभियान कार्यक्रम रविवार को लगातार तीसरे वर्ष भी सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम का आयोजन भिलाई ट्रक ट्रेलर ट्रांसपोर्टर्स एसोसिएशन के मुख्य कार्यालय, खुर्सीपार गेट, भिलाई में किया गया, जहां सड़क सुरक्षा को लेकर अनुकरणीय पहल देखने को मिली।

कार्यक्रम के दौरान 250 से अधिक ड्राइवरों का स्वास्थ्य परीक्षण, 150 से अधिक लोगों की नेत्र जांच, तथा 100 से अधिक यूनिट रक्तदान कर सामाजिक सरोकार का मजबूत संदेश दिया गया। इसके साथ ही चालकों को यातायात नियमों की जानकारी, ड्राइविंग लाइसेंस से संबंधित मार्गदर्शन प्रदान किया गया। सड़क सुरक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 100 से अधिक महिलाओं एवं 500 से अधिक पुरुषों को हेलमेट का वितरण किया गया, जो कार्यक्रम की सबसे प्रभावशाली उपलब्धियों में रहा।

यातायात जागरूकता को जनमानस तक पहुंचाने के लिए नुक्कड़ नाटक का मंचन किया गया, जिसने सरल और प्रभावी संवाद के माध्यम से सुरक्षित ड्राइविंग, नियमों के पालन और जीवन की अहमियत का संदेश दिया। उपस्थित जनसमूह ने इस प्रस्तुति को सराहा।

कार्यक्रम में अतिरिक्त परिवहन आयुक्त छत्तीसगढ़ श्री यू.बी.एस. चौहान, क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी दुर्ग श्री एस. लकड़ा, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक दुर्ग श्री सुखनंदन राठौर, उप पुलिस अधीक्षक भिलाई श्री सत्य प्रकाश तिवारी, टीआई (आरटीओ) दुर्ग श्री डगेश्वर सिंह राजपूत, टीआई (आरटीओ) दुर्ग श्रीमती अरुणा साहू एवं परिवहन निरीक्षक श्री एस.के. जांगड़े की गरिमामयी उपस्थिति रही। सभी अतिथियों ने अपने संबोधन में कहा कि सड़क सुरक्षा अभियान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि निरंतर जनजागरूकता का माध्यम होना चाहिए।

भिलाई ट्रक ट्रेलर ट्रांसपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री इंद्रजीत सिंह ने सभी अतिथियों, सहयोगी संस्थाओं एवं कार्यक्रम में शामिल ड्राइवर साथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा,

“सड़क सुरक्षा केवल एक अभियान नहीं, बल्कि हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। एक छोटी सावधानी भी किसी की जिंदगी बचा सकती है।”

कार्यक्रम का सफल संचालन महासचिव श्री मलकीत सिंह द्वारा किया गया। इस अवसर पर एसोसिएशन के पदाधिकारी एवं सदस्य, ड्राइवर साथी, सामाजिक कार्यकर्ता और गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

यह आयोजन न केवल सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता का उदाहरण बना, बल्कि सामाजिक सहभागिता और जिम्मेदार नागरिकता का भी सशक्त संदेश देकर गया।

देशभक्तिपूर्ण कार्यक्रमों से गूंजा प्रेरणा कक्ष

जगदलपुर, शौर्यपथ। गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर जिले के कलेक्टर आकाश छिकारा ने कलेक्टोरेट में ध्वजारोहण कर राष्ट्रीय ध्वज को सलामी दी। ध्वजारोहण के पश्चात राष्ट्र गान और राष्ट्रीय गीत का गायन किया गया। इस अवसर पर कलेक्टर आकाश छिकारा ने उपस्थित समस्त अधिकारियों और कर्मचारियों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। इस दौरान उन्होंने छत्तीसगढ़ महतारी के प्रतिमा में पुष्प अर्पित किया।

     कलेक्टोरेट में ध्वजारोहण के पश्चात प्रेरणा कक्ष में अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए देशभक्ति से ओत-प्रोत शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। इन प्रस्तुतियों ने वहां मौजूद सभी लोगों के भीतर राष्ट्रप्रेम की भावना को और प्रगाढ़ कर दिया। इस अवसर पर अपर कलेक्टर सीपी बघेल एवं प्रवीण वर्मा, सहायक कलेक्टर विपिन दुबे, संयुक्त कलेक्टर एआर राणा सहित डिप्टी कलेक्टर सुश्री हीरा गवर्ना और सुश्री नंदिनी साहू समेत अन्य अधिकारी-कर्मचारी मौजूद रहे।

शौर्यपथ राजनितिक /
प्रयागराज में आयोजित माघी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि अब यह उत्तर प्रदेश की राजनीति का ऐसा केंद्र बन गया है, जहाँ से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सत्ता, संगठन और संत-समाज के साथ संबंधों की गहन परीक्षा हो रही है। शंकराचार्य स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार, प्रशासनिक कार्रवाई और उसके बाद उभरे विरोधाभासी राजनीतिक संकेतों ने सरकार को एक जटिल चक्रव्यूह में खड़ा कर दिया है।
शंकराचार्य बनाम प्रशासन: विवाद की जड़
माघी मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद के पालकी यात्रा को लेकर प्रशासन और संत-समाज के बीच टकराव सामने आया। सरकार की ओर से शंकराचार्य पर “व्यवस्था बाधित करने” जैसे आरोप लगाए गए और लगातार नोटिस भेजे गए। इसके विपरीत, उसी प्रतिबंधित क्षेत्र में ‘सातवाँ बाबा’ का वाहन से प्रवेश—और उस पर किसी प्रकार की रोक-टोक या कार्रवाई का अभाव—प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
संत-समाज में यह संदेश गया कि नियम सबके लिए समान नहीं हैं, और यही असंतोष का मूल बनता चला गया।
संत-समाज में दरार, सनातन में विभाजन
इस घटनाक्रम के बाद साधु-संत दो गुटों में बँटते दिखाई दिए। सोशल मीडिया पर शंकराचार्य की पदवी और वैधता तक पर सवाल उठने लगे—जो किसी भी सरकार के लिए बेहद संवेदनशील स्थिति है।
भारत के चार शंकराचार्यों में से कुछ का खुला समर्थन, तो कुछ का मौन—दोनों ही अलग-अलग अर्थों में देखा जा रहा है। जहाँ समर्थन स्पष्ट संदेश देता है, वहीं मौन को भी कहीं न कहीं समर्थन या रणनीतिक दूरी के रूप में व्याख्यायित किया जा रहा है।
सरकार के भीतर दो स्वर
सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने सार्वजनिक रूप से शंकराचार्य स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद को बारंबार प्रणाम, सम्मान-स्नान और मामला समाप्त करने की अपील कर सरकार के भीतर मौजूद दो अलग-अलग दृष्टिकोणों को उजागर कर दिया।
एक ओर मुख्यमंत्री के नेतृत्व में प्रशासनिक सख्ती और नोटिस, दूसरी ओर उपमुख्यमंत्री का नरम और समन्वयी रुख—यह विरोधाभास केवल संत-समाज ही नहीं, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गया।
केंद्रीय नेतृत्व का मौन और संगठनात्मक संकेत
इस पूरे प्रकरण में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की चुप्पी भी कम अर्थपूर्ण नहीं है। न तो खुला समर्थन, न ही स्पष्ट असहमति—यह मौन कई तरह के राजनीतिक संदेश देता है।
इसी क्रम में उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में पंकज चौधरी की नियुक्ति—जो कथित तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहली पसंद नहीं माने जाते—भी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठनात्मक संतुलन और शक्ति-वितरण के संकेत देती है।
2027 से पहले योगी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती
यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि मामला केवल एक शंकराचार्य या एक मेला-व्यवस्था तक सीमित नहीं है। यह सनातन समाज की भावनाओं, संतों के सम्मान, और सत्ता-संगठन के समीकरणों से जुड़ा व्यापक प्रश्न बन चुका है।
यह भी चर्चा में है कि केशव प्रसाद मौर्य की दिल्ली से निकटता और योगी आदित्यनाथ की कथित बढ़ती दूरी, भविष्य की राजनीति को नई दिशा दे सकती है।
निष्कर्ष: परीक्षा की घड़ी
माघी मेले में हुआ यह विवाद उत्तर प्रदेश सरकार के लिए चेतावनी संकेत है। यदि संत-समाज और आम सनातन अनुयायी स्वयं को उपेक्षित या भेदभाव का शिकार महसूस करते हैं, तो इसका प्रभाव सीधे विधानसभा चुनाव 2027 पर पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है—
क्या वे प्रशासनिक सख्ती, संत-सम्मान और संगठनात्मक संतुलन के बीच इस राजनीतिक चक्रव्यूह को तोड़ पाएँगे?
या फिर यह घटनाक्रम आने वाले समय में उनकी सत्ता-यात्रा का सबसे कठिन मोड़ साबित होगा—यह निर्णय अब उनके अगले कदमों पर निर्भर करता है।
नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट
कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ की गई आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 19 जनवरी 2026 को सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश सरकार को सख्त शब्दों में कटघरे में खड़ा कर दिया। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ कर दिया कि कानून चुप्पी की इजाजत नहीं देता—अब सरकार को फैसला लेना ही होगा।
दो सप्ताह का अल्टीमेटम
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को दो सप्ताह के भीतर यह तय करने का निर्देश दिया है कि मंत्री कुंवर विजय शाह के खिलाफ अभियोजन (मुकदमा चलाने) की मंजूरी दी जाएगी या नहीं। कोर्ट ने कहा कि यह कोई वैकल्पिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि कानूनी दायित्व है।
“पांच महीने से चुप्पी क्यों?”
कोर्ट ने सरकार की देरी पर तीखी नाराजगी जताते हुए याद दिलाया कि विशेष जांच टीम (SIT) ने 19 अगस्त 2025 को ही अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी थी। इसके बावजूद सरकार द्वारा अब तक कोई निर्णय न लेना न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है। पीठ की टिप्पणी थी—
“कानून आप पर निर्णय लेने की जिम्मेदारी डालता है, और आपको फैसला लेना ही होगा।”
माफी पर सख्त रुख
मंत्री विजय शाह द्वारा दी गई माफी को सुप्रीम कोर्ट ने “मगरमच्छ के आँसू” बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि अब माफी मांगने का समय निकल चुका है, और ऐसी टिप्पणियों को केवल औपचारिक खेद से ढका नहीं जा सकता।
जांच का दायरा बढ़ा
सुप्रीम कोर्ट ने SIT को यह भी निर्देश दिया कि जांच के दौरान सामने आई अन्य आपत्तिजनक टिप्पणियों की अलग से जांच कर रिपोर्ट दाखिल की जाए। यानी मामला अब केवल एक बयान तक सीमित नहीं रहेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वर्ष 2025 में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सामने आया, जब एक सार्वजनिक सभा में मंत्री कुंवर विजय शाह ने सेना की ओर से मीडिया ब्रीफिंग कर रहीं कर्नल सोफिया कुरैशी के लिए “आतंकवादियों की बहन” जैसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया।
इस पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज करने के आदेश दिए थे। बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया।
व्यापक संदेश
इस पूरे घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट का रुख बेहद स्पष्ट है—
सेना की गरिमा, महिला अधिकारियों का सम्मान और संवैधानिक मर्यादा किसी भी सूरत में राजनीतिक बयानबाज़ी की भेंट नहीं चढ़ाई जा सकती।
अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि मध्य प्रदेश सरकार दो सप्ताह के भीतर कानून के अनुरूप साहसिक फैसला लेती है या फिर न्यायपालिका को एक बार फिर हस्तक्षेप करना पड़ता है।

 

शौर्यपथ संपादकीय | दुर्ग

दुर्ग में दूसरे प्रेस क्लब का गठन कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं है।
यह न तो शौक का परिणाम है, न किसी साजिश का।
बल्कि यह वर्षों से पनप रहे अहंकार, एकाधिकार और बंद दरवाज़ों वाली व्यवस्था के खिलाफ हुआ स्वाभाविक विस्फोट है।

यह उस सोच का अंत है, जो स्वयं को पत्रकारिता का पर्याय और शेष सभी को नगण्य समझ बैठी थी।

सवाल सीधा और असहज है—
क्या पत्रकारिता किसी क्लब की बपौती है?
क्या किसी पत्रकार की पहचान कुछ लोगों की मोहर से तय होगी?

यदि जवाब “नहीं” है,
तो फिर दुर्ग में वह स्थिति क्यों बनी, जहाँ राष्ट्रीय और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकारों को भी बार-बार “पत्रकार” साबित करना पड़ा?


पुराना प्रेस क्लब: अनुभव की ढाल या निजी हितों का किला?

इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि पुराने प्रेस क्लब में अनुभव है, वरिष्ठता है और पत्रकारिता का इतिहास है।

लेकिन जब यही वरिष्ठता—

  • नए पत्रकारों के लिए दीवार बन जाए

  • सदस्यता वर्षों तक लटकाई जाए

  • बैठकों से लोकतांत्रिक संवाद गायब हो जाए

  • और संगठन कुछ गिने-चुने लोगों की सुविधा व वसूली का माध्यम बन जाए

तो सवाल उठना स्वाभाविक ही नहीं, आवश्यक हो जाता है।पत्रकारिता में सबसे खतरनाक नज़दीकी होती है— सत्ता से नहीं, आत्ममुग्धता से।


“हम ही हम हैं” का झूठा नैरेटिव

दुर्ग में वर्षों तक प्रशासन और राजनीतिक तंत्र के भीतर यह भ्रम बैठाया गया कि—“प्रेस क्लब मतलब यही लोग,इनके बाहर कोई पत्रकार नहीं।”

यह भ्रम इतना गहरा था कि कई अवसरों पर अन्य पत्रकारों को सार्वजनिक रूप से नकारा गया,जबकि वे ज़मीनी पत्रकारिता कर रहे थेऔर बड़े मीडिया संस्थानों से जुड़े हुए थे।

यह पत्रकारिता नहीं थी— यह सूचना पर कब्ज़े की मानसिकता थी।


नया प्रेस क्लब: विद्रोह नहीं, विवशता

नया प्रेस क्लब किसी सत्ता-समर्थित षड्यंत्र का परिणाम नहीं है। यह उन पत्रकारों की आख़िरी चुप्पी-तोड़ प्रतिक्रिया है,जिन्हें वर्षों तक यही सुनाया गया—
“जगह नहीं है, नियम नहीं है, ज़रूरत नहीं है।”

जब संगठन परिवार न रहे,तो नए घर बनते ही हैं।


लेकिन एक कड़वा सच…

यहाँ एक सच नए प्रेस क्लब के लिए भी उतना ही ज़रूरी है—पत्रकारिता जितनी बँटेगी,उतनी ही कमज़ोर होगी।दो प्रेस क्लब,दो मंच,दो ध्रुव—इस बंटवारे का सीधा लाभ पत्रकारों को नहीं, सत्ता और प्रशासन को मिलेगा।

जो आज तालियाँ बजा रहे हैं,वही कल इसी विभाजन का इस्तेमाल पत्रकारों की आवाज़ दबाने में करेंगे।


जिम्मेदारी दोनों की है

  • वरिष्ठ पत्रकारों की — कि संगठन को निजी जागीर न बनाएं

  • नए पत्रकारों की — कि विद्रोह मर्यादा से बाहर न जाए

पत्रकारिता में न वरिष्ठ छोटा होता है,न कनिष्ठ कमज़ोर— कमज़ोर होती है केवल नीयत।


आख़िरी सवाल (जो सबसे ज़रूरी है)

क्या दुर्ग का पत्रकार क्लब से बड़ा बनेगा,या क्लब के नाम पर खुद को छोटा करता रहेगा? यदि पुराने प्रेस क्लब ने आत्ममंथन नहीं किया और नया प्रेस क्लब आत्मसंयम नहीं अपनाता—

तो इतिहास साफ़ है—
अहंकार से बना संगठन और जल्दबाज़ी से जन्मा विद्रोह,दोनों ही ज़्यादा देर तक नहीं टिकते। दुर्ग की पत्रकारिता आज चौराहे पर खड़ी है। अब फैसला पत्रकारों को करना है—

✒️ कलम एकजुट रखनी है
या
✒️ क्लबों में बाँट देनी है।

 

दुर्ग।
तहसील साहू संघ दुर्ग द्वारा साहू सदन, केलाबाड़ी में कार्यकारिणी विस्तार एवं शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन गरिमामय एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण में किया गया। कार्यक्रम में दुर्ग जिला साहू संघ के अध्यक्ष नंद लाल साहू तथा तहसील साहू संघ दुर्ग के अध्यक्ष पोषण साहू विशेष रूप से उपस्थित रहे।

समारोह के दौरान संगठन की नवगठित कार्यकारिणी के पदाधिकारियों को विधिवत शपथ दिलाई गई। इस अवसर पर शैलेन्द्र कुमार साहू को तहसील साहू संघ दुर्ग का मीडिया प्रभारी नियुक्त किया गया। उन्हें संगठन की गतिविधियों, सामाजिक कार्यों एवं विचारों को समाज और जनमानस तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने समाज की एकता, संगठन की मजबूती और सामाजिक उत्थान के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। नवनियुक्त पदाधिकारियों ने समाजहित में निष्ठा, ईमानदारी और पूर्ण समर्पण के साथ अपने दायित्वों के निर्वहन का संकल्प लिया।

इस अवसर पर तहसील साहू संघ के पूर्व अध्यक्ष भीखम साहू, यतीश साहू सहित साहू समाज के अनेक वरिष्ठ पदाधिकारी एवं सदस्य बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सभी ने कार्यकारिणी विस्तार को संगठन को और अधिक सशक्त बनाने की दिशा में सकारात्मक कदम बताते हुए नवनियुक्त पदाधिकारियों को शुभकामनाएँ दीं।

समारोह उत्साहपूर्ण और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

रायपुर । छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में दशकों तक चले नक्सली हिंसा के अंधकार के बाद अब शांति, विश्वास और लोकतंत्र का उजास दिखाई देने लगा है। लंबे समय तक…

विज्ञानसम्मत बाल साहित्य का लेखन अनिवार्य : डॉ. विकास दवे

साहित्य के बिना शिक्षा की कल्पना नहीं : श्री बलदाऊ राम साहू

रायपुर,/  रायपुर साहित्य उत्सव के तीसरे दिन कवि-कथाकार अनिरुद्ध नीरव मंडप में बाल साहित्य की प्रासंगिकता का सत्र ख्यातिलब्ध साहित्यकार नारायण लाल परमार को समर्पित रहा। जिसमें साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश के अध्यक्ष डॉ. विकास दवे, बाल साहित्यकार श्री बलदाऊ राम साहू बतौर वक्ता परिचर्चा में शामिल हुए, जिसके सूत्रधार श्री एस के बिसेन रहे। इस अवसर पर देवभोग के कृष्ण कुमार अजनबी द्वारा लिखित बाल कविता संग्रह आंखों का तारा, श्री ओमप्रकाश जैन की पुस्तक जीवन चक्र और श्री संतोष कुमार मिरी की पुस्तक जीवन बोध का विमोचन किया गया।

परिचर्चा में अपने संबोधन में डॉ. विकास दवे ने कहा कि बाल साहित्य का पाठक एकमात्र ऐसा पाठक है जो स्वयं क्रेता नहीं होता, न ही निर्णायक होता है। एक समय था जब बस स्टैंड और रेलवे स्टेशनों में बच्चे अपने पालकों से बाल साहित्य खरीदने की जिद करते थे। डॉ. दवे ने कहा कि हमें बच्चों को सरल साहित्य सिखाना होगा। अंग्रेजी के नाम पर हम कितने सारे उपक्रम कर रहे हैं। उन्होंने पालकों से अपील की कि बच्चों को बाल साहित्य लेकर दें साथ ही एक हिंदी शब्दकोश भी दें ताकि जब कोई शब्द समझ न आए वह शब्दकोश में ढूंढ सके।उन्होंने आज के समय में विज्ञानसम्मत बाल साहित्य के लेखन को अनिवार्य बताया।

श्री बलदाऊ राम साहू ने कहा कि बाल साहित्य बच्चों को गढ़ता है, उन्हें विचार देता है। बाल साहित्य के बिना शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। बाल साहित्य को यदि हम पाठ्यपुस्तक से निकाल दें तो कुछ नहीं बचता। बाल साहित्य बच्चों को प्रेरित करता है। बच्चों को प्रोत्साहित करता है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि बच्चों में पढ़ने की परंपरा कम हो रही है, बाल पत्रिकाएं बंद होती जा रही हैं।

श्री साहू ने कहा कि शिक्षक बच्चों का मूल्यांकन सही ढंग से नहीं कर पाते। लोग बाल साहित्य को मनोरंजन का साधन नहीं, सद्विचारों का विचारों का संग्रह है। बच्चों को संवेदनशील मनुष्य बनाने में बाल साहित्य का बड़ा महत्व है। श्री साहू ने बाल साहित्य को जीवन के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि बाल साहित्य बच्चों के लिए भाषा संस्कार की पाठशाला है। उन्होंने कहा कि हमें बच्चों को बाल साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करना होगा।

परिचर्चा के सूत्रधार श्री एस के बिसेन ने कहा कि दुर्भाग्य की बात है कि धीरे-धीरे पुस्तकों से पंचतंत्र और हितोपदेश की कहानियां गायब हो रही हैं। उन्होंने नैतिक शिक्षा के पाठ में बाल साहित्य को बहुत जरूरी बताया और कहा कि बाल साहित्य संस्कार और व्यवहार का मूल आधार है।

शासन और साहित्य विषय पर पूर्व आईएएएस अधिकारियों के साथ सूत्रधार कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह ने की चर्चा

प्रेमचंद, शरद जोशी, सार्त्र और वाक्लाव हैवेल जैसे साहित्यकारों विचारकों के उद्दरणों के साथ सार्थक चर्चा का हुआ आयोजन

लाला जगदलपुरी मंडप में हुआ आयोजन, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय केयूर भूषण को किया गया नमन

रायपुर । शासन और साहित्य विषय पर आज लाला जगदलपुरी मंडप में दिलचस्प चर्चा हुई। सूत्रधार थे कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह और अतिथि वक्ता थे पूर्व आईएएस अधिकारी श्री बीकेएस रे, श्रीमती इंदिरा मिश्रा, डॉ. सुशील त्रिवेदी और डॉ. संजय अलंग। साहित्य में गहरी दिलचस्पी रखने वाले और अपनी प्रशासनिक क्षमता से प्रदेश में पहचान छोड़ने वाले अधिकारियों ने सूत्र बताए कि किस तरह साहित्य शासन-प्रशासन को जनकल्याण के लिए लगातार सकारात्मक दिशा में लेकर जाता है। कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह ने कहा कि साहित्य समाज को जगाता है। डॉ. सिंह ने कहा कि अगर साहित्य केवल प्रशंसा करता है तो वो कमजोर हो जाता है और शासन यदि केवल नियंत्रण करता है तो वो कठोर हो जाता है इसलिए लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि आलोचना को सुना जाए और संवेदना को नीति में बदला जाए। उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रसंग बताते हुए कहा कि किस प्रकार वीरगाथा काल में कवियों ने राष्ट्रबोध जगाया और भक्तिकाल में उन्होंने वो मानक बताये जिससे शासन को चलाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि साहित्य हमेशा केंद्र में रहा है और साहित्यकारों ने अपने प्रखर विचारों को हमेशा रखा। इस मौके पर डॉ. सुशील त्रिवेदी ने कहा कि साहित्य की शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्वतंत्रता संग्राम में हमारे अनेक नेता साहित्यकार रहे। उस दौर में अंग्रेजों की आलोचना करने वाले साहित्यकारों की किताबों पर बैन लगाया गया। यह साहित्य की शक्ति है। उन्होंने दिनकर को उद्धृत करते हुए कहा कि जब राजनीति फिसलती है तो साहित्य उसे संभालता है। यह साहित्य की बड़ी शक्ति है। डॉ. संजय अलंग ने कहा कि साहित्यकार जो देखते हैं उसे लिख देते हैं यह आलोचना भी होती है और प्रशंसा भी होती है। नमक का दरोगा कहानी पढ़े तो ये ईमानदार अधिकारी की कहानी है और इस कहानी ने न जाने कितने लोगों के भीतर ईमानदारी के भाव भरे लेकिन सिस्टम में विसंगतियों को भी अनेक कहानियां अथवा निबंध सामने लाते हैं। उन्होंने शरद जोशी के लिखे व्यंग्य लेख जीप पर सवार इल्लियां का जिक्र किया। श्रीमती इंदिरा मिश्रा ने लेखिका तसलीमा नसरीन का जिक्र किया कि उन्होंने सच्चाई को सामने लाने की हिम्मत दिखाई और उन्हें निर्वासन सहना पड़ा। साहित्य सच को सामने लाता है और समाज को आइना दिखाता है। साहित्य संवेदनशीलता लाता है और जनकल्याणकारी शासन की नींव तैयार करता है। इस मौके पर बीकेएस रे ने कहा कि साहित्य हमारे मनोविज्ञान को बदलता है और एक संवेदनशील मनुष्य बेहतर प्रशासक बनता है। श्री रे ने फ्रांस के स्टूडेंट मूवमेंट का उदाहरण बताते हुए कहा कि नोबल पुरस्कार प्राप्त जीन पाल सार्त्र के नेतृत्व में हो रहे मूवमेंट को रोकने कैबिनेट के बैठक में चर्चा चली। जब किसी ने सार्त्र को गिरफ्तार करने की बात कही तो चार्ल्स डी गाव ने कहा कि हम इस सदी के वाल्तेयर को गिरफ्तार करने का जोखिम नहीं उठा सकते। यह साहित्य की शक्ति है। श्री रे ने वाक्लाव हैवल जैसे विचारकों के प्रमुख उद्दरणों को रखा और इसके माध्यम से अपनी बात कही। सूत्रधार डॉ. गौरव सिंह ने अंत में चर्चा के निष्कर्ष के रूप में कहा कि साहित्य संवेदनशीलता प्रदान करता है समझ प्रदान करता है इसलिए हर युग में वो केंद्र में रहा है। उन्होंने कहा कि रायपुर साहित्य उत्सव जैसे आयोजनों से साहित्य के प्रति लोगों की जागरकूता बढ़ाने में मदद मिलती है।


इस अवसर पर उप संचालक श्री सौरभ शर्मा ने शासकीय गमछा पहनाकर स्वागत किया एवं संयुक्त संचालक श्री हीरा देवांगन ने प्रतीक चिन्ह प्रदान किया। साथ ही कुछ नवोदित साहित्यकारों के पुस्तक का विमोचन भी किया गया।

‘बड़ी दीदी’ बुधरी ताटी, डॉ. रामचंद्र गोडबोले एवं सुनीता गोडबोले का पद्म श्री के लिए चयन छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का क्षण

रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ के लिए यह अत्यंत गर्व और सम्मान का अवसर है कि बस्तर की समाजसेविका, स्नेह और ममता की प्रतिमूर्ति ‘बड़ी दीदी’ के नाम से विख्यात श्रीमती बुधरी ताटी, तथा जनजातीय अंचलों में निःस्वार्थ सेवा के जीवंत प्रतीक डॉ. रामचंद्र गोडबोले एवं सुनीता गोडबोले का पद्म श्री सम्मान के लिए चयन किया गया है।

मुख्यमंत्री ने प्रदेश और देश का नाम रोशन करने वाली इन तीनों विभूतियों को हृदय से बधाई एवं शुभकामनाएँ देते हुए उनके स्वस्थ जीवन की कामना की है।मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा कि यह उपलब्धि न केवल इन तीनों विभूतियों की तपस्या और समर्पण का सम्मान है, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए अपार गौरव का विषय भी है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि बस्तर और जनजातीय अंचलों में मानव सेवा, करुणा और समर्पण की जो मिसाल इन विभूतियों ने प्रस्तुत की है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि सेवा भाव से किया गया कार्य सीमाओं को पार कर राष्ट्रीय पहचान बन जाता है।

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि इन तीनों विभूतियों ने वर्षों तक मौन साधना की तरह समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों की सेवा की है और आज देश ने उस सेवा को सम्मान दिया है। यह छत्तीसगढ़ की मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक चेतना और जनजातीय संस्कृति की शक्ति का राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान है।

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