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April 05, 2026
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सेहत / शौर्यपथ /ब्लड प्रेशर के कम ज्यादा होने पर गंभीर समस्‍या का भी खतरा रहता है। इस दौरान थोड़ी सावधानी बरतने की जरूरत होती है। खानपान का ध्‍यान
रखना भी जरूरी होता है। बीपी अधिक होने पर सोडियम की मात्रा बेहद कम कर दी जाती है। तेल और घी का भी सेवन कमकर दिया जाता है। लेकिन अपनी डाइट चार्ट में बदलाव कर ब्‍लड प्रेशर को कंट्रोल किया जा सकता है। तो आइए जानते हैं ब्लड प्रेशर बढ़ने पर कौन से फल आप खा सकते हैं –
1. कीवी – एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर कीवी का सेवन कर सकते हैं। कीवी में विटामिन सी, फोलेट,फाइबर भरपूर मात्रा में मौजूद होता है। इसके सेवन से पाचन शक्ति मेंसुधार होता है, इम्‍यून सिस्‍टम मजबूत होता है, त्वचा भी अच्छीहोजाती है। कीवी का सेवन करने से दिल के दौरे, स्ट्रोक का खतरा कम होता है।
2.तरबूज – तरबूज में सबसे अधिक पानी की मात्रा होती है। इसीके साथ इसमें अमीनो एसिड,पोटेशियम, विटामिन सी, विटामिन ए, लाइकोपीन जैसे तत्‍व भी मौजूद होते हैं, जो हाई ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद करते हैं।
3.आम- फलोंका राजा आम किसे पसंद नहीं होते हैं। आम में मुख्य रूप से फाइबर और बीटा कैरोटीन मौजूद होता है, जिससे ब्लड प्रेशर को कम किया जा सकता है।
4.स्ट्रॉबेरी – यह सभी का पसंदीदा फल होता है। खट्टी-मीठी यह स्ट्रॉबेरी खाने से ताजगी महसूस होती है। इसमें मौजूदविटामिन सी, ओमेगा-3,फैटी एसिड होते हैं,जिससे हाई ब्लड प्रेशर को कम किया जा सकता है।
5.केला – केले के कई सारे फायदे हैं। यह बीपी को भी कंट्रोल करने में मदद करता है। इसमें मौजूद पोटेशियम,ओमेगा-3, फैटी एसिड होता है।

आस्था / शौर्यपथ /हिन्दू धर्म में त्रिदेवियों में से एक है माता लक्ष्मी। दीपावली के दिन इनकी विशेष पूजा होती है साथ ही विशेष अवसरों पर महालक्ष्मी की घर में स्थापना करके उनकी पूजा की जाती है। खासकर महाराष्ट्र में महालक्ष्‍मी की पूजा का प्रचलन है। हम अक्सर 2 नाम सुनते हैं लक्ष्मी और महालक्ष्मी। आखिर क्या यह दोनों एक ही हैं या दोनों में कोई अंतर या फर्क है? आओ जानते हैं प्रचलित मान्यता।
1. भृगु पुत्री लक्ष्मी: पुराणों में एक लक्ष्मी वह है जो समुद्र मंथन से जन्मीं थीं और दूसरी वह है जो भृगु की पुत्रीं थी। भृगु की पुत्री को श्रीदेवी भी कहते थे। उनका विवाह भगवान विष्णु से हुआ था।
2. दो लक्ष्मी : लक्ष्मीजी की अभिव्यक्ति को दो रूपों में देखा जाता है- 1. श्रीरूप और 2. लक्ष्मी रूप। श्रीरूप में वे कमल पर विराजमान हैं और लक्ष्मी रूप में वे भगवान विष्णु के साथ हैं। महाभारत में लक्ष्मी के 'विष्णुपत्नी लक्ष्मी' एवं 'राज्यलक्ष्मी' दो प्रकार बताए गए हैं।
3. भूदेवी और श्रीदेवी : एक अन्य मान्यता के अनुसार लक्ष्मी के दो रूप हैं- भूदेवी और श्रीदेवी। भूदेवी धरती की देवी हैं और श्रीदेवी स्वर्ग की देवी। पहली उर्वरा से जुड़ी हैं, दूसरी महिमा और शक्ति से। भूदेवी सरल और सहयोगी पत्नी हैं जबकि श्रीदेवी चंचल हैं। विष्णु को हमेशा उन्हें खुश रखने के लिए प्रयास करना पड़ता है।
5. समुद्र मंथन की महालक्ष्मी : समुद्र मंथन की लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। उनके हाथ में स्वर्ण से भरा कलश है। इस कलश द्वारा लक्ष्मीजी धन की वर्षा करती रहती हैं। उनके वाहन को सफेद हाथी माना गया है। दरअसल, महालक्ष्मीजी के 4 हाथ बताए गए हैं। वे 1 लक्ष्य और 4 प्रकृतियों (दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प, श्रमशीलता एवं व्यवस्था शक्ति) के प्रतीक हैं और मां महालक्ष्मीजी सभी हाथों से अपने भक्तों पर आशीर्वाद की वर्षा करती हैं। समुद्र मंथन से उत्पन्न लक्ष्मी को कमला कहते हैं जो दस महाविद्याओं में से अंतीम महाविद्या है।
6. विष्णुप्रिया लक्ष्मी : ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी थीं। उनकी माता का नाम ख्याति था। म‍हर्षि भृगु विष्णु के श्वसुर और शिव के साढू थे। महर्षि भृगु को भी सप्तर्षियों में स्थान मिला है। राजा दक्ष के भाई भृगु ऋषि थे। इसका मतलब वे राजा द‍क्ष की भतीजी थीं। माता लक्ष्मी के दो भाई दाता और विधाता थे। भगवान शिव की पहली पत्नी माता सती उनकी (लक्ष्मीजी की) सौतेली बहन थीं। सती राजा दक्ष की पुत्री थी।
7. धन की देवी : देवी लक्ष्मी का घनिष्ठ संबंध देवराज इन्द्र तथा कुबेर से है। इन्द्र देवताओं तथा स्वर्ग के राजा हैं तथा कुबेर देवताओं के खजाने के रक्षक के पद पर आसीन हैं। देवी लक्ष्मी ही इन्द्र तथा कुबेर को इस प्रकार का वैभव, राजसी सत्ता प्रदान करती हैं। देवी लक्ष्मी कमलवन में निवास करती हैं, कमल पर बैठती हैं और हाथ में कमल ही धारण करती हैं।
8. इसके अलावा 8 अवतार बताए गए हैं:- महालक्ष्मी, जो वैकुंठ में निवास करती हैं। स्वर्गलक्ष्मी, जो स्वर्ग में निवास करती हैं। राधाजी, जो गोलोक में निवास करती हैं। दक्षिणा, जो यज्ञ में निवास करती हैं। गृहलक्ष्मी, जो गृह में निवास करती हैं। शोभा, जो हर वस्तु में निवास करती हैं। सुरभि (रुक्मणी), जो गोलोक में निवास करती हैं और राजलक्ष्मी (सीता) जी, जो पाताल और भूलोक में निवास करती हैं।
9. अष्टलक्ष्मी : आदि लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी या जायालक्ष्मी और विद्यालक्ष्मी। ये सभी माता लक्ष्मी के विभिन्न रूप हैं।
10. लक्ष्मी और महालक्ष्मी में अंतर : शाक्त परंपरा में तीन रहस्यों का वर्णन है- प्राधानिक, वैकृतिक और मुक्ति। इस प्रश्न का, इस रहस्य का वर्णन प्राधानिक रहस्य में है। इस रहस्य के अनुसार महालक्ष्मी के द्वारा विष्णु और सरस्वती की उत्पत्ति हुई अर्थात विष्णु और सरस्वती बहन और भाई हैं। इन सरस्वती का विवाह ब्रह्माजी से और ब्रह्माजी की जो पुत्री सरस्वती है, उनका विवाह विष्णुजी से हुआ है। इससे यह पता चलता है कि महालक्ष्मीजी, विष्णु पत्नी लक्ष्मी जी से भिन्न हैं। महालक्ष्मी आदिदेवी हैं।

टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ /आपकी चिंता हम समझ सकते हैं क्योंकि स्कूल खुल रहें हैं और कोरोना वायरस की तीसरी लहर आ चुकी है। साथ ही, यह बरसात का मौसम है जिसमें सर्दी, खांसी, जुकाम बहुत आम है। ऐसे में अपने बच्चों का ख्याल रखने के लिए उनकी इम्युनिटी पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है।
इसलिए, हम आपके लिए लाए हैं ऐसे टिप्स जो बच्चों की इम्युनिटी बढ़ाने में योगदान कर सकते हैं। तो, चलिये जानते हैं इनके बारे में –

.१. ताज़े फल और सब्जियां खिलाएं
गाजर, हरी बीन्स, संतरे, स्ट्रॉबेरी: इन सभी में कैरोटेनॉयड्स होते हैं, जो इम्युनिटी-बढ़ाने वाले फाइटोन्यूट्रिएंट्स हैं। ये न्यूट्रिएंट्स संक्रमण से लड़ने वाली श्वेत रक्त कोशिकाओं और इंटरफेरॉन के उत्पादन को बढ़ा सकते हैं। यह एक प्रकार की एंटीबॉडी हैं, जो सेल की सतहों को कोट करती है और वायरस को रोकती है। कई अध्ययनों से पता चलता है कि फाइटोन्यूट्रिएंट्स से भरपूर आहार कैंसर और हृदय रोग जैसी बीमारियों से भी बचा सकता है।
2. उन्हें पर्याप्त नींद लेने को कहें
सिर्फ बड़े ही नहीं बच्चों के लिए भी पर्याप्त नींद लेना ज़रूरी है। रात को अच्छी नींद लेने से उनकी इम्युनिटी में वृद्धि हो सकती है। साथ ही, नींद की कमी से कई बीमारियों का जोखिम भी बढ़ता है, जो इस कोरोनाकाल में भारी पड़ सकता है। एक स्कूल जाने वाले बच्चे के लिए प्रतिदिन 8 से 10 घंटे की नींद ज़रूरी है।
3. नियमित रूप से उन्हें एक्सरसाइज़ करवाएं
इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए व्यायाम करना सबसे ज़रूरी है। बच्चा हो या बूढ़ा हर किसी को रोजाना कुछ समय योगा या एक्सरसाइज़ करने के लिए निकालना चाहिए। बच्चों को बचपन से ही एक्सरसाइज़ करवाने और एक हेल्दी लाइफस्टाइल जीने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप खुद भी अपने बच्चों के साथ एक्सरसाइज़ या योगा करें। इसके अलावा, उन्हें बहार जाने और दोस्तों के साथ खेलने को कहें।
4. बच्चों में अच्छी आदतें डालें
अच्छी स्वच्छता कीटाणुओं और संक्रमणों को दूर रखती है। खेलने के बाद, खाने से पहले और शौचालय का उपयोग करने के बाद हाथ धोने जैसी साधारण आदतों पर जोर दिया जाना चाहिए। उनके ओरल हाइजीन का भी ध्यान रखें क्योंकि खराब मौखिक स्वछता इम्युनिटी को प्रभावित करती है।
5. उन्हें बिना वजह एंटीबायोटिक्स न खिलाएं
अगर आपके बच्चे को मामूली सर्दी, खांसी, जुकाम है तो उन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक्स न दें। एंटीबायोटिक्स अक्सर हानिकारक बैक्टीरिया के साथ-साथ अच्छे बैक्टीरिया का भी सफाया कर देते हैं। इस प्रकार शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। अपने बाल रोग विशेषज्ञ की सलाह पर जाएं और उन पर हर बीमारी के लिए एंटीबायोटिक्स लिखने का दबाव न डालें।

खाना खजाना / शौर्यपथ / बदलता मौसम हो या फिर खाने के बाद कुछ मीठा खाने की करे क्रेविंग, मीठा पसंद करने वाले लोगों को हलवा खाने के लिए किसी बहाने की जरूरत नहीं होती। लेकिन अगर आपका मनपसंद हलवा आपके स्वाद के साथ आपकी सेहत का भी ख्याल रखने लगे तो? जी हां ऐसे ही एक हलवे का नाम है अमृतसरी गुड़ हलवा। अमृतसरी हलवे की यह फेमस रेसिपी न सिर्फ आपके स्वाद बल्कि सेहत का भी बदलते मौसम में खास ख्याल रखती है। तो आइए जान लेते हैं कैसे बनाई जाती है यह टेस्टी रेसिपी।
अमृतसरी गुड़ हलवा बनाने के लिए सामग्री-
-गुड़ – डेढ़ कप
-आटा – 1 कप
-देसी घी – 1 कप
-काजू – 10-12
-पानी – 3 कप
अमृतसरी गुड़ हलवा बनाने की विधि-
अमृतसरी गुड़ का हलवा बनाने के लिए सबसे पहले एक बर्तन में गुड़ और पानी डालकर इसे अच्छी तरह से घोल लें। अब गुड़ को पिघलाने के लिए इसे गैस पर धीमी आंच पर पकाएं जब तक की गुड़ पूरी तरह से न घुल जाए। जब तक गुड़ घुलता है तब तक एक दूसरी कड़ाही में घी डालकर उसे गर्म कर लें। घी पिघलने के बाद इसमें आटा डालें और उसे घी के साथ अच्छी तरह से मिक्स करें। इसे 4 से 5 मिनट तक तब तक पकाते रहे जब तक इसमें से अच्छी खुशबू न आने लगे।

अब गुड़ वाली चाशनी को छानकर कड़ाही में डालते हुए लगातार चलाते हुए पकाएं। चाशनी डालते वक्त आंच धीमी रखें। अब इसे 2-3 मिनट तक पका लें, फिर हलवे में काजू के टुकड़े डाल दें.। इस बात का ध्यान रखें की हलवे का पानी पूरी तरह से सूख जाना चाहिए। अब 14-15 मिनट तक इसे अच्छे चलाते हुए पकाएं। इसके बाद आपका अृमतसरी गुड़ का हलवा तैयार हो जाएगा। अब इस हलवे को गर्मागर्म परोसें ।

सेहत / शौर्यपथ /अधिकतर लोग चाय के बहुत शौकीन होते हैं। सुबह की शुरुआत चाय से करना ही पसंद करते ताकि दिनभर एक्टिव और तरोताजा महसूस कर सकें। लेकिन यदि ऐसी चाय के बारे में हम आपको बताएं जिसके सेवन से आपको ताजगी भी मिले, साथ ही आपके स्वास्थ्य को बेहतर करने में भी चाय मदद करे तो? जी हां, हम बात कर रहे हैं नींबू की चाय की। इसके रोज सुबह सेवन करने से आपको कई स्वास्थ्य लाभ होते हैं।
नींबू की चाय आपके लिए सबसे अच्छे विकल्पों में से एक है। नींबू की चाय आसानी से तैयार की जाती है और कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती है। यह आपके शरीर के टॉक्सिन को निकालने में मदद करती है और आपके शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है। इसके अलावा आपको रिफ्रेशमेंट भी महसूस करवाती है।
नींबू की चाय कैसे बनाएं?
* नींबू में विटामिन सी पाया जाता है, जो आपकी त्वचा के लिए फायदेमंद है। इसके नियमित सेवन से चेहरे पर चमक और मुंहासे की समस्या में राहत मिलती है।
* नींबू की चाय में एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल गुण पाए जाते हैं। इसके नियमित सेवन से बीमारियों के उपचार में मदद मिलती है।
* नींबू की चाय पीने पर आपको सर्दी-जुकाम से राहत मिलती है, साथ ही यह प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाती है।
नींबू के 25 प्रयोग, दूर करेंगे हर रोग
नींबू विटामिन सी का बेहतर स्त्रोत है।आपकी सेहत के लिए केवल थोड़े से नींबू का सेवन करना फायदेमंद साबित होगा। आप किसी भी रूप में इसका नियमित सेवन कर सकते हैं, चाहे तो अपने भोजन में इसे शामिल करें या चाहे तो नींबू-पानी बनाकर पिएं।
आइए, जानते हैं नियमित नींबू का सेवन करने से आपको क्या सेहत लाभ मिलते हैं और किस प्रकार यह आपको स्वस्थ रखने में मदद करता है-
1. नींबू पानी विटामिन सी का एक बेहतरीन स्त्रोत है। इसमें पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं, जिससे आप कई तरह के रोग और बैक्टीरिया से बचे रहते हैं।
2. अगर आप सुबह फ्रेश होने से पहले गर्म पानी में नींबू निचोड़कर पीते हैं, तो आपका पेट आसानी से साफ होगा और कब्ज की समस्या नहीं होगी।
3. नींबू विटामिन सी का स्त्रोत है इसलिए यह त्वचा को स्वस्थ बनाने के साथ ही लिवर के लिए भी यह बेहतर होता है।
4. नींबू पानी में कई तरह के मिनरल्स जैसे आयरन, मैग्नीशियम, फास्फोरस, कैल्शियम, पोटैशियम और जिंक पाए जाते हैं।
5. नींबू पानी पीने से शरीर को रिहाइड्रेट होने में मदद मिलती है और यह यूरीन को पतला रखने में मदद करता है।
6. नींबू पानी हाई शुगर वाले जूस व ड्रिंक का बेहतर विकल्प है। खासतौर से उनके लिए जो डायबिटिक या वजन कम करना चाहते हैं।
7. नींबू पानी में मौजूद नींबू का रस हाइड्रोक्लोरिक एसिड और पित्त सिक्रेशन के प्रोडक्शन में वृद्धि करता है, जो पाचन के लिए आवश्यक और पाचनक्रिया में फायदेमंद है।
8. प्रतिदिन सुबह गर्म नींबू पानी पिएं और पूरे दिन कॉन्स्टीपेशन की समस्या से दूर रहें।
9. नींबू पानी को गुनगुना करके पीने से गले की खराबी या फैरिन्जाइटिस में आराम पहुंचाता है।
10. नींबू पानी पीने से मसूड़ों से संबंधित समस्याओं से राहत मिलती है। नींबू पानी में एक चुटकी नमक मिलाकर पीने से बेहतर परिणाम मिलते हैं।
11. नींबू पानी में एंटी ट्यूमर गुण होते हैं, जिससे की कैंसर का खतरा कम हो जाता है।
12. इसमें ब्लड प्रेशर को कम करने के गुण के साथ ही तनाव,डिप्रेशन और अवसाद कम करने के गुण पाये जाते हैं। नींबू पानी पीने से तुरंत ही आपको आराम का अनुभव होगा।
13 हल्के गर्म पानी में शहद-नींबू डालकर पीने से गले के इंफेक्शन से भी छुटकारा मिलता है। नींबू कफ को बाहर निकालने में मददगार साबित हो सकता है वहीं शहद में एंटी-बैक्टेरियल तत्व होते हैं। जो थ्रोट इंफेक्शन से राहत पाने के लिए इस ड्रिंक को पीने की सलाह दी जाती है।
14 अगर आप सुबह फ्रेश होने के बाद यानि बिल्कुल खाली पेट इसका प्रयोग करते हैं, तो यह आपकी बढ़ी हुई चर्बी कम करने में मददगार साबित होगा और आपका वजन भी कम होगा।
15 यह आपके पाचन तंत्र को फायदा पहुंचाएगा और पाचन क्रिया पहले से बेतर होगी। इसके चलते आपको पेट की समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा।
16 गर्म नींबू पानी का सेवन आपके शरीर की अंदर से सफाई करता है और हानिकरक तत्वों को शरीर से बाहर करने में मदद करता है। यह प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाता है।
17 नींबू पानी सेवन का एक बड़ा फायदा यह भी है कि यह आपको मुंह और सांसों की दुर्गंध से भी निजात दिलाएगा और आप ताजगी महसूस करेंगे। इसमें मौजूद विटामिन सी भी आपको कई फायदे देगा।
18 नींबू में विभिन्न विटामिन्स जैसे थियामिन, रिबोफ्लोविन, नियासिन, विटामिन बी- 6, फोलेट और विटामिन-ई की थोड़ी मात्रा मौजूद रहती है। यह खराब गले, कब्ज, किडनी और मसूड़ों की समस्याओं में राहत पहुंचाता है।
19 नींबू ब्लड प्रेशर और तनाव को कम करता है।
20 त्वचा को स्वस्थ बनाने के साथ ही लिवर के लिए भी यह बेहतर होता है।
21 नींबू पानी, हाई शुगर वाले जूस व ड्रिंक का बेहतर विकल्प माना जाता है। खासतौर से उनके लिए जो डायबिटीज के मरीज हैं या वजन कम करना चाहते हैं। यह शुगर को गंभीर स्तर तक पहुंचाए बिना शरीर को रिहाइड्रेट व एनर्जाइज करता है।
22 साथ ही यह किडनी स्टोन बनने के किसी भी तरह के खतरे को कम करता है।
23 हर सुबह शहद के साथ गुनगुना नींबू पानी पीने से अतिरिक्त वजन आसानी से कम किया जा सकता है।
24 यदि आप दिनभर फ्रेश महसूस करना चाहते हैं, तो आपको रोजाना नींबू पानी पीना चाहिए। यह आपको फ्रेश रखता हैं। इसलिए अपनी आदत बनाए की नियमित रूप से नींबू पानी का सेवन करें।
25 आपकी खूबसूरती को बढ़ाने के लिए नींबू पानी बहुत कारगर है। यह त्वचा को फायदा पंहुचाता है। नियमित इसे पीने से चेहरे पर ग्लो आता है।

आस्था / शौर्यपथ /भगवान श्रीकृष्ण की प्रेमिका राधा। महाभारत में 'राधा' के नाम का उल्लेख नहीं मिलता है। राधा का जिक्र विष्णु, पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। राधा और रुक्मणि दोनों ही कृष्ण से उम्र में बड़ी थीं। मान्यता और किवदंतियों के आधार पर आओ हम जानते हैं राधा रानी के 5 ऐसे रहस्य जिन्हें जानकर आपको आश्चर्य होगा।
1. पहला राज : पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक वैष्य गोप की पुत्री थीं। उनकी माता का नाम कीर्ति था। उनका नाम वृषभानु कुमारी पड़ा। बरसाना राधा के पिता वृषभानु का निवास स्थान था। कुछ विद्वान मानते हैं कि राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था और बाद में उनके पिता बरसाना में बस गए। लेकिन अधिकतर मानते हैं कि उनका जन्म बरसाना में हुआ था।
पुराणों के अनुसार अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था और इसी तिथि को शुक्ल पक्ष में देवी राधा का जन्म भी हुआ था। बरसाने में राधाष्टमी का त्योहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। राधाष्टमी का पर्व जन्माष्टमी के 15 दिन बाद भद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है।
राधारानी का विश्वप्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। बरसाना में राधा को 'लाड़ली' कहा जाता है। राधा का प्राचीन मंदिर मध्यकालीन है जो लाल और पीले पत्थर का बना है। मंदिर का निर्माण राजा वीर सिंह ने 1675 में करवाया था।
2. दूसरा राज : ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड अध्याय 49 श्लोक 35, 36, 37, 40, 47 के अनुसार एक अलग रिश्ते के अनुसार राधा श्रीकृष्ण की मामी भी थीं, क्योंकि उनका विवाह कृष्ण की माता यशोदा के भाई रायाण के साथ हुआ था। रायाण को रापाण अथवा अयनघोष भी कहा जाता था।
पिछले ज्म में राधा का पति रायाण गोलोक में श्रीकृष्ण का अंशभूत गोप था। अत: गोलोक के रिश्ते से राधा श्रीकृष्ण की पुत्रवधू हुई। माना जाता है कि गोकुल में रायाण रहते थे। मतलब यह कि राधा का श्रीकृष्ण से पिछले जन्म का भी रिश्ता है। यह भी कि उन्हें लक्ष्मी का रूप भी माना जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्मखंड के 5वें अध्याय में श्लोक 25, 26 के अनुसार राधा को कृष्ण की पुत्री सिद्ध किया गया है।
3. तीसरा राज : ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खंड अध्याय 48 के अनुसार और यदुवंशियों के कुलगुरु गर्ग ऋषि द्वारा लिखित गर्ग संहिता की एक कथा के अनुसार एक बार नंदबाबा श्रीकृष्ण को लेकर बाजार घूमने निकले थे। उसी दौरान राधा और उनके पिता भी वहां पहुंचे थे। दोनों का वहां पहली बार मिलन हुआ। उस दौरान दोनों की ही उम्र बहुत छोटी थी। उस स्थान को सांकेतिक तीर्थ स्थान कहते हैं। यह स्थान संभवत: नंदगांव और बरसाने के बीच है। संकेत का शब्दार्थ है पूर्वनिर्दिष्ट मिलने का स्थान। इसको लेकर ब्रह्मवैवर्त पुराण में बहुत बड़ी कथा मिलती है।
श्रीमद्भागवत और विष्णुपुराण के अनुसार कंस के अत्याचार से बचने के लिए नंदजी कुटुम्बियों और सजातियों के साथ नंदगांव से वृंदावन में आकर बस गए थे, जहां बरसाने के लोग भी थे। मान्यता है कि यहीं पर वृंदावन में श्रीकृष्‍ण और राधा एक घाट पर युगल स्नान करते थे। उस वक्त कृष्ण 7 साल के थे और राधे 12 की, उनके साथ उन्हीं की उम्र के बच्चों की एक बड़ी टोली रहा करती थी, जो गांव की गलियों में धमाचौकड़ी मचाया करती थी। वृंदावन में बच्चों की इस धमाचौकड़ी को भक्तिकाल के कवियों ने प्रेमलीला में बदल दिया। वृंदावन में ही श्रीकृष्ण और गोपियां आंख-मिचौनी का खेल खेलते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और उनके सभी सखा और सखियां मिलकर रासलीला अर्थात होली आदि तीज-त्योहारों पर नृत्य-उत्सव का आयोजन करते थे।
4. चौथा राज : 11 वर्ष की अवस्था में श्रीकृष्ण मथुरा चले गए थे और वहां उन्होंने कंस का वध कर दिया जिसके चलते मगध और भारत का सबसे शक्तिशाली सम्राट उनकी जान का दुश्मन बन गया, क्योंकि कंस उसका दामाद था। इसके बाद राधा और कृष्ण के मिलन का उल्लेख नहीं मिलता है। कहते हैं कि इसके बाद राधा और श्रीकृष्ण की अंतिम मुलाकात द्वारिका में हुई थी। सारे कर्तव्यों से मुक्त होने के बाद राधा आखिरी बार अपने प्रियतम कृष्ण से मिलने गईं। जब वे द्वारका पहुंचीं तो उन्होंने कृष्ण के महल और उनकी 8 पत्नियों को देखा। जब कृष्ण ने राधा को देखा तो वे बहुत प्रसन्न हुए। तब राधा के अनुरोध पर कृष्ण ने उन्हें महल में एक देविका के पद पर नियुक्त कर दिया।
5. पांचवां राज : कहते हैं कि वहीं पर राधा महल से जुड़े कार्य देखती थीं और मौका मिलते ही वे कृष्ण के दर्शन कर लेती थीं। एक दिन उदास होकर राधा ने महल से दूर जाना तय किया। कहते हैं कि राधा एक जंगल के गांव में में रहने लगीं। धीरे-धीरे समय बीता और राधा बिलकुल अकेली और कमजोर हो गईं। उस वक्त उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की याद सताने लगी। आखिरी समय में भगवान श्रीकृष्ण उनके सामने आ गए। भगवान श्रीकृष्ण ने राधा से कहा कि वे उनसे कुछ मांग लें, लेकिन राधा ने मना कर दिया। कृष्ण के दोबारा अनुरोध करने पर राधा ने कहा कि वे आखिरी बार उन्हें बांसुरी बजाते देखना और सुनना चाहती हैं। श्रीकृष्ण ने बांसुरी ली और बेहद सुरीली धुन में बजाने लगे। श्रीकृष्ण ने दिन-रात बांसुरी बजाई। बांसुरी की धुन सुनते-सुनते एक दिन राधा ने अपने शरीर का त्याग कर दिया।

टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / कोविड-19 की जद में आने वाले लोग रिकवर तो हो रहे हैं लेकिन एक नई समस्या उभर कर सामने आ रही है। वह है सूंघने की क्षमता खत्म होना। हालांकि डॉ. द्वारा समझाया जा रहा है कि कुछ दिन बाद सूंघने की क्षमता लौट आएगी। लेकिन कई लोगों को 6 महीने बाद भी किसी तरह की सुगंध महसूस नहीं हो रही है। यह एक चिंताजनक विषय है। लेकिन कुछ उपाय जिसकी मदद से दोबारा सूंघने की शक्ति लौट सकती है। लेकिन इससे पहले जानते हैं आखिर सूंघने की शक्ति क्यों चली जाती है?
इंसानों की नाक में मौजूद ओल्फक्टरी नर्व से जुड़ा होता है। यह वही जरिया है जिससे किसी भी प्रकार की गंध से जुड़ी सूचना को पहले मस्तिष्क तक पहुंचाया जाता है। लेकिन वायरस की चपेट में आने के बाद ओल्फक्टरी नर्व और मस्तिष्क का संबंध टूट जाता है। इससे सूंघने की शक्ति खत्म हो जाती है।
आइए जानते हैं सूंघने की शक्ति वापस पाने के घरेलू उपाय -
1.सूंघने की शक्ति वापस पाने के लिए खट्टे फलों को सूंघने और इसका सेवन करने से भी खुशबू लौट सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार नियमित प्रयोग करने से यह संभव है।
2.विटामिन-ए और अल्फा लिपोइक एसिड मौजूद खाद्य पदार्थों का सेवन करें। जैसे- चावल, ब्रोकोली, मछली, दूध, गाजर, पालक, टमाटर, चुकंदर, पपीता, दही इनके सेवन से स्वाद और सुगंध दोनों लौटाने में मदद होगी।
3.कुछ चीजें ऐसी होती है जिनकी खुशबू बहुत अधिक स्ट्रांग होती है। जैसे पुदीना, लौंग, नीलगिरी, जायफल, परफ्यूम, नींबू के छिलके भी सूंघने से ओल्फक्टरी नर्व को दोबारा सक्रिय किया जा सकता है।
4.योग हमेशा से स्वास्थ्य के लिए लाभदायक रहा है। सूंघने के शक्ति वापस लाने के लिए प्रतिदिन 15 मिनट अनुलोम-विलोम करें। इससे कुछ ही दिनों में फायदा नजर आएगा।
5.जल नेति की मदद से भी लॉस ऑफ स्मेल यानी सुगंध का चले जाना। इसे वापस लाने में मदद करती है। लेकिन इसका प्रयोग किसी एक्सपर्ट के गाइडेंस में ही करें।

सेहत / शौर्यपथ /बदलती लाइफस्टाइल में आंत और पेट से संबंधित समस्या आम बात जरूर हो गई है लेकिन इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इम्यून सिस्टम मजबूत होने पर आप किसी भी बीमारी से आसान से पार पा लेते हैं लेकिन कमजोर इम्यूनिटी से वायरल इंफेक्शन की चपेट में आ जाते हैं। इम्यून सिस्टम को बेहतर करने के लिए आयुर्वेदिक डाइट भी आजमा सकते हैं। इस डाइट से आपको मानसिक शांति भी मिलेगी। साथ ही शरीर भी स्वस्थ होगा। आयुर्वेदिक डाइट को फॉलो करने में आप शुरुआत में जरूर आलसी खा सकते हैं लेकिन उसे रूटीन में लाने के बाद आप बेहतर महसूस करेंगे। तो आइए जानते हैं आयुर्वेदिक डाइट के बारे में जो आपके पूरे शरीर के विकास के लिहाज से बहुत अच्छा है।
1.शांति से भोजन करें -भोजन करते वक्त किसी से भी किसी भी तरह की बातचीत नहीं करें। मौन रहकर भोजन करें। इससे आपको बहुत मिलेगी। साथ ही आपको हल्का महसूस होगा और खाने में किसी प्रकार की समस्या नहीं होगी। आयुर्वेद के मुताबिक भोजन करने के दौरान बिल्कुल शांत वातावरण में रहकर भोजन करें।
2. डिजिटल उपकरणों को रखें दूर -भोजन करते वक्त आजकल किसी को किसी की जरूरत महसूस नहीं होती है।क्योंकि उनके साथ मोबाइल या लैपटॉप रहता है। लेकिन ऐसा करने से मोबाइल या लैपटाॅप की किरणे आपके के अंदर पहुंचकर आपको नुकसान पहुंचाती है। सबसे बड़ी चीज इसके उपयोग के साथ आप अधिक खाना खाते हैं साथ ही बहुत देर तक खाते रहते हैं।
3.पैकेज्ड फूड से बचें -आजकल घर का खाना कम बाहर का खाना ज्यादा अच्छा लगता है। लेकिन लगातार खाने से बहुत जल्दी डॉक्टर के पास जाते हैं और फिर सब कुछ बंद हो जाता है। इसलिए नियमित रूप से घर का खाना खाएं। और अधिक से अधिक पानी पिएं। इससे आपके पेट में हो रही गड़बड़ी में आराम मिलेगा।
4.भोजन को चबाकर खाएं -अगर आप भोजन को अच्छे से चबाकर खाएंगे तो आगे की प्रक्रिया आराम से होगी। जैसे कि पाचन प्रक्रिया मुख से ही शुरू होती है। इसके बाद भोजन पेट में पहुंचता है। इसलिए भोजन हमेशा चबाकर खाने की सलाह दी जाती है।
5. भोजन की मात्रा -कई बार भोजन करने के बाद भी समझ नहीं आता है कि पेट भराया है या नहीं। ऐसा इसलिए होता क्योंकि उस दौरान हम किसी
से बात करें होते हैं, टीवी देख रहे होते हैं या साथ में अन्य काम भी कर रहे होते ।
आयुर्वेद के अनुसार भोजन के करते समय अन्य कार्यों को एक तरफ रख देना चाहिए। ताकि सीमित मात्रा में भोजन कर सकें।
ऊपर दी गई सभी जानकारी बहुत सामान्य सी है लेकिन वैज्ञानिक तर्ज पर 21 दिन तक किसी भी चीज को फॉलो करने से वह आपके प्रतिदिन का हिस्सा बन जाता है। सेहत की लिहाज से सामान्य भोजन पेट और आंत की समस्या से निदान दिलाने में सबसे अधिक सहायक है।

खाना खजाना / शौर्यपथ /गणेशोत्सव के दस दिनों में भगवान श्री गणेश को अलग-अलग पकवानों को भोग लगाया जाता है। अत: गणेश पूजा के अवसर पर भगवान श्री गणेश को मोदक और लड्‍डूओं का भोग अवश्य लगाना चाहिए, क्योंकि यह उनके सबसे प्रिय व्यंजन है। यहां पढ़ें 5 खास प्रसाद-
सामग्री : 3 कटोरी बेसन (दरदरा पिसा हुआ), 2 कटोरी चीनी, एक छोटा चम्मच इलायची पावडर, काजू अथवा बादाम पाव कटोरी, केसर 5-6 लच्छे, मीठा पीला रंग चुटकी भर, तलने के लिए पर्याप्त मात्रा में देसी घी, पाव कप दूध।
विधि : सबसे पहले बेसन को छान लें। उसमें चुटकी भर मीठा पीला रंग मिलाइए और पानी से घोल तैयार कर लीजिए। अब एक तपेले में पानी एवं शकर को मिलाकर एक तार की चाशनी तैयार कर लें। चाशनी में थोड़ा-सा पीला रंग और केसर हाथ से मसलकर डाल दीजिए। साथ ही पिसी इलायची भी डाल दें।
एक कड़ाही में घी गर्म करके छेद वाली स्टील की चलनी या झारे की सहायता से थोड़ी-थोड़ी करके सारे घोल की बूंदी बनाते जाइए और चाशनी में डालते जाइए। जब बूंदी पूरी तरह चाशनी पी लें, तब हाथ पर हल्का-सा घी या पानी लगाकर हल्के से दबाते हुए सभी बूंदी के लड्‍डू तैयार कर लें। लड्‍डू बनाते समय सभी पर एक-एक काजू अथवा बादाम लड्‍डू के ऊपर हाथ से दबा दें। घर पर तैयार किए गए इन खास लड्‍डूओं से भोग लगाएं।
नारियल के मोदक
मोदक सामग्री : डेढ़ कप किसा हुआ नारियल, दो बड़े चम्मच घी, एक कप सूजी, एक कप शक्कर, पानी आवश्यकतानुसार, अन्य सामग्री- चुटकी भर मीठा पीला रंग, 5-10 पिस्ता, इलायची पावडर आदि।
आसान वि‍धि : एक मोटी तल वाली कड़ाही में घी गरम करके छनी हुई सूजी को हल्का भूरा होने तक सेक लें। अब इसमें किसा हुआ नारियल डालें और थोड़ा सेक लें।
तत्पश्चात एक दूसरे पैन में शक्कर-पानी मिलाकर चाशनी बनाएं। ध्यान रहें चाशनी एक तार की हो। अब इसमें मीठा रंग, इलायची मिला लें और उसमें सूजी-नारियल का मिश्रण डालें और अच्छी तरह से मिला लें। फिर थोड़ी देर ढंक कर रखे और ठंडा होने दें। मिश्रण गुनगुना होने पर सभी के मोदक बना लें। ऊपर से एक पिस्ता मोदक के मुंह पर चिपका दें और तैयार स्वादिष्ट नारियल के मोदक प्रसाद में उपयोग में लाएं।
बेसन के लड्डू
सामग्री : 1 कप मोटा बेसन, 1 कप शकर का बूरा, 1 चम्मच पीसी इलायची, 4-5 बड़ा चम्मच घी, मेवे की कतरन पाव कप, चांदी का वर्क (आवश्‍यकतानुसार), केसर या बादाम।
विधि : एक कप मोटा लेकर छान लें। अब 4-5 चम्मच घी डालें व लगातार चलाते रहें, जब तक बेसन हल्का भूरा ना हो जाए। बीच-बीच में इस बात का ध्यान रखें कि बेसन जल न जाए। बेसन अच्छी तरह सिंक जाने पर थाली में निकाल कर ठंडा करें।
अब शकर बूरा, पीसी इलायची व मेवे की कतरन मिलाएं तथा अच्छी तरह मिक्स कर लें। जब मिश्रण गुनगुना होने लगे तब इसके छोटे-छोटे लड्डू बनाएं और चांदी का वर्क लगाकर सर्व करें। आप चाहे तो चांदी की वर्क की जगह केसर की पत्ती या बादाम का उपयोग कर सकती है।
रवा लड्डू
सामग्री : 500 ग्राम रवा, 500 ग्राम घी, 400 ग्राम शकर का बूरा, 25 ग्राम किशमिश, 25 ग्राम चारोली, एक चम्मच इलायची पावडर, गुनगुना पानी आवश्यक्तानुसार।
विधि : रवे को छानकर उसमें 2-3 बड़े चम्मच मोयन डालकर अच्छी तरह मिला लें। अब रवे को गुनगुने पानी से कड़ा गूंथ लें। एक कड़ाही में घी गरम रखें। अब गूंथे आटे के बड़े-बड़े मुठिए बनाकर धीमी आंच पर तल लें। अब तले मुठिए को हाथ से बारीक मसलकर उसका रवा तैयार करके चलनी से छान लें। सारे मुठिए का जब रवा तैयार हो जाए तब उसे थोड़ी देर ठंडा होने के लिए रख दें।
अब रवे में शकर का बूरा, इलायची पावडर व चारोली मिला दें। आवश्‍यकतानुसार और घी मिला लें ताकि उनके लड्‍डू आसानी से बन जाए। अब लड्‍डू बनाते समय ऊपर से एक-एक किशमिश चिपका दें। लीजिए तैयार टेस्टी रवा लड्‍डू से अपना त्योहार मनाएं।
राइस मोदक
सामग्री : 1 कप चावल का आटा, 1 कप बारीक किया हुआ गुड़, 1 कप खोपरे का बूरा, पाव कटोरी मेवे (काजू-किशमिश-बादाम की कतरन), इलायची पावडर आधा चम्मच, चुटकी भर नमक और घी।
विधि : सबसे पहले एक कड़ाही में गुड़ पिघला लें तथा उसे थोड़ा गाढ़ा होने दें। फिर उसमें खोपरे का बूरा मिलाकर हल्के से भून लें। अब इस मिश्रण में मेवे की कतरन डालें, मिलाएं और आंच से उतार कर ठंडा होने के लिए रख दें। तत्पश्चात चावल के आटे को पानी की सहायता से नरम गूंथ कर थोड़ी देर ढंक कर रख दें।
अब आटे की छोटी-सी लोई हाथ में लेकर फैलाएं, ऊपर से एक छोटा चम्मच मिश्रण रखकर मोदक का आकार सभी मोदक तैयार कर लें। एक कड़ाही में घी गरम करके धीमी आंच पर सभी मोदक तल लें। लीजिए तैयार मेवे भरे चावल के लजीज मोदक से भगवान श्रीगणेश को भोग लगाएं।

आस्था / शौर्यपथ /देवी लक्ष्मी को धन और समृद्धि प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। मान्यता है कि माता लक्ष्मी के मंदिर में जाकर पूजन-अर्चन करने से आर्थिक संकट समाप्त हो जाता है। खासकर शुक्रवार को यहां जाना चाहिए। महालक्ष्मी और लक्ष्मी के कई प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है। उनमें से ही जानते हैं 10 की जानकारी।
1. पद्मावती का मंदिर : तिरुपति के पास तिरुचुरा नामक एक छोटा-सा गांव है। इस गांव में देवी पद्मावती का सुंदर मंदिर है। यह मंदिर 'अलमेलमंगापुरम' के नाम से भी जाना जाता है। लोक मान्यता है कि तिरुपति बालाजी के मंदिर में मांगी मुराद तभी पूरी होती है, जब श्रद्धालु बालाजी के साथ-साथ देवी पद्मावती का आशीर्वाद भी ले लें।
2. दक्षिण भारत का स्वर्ण मंदिर : भारतीय राज्य तमिलनाडु के जिले वेल्लू में स्थित थिरुमलई कोड गांव श्रीपुरम में स्थित महालक्ष्मी मंदिर को 'दक्षिण भारत का स्वर्ण मंदिर' कहा जाता है। 100 एकड़ में फैला यह मंदिर चेन्नई से 145 किलोमीटर दूर पलार नदी के किनारे स्थित है।
3. पद्मनाभस्वामी मंदिर : पद्मनाभस्वामी मंदिर केरल के तिरुअनंतपुरम् में मौजूद भगवान विष्णु का प्रसिद्ध मंदिर है, लेकिन यहां से अपार मात्रा में 'लक्ष्मी' की प्राप्ति हुई थी। यह मंदिर अपने सोने के खजाने के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। भगवान विष्णु को समर्पित पद्मनाम मंदिर को त्रावणकोर के राजाओं ने बनाया था। इसका जिक्र 9वीं शताब्दी के ग्रंथों में भी आता है, लेकिन मंदिर के मौजूदा स्वरूप को 18वीं शताब्दी में बनवाया गया था।
4. मुंबई का महालक्ष्मी मंदिर : समुद्र के किनारे बी. देसाई मार्ग पर स्थित यह मंदिर अत्यंत सुंदर, आकर्षक और लाखों लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। ज्ञात इतिहास के अनुसार इस महालक्ष्मी मंदिर की स्थापना अंग्रेजों के काल में हुई। उस समय देवी लक्ष्मी एक ठेकेदार रामजी शिवाजी के स्वप्न में प्रकट हुईं और उन्हें समुद्र तल से देवियों की 3 प्रतिमाएं निकालकर मंदिर में स्थापित करने का आदेश दिया। मंदिर के गर्भगृह में महालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वती तीनों देवियों की प्रतिमाएं एकसाथ विद्यमान हैं।
5. कोल्हापुर का महालक्ष्मी मंदिर : कोल्हापुर महाराष्ट्र का एक जिला है। कहा जाता है कि यहां स्थित महालक्ष्मी मंदिर का निर्माण चालुक्य शासक कर्णदेव ने 7वीं शताब्दी में करवाया था। इसके बाद शिलहार यादव ने 9वीं शताब्दी में इसका पुनर्निर्माण करवाया था।
मंदिर के मुख्य गर्भगृह में देवी महालक्ष्मी की लगभग 40 किलो की प्रतिमा स्थापित है जिसकी लंबाई लगभग 4 फीट की है। कहा जाता है कि यहां की लक्ष्मी प्रतिमा लगभग 7,000 साल पुरानी है।
6. लक्ष्मीनारायण मंदिर : दिल्ली के प्रमुख मंदिरों में से एक लक्ष्मीनारायण मंदिर को मूल रूप में 1622 में वीरसिंह देव ने बनवाया था, उसके बाद पृथ्वीसिंह ने 1793 में इसका जीर्णोद्धार कराया। इसके बाद सन् 1938 में भारत के बड़े औद्योगिक परिवार बिड़ला समूह ने इसका विस्तार और पुनरुद्धार कराया जिसके बाद इसे बिड़ला मंदिर भी कहा जाता है।
7. इंदौर का महालक्ष्मी मंदिर : इंदौर शहर के हृदयस्थल राजवाड़ा की शान कहे जाने वाले श्री महालक्ष्मी मंदिर के संबंध में कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 1832 में मल्हारराव (द्वितीय) ने कराया था। 1933 में यह 3 तलों वाला मंदिर था, जो आग के कारण तहस-नहस हो गया था। 1942 में मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार कराया गया था। वर्तमान में मुंबई के महालक्ष्मी मंदिर की तर्ज पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार करके इसे भव्य रूप दिया गया है।
8. चौरासी मंदिर : यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के चंबा से 65 किलोमीटर दूर भरमौर जिला नगर में स्थित है। यहां महालक्ष्मी के साथ गणेशजी और नरसिंह भगवान की मूर्ति भी स्थित है। प्राकृतिक वादियों में बसा यह मंदिर ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
9. चंबा का लक्ष्मीनारायण का मंदिर : हिमाचल के चंबा में स्थित यह मंदिर पारंपरिक वास्तुकारी और मूर्तिकला का उत्कृष्‍ट उदाहरण है। चंबा के 6 प्रमुख मंदिरों में यह मंदिर सबसे विशाल और प्राचीन है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर राजा साहिल वर्मन ने 10वीं शताब्दी में बनवाया था। यह मंदिर शिखर शैली में निर्मित है।
10. अष्टलक्ष्मी मंदिर : चेन्नई के इलियट समुद्र तट के पास स्थित यह मंदिर लगभग 65 फीट लम्बा और 45 फीट चौड़ा है। मंदिर में देवी लक्ष्मी के आठ स्वरूप 4 मंजिल में बने 8 अलग-अलग कमरों में स्थापित है। इस मंदिर में देवी लक्ष्मी अपने पति और भगवान विष्णु के साथ मंदिर की दूसरी मंजिल में विराजित है।

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