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आस्था /शौर्यपथ / भारतीय राज्य ओड़िसा में सप्तपुरियों में से एक है पुरी जहां पर प्रभु जगन्नाथ का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। इसे चार धामों में एक माना जाता है। इस मंदिर को राजा इंद्रद्युम्न ने हनुमानजी की प्रेरणा से बनवाया था। कहते हैं कि इस मंदिर की रक्षा का दायित्व प्रभु जगन्नाथ ने श्री हनुमानजी को ही सौंप रखा है। यहां के कण कण में हनुमानजी का निवास है। हनुमानजी ने यहां कई तरह के चमत्कार बताए हैं। उन्हीं में से एक है समुद्र के पास स्थित मंदिर के भीतर समुद्र की आवाज को रोक देना।
इस मंदिर के चारों द्वार के सामने रामदूत हनुमानजी की चौकी है अर्थात मंदिर है। परंतु मुख्य द्वार के सामने जो समुद्र है वहां पर बेड़ी हनुमानजी का वास है। यहां जगन्नाथपुरी में ही सागर तट पर बेदी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। भक्त लोग बेड़ी में जकड़े हनुमानजी के दर्शन करने के लिए आते हैं।
एक बार नारदजी भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पहुंचे तो उनका सामना हनुमानजी से हुआ। हनुमानजी ने कहा कि इस वक्त तो प्रभु विश्राम कर रहे हैं आपको इंतजार करना होगा। नारदजी द्वार के बाहर खड़े होकर इंतजार करने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने मंदिर के द्वार के भीतर झांका तो प्रभु जगन्नाथ श्रीलक्ष्मी के साथ उदास बैठे थे। उन्होंने प्रभु से इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहाकि यह समुद्र की आवाज हमें विश्राम कहां करने देती है।
नारदजी ने यह बात बाहर जाकर हनुमानजी को बताई। हनुमानजी ने क्रोधित होकर समुद्र से कहा कि तुम यहां से दूर हटकर अपनी आवाज रोक लो क्योंकि मेरे स्वामी तुम्हारे शोर के कारण विश्राम नहीं कर पात रहे हैं। यह सुनकर समुद्रदेव ने प्रकट होकर कहा कि हे महावीर हनुमान! यह आवाज रोकना मेरे बस में नहीं। जहां तक पवनवेग चलेगा यह आवाज वहां तक जाएगी। आपको इसके लिए अपने पिता पवनदेव से विनति करना चाहिए।
तब हनुमानजी ने अपने पिता पवदेव का आह्वान किया और उनसे कहा कि आप मंदिर की दिशा में ना बहें। इस पर पवनदेव ने कहा कि पुत्र यह संभव नहीं है परंतु तुम्हें एक उपाय बताता हूं कि तुम्हें मंदिर के आसपास ध्वनिरहित वायुकोशीय वृत या विवर्तन बनाना होगा। हनुमानजी समझ गए।
तब हनुमानजी ने अपनी शक्ति से खुद को दो भागों में विभाजित किया और फिर वे वायु से भी तेज गति से मंदिर के आसपास चक्कर लगाने लगे। इससे वायु का ऐसा चक्र बना की समुद्र की ध्वनि मंदिर के भीतर ना जाकर मंदिर के आसपास ही घूमती रहती है और मंदिर में श्री जगन्नाथजी आराम से सोते रहते हैं।
यही कारण है कि तभी से मंदिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर ही (मंदिर के अंदर से) आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि को नहीं सुन सकते। आप (मंदिर के बाहर से) एक ही कदम को पार करें, तब आप इसे सुन सकते हैं। इसे शाम को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। इसी तरह मंदिर के बाहर स्वर्ग द्वार है, जहां पर मोक्ष प्राप्ति के लिए शव जलाए जाते हैं लेकिन जब आप मंदिर से बाहर निकलेंगे तभी आपको लाशों के जलने की गंध महसूस होगी।
दूसरा यह कि इस कारण श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। यह भी आश्चर्य है कि प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। ध्वज भी इतना भव्य है कि जब यह लहराता है तो इसे सब देखते ही रह जाते हैं। ध्वज पर शिव का चंद्र बना हुआ है। जय हनुमान। जय श्रीराम।
धर्म संसार / शौर्यपथ / इस संबंध में एक जन प्रचलित कथा है कि एक बार श्रीकृष्ण अचानक नींद में राधे-राधे कहने लगे तो श्रीकृष्ण की आठों पत्नियां चौंक गई और सोचने लगे कि भगवान अभी तक राधा को नहीं भले हैं। सभी ने मिलकर माता रोहिणी से इस संबंध मैं विचार किया और उनसे राधा और कृष्ण की रासलीला के बारे में कथा सुनाने का आग्रह किया।
हठ करने के बाद माता रोहिणी ने कहा कि ठीक है सुनो लेकिन पहले सुभद्रा को द्वार पर पहरे पर बिठा तो ताकि कोई भीतर प्रवेश न कर पाए फिर वह चाहे बलराम हो या कृष्ण। सुभद्रा पहरा देने लगी और भीत माता रोहिणी आठों भार्या को कृष्ण और राधा की कथा सुनाने लगी।
उसी दौरान बलराम और श्रीकृष्ण द्वार पर पहुंच जाते हैं। द्वार पर ही खड़ी सुभद्रा भी यह कथा बड़े ध्यान से सुन रही थी। श्रीकृष्ण और बलराम के आने पर सुभद्रा ने उचित कारण बता कर दरवाजे पर ही उन्हें रोक लिया। महल के अंदर से श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला की कथा श्रीकृष्ण और बलराम दोनों को ही सुनाई दे रही थी। तीनों ही उस कथा को भाव विह्वल होकर सुनने लगे। तीनों की ही ऐसी अवस्था हो गई कि पूरे ध्यान से देखने पर भी किसी के भी हाथ-पैर आदि स्पष्ट नहीं दिखाई देते थे। तभी वहां अकस्मात देवऋषि नारद आ धमके। उन्होंने दे तीनों को ऐसी अवस्था देखी तो वे देखते ही रह गए। तीनों पूर्ण चेतना में वापस लौटे। नारद जी ने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की कि हे भगवान आप तीनों के जिस महाभाव में लीन मूर्तिस्थ रूप के मैंने दर्शन किए हैं, वह सामान्य जनों के दर्शन हेतु पृथ्वी पर सदैव सुशोभित रहे। प्रभु ने तथास्तु कह दिया। कहते हैं कि तभी से भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्र जी का वही स्वरूप आज भी जगन्नाथपुरी में विद्यमान है। उसे सर्व प्रथम स्वयं विश्वकर्मा जी ने बनाया था।
इसी वरदान के चलते बाद में राजा इंद्रद्युम्न एक कारिगर से यह तीनों मूर्तियां बनवाई थीं। तीनों लोक के कुशल कारीगर भगवान विश्वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धरकर आए। उन्होंने राजा को कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी शर्त भी रखी कि वे 21 दिन में मूर्ति बनाएंगे और अकेले में बनाएंगे। कोई उनको बनाते हुए नहीं देख सकता। उनकी शर्त मान ली गई। लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी। अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी तो राजा को भी ऐसा ही लगा। सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुए राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया।
जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें 3 अधूरी मूर्तियां मिली पड़ी मिलीं। भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे। राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं।
ब्यूटी टिप्स /शौर्यपथ /शरीर के साफ रखने के लिए हम पूरी तरह से मेहनत करते हैं। लेकिन कोहनी और घुटने शरीर के अन्य हिस्सों की तुलना में डार्क दिखते हैं। इसकी वजह धूप, डेड स्किन सेल का लगाता जमा होते रहना या फिर एक्जीमा भी हो सकता है। यूं तो इन वजहों से शरीर पर भी स्पॉट आ सकते हैं, लेकिन कोहनी और घुटनों को केयर ना मिलने की वजह से ये ज्यादा नजर आने लगते हैं। इस समस्या से आप छुटकारा पा सकते हैं, वो भी घरेलू उपायों के जरिए। आइए जानते हैं...
आलू का रस
टैनिंग को दूर करने में आलू का रस कारगर है। आलू को कद्दूकस करें और छानकर जूस निकालें। कॉटन की मदद से कोहनी और घुटनों पर लगाएं। इसे 10 से 15 मिनट बाद पानी से धो लें।
खीरा
हल्दी
हल्दी का पानी में मिलाकर एक पेस्ट बनाएं और कोहनी पर 10 मिनट के लिए अप्लाई करें। हल्दी टैनिंग को हटाने में मदद करता है और इसको लगाने से निखार आता है।
नींबू
दिन में दो बार नीबू के रस को कोहनी और घुटनों पर लगाएं। ये बेहद असरदार होता है। अगर आप इसके छीलके पर थोड़ी सी चीनी डाल कर रगड़ें तो ये डेड स्किन हटाने में मदद करेगा।
खाना खजाना / शौर्यपथ / खाने के साथ सलाद न परोसा गया हो तो खाने का मजा अधूरा सा रहता है। लंच या डिनर पर खीरा, टमाटर तो आपने अक्सर हर घर में सलाद की प्लेट पर सजे देखे होंगे लेकिन आज आपको सलाद की एक यूनिक रेसिपी के बारे में बताते है। जिसका नाम है लच्छा प्याज। यह साइड डिश आपके खाने को और भी स्वादिष्ट बना देती है। तो आइए जान लेते हैं कैसे बनाई जाती है रेस्टोरेंट स्टाइल लच्छा प्याज रेसिपी।
रेस्टोरेंट स्टाइल लच्छा प्याज बनाने की विधि-
रेस्टोरेंट स्टाइल लच्छा प्याज बनाने के लिए सबसे पहले प्याज के 3 स्लाइस करके उन्हें अलग कर लें। अब इन्हें ठंडे पानी में भिगोकर रख दें ताकि ये क्रिस्पी हो जाएं। अब एक बाउल में 3 छोटी चम्मच मिर्च पाउडर, 1 छोटी चम्मच काला नमक, आधा छोटा चम्मच चाट मसाला और 1 छोटा चम्मच नमक डाल कर मिला लें। प्याज के रिंग को छान लें, और सुखा लें, फिर 3 छोटे चम्मच कटा हरा धनिया, मसाला मिला कर सभी को एक साथ मिला लें। 1 चम्मच सरसों का तेल और 2 नींबू का रस डालकर मिला लें। लच्छा प्याज खाने के लिए तैयार है।
सेहत /शौर्यपथ / महंगाई के दौर में भी स्वास्थ्य का ख्याल रखना बेहद जरूरी है। क्योंकि दूसरी और कोरोना काल का प्रकोप भारी है। ऐसे में अधिक से अधिक फल और सब्जियां खाने की सलाह दी जा रही है। क्योंकि रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर जल्द ही कोरोना की चपेट में आ सकते हैं। फल और सब्जियों के माध्यम से शरीर को जरूरी पोषक तत्व मिलने पर बीमारी की चपेट में आने से बचा जा सकता है। हालांकि हर फल और सब्जियों में अलग-अलग पोषक तत्व होते हैं। कई बार पता नहीं होने पर सही से उनका सेवन नहीं भी कर पाते हैं।
तो आइए जानते हैं कम कीमत में कौन से फल और सब्जियों का सेवन किया जाएं ताकि सेहत भी बने रहे और जेब पर महंगाई का असर नहीं पड़ें।
विटामिन ए: त्वचा, आंख और शरीर के विकास में विटामिन ए वृद्धि के लिए अच्छा स्रोत होता है। विटामिन ए के सेवन से सबसे अधिक आंखों की बीमारी में आराम मिलता है। इसकी कमी होने पर गाजर, सोयाबीन, कद्दू, चुकंदर, टमाटर हरे पत्तेदार सब्जी, आम, पपीता में भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
विटामिन बी- विटामिन बी में अन्य विटामिन मौजूद होते हैं जैसे राइबोफ्लेविन, निकोटिनिक एसिड, फोलिक एसिड, विटामिन- बी12 । इसकी कमी होने पर वजन घटना, भूख नहीं लगना, बेरी-बेरी जैसी समस्या उत्पन्न होने लगती है। इसकी कमी को पूरा करने के लिए पत्ता गोभी, हरे प्याज, गाजर, सलाद, संतरा, नींबू जरूर खाएं।
विटामिन सी- विटामिन सी की कमी होने पर कई सारी छोटी-मोटी बीमारी होने लगती है। जैसे दांतों का दुखना, मसूड़ों से खून आना, स्कर्वी बीमारी, रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना। विटामिन सी कई सारे फल और सब्जियों में पाया जाता है। फल में संतरा, मौसमी, अंगूर खा सकते हैं। सब्जियों में अंकुरित मूंग, चना, हरी और लाल मिर्च, पालक, सरसों का साग, आलू, टमाटर, नींबू में मुख्य रूप से पाया जाता है।
विटामिन डी- विटामिन डी की कमी होने पर डिप्रेशन, हड्डियों में कमजोरी, नींद की कमी होने लगती है। विटामिन डी की कमी होने पर सूरज की रोशनी लेने की सलाह दी जाती है। साथ ही विटामिन डी से भरपूर फल और सब्जियों का सेवन भी करना चाहिए। संतरे का एक कप ज्यूस पीने से विटामिन डी की कमी पूरी होती है। संतरे का ज्यूस हड्डियों को भी मजबूत करता है। संतरे में विटामिन सी, फोलेट और पोटेशियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है। दूध, मशरूम भी विटामिन डी की पूर्ति करते हैं।
कैल्शियम- कैल्शियम की कमी होने पर हड्डिया और दांत कमजोर पड़ने लगते हैं। ऐसे में पालक, दूध, गुड़, मटर, मूंगफली, सिंघाड़ा, सूर्यमुखी के बीज, संतरा, दलिया, लौंग, काली मिर्च, आम, जायफल, रागी, बाजरा, आंवला, इन चीजों का सेवन कर कैल्शियम की कमी को पूरा किया जा सकता है।
कार्बोहाइड्रेट- इसकी पूर्ति होने पर शरीर में पर्याप्त मात्रा में कैलोरी और ताकत होती है। मटर, केला, शकरकंद, आलू में कार्बोहाइड्रेट मौजूद होता है।
प्रोटीन- प्रोटीन मानव शरीर के विकास और रखरखाव के लिए बहुत अहम होता है। शरीर में पानी की कमी के बाद प्रोटीन आवश्यक तत्व होता है। हमारे शरीर में 18 से 20 फीसदी प्रोटीन की मात्रा होती है। इसकी कमी से मांसपेशियों में दर्द, रोग प्रतिरोधक क्षमता घटती, कमजोरी, थकावट, बाल और नाखून पर असर होता है। ऐसे में अमरूद, चना मटर, मूंग, सोयाबीन, मूंगफली, आलूबुखारा, देसी चना, राजमा, फूल गोभी, सुरजना फली में मुख्य रूप से पाया जाता है।
सेहत /शौर्यपथ / भुने हुए चने के साथ वैसे तो चिरोंजी खाई जाती है लेकिन चने के साथ गुड़ खाना लाभकारी होता है। भुने हुए चने में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्षियम, विटामिन और भरपूर आयरन होता है। इसमें फाइबर की मात्रा भी काफी अच्छी होती है। इसलिए भुने हुए चने खाए जाते हैं। बाॅडी और मसल्स बानने के लिए भी भुने हुए चने और गुड़ खाने की सलाह दी जाती है। गुड़ में विटामिन ए और बी होता है। साथ ही सुक्रोज, पोटेशियम, जस्ता, कैल्शियम, आयरन भी प्रचुर मात्रा में होता है। बहुत कम लोग इसे साथ में खाने के फायदे के बारे में जानते हैं।
तो आइए आज जान लेते हैं भुने हुए चने और गुड़ खाने से क्या - क्या फायदे होते हैं -
1.शरीर का डाइजेशन सिस्टम खराब होने पर गुड़ और चने का सेवन करना चाहिए। इसमें फाइबर की मात्रा होने से पाचन शक्ति अच्छी होती है।
2.गुड़ और चने के सेवन से दांत मजबूत होते हैं और जल्दी नहीं टूटते हैं।
3.महिला और पुरूष दोनों को गुड़ और चने का सेवन करना चाहिए। इसे खाने से चेहरे की चमक बढ़ती है और किसी भी प्रकार की कमजोरी महसूस नहीं होती है।
4.गुड़ और चने का मिश्रण खाने से वजन कम करने में मदद मिलती है। इसके सेवन से मेटाबाॅलिज्म बढ़ता है वजन तेजी से कम होता है।
5.दिन में एक बार 50 ग्राम चने का सेवन गुड़ के साथ जरूर करना चाहिए। इससे इम्यून सिस्टम मजबूत होता है। साथ ही इंफेक्शन का खतरा भी कम होता है।
6.अगर आप बार- बार यूरीन की समस्या से जूझ रहे हैं तो गुड़ और चने का सेवन जरूर करें। इससे बहुत जल्दी आराम मिलेगा।
7.डायबिटीज मरीजों को मीठा खाने से पहले 10 बार सोचना पड़ता है। लेकिन वह गुड का सेवन सीमित मात्रा में कर सकते हैं। और इसके साथ चने खा सकते हैं। गुड और चने का सेवन करने से ब्लड ष्षुगर कंट्रोल में रहता है।
8.गुड़ चना मिक्स करके खाने से त्वचा में काफी निखार आता है। झुर्रियां भी कम हो जाती है। साथ ही धूप में होने वाली समस्या से निजात मिलती है।
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लाइफस्टाइल /शौर्यपथ / हस्ताक्षर भी मस्तिष्क के आदेश से ही अंगुलियों द्वारा संपादित होता है। इस वजह से इस माध्यम से व्यक्ति मनोवृत्ति का पता लगाया जा सकता है। जो लोग हस्ताक्षर करते समय पहला अक्षर थोड़ा बड़ा और उसके बाद पूरा उपनाम लिखते हैं वे अद्भुत प्रतिभा के धनी होते हैं। जानिए क्या आप भी हैं इसमें शामिल-
• हस्ताक्षर करने के बाद उसे रेखांकित करने की आदत शक्तिशाली व मजबूत व्यक्ति में देखी गई है। छोटा-सा हस्ताक्षर स्वार्थी व निग्रही व्यक्तित्व को दर्शाता है। यदि हस्ताक्षर का आकार उसके अक्षर के अनुपात में बड़ा हो तो व्यक्ति में शासन करने की उत्कृष्ट अभिलाषा होती है।
• हस्ताक्षर बदलते हैं तो स्वभाव बदलता है और स्वभाव बदलता है तो हस्ताक्षर बदलते हैं।
• साफ-सुथरे पढ़े जा सकने वाले हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति व्यवस्थित होते हैं।
• हस्ताक्षर नीचे से ऊपर की ओर उठे हुए हों तो वह मानव महत्वाकांक्षी होता है। अपने उद्देश्य को हर कीमत पर पाकर रहने वाला होता है।
• यदि शिरो लहरदार हो तो वह व्यक्ति अपनी इच्छाओं के लिए अथवा अपने किसी भी कार्य के लिए भी किसी प्रकार गोपनीय कदम उठा सकता है।
• यदि हस्ताक्षर का प्रथम अक्षर बड़ा हो और शेष अक्षर बराबर हों तो वह व्यक्ति अत्यंत घमंडी तथा स्वाभिमानी भी होता है। वह चापलूसी पसंद होता है।
• यदि हस्ताक्षर का प्रथम अक्षर बड़ा हो और अंतिम अक्षर एकदम छोटा हो तो वह बड़ी शान से धूमधाम से कार्य का प्रारंभ करता है। और एकदम नीचे गिर जाता है। वह व्यक्ति कल्पना जगत में विचरण करने वाला होता है।
• यदि हस्ताक्षर के नीचा यानी उसमें एक सीधी रेखा की लाइन लगा रखी है तो वह व्यक्ति हमेशा दूसरों की याद व आशीर्वाद पर अपना जीवन व्यतीत करता रहता है। वह खुशामदी और चापलूस होता है। ऐसे व्यक्ति को साझेदारी का कार्य पसंद होता है। रेखा के साथ-साथ यदि रेखा के नीचे बिंदु हो तो वह व्यक्ति अपने वचन पर पक्का रहने वाला होता है। वह अपने निहित स्वार्थ के लिए दुहरे वातावरण को रचता है।
• यदि हस्ताक्षर एक सीधी लाइन में हो तो वह तटस्थ, ईमानदार, उदार, विश्वसनीय होता है। वह अपनी धुन का पक्का, सीधा-साधा और निश्चल और छल स्वभाव का होता है।
• बात बताकर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति चापलूसी पसंद होता है और अंहकारी होता है।
धर्म संसार /शौर्यपथ / द्वापर के बाद भगवान कृष्ण पुरी में निवास करने लगे और बन गए जग के नाथ अर्थात जगन्नाथ। पुरी का जगन्नाथ धाम चार धामों में से एक है। यहां भगवान जगन्नाथ बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। आओ जानते हैं बलभद्र और सुभद्रा के बारे में कुछ खास।
बलभद्र :
1. भगवान बलभद्र को बलराम, दाऊ और बलदाऊ भी कहते हैं। बलवानों में श्रेष्ठ होने के कारण उन्हें बलभद्र भी कहा जाता है।
2. बलभद्र को शेषनाग तो भगवान जगन्नाथ अर्थात श्रीकृष्ण को विष्णुजी का अवतार माना जाता है।
3. कहते हैं कि जब कंस ने देवकी-वसुदेव के छ: पुत्रों को मार डाला, तब देवकी के गर्भ में शेषावतार भगवान बलराम पधारे। योगमाया ने उन्हें आकर्षण करके नन्द बाबा के यहां निवास कर रही श्री रोहिणीजी के गर्भ में पहुंचा दिया था। इसलिए उनका एक नाम संकर्षण पड़ा। श्रीकृष्ण और बलराम की माताएं अलग अलग हैं लेकिन पिता एक ही हैं। हालांकि देखा जाए तो पहले वे देवकी के गर्भ में ही थे।
4. बलराम जी का विवाह सतयुग के महाराज कुकुदनी की पुत्री रेवती से हुआ था। रेवती बलरामजी से बहुत लंबी थी तो बलरामजी ने उन्हें अपने हल से अपने समान कर दिया था।
4. जगन्नाथ की रथयात्रा में बलभद्रजी का भी एक रथ होता है। यह गदा धारण करते हैं। बलरामजी ने दुर्योधन और भीम दोनों को ही गदा सिखाई थी। उनके लिए कौरव और पांडव दोनों ही समान थे इसलिए उन्होंने युद्ध में भाग नहीं लिया था। मौसुल युद्ध में यदुवंश के संहार के बाद बलराम ने समुद्र तट पर आसन लगाकर देह त्याग दी थी।
सुभद्रा :
1. योगमाया के अलावा सुभद्रा भी श्रीकृष्ण की बहन थीं।
2. बलराम चाहते थे कि सुभद्रा का विवाह कौरव कुल में हो लेकिन बलराम के हठ के चलते कृष्ण ने सुभद्रा का अर्जुन के हाथों हरण करवा दिया था। बाद में द्वारका में सुभद्रा के साथ अर्जुन का विवाह विधिपूर्वक संपन्न हुआ।
3. विवाह के बाद वे एक वर्ष तक द्वारका में रहे और शेष समय पुष्कर क्षेत्र में व्यतीत किया। 12 वर्ष पूरे होने पर वे सुभद्रा के साथ इंदप्रस्थ लौट आए।
4. सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु था जिसकी महाभारत के युद्ध में चक्रव्यूह फंसने के कारण दुर्योधन, कर्ण सहित कुल सात आठ लोगों ने मिलकर निर्मम हत्या कर दी थी। अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा थी जिसके गर्भ से परीक्षित का जन्म हुआ और परीक्षित का पुत्र जनमेजय था।
5. कहा जाता है कि नरकासुर का वध करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा से मिलने भाई दूज के दिन उनके घर पहुंचे थे। सुभद्रा ने उनका स्वागत करके अपने हाथों से उन्हें भोजन कराकर तिलक लगाया था।
6. पुरी, उड़ीसा में 'जगन्नाथ की यात्रा' में बलराम तथा सुभद्रा दोनों की मूर्तियां भगवान श्रीकृष्ण के साथ-साथ ही रहती हैं।
7.सुभद्रा वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी की पुत्री थीं, जबकि वसुदेकी की दूसरी पत्नी देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण थे। इस तरह श्रीकृष्ण और सुभद्रा के पिता एक ही थे परंतु माताएं अलग अलग थी।
रथ यात्रा निकालने की परंपरा : पौराणिक मततानुसार स्नान पूर्णिमा यानी ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन जगत के नाथ श्री जगन्नाथ पुरी का जन्मदिन होता है। उस दिन प्रभु जगन्नाथ को बड़े भाई बलराम जी तथा बहन सुभद्रा के साथ रत्नसिंहासन से उतार कर मंदिर के पास बने स्नान मंडप में ले जाया जाता है। 108 कलशों से उनका शाही स्नान होता है। फिर मान्यता यह है कि इस स्नान से प्रभु बीमार हो जाते हैं उन्हें ज्वर आ जाता है। तब 15 दिन तक प्रभु जी को एक विशेष कक्ष में रखा जाता है। जिसे ओसर घर कहते हैं। इस 15 दिनों की अवधि में महाप्रभु को मंदिर के प्रमुख सेवकों और वैद्यों के अलावा कोई और नहीं देख सकता। इस दौरान मंदिर में महाप्रभु के प्रतिनिधि अलारनाथ जी की प्रतिमा स्थपित की जाती हैं तथा उनकी पूजा अर्चना की जाती है। 15 दिन बाद भगवान स्वस्थ होकर कक्ष से बाहर निकलते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं। जिसे नव यौवन नैत्र उत्सव भी कहते हैं। इसके बाद द्वितीया के दिन महाप्रभु श्री कृष्ण और बडे भाई बलराम जी तथा बहन सुभद्रा जी के साथ बाहर राजमार्ग पर आते हैं और रथ पर विराजमान होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं।
सेहत / शौर्यपथ /भारत में सुबह के नाश्ते में पराठें, रोटी, सब्जी, अंडा, पनीर जूस आदि खाया जाता है। हालांकि अब बदलते समय के साथ भारतीय नाश्ते में कॉर्नफ्लेक्स ने एक खास जगह बनाई है। समय की कमी के कारण लोग कॉर्नफ्लेक्स खाना पसंद करते हैं क्योंकि इसको बनाने में ज्यादा समय नहीं लगता। भारतीय घरों में हेल्दी फूड माना जाने वाला कॉर्नफ्लेक्स आपकी सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
कॉर्नफ्लेक्स में जीरो न्यूट्रिशनल वैल्यू होती है। इसको बनाने में कई कॉर्नसिरप और वनस्पति तेल जैसे इंग्रेडिएंट होते हैं। जो सेहत के लिए नुकसानदायक होते हैं। वहीं इसका ज्यादा सेवन करने से डायबिटीज होने की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि इसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी हाई होता है। ग्लाइसेमिक इंडेक्स से पता चलता है कि कोई फूड कितनी तेजी से और कितनी मात्रा में शरीर के शुगर लेवल को बढ़ाता है।
कॉर्नफ्लेक्स को टेस्टी बनाने के लिए कई प्रोसेस को फॉलो किया जाता है। जैसे इसे सोडियम में गर्म किया जाता है। इसके बाद स्वाद के लिए कॉर्न सिरप और स्वीटनर डाला जाता है।
इन चीजों से करें कॉर्नफ्लेक्स को रिप्लेस
पोहा
दलिया
फ्रूट्स स्मूदी
चीला
ओट्स
खाना खजाना / शौर्यपथ / सामग्री 2 उबले आलू
3-4 हरी मिर्च
1 इंच अदरक
4 ब्रेड स्लाइस
1/2 कप पोहा
2 से 3 चम्मच बेसन
1/2 कप स्वीट कॉर्न
1/2 चम्मच चाट मसाला
नमक स्वादानुसार
हरा धनिया
विधि मिक्सर में ब्रेड को पीसकर पाउडर बनाए और पोहे को थोड़ी देर पानी में भीगाएं।
उबले हुए आलू को छीलकर मैश करें फिर स्वीट कॉर्न, ब्रेड का पाउडर और निचोड़े हुए पोहे को मिश्रण मिलाएं और अच्छी तरह से मिक्स करें।
अब इस पेस्ट में बेसन, हरी मिर्च(बारीक कटी), अदरक(ग्रेट), चाट मसाला, हरा धनिया और नमक मिलाकर तैयार करें।
मिश्रण के गोले बना ले और हाथों से टिक्की का आकार दें। फिर गरम तेल होने पर मीडियम धीमी आंच पर गोल्डन ब्राउन होने तक अच्छी तरह से सेक लें। आपकी कॉर्न आलू टिक्की तैयार है। इसे चटनी या सॉस के साथ सर्व करें।
ब्यूटी टिप्स /शौर्यपथ / लड़कियों अपने हाथों की केयर खूब अच्छे से करती है। लेकिन अकसर नेल्स का ध्यान पूरी तरह से रखने में असमर्थ होती हैं। नेल्स बहुत नाजुक होते है और यही वजह है कि ये जल्दी टूट जाते हैं या फिर ब्रेक हो जाते हैं। अगर आपको भी लंबे नेल्स पसंद हैं तो इस नुस्खे को फॉलो करें। आप घर में ही नेल्स सीरम बनाए और इसकी नियमित रूप से इस्तेमाल करें।
कैसे करें इस्तेमाल
हाथों को अच्छी तरह से साफ करें और अपनी उंगलियों को 5 मिनट तक सीरम में डुबोएं, ताकी सीरम पूरी तरह से नाखूनों में लगे। फिर गुनगुने पानी से धो लें। इसे हफ्ते में दो बार कर सकते हैं।
ऐसे बनाएं नेल ग्रोथ सीरम
सामग्री
1 चम्मच ऑरेंज जेस्ट
1 चम्मच नारियल तेल
1 चम्मच बादाम तेल
1 चम्मच संतरे का रस
विधि
ऑरेंज जेस्ट को संतरे के रस में और बादाम तेल की कुछ बूंदों को अच्छी तरह मिलाएं। फिर नारियल तेल की कुछ बुंदे गरम करें और मिश्रण में मिक्स कर दें। आपका नेल ग्रोथ सीरम तैयार है।
शौर्यपथ / योग के प्रचलन के इतिहास को हम दो भागों में विभक्त कर सकते हैं पहला हिन्दू परंपरा से प्राप्त इतिहास और दूसरा शोध पर आधारित इतिहास। योग का इतिहास बहुत ही वृहद है हमनें इसे यहां पर संक्षिप्त रूप से लिखा है। कहते हैं कि भारत में योग लगभग 15 हजार वर्षों से निरंतर प्रचलित है। सभ्यताओं के युग से पूर्व ही ऋषि मुनियों ने पशु-पक्षियों आदि को देखकर योग के आसन विकसित किए और फिर इस तरह योग में कई आयाम जुड़ते गए।
हिन्दू परंपरा पर आधारित योग का इतिहास
1. योग का उपदेश सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने सनकादिकों को, इसके बाद विवस्वान सूर्य, रुद्रादि को दिया। बाद में यह दो शाखाओं में विभक्त हो गया। एक ब्रह्मयोग और दूसरा कर्मयोग।
2. ब्रह्मयोग की परम्परा सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, कपिल, आसुरि, वोढु, पंच्चशिख नारद और शुकादिकों ने शुरू की थी। यह ब्रह्मयोग लोगों के बीच में ज्ञानयोग, अध्यात्मयोग और सांख्ययोग नाम से प्रसिद्ध हुआ।
3. दूसरी कर्मयोग की परम्परा विवस्वान की है। विवस्वान ने वैवस्वत मनु को, मनु ने ऋषभदेव और इक्ष्वाकु को, इक्ष्वाकु ने राजर्षियों एवं प्रजाओं को योग का उपदेश दिया। फिर भगवान श्रीराम को ऋषि वशिष्ठ और विश्वामित्र ने यह ज्ञान दिया।
4. परंपरा से प्राप्त यह ज्ञान महर्षि सांदीपनि, वेदव्यास, गर्गमुनि, घोर अंगिरस, नेमिनाथ आदि गुरुओं ने भगवान श्रीकृष्ण को दिया और श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया।
5. योग के इसी ज्ञान को बाद में भगवान महावीर स्वामी ने पंच महाव्रत और गौतम बुद्ध ने आष्टांगिक मार्ग नाम से विस्तार दिया।
6. परंपरा से ही यह ज्ञान महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के माध्यम से और आदि शंकराचार्य ने वेदांत के माध्य से इसका प्रचार-प्रसार किया।
7. इसी ज्ञान को बाद में 84 नाथों की परंपरा ने हठयोग के नाम से आगे बढ़ाया जिनके प्रमुख योगी थे गुरु मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गोरखनाथ।
8. शैव परंपरा के अनुसार योग का प्रारंभ आदिदेव शिवजी से होता है। शिवजी ने योग की पहली शिक्षा अपनी पत्नी पार्वती को दी थी।
9. शिवजी ने दूसरी शिक्षा केदारनाथ में कांति सरोवर के तट पर अपने पहले 7 शिष्यों को दी थी, जिन्हें सप्तऋषि कहा जाता है।
10. भगवान शिव की योग परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष शिव, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भारद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरीष मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया।
11. भगवान शिव के बाद योग के सबसे बड़े गुरु गुरु दत्तात्रेय थे। गुरु दत्तात्रेय की योग परंपरा में ही आगे चलकर आदि शंकराचार्य और गोरखनाथ की परंपरा का प्रारंभ होता है।
12. गुरु गोरखनाथ की 84 सिद्धों और नवनाथ की परंपरा में मध्यकाल में कई महान संत हुए जिन्होंने योग को आगे बढ़ाया। संत गोगादेवजी, रामसापीर, संत ज्ञानेश्वर, रविदासजी महाराज से लेकर परमहंस योगानंद, रमण महर्षि और स्वामी विवेकानंद तक हजारों योगी हुए हैं जिन्होंने योग के विकास में योगदान दिया है।
शोध पर आधारित योग का इतिहास
1. श्रीराम के काल में योग : नए शोध के अनुसार 5114 ईसा पूर्व प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ था। उस वक्त महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र और वाल्मीकिजी लोगों को योग की शिक्षा देते थे।
2. श्रीकृष्ण के काल में योग : नए शोधानुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व हुआ था। उन्होंने अर्जुन को योग की शिक्षा दी थी।
3. सिंधु घाटी सभ्यता काल में योग : योगाभ्यास का प्रामाणिक चित्रण लगभग 3000 ईस्वी पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता के समय की मुहरों और मूर्तियों में मिलता है। इसके अलावा भारत की प्राचीन गुफाएं, मंदिरों और स्मारकों पर योग आसनों के चिह्न आज भी खुदे हुए हैं।
4. ऋग्वेद काल में योग : संसार की प्रथम पुस्तक 'ऋग्वेद' में यौगिक क्रियाओं का उल्लेख मिलता है। हजारों वर्षों की वाचिक परंपरा के बाद 1500 ईसा पूर्व वेद लिखे गए।
5. महावीर स्वामी के काल में योग : भगवान महावीर स्वामी का जन्म 599 ईस्वी पूर्व हुआ था। उन्होंने योग के आधार पर ही पंच महाव्रत का सिद्धांत प्रतिपादित किया था।
6. बौद्ध काल में योग : भगवान बुद्ध का जन्म 483 ईस्वी पूर्व हुआ था। उन्होंने योग के आधार पर ही आष्टांगिक मार्ग का निर्माण किया था।
7. आदि शंकराचार्य के काल में योग : मठ परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य का जन्म 508 ईसा पूर्व और मृत्यु 474 ईसा पूर्व हुई थी। इतिहासकारों के अनुसार 788 ईस्वी में जन्म और 820 ईस्वी में मृत्यु हुई थी। उनसे योग की एक नई परंपरा की शुरुआत होती है।
8. महर्षि पतंजलि के काल में योग : महर्षि पतंजलि ने योग का प्रामाणिक ग्रंथ 'योगसूत्र' को 200 ईस्वी पूर्व लिखा था। योगसूत्र पर बाद के योग शिक्षकों ने कई भाष्य लिखे हैं।
9. हिन्दू संन्यासियों के 13 अखाड़ों में योग : सन् 660 ईस्वी में सर्वप्रथम आवाहन अखाड़ा की स्थापना हुई। सन् 760 में अटल अखाड़ा, सन् 862 में महानिर्वाणी अखाड़ा, सन् 969 में आनंद अखाड़ा, सन् 1017 में निरंजनी अखाड़ा और अंत में सन् 1259 में जूना अखाड़े की स्थापना का उल्लेख मिलता है।
10. गुरु गोरखनाथ के काल में योग : पतंजलि के योगसूत्र के बाद गुरु गोरखनाथ ने सबसे प्रचलित 'हठयोग प्रदीपिका' नामक ग्रंथ लिखा। इस ग्रंथ की प्राप्त सबसे प्राचीन पांडुलिपि 15वीं सदी की है।
11. मध्यकाल में योग : गुरु गोरखनाथ की 84 सिद्धों और नवनाथ की परंपरा में मध्यकाल में कई महान संत हुए जिन्होंने योग को आगे बढ़ाया। संत गोगादेवजी, रामसापीर, संत ज्ञानेश्वर, रविदासजी महाराज से लेकर परमहंस योगानंद, रमण महर्षि और विवेकानंद तक हजारों योगी हुए हैं जिन्होंने योग के विकास में योगदान दिया है।
- कबीर दास /शौर्यपथ /
माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय॥
माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर ।
कर का मन का डारि दे, मन का मनका फेर॥
तिनका कबहुं ना निंदए, जो पांव तले होए।
कबहुं उड़ अंखियन पड़े, पीर घनेरी होए॥
गुरु गोविंद दोऊं खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताय॥
साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय॥
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय॥
कबीरा ते नर अंध है, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर॥
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर॥
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।
हीरा जनम अमोल है, कोड़ी बदली जाय॥
दुःख में सुमिरन सब करें सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे तो दुःख काहे होय॥
बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर॥
उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥
सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनाई।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाई॥
रायपुर / शौर्यपथ / सुराजी गांव योजना के नरवा विकास कार्यक्रम से भू-जल स्तर में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ नाले के किनारे स्थित किसानों को फसलों की सिंचाई के लिए जल उपलब्धता सुनिश्चित हुई है। फलस्वरूप दोहरी और तिहरी फसलों की खेती से कृषि का रकबा और किसानों की आमदनी में बढ़ोत्तरी हुई है। कोण्डागांव जिले के ग्राम पंचायत बड़े राजपुर स्थित बुचरा नाला के उपचार से लाभान्वित कृषक श्री जोहर लाल नेताम ने आज मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से विकास एवं निर्माण कार्यों के वर्चुअल लोकर्पण एवं भूमिपूजन कार्यक्रम के अवसर पर चर्चा के दौरान बताया कि उनके साथ-साथ बुचरा नाले के दोनों ओर के लगभग 40 से 50 किसानों की खेती-किसानी के लिए अब पर्याप्त पानी मिलने लगा है। जिससे फसल का रकबा और उत्पादन बढ़ा है।
जोहर लाल नेताम ने बताया कि पहले यह नाला बरसात के बाद सूखने लगता था। नाले का उपचार और पानी को रोकने के लिए इसमें जगह-जगह बनाई गई संरचानाएं और स्टॉप डेम से इस नाले में अब बारहमासी पानी का भराव होने लगा है। पानी की कमी के कारण बड़ी मुश्किल से पहले श्री नेताम 2-3 एकड़ में खेती कर पाते थे। आज नाले में पर्याप्त पानी उपलब्ध होने के कारण 6 से 7 एकड़ भूमि में खेती कर रहे है। पानी की उपलब्धता की वजह से फसल भी अच्छी हो रही है। उन्होंने बताया कि वह अपनी 7 एकड़ भूमि में से 6 एकड़ भूमि में मक्के की खेती और एक एकड़ भूमि में सब्जी व गेंहू की खेती कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जोहर लाल नेताम और बुचरा नाले के किनारे स्थित सभी कृषकों को नरवा विकास कार्यक्रम का लाभ उठाकर बेहतर खेती-किसानी के लिए शुभकामनाएं दी। मुख्यमंत्री ने जोहर लाल नेताम को मक्के सहित सब्जी की खेती में वर्मी कम्पोस्ट खाद का उपयोग करने की सलाह दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे भूमि की उर्वरा शक्ति बेहतर होगी, उत्पादन बढ़ेगा साथ ही मक्के की मिठास भी बढ़ेगी। जोहर लाल नेताम ने मुख्यमंत्री को बताया कि नाले में स्टॉप डेम के निर्माण से काफी दूर तक पानी रूकने लगा है। इससे गांव के भू-जल स्तर में भी बढ़ोत्तरी हुई है। पहले नलकूप खनन 80 से 100 फीट होने पर पानी मिलता था, अब से 50 से 60 फीट में ही पानी मिलने लगा है। उन्होंने मुख्यमंत्री से इस नाले पर 2-3 स्थानों पर स्टॉप डेम बनाये जाने का आग्रह किया। जिस पर मुख्यमंत्री ने शीघ्र ही इसका परीक्षण कर कार्रवाई की बात कही।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
