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April 05, 2026
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धर्म संसार / शौर्यपथ / हिन्दू कैलेंडर के अनुसार श्रावण मास वर्ष का पांचवां माह होता है। अंग्रेजों के कैलेंडर के अनुसार यह जुन-जुलाई के बीच आता है। इस बार इस माह की शुरुआत 25 जुलाई 2021 रविवार से हो रही है। 26 जुलाई को सावन का पहला सोमवार रहेगा। 22 अगस्त रविवार रक्षा बंधन के दिन श्रावण मास समाप्त हो जाएगा और भाद्रपद माह की शुरुआत हो जाएगी। दक्षिण भारत में श्रावण मास का प्रारंभ देर से होता है।
अषाड़ माह के शुक्ल पक्ष की समाप्ति के पश्चात श्रावण माह का प्रारंभ होता है। अषाड़ माह से ही वर्षा ऋतु का प्रारंभ हो जाता है और इसी माह की शुक्ल एकादशी के दिन देव सो जाते हैं। देवशयनी एकादशी से ही चतुर्मास का प्रारंभ हो जाता है। श्रावण माह से व्रत और साधना के चार माह अर्थात चातुर्मास प्रारंभ होते हैं। ये 4 माह हैं- श्रावण, भाद्रपद, आश्‍विन और कार्तिक। पौराणिक कथा के अनुसार देवी सती ने अपने दूसरे जन्म में शिव को प्राप्त करने हेतु युवावस्था में श्रावण महीने में निराहार रहकर कठोर व्रत किया और उन्हें प्रसन्न कर विवाह किया था। इसलिए यह माह विशेष है।
श्रावण शब्द श्रवण से बना है जिसका अर्थ है सुनना। अर्थात सुनकर धर्म को समझना। इस माह में सत्संग का महत्व है। इस माह में पतझड़ से मुरझाई हुई प्रकृति पुनर्जन्म लेती है। श्रावण माह में सिर्फ सावन सोमवार ही नहीं संपूर्ण माह ही व्रत रखना जाता है। जिस तरह गुड फ्राइडे के पहले ईसाइयों में 40 दिन के उपवास चलते हैं और जिस तरह इस्लाम में रमजान माह में रोजे (उपवास) रखे जाते हैं उसी तरह हिन्दू धर्म में श्रावण मास को पवित्र और व्रत रखने वाला माह माना गया है। पूरे श्रावण माह में निराहारी या फलाहारी रहने की हिदायत दी गई है। इस माह में शास्त्र अनुसार ही व्रतों का पालन करना चाहिए। मन से या मनमानों व्रतों से दूर रहना चाहिए। संपूर्ण माह नहीं रख सकते हैं तो सोमवार सहित कुछ खास दिनों व्रत का पालन अवश्य करें।
उत्तर भारतीयों के लिए सावन सोमवार के दिन :
1. रविवार, 25 जुलाई 2021 श्रावण मास का पहला दिन
2. सोमवार, 26 जुलाई 2021 पहला श्रावण सोमवार
3. सोमवार, 02 अगस्त 2021 दूसरा श्रावण सोमवार
4. सोमवार, 09 अगस्त 2021 तीसरा श्रावण सोमवार
5. सोमवार, 16 अगस्त 2021 चौथा श्रावण सोमवार
6. रविवार, 22 अगस्त 2021 श्रावण मास का अंतिम दिन
पश्‍चिम और दक्षिण भारत में श्रावण माह :
वहां 9 अगस्त 2021 से श्रावण मास प्रारंभ होगा और 7 सितंबर 2021 को श्रावण मास का अंतिम दिन होगा। 9 अगस्त, 19 अगस्त, 23 अगस्त, 30 अगस्त और 6 सितंबर को श्रावण के सोमवार रहेंगे।

टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / फ्राई फूड्स को हेल्थ के लिए ज्यादा अच्छा तो नहीं माना जा सकता लेकिन फिर भी टेस्ट के लिहाज से देखें, तो फ्राई खाने को काफी पसंद किया जाता है। चीजों को तरीके से फ्राई करने पर खाना बहुत ही स्वादिष्ट बनता है। आइए, जानते हैं कुछ टिप्स-
-किसी भी चीज को फ्राई करने से पहले तेल को अच्छी तरह से गर्म कर लें।
-तलने से पहले उस चीज का एक छोटा सा टुकड़ा तेल में डालकर चेक कर सकते हैं कि तेल कितना गरम हुआ है।
-अगर मसाले में नारियल का इस्तेमाल करना है तो नारियल को ज्यादा देर तक न भूनें।
-जब तेल गर्म होने पर धुआं देने लगे, तब गैस को धीमा कर सब्जियां तेल में छोड़ें।
-मीट फ्राई करने से पहले फ्राइंग पैन में थोड़ा सा नमक छिड़क लें। इससे मीट पैन में नहीं चिपकेगा।
-सरसों तेल की महक कम करने के लिए इसे गरम करते समय इसमें थोड़ा सा नमक डाल दें।
-पूरी तरह से तेल के गर्म होने के बाद ही किसी भी चीज को फ्राई करें। इससे खाना भी अच्छी तरह से फ्राई होगा।
-तेल या घी के गर्म होने पर आंच धीमी कर दें ताकि तेल आंच न पकड़ लें।
-इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि कभी कोई गीली चीज एकदम से गरम तेल में न छोड़ें।
-खाना बनाने के बाद तेल के बर्तन को ठंडा होने दें उसके बाद ही उसे छुएं।
-एक साथ सभी चीजें न डालकर स्टेप बाय स्टेप ही डालें। इससे सब्जी, मसाले सब अच्छे से भुन पाएंगे।

टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / स्किन के लिए फेस काफी फायदेमंद है। फेस ऑयल स्किन को फ्लॉलेस और खूबसूरत बनाते हैं। ये ना सिर्फ स्किन को ग्लोइंग बनाता है बल्कि स्किन को कई तरह के इंफेक्शन से भी बचाता है। इसके इस्तेमाल से स्किन में निखार तो आता ही है, साथ ही ड्राईनेस को भी दूर करता है। इसे लगाने से कम उम्र में झुर्रियों की समस्या नहीं होती। वहीं अगर ऑयल स्किन के मुताबिक हो तो ये पिंपल्स की समस्या से भी निजात दिलाता है।
क्यों लगाना चाहिए?
यूं तो स्किन के पोर्स में से नैचुरल ऑयल निकलता है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ ही स्किन में मौजूद नैचुरल ऑयल कम होने लगता है। ऐसे में फेस ऑयल स्किन की मरम्मत करता है।
कैसे लगाएं?
सही मात्रा में लगाया गया फेस ऑयल स्किन को स्वस्थ और शाईनी बनाता है। आप फेस ऑयल को मॉइश्चराइजर के साथ मिलाकर लगा सकते हैं। ब्यूटी एक्सपर्ट्स की मानें तो तेल की कमी स्किन में सीबम नाम के एक पदार्थ की मात्रा काफी बढ़ जाती है, जिससे त्वचा ज्यादा ऑयली होने लगती है। ऐसे में बेजान स्किन को हाईड्रेट करने के लिए फेस ऑयल काफी मददगार हो सकते हैं।

टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ /कल्पनाओं का आना ऑटोमेटिक होता है क्योंकि हमें नकारात्मक सोचना नहीं पड़ता है यह खुद ब खुद ही दिमाग में आ जाता है। हम कोशिश करते हैं कि नकारात्मक कल्पना दिमाग में ना आए फिर भी आ ही जाती है। ऐसा इसलिए कि हमारे चारों ओर जो समाज है, फिल्म है और अब तो सोशल मीडिया भी है जो निरंतर नकारात्मकता फैलाने में लगे हैं तो हमारा दिमाग भी इसके लिए अभ्यस्त हो चला है। कहते हैं नकारात्मक सोच या कल्पना से ही नकारात्मक भविष्य का निर्माण होता है। ऐसे में ओशो रजनीश ने इससे छुटकारा पाने के लिए एक ट्रिक्स बताई है। आप जानिए उसे।

कल्पना द्वारा नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना : सुबह उठते ही पहली बात, कल्पना करें कि तुम बहुत प्रसन्न हो। बिस्तर से प्रसन्न-चित्त उठें- आभा-मंडित, प्रफुल्लित, आशा-पूर्ण- जैसे कुछ समग्र, अनंत बहुमूल्य होने जा रहा हो। अपने बिस्तर से बहुत विधायक व आशा-पूर्ण चित्त से, कुछ ऐसे भाव से कि आज का यह दिन सामान्य दिन नहीं होगा- कि आज कुछ अनूठा, कुछ अद्वितीय तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है; वह तुम्हारे करीब है। इसे दिन-भर बार-बार स्मरण रखने की कोशिश करें। सात दिनों के भीतर तुम पाओगे कि तुम्हारा पूरा वर्तुल, पूरा ढंग, पूरी तरंगें बदल गई हैं।
जब रात को तुम सोते हो तो कल्पना करो कि तुम दिव्य के हाथों में जा रहे हो…जैसे अस्तित्व तुम्हें सहारा दे रहा हो, तुम उसकी गोद में सोने जा रहे हो। बस एक बात पर निरंतर ध्यान रखना है कि नींद के आने तक तुम्हें कल्पना करते जाना हैं ताकि कल्पना नींद में प्रवेश कर जाए, वे दोनों एक-दूसरे में घुलमिल जाएं।

किसी नकारात्मक बात की कल्पना मत करें, क्योंकि जिन व्यक्तियों में निषेधात्मक कल्पना करने की क्षमता होती है, अगर वे ऐसी कल्पना करते हैं तो वह वास्तविकता में बदल जाती है। अगर तुम कल्पना करते हो कि तुम बीमार पड़ोगे तो तुम बीमार पड़ जाते हो। अगर तुम सोचते हो कि कोई तुमसे कठोरता से बात करेगा तो वह करेगा ही। तुम्हारी कल्पना उसे साकार कर देगी।
तो जब भी कोई नकारात्मक विचार आए तो उसे एकदम सकारात्मक सोच में बदल दें। उसे नकार दें, छोड़ दें उसे, फेंक दें उसे। एक सप्ताह के भीतर तुम्हें अनुभव होने लगेगा कि तुम बिना किसी कारण के प्रसन्न रहने लगे हो- बिना किसी कारण के।

सेहत / शौर्यपथ / मूंगफली का सेवन सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है। बल्कि इसे बादाम का पर्याय माना जाता है। जितने पोषक तत्व बादाम में मौजूद होते हैं वह सभी मूंगफली में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। लेकिन बादाम महंगा होता है और मूंगफली सस्ती होती है लेकिन आप बादाम की जगह मूंगफली भी खा सकते हैं। एक लीटर दूध के बजाए 100 ग्राम कच्ची मूंगफली में अधिक प्रोटीन होता है। मूंगफली के साथ ही मूंगफली के तेल के कई फायदे होते हैं। यह कीटाणुओं को खत्म करने में मददगार होता है।
तो आइए जानते हैं मूंगफली खाने के अचूक फायदों के बारे में -
1.हड्डियों को करें मजबूत- मूंगफली के सेवन से हड्डियां मजबूत होती है। मूंगफली में मौजूद पोषक तत्वों से शरीर को विटामिन डी और कैल्शियम मिलता है। बादाम के बदले इसका आसानी से सेवन कर सकते हैं।
2.हार्मोन को करें बैलेंस- जब महिला और पुरुषों में हार्मोंस अनबैलेंस्ड हो जाते हैं तब कई प्रकार की शारीरिक समस्या होती है। इसलिए महिला और पुरुष को रोज एक मुट्ठी मूंगफली का सेवन करना चाहिए।
3.कैंसर से बचाएं-
मूंगफली में एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है जिसका नाम है पॉलीफिनॉलिक। इसके सेवन से पेट के कैंसर का खतरा कम हो जाता है। सप्ताह में 1 बार मूंगफली के साथ मक्खन का सेवन करना चाहिए।
4.झुर्रियों को हटाए- मूंगफली खाने से झुर्रियां कम होती है। इसमें मौजूद तत्व चेहरे पर बारीक रेखा और झुर्रियों को बनने से रोकती है।
5.डायबिटीज को करें नियंत्रित- मूंगफली का सेवन करने से डायबिटीज की आशंका कम होती है। रोज अपनी डाइट में इसे जरूर शामिल करना चाहिए। ताकि घातक बीमारियों से बचा जा सकें।

लाइफस्टाइल /शौर्यपथ / बहुत से शोधों के उपरांत चिकित्सा विज्ञान भी यह मानने लगा हैं कि प्रतिदिन 20 मिनट अपनी पसंद का संगीत सुनने से रोजमर्रा की होने वाली बहुत-सी बीमारियों से निजात पाई जा सकती है। कई दिनों से कोमा में पड़ा एक बच्चा अपनी मां की लोरी सुनकर होश में आ गया। यह सिद्ध करता है कि ध्वनि तरंगों के माध्यम से भी उपचार किया जा सकता है।
बीमारियों का इलाज अब सिर्फ दवाइयों से ही नहीं, बल्कि अपरंपरागत उपचार विधियों से भी किया जाने लगा है। सुगंध, स्पर्श से लेकर संगीत द्वारा भी बहुत सी बीमारियों का इलाज किया जाने लगा है। ज्योतिष में जिस प्रकार हर रोग का संबंध किसी न किसी ग्रह विशेष से होता है उसी प्रकार संगीत की हर ध्वनि या हर सुर व राग का संबंध किसी न किसी ग्रह से अवश्य होता है।
गंधर्व-वेद जो उपवेद भी कहलाता है, संगीत पर आधारित है। इसमें भी रोगियों के उपचार के लिए संगीत का उपयोग किए जाने का उल्लेख है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार यदि किसी जातक को किसी ग्रह विशेष से संबंधित रोग हो और उसे उस ग्रह से संबंधित राग, सुर अथवा गीत सुनाए जाएं तो जातक विशेष जल्दी ही स्वस्थ हो जाता है। आइए जानते हैं कि ऐसे बहुत से रोग व उनसे राहत देने वाले गीत-संगीत और रागों के विषय में...
निम्न शास्त्रीय रागों का उल्लेख किया किया गया है। इन रागों में कोई भी गीत, संगीत, भजन या वाद्य यंत्र बजाकर लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
1) हृदय रोग : इस रोग में राग दरबारी व राग सारंग से संबंधित संगीत सुनना लाभदायक है। मध्यम सितार वादन से फायदा होता है, तेज संगीत न सुनें।
2) अनिद्रा : यह रोग हमारे जीवन में होने वाले सबसे साधारण रोगों में से एक है। इस रोग के होने पर राग भैरवी व राग सोहनी सुनना लाभकारी होता है। बिस्तर पर शांतचित्त होकर मध्यम बांसुरी वादन सुनने से फायदा होता है।
3) पित्त रोग : इस रोग के होने पर राग खमाज सुनने से लाभ मिलता है। खाना खाते समय विशेषकर पानी-हवा जैसी प्राकृतिक ध्वनियों से परिपूर्ण मध्यम स्वर लहरियां सुनने से फायदा होता है।
4) कमजोरी : यह रोग शारीरिक शक्तिहीनता से संबंधित है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति कुछ भी काम कर पाने में खुद को असमर्थ महसूस करता है। इस रोग के होने पर राग जय जयवंती सुनना या गाना लाभदायक होता है। उत्साह का संचार करने के लिए थोड़ा तेज संगीत सुनें।
5) याददाश्त : जिन लोगों की याददाश्त कम हो या कम हो रही हो, उन्हें राग शिवरंजनी सुनने से बहुत लाभ मिलता है। वीणा वादन और बांसुरी सुनने से अत्यधिक फायदा होता है।
6) खून की कमी या शारीरिक कमजोरी से पीड़ित होने पर व्यक्ति निस्तेज रहता है। राग पीलू से संबंधित गीत सुनने से लाभ पाया जा सकता है। मृदंग और ढोल से उत्साह का संचार होता है।
7) मनोरोग अथवा डिप्रेशन : इस रोग में राग बिहाग व राग मधुवंती सुनना लाभदायक होता है। घुंघरू और तबला सुनना मन प्रसन्न करता है।
8) रक्तचाप : ऊंचे रक्तचाप में धीमी गति और निम्न रक्तचाप में तीव्र गति का गीत-संगीत लाभ देता है। वीणा वादन सुनना अति लाभदायक होता है।
9) सांस संबधी रोग जैसे अस्थमा : इस रोग में आस्था-भक्ति पर आधारित गीत-संगीत सुनने व गाने से लाभ होता है। राग मालकौंस व राग ललित से संबंधित गीत इस रोग में सुने जा सकते हैं। प्राकृतिक स्वर लहरियां जैसे समुद्र की लहरें या पानी की कल-कल से अत्यंत फायदा होता है।

धर्म संसार / शौर्यपथ / गंगा नदी को भारत में सबसे पवित्र नदी माना जाता है। ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा पर्व मनाया जाता है। इस दिन मां गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। इस वर्ष यह 20 जून 2021 को मनाया जाएगा। आओ जानते हैं मां गंगा के 10 पौराणिक और 10 ऐतिहासिक तथ्य।
1. विष्णु के कमंडल से प्रकट हुई गंगा : यह भी कहा जाता है कि गंगा का जन्म ब्रह्मा के कमंडल से हुआ था। मतलब यह कि गंगा नामक एक नदी का जन्म। एक अन्य कथा के अनुसार ब्रह्माजी ने विष्णुजी के चरणों को आदर सहित धोया और उस जल को अपने कमंडल में एकत्र कर लिया। भगवान विष्णु के अंगूठे से गंगा प्रकट हुई अतः उसे विष्णुपदी कहां जाता है।
2. हिमवान की पुत्री : एक अन्य कथा के अनुसार गंगा पर्वतों के राजा हिमवान और उनकी पत्नी मीना की पुत्री हैं, इस प्रकार वे देवी पार्वती की बहन भी हैं। कुछ जगहों पर उन्हें ब्रह्मा के कुल का बताया गया है।
3. जाह्‍नु ऋषि की पुत्री : जैसे राजा दक्ष की पुत्री माता सती ने हिमालय के यहां पार्वती के नाम से जन्म लिया था उसी तरह माता गंगा ने अपने दूसरे जन्म में ऋषि जह्नु के यहां जन्म लिया था।
4. स्वर्ग से धरती पर उतरी गंगा : पौराणिक शास्त्रों के अनुसार गंगा अवतरण हेतु ऋषि भागीरथ की तपस्या ने घोर तपस्या की। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छोड़ा। तब भगवान शंकर ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएं बांध लीं। बाद में भगीरथ की आराधना के बाद उन्होंने गंगा को अपनी जटाओं से मुक्त कर धरती पर उतार दिया।
5. गंगा दशहरा के दिन हुआ गंगा अवतरण : पुराणों अनुसार वैशाख शुक्ल सप्तमी तिथि को मां गंगा स्वर्गलोक से सबसे पहले शिवशंकर की जटाओं में पहुंची और फिर धरती गंगा दशशहरा के दि धरती पर उतरीं।
6. शिव की गंगा : कहते हैं कि ब्रह्मचारिणी गंगा के द्वारा किए स्पर्श से ही महादेव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। पत्नी पुरुष की सेवा करती है अतः उसका वास पति के हृदय में अथवा चरणों मे होता है किंतु भगवती गंगा शिव के मस्तक पर विराजति है।
7. गणेश और कार्तिकेय की माता : कहते हैं कि शंकर और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का गर्भ भी देवी गंगा ने धारण किया था। गंगा के पिता भी हिमवान है अतः वो पार्वती की बहन मानी जाती है। स्कंद पुराण के अनुसार, देवी गंगा कार्तिकेय (मुरुगन) की सौतेली माता हैं; कार्तिकेय वास्तव में शंकर और पार्वती के एक पुत्र हैं। पार्वती ने अपने शारीरिक मेल से गणेश की छवि का निर्माण किया, लेकिन गंगा के पवित्र जल में डूबने के बाद गणेश जीवित हो उठे। इसलिए कहा जाता है कि गणेश की दो माताएं हैं-पार्वती और गंगा और इसीलिए उन्हें द्विमातृ तथा गंगेय (गंगा का पुत्र) भी कहा जाता है।
8. गंगा और शांतनु : जह्नु ऋषि की पुत्री गंगा ने राजा शांतनु से विवाह करते सात पुत्रों को जन्म दिया और सभी को नदी में बहा दिया। तब आठवां पुत्र हुआ तो राजा शांतनु ने पूछ लिया कि तुम ऐसा क्यों कर रही हो। यह सुनकर गंगा ने कहा कि विवाह की शर्त के मुताबीक तुम्हें ऐसा नहीं पूछना था। अब मुझे पुन: स्वर्ग जाना होगा और यह आठवीं संतान अब तुम्हारे हवाले। वही आठवीं संतान आगे चलकर भीष्म पितामह के नाम से विख्‍यात हुई।
9. गंगा का पानी अमृत क्यों : पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गंगा नदी में ही समुद्र मंथन से निकला अमृत कुंभ का अमृत दो जगह गिरा था। पहला प्रयाग और दूसरा हरिद्वार।
10. ग्रंथों में गंगा : ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण, पंचविश ब्राह्मण, गौपथ ब्राह्मण, ऐतरेय आरण्यक, कौशितकी आरण्यक, सांख्यायन आरण्यक, वाजसनेयी संहिता, रामायण और महाभारत इत्यादि में गंगा की महिमा का वर्णन मिलता है।
ऐतिहासिक तथ्य :
1. भागीरथ की गंगा : ब्रह्मा से लगभग 23वीं पीढ़ी बाद और राम से लगभग 14वीं पीढ़ी पूर्व भगीरथ हुए। भगीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था। इससे पहले उनके पूर्वज सगर ने भारत में कई नदी और जलराशियों का निर्माण किया था। उन्हीं के कार्य को भगीरथ ने आगे बढ़ाया। पहले हिमालय के एक क्षेत्र विशेष को देवलोक कहा जाता था। वहां से भगीरथजी ने गंगा को नीचे धरती पर उतारा। भारत की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में निरुपित किया गया है। परंतु देवी गंगा और नदी में क्या अंतर है यह बताना मुश्‍किल है।
2. गंगा की मुख्य 12 धाराएं : हिमालय से निकलकर गंगा 12 धाराओं में विभक्त होती है इसमें मंदाकिनी, भागीरथी, धौलीगंगा और अलकनंदा प्रमुख है। गंगा नदी की प्रधान शाखा भागीरथी है जो कुमाऊं में हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री हिमनद से निकलती है। यहां गंगाजी को समर्पित एक मंदिर भी है।
3. गंगोत्री मुख्‍य पड़ाव : गंगा का उद्गम दक्षिणी हिमालय में तिब्बत सीमा के भारतीय हिस्से से होता है। गंगोत्री को गंगा का उद्गम माना गया है। गंगोत्री उत्तराखंड राज्य में स्थित गंगा का उद्गम स्थल है। सर्वप्रथम गंगा का अवतरण होने के कारण ही यह स्थान गंगोत्री कहलाया।
4. गौमुख से निकली गंगा : किंतु वस्तुत: उनका उद्गम 18 मील और ऊपर श्रीमुख नामक पर्वत से है। वहां गोमुख के आकार का एक कुंड है जिसमें से गंगा की धारा फूटी है। 3,900 मीटर ऊंचा गौमुख गंगा का उद्गम स्थल है। इस गोमुख कुंड में पानी हिमालय के और भी ऊंचाई वाले स्थान से आता है।
5. हरिद्वार को कहते हैं गंगा द्वार : हिमाचल के हिमालय से निकलकर यह नदी प्रारंभ में 3 धाराओं में बंटती है- मंदाकिनी, अलकनंदा और भगीरथी। देवप्रयाग में अलकनंदा और भगीरथी का संगम होने के बाद यह गंगा के रूप में दक्षिण हिमालय से ऋषिकेश के निकट बाहर आती है और हरिद्वार के बाद मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है। हरिद्वार को गंगा द्वार भी कहते हैं क्योंकि यहीं से गंगा पहाड़ों से उतरकर मैदानी इलाके में आगे बढ़ती है।
6. गंगा का सागर से संगम : फिर यह नदी उत्तराखंड के बाद मध्यदेश से होती हुई यह नदी बिहार में पहुंचती है और फिर पश्चिम बंगाल के हुगली पहुंचती है। यहां से बांग्लादेश में घुसकर यह ब्रह्मपुत्र नदी से मिलकर गंगासागर, जिसे आजकल बंगाल की खाड़ी कहा जाता है, में मिल जाती है। हुगली नदी कोलकाता, हावड़ा होते हुए सुंदरवन के भारतीय भाग में सागर से संगम करती है। इस स्थान को गंगा सागर कहते हैं। कहते भी हैं कि सारे तीरर्थ बार बार गंगा सागर एक बार।
7. गंगा का अन्य नदियों से संगम : इस बीच इसमें कई नदियां मिलती हैं जिसमें प्रमुख हैं- सरयू, यमुना, सोन, रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, कोसी, घुघरी, महानंदा, हुगली, पद्मा, दामोदर, रूपनारायण, ब्रह्मपुत्र और अंत में मेघना। गंगा देवप्रयाग, हरिद्वार, ऋषिकेश से प्रयागराज पहुंचकर यह यमुना से मिलती है।
8. गंगा के तट के तीर्थ : गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक गंगा के तट पर हजारों तीर्थ है। गंगा को भारत का हृदय माना जाता है। इसके एक और सिन्धु और सरस्वती बहती है तो दूसरी ओर ब्रह्मपुत्र। गंगा देवप्रयाग, हरिद्वार, ऋषिकेश, प्रयागराज, काशी, भागलपुर, गिरिया से होते हुए गंगासागर तक अनेकों तीर्थ है। महाभारत के अनुसार मात्र प्रयाग में माघ मास में गंगा-यमुना के संगम पर तीन करोड़ दस हजार तीर्थों का संगम होता है।
9. गंगा के जंगल : ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह ज्ञात होता है कि 16वीं तथा 17वीं शताब्दी तक गंगा-यमुना प्रदेश घने वनों से ढका हुआ था। इन वनों में जंगली हाथी, भैंस, गेंडा, शेर, बाघ तथा गवल का शिकार होता था। यहां लाखों तरह के पशु और पक्षी विचरण करते थे। परंतु आधुनिकरण और शहरीकरण के चलते यह सबकुछ नष्ट हो गया।
10. गंगा जल के जंतु : इसमें मछलियों की 140 प्रजातियां, 35 सरीसृप तथा इसके तट पर 42 स्तनधारी प्रजातियां पाई जाती हैं। गंगा के पर्वतीय किनारों पर लंगूर, लाल बंदर, भूरे भालू, लोमड़ी, चीते, बर्फीले चीते, हिरण, भौंकने वाले हिरण, सांभर, कस्तूरी मृग, सेरो, बरड़ मृग, साही, तहर आदि काफी संख्या में मिलते हैं। विभिन्न रंगों की तितलियां तथा कीट भी यहां पाए जाते हैं।

टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / आप वजन घटाने के लिए कितनी ही कोशिश करते हैं लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि हर तरह की सावधानी और नियम फॉलो करने के बाद भी वजन कम होने की बजाय बढ़ता जाता है। ऐसे में बार-बार या हर दिन वजन मापना सम्भव भी नहीं है इसलिए आपको कुछ ऐसी बातों पर नजर जरूर रखनी चाहिए, जिससे कि आपको पता चले कि आपका वजन वाकई कम हो रहा है क्योंकि कई बार जिम या होम वर्कआउट के बाद हम ज्यादा डाइट ले लेते हैं, जिससे वजन बढ़ने लगता है। समय पर पता चलने पर हम यह समझ सकते हैं कि वजन कम करने के प्रयास सही दिशा में जा रहे हैं। आइए, जानते हैं ऐसे संकेत जिनसे पता चलता है कि आपका वजन कम हो रहा है-
बार-बार टॉयलेट आना
आपको अगर बार-बार टॉयलेट आता है और आपको कोई बीमारी नहीं है, तो आपको समझ लेना चाहिए कि आपका वजन पहले की तुलना में धीरे-धीरे कम हो रहा है। हालांकि, इस बात की सावधानी भी रखें कि बिना किसी खास प्रयास के कहीं आपका वजन तेजी से तो कम नहीं हो रहा है।
पसीना आना
आपको अगर वर्कआउट करते समय ज्यादा पसीना आ रहा है, तो समझ लें कि वजन घटाने का आपका प्रयास सही दिशा में जा रहा है। पसीना आने से भी वजन कम होने के संकेत मिलते हैं।
चलने में स्पीड बढ़ना
आमतौर पर मोटे लोगों की तुलना में सामान्य वजन वाले लोग ज्यादा तेजी से चलते हैं। ऐसे में इस बात को याद रखें कि चलते हुए अगर आपकी स्पीड पहले के मुकाबले बढ़ गई है, तो आपका वजन कम हो रहा है क्योंकि आपके घुटनों पर कम वजन पड़ रहा है।
प्यास ज्यादा और भूख कम
वजन कम होने पर गला बार-बार सूखने लगता है। ऐसे में आपको बार-बार प्यास लगती है। इसके अलावा हल्कापन होने की वजह से पहले की अपेक्षा आपकी भूख में भी कमी आती है। आपकी डाइट में कुछ कमी आती है।
कपड़ों की फिटिंग में बदलाव
सबसे आसान तरीका जिससे ज्यादातर लोगों को पता लगता है कि उनका वजन बढ़ा है या कम हो रहा है। जाहिर है कि अगर आपका वजन कम हो रहा है, तो आपके कपड़े आपको पहले के मुकाबले कुछ ढीले होंगे।

खाना खजाना / शौर्यपथ / आइए जानें कुछ खास रेसिपीज- मालपुए
सामग्री :5 बड़े चम्मच मैदा, 5 बड़े चम्मच मिल्क पावडर, 4 चम्मच रवा, 5 हरी इलायची, 250 ग्राम चीनी, 2 कप दूध, तलने के लिए घी।
विधि :
सर्वप्रथम चीनी के अलावा बाकी सारी सामग्री को दूध के साथ मिलाकर गाढ़ा घोल बना लें। इसे 3-4 घंटे तक रखे रहें। एक कड़ाही में घी गर्म करके एक बड़ा चम्मच घोल डालकर मंदी आंच पर बादामी रंग होने तक तलें।
चीनी की चाशनी बना लें और तला हुआ मालपुआ चाशनी में डाल दें। इस तरह से सभी मालपुए तलकर चाशनी में डालते जाएं। ऊपर से सूखे मेवे व वर्क की कतरन डालकर शाही मालपुए सर्व करें।
रसगुल्ले
सामग्री :500 ग्राम छेना (कपड़े में बांधकर पानी निकाल दें), 1 चुटकी केसर, 1 चम्मच दूध, 350 ग्राम शक्कर, 5 कप पानी।
विधि : सर्वप्रथम पानी निकले छेने को हथेली से खूब मसल लें। अब दूध में केसर को घिसकर छेने में मिलाएं और अच्छी तरह मिक्स कर लें। जब यह एकसार और चिकना हो जाए तो इसकी 14-15 गोली बनाएं।
अब एक बर्तन में शक्कर-पानी मिलाकर मध्यम आंच पर 5-10 मिनट उबालें। इसमें छेने की गोली डालें और आधा घंटा तक उबालें। इस दौरान उबलते पानी को चम्मच से रसगुल्लों पर डालती रहे ताकि चाशनी गाढ़ी न होने पाएं। रसगुल्ले जब चाशनी वाले पानी में पूरी तरह ऊपर आ जाए तब आंच बंद कर दें। ठंडे होने पर फ्रिज में रखें। बाउल में सजाएं और पेश करें।
सत्तू बर्फी
सामग्री : क्रशड्डह्यह्लद्गस्र ष्टद्धड्डठ्ठड्ड ष्ठड्डद्य का सत्तू बनाने के लिए 500 ग्राम सिंकी हुई चने की दाल (फुटाणे की दाल), 500 ग्राम पिसी शक्कर, 300 ग्राम घी, इलायची, चांदी का वरक, बादाम, पिस्ता, इलायची पाउडर, खड़ी सुपारी।
विधि :सर्वप्रथम सिंकी हुई चने की दाल को मिक्सर में अच्छी तरह बारीक पीसकर पिसी हुई शक्कर में मिलाकर छलनी से छान लें।
अब घी को हल्का गरम करके चना दाल व शक्कर के मिश्रण में मिला दें तथा इलायची भी पीसकर मिला दें। इसे दोनों हथेलियों से अच्छा मसल कर मिलाएं ताकि एकसार हो जाए, इलायची पाउडर मिलाएं फिर थाली में पिंडे के आकार में जमा दें।
पिंडे के ऊपर चांदी का वरक लगाएं तथा बीच में एक सुपारी और आसपास बादाम, पिस्ता से सजाएं। ठंडा होने पर अपने मनचाहे आकार में काट कर पेश करें।
रसमलाई
सामग्री :कवर के लिए आटा 250 ग्राम, घी 1 बड़ा चम्मच, पिसी शक्कर 50 ग्राम, इलायची पावडर 1 छोटा चम्मच। भरावन के लिए : बारीक कटी मेवा 1 छोटी कटोरी। रबड़ी के लिए : फूल क्रीम दूध 2 लीटर, शक्कर 2 टेबल स्पून, केसर के धागे 3, सजाने के लिए पिस्ता कतरन 1 चम्मच, बादाम 8-10।
विधि :सबसे पहले आटे को घी में गुलाबी भूनकर शक्कर और 1 गिलास पानी डालकर गाढ़ा हलवा तैयार करें। दूध को शक्कर और केसर के धागे डालकर आधा रहने तक उबालें। इसे ठंडा होने दें। एक बड़ा चम्मच हलवा लेकर हथेली पर फैलाएं और इसके अंदर एक चम्मच मेवा रखकर चारों ओर से बंद करके हाथ से हल्का-सा चपटा करें।
गरम तवे पर एक चम्मच घी लगाकर दोनों ओर सुनहरा होने तक सेकें। इन्हें गरम-गरम ही तैयार रबड़ी में डालें। ऊपर से मेवे की कतरन से सजाकर पेश करें।

आस्था /शौर्यपथ /माह में 2 एकादशियां होती हैं अर्थात आपको माह में बस 2 बार और वर्ष के 365 दिनों में मात्र 24 बार ही नियमपूर्वक एकादशी व्रत रखना है। हालांकि प्रत्येक तीसरे वर्ष अधिकमास होने से 2 एकादशियां जुड़कर ये कुल 26 होती हैं। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते हैं। आओ जानते हैं इसके संबंध में 10 प्रमुख बातें।
कब है निर्जला एकादशी का व्रत : प्रत्येक हिन्दू वर्ष के ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाता है। अंग्रेजी माह के अनुसार इस वर्ष 2021 में यह व्रत 21 जून को सोमवार के दिन रखा जाएगा।
निर्जला एकादशी शुभ मुहूर्त : एकादशी तिथि का प्रारम्भ 20 जून 2021 को शाम के 04 बजकर 21 मिनट पर पर होगा और इसका समापन 21 जून को दोपहर 01 बजकर 31 मिनट पर होगा। इसका पारण समय 22 जून को 05:23:49 से 08:11:28 तक रहेगा। पारणा अवधि : 02 घंटे 47 मिनट है। वैसे व्रत का प्रारंभ उदया तिथि से माना जाता है। सूर्योदय से दूसरे दिन के सूर्योदय तक व्रत रहेगा।
जानें 10 प्रमुख बातें :
1. ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी के अलावा भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। भीमसेनी एकादशी और कुछ अंचलों में पांडव एकादशी पड़ा। कुछ ग्रंथों में माघ शुक्ल एकादशी व कार्तिक शुक्ल एकादशी को भी भीमसेनी एकादशी का नाम दिया गया है, परंतु ज्यादातर विद्वान निर्जला एकादशी को ही भीमसेनी एकादशी के रूप में स्वीकार करते हैं।
2. शास्त्रों में उल्लेखों के अनुसार मान्यता है कि पांडव पुत्र भीम के लिए कोई भी व्रत करना कठिन था, क्योंकि उनकी उदराग्नि कुछ ज्यादा प्रज्वलित थी और भूखे रहना उनके लिए संभव न था। मन से वे भी एकादशी व्रत करना चाहते थे। इस संबंध में भीम ने वेद व्यास व भीष्म पितामह से मार्गदर्शन लिया। दोनों ने ही भीम को आश्वस्त किया कि यदि वे वर्ष में सिर्फ निर्जला एकादशी का व्रत ही कर लें तो उन्हें सभी चौबीस एकादशियों (यदि अधिक मास हो तो छब्बीस) का फल मिलेगा। इसके पश्चात भीम ने सदैव निर्जला एकादशी का व्रत किया।
3. पद्मपुराण में निर्जला एकादशी व्रत द्वारा मनोरथ सिद्ध होने की बात कही गई है।
4. निर्जला का अर्थ निराहार और निर्जल रहकर व्रत करना है। इस दिन व्रती को अन्न तो क्या, जलग्रहण करना भी वर्जित है। यानी यह व्रत निर्जला और निराहार ही होता है। शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि संध्योपासना के लिए आचमन में जो जल लिया जाता है, उसे ग्रहण करने की अनुमति है।
5. निर्जला एकादशी व्रत पौराणिक युगीन ऋषि-मुनियों द्वारा पंचतत्व के एक प्रमुख तत्व जल की महत्ता को निर्धारित करता है। पंचत्वों की साधना को योग दर्शन में गंभीरता से बताया गया है। अत: साधक जब पांचों तत्वों को अपने अनुकूल कर लेता है तो उसे न तो शारीरिक कष्ट होते हैं और न ही मानसिक पीड़ा।
6. इस एकादशी के व्रत को विधिपूर्वक करने से सभी एकादशियों के व्रत का फल मिलता है।
7. सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही नहीं अपितु दूसरे दिन द्वादशी प्रारंभ होने के बाद ही व्रत का पारायण किया जाता है। अत: पूरे एक दिन एक रात तक बिना पानी के रहना ही इस व्रत की खासियत है और वह भी इतनी भीषण गर्मी में।
8. निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। निर्जला एकादशी को जल एवं गौ दान करना सौभाग्य की बात मानते थे। इसीलिए आज भी जो लोग गौ दान नहीं कर पाते हैं वे इस समय जलपान जरूर कराते हैं। ज्येष्ठ माह वैसे भी तपता है तो भी जगह प्याऊ लगान और लोगों को पानी पिलाना पुण्य का कार्य है। इस दिन जल में वास करने वाले भगवान श्रीमन्नारायण विष्णु की पूजा के उपरांत दान-पुण्य के कार्य कर समाज सेवा की जाती रही। इसके अलावा लोग ग्रीष्म ऋतु में पैदा होने वाले फल, सब्जियां, पानी की सुराही, हाथ का पंखा आदि का दान करते हैं।
9. इस दिन प्रात:काल उठकर स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें। पूजाघर में धूप दीप जलाएं। इसके बाद भगवान विष्णु का गंगाजल से अभिषेक करें और उन्हें पुष्प एवं तुलसी के पत्ते अर्पित करने के बाद व्रत का संकल्प लें। संकल्प के बाद उनकी और माता लक्ष्मी की आरती करके उन्हें भोग लगाएं। पूजा एवं आरती के बाद जब तक व्रत चलता है तब तक भगवान विष्णु का भजन और ध्यान करें।
10. अपनी सामर्थ के अनुसार अन्न, वस्त्र, जल, जूता, छाता, फल आदि का दान करें। यह नहीं कर सकते हैं तो कम से कम इस दिन जल कलश में जल भरकर उसे सफेद वस्त्र से ढंककर चीनी और दक्षिणा के साथ किसी ब्राह्मण को दान जरूर करें जिससे साल भर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है।

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