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ब्यूटी टिप्स /शौर्यपथ / टमाटर का उपयोग भोजन के स्वाद को बढ़ाने के लिए खूब किया जाता है। पौष्टिक गुणों से भरपूर टमाटर सेहत और सौंदर्य दोनों के लिए बेहद लाभकारी है। नियमित रूप से टमाटर के जूस के सेवन से सेहत और सौंदर्य दोनों ही पाई जा सकती हैं। टमाटर आपकी
टमाटर को सलाद के रूप में खाना पसंद करते है। वहीं आपको बता दें कि प्रतिदिन टमाटर के जूस को पीने से त्वचा के रोग ठीक होते हैं चेहरे पर ग्लो यानि चमक आती है।
टमाटर के जूस पीने के फायदे
* बदहजमी से निजात पानें के लिए टमाटर के जूस में सेंधा नमक और सौंठ मिलाकर पीने से बदहजमी की समस्या से राहत मिलती है।
* टमाटर के जूस में काली मिर्च और इलायची के दानों का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से दिल घबराना जी मिचलाना में आराम मिलता है।
* पाचन क्रिया को बेहतर रखने के लिए टमाटर के जूस में अदरक और नींबू का जूस मिलाकर, थोड़ा-सा सेंधा नमक डालकर पीने से पाचन सही रहता है।
* टमाटर के जूस का यदि रोज सेवन किया जाएं तो पेट संबंधी परेशानियों से राहत मिलती है।
* टमाटर के सूप में काली मिर्च डालकर नियमित पीने से कब्ज की समस्या से निजात मिलती है। साथ ही चेहरे पर चमक और शरीर में चुस्ती बरकरार रहती है।
* कफ, खांसी से परेशान है, तो टमाटर के सूप में पिसी हुई काली मिर्च का पाउडर मिलाएं या लाल मिर्च का इसे गर्म-गर्म रोजाना पीने से कफ, खांसी, बलगम की परेशानी से राहत मिलती है।
टमाटर के फायदे स्किन के लिए
* त्वचा के लिए टमाटर बहुत लाभकारी माना जाता है। इसके सेवन से चेहरे की झुर्यियां कम होती है। साथ ही टमाटर अल्ट्रावायलेट रेज़ से त्वचा को बचाता है, जो त्वचा पर लाइनों और झुर्रियों का एक प्रमुख कारण होता है।
* टमाटर का जूस त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद होता है यदि मुहांसों की समस्या से परेशान है, तो टमाटर का सेवन और इसे चेहरे पर लगाने से आप पिम्पल्स की परेशानी से झुटकारा पा सकते है।
* एक चम्मच टमाटर के जूस में बेसन और आधा चम्मच मलाई मिलाकर लगाने से चेहरे पर ग्लो आता है।
* टमाटर के जूस को पीने से खून साफ होता है और चेहरा दमकने लगता है।
* नियमित रूप से टमाटर का जूस पीने से चेहरे पर ग्लो आता है।
सेहत /शौर्यपथ /अभी कोरोना महामारी का दौर जारी है। ऐसे समय में ज्यादा से ज्यादा साफ-सफाई पर ध्यान देना चाहिए। बेहतर स्वास्थ्य के लिए साफ-सफाई का होना बहुत आवश्यक है। यदि हम सफाई पर ध्यान दें तो कीटाणुओं के संपर्क में आने से बचे रहेंगे।
हम सभी अपने घर और अपने किचन की सफाई पर बहुत ध्यान देते हैं। लेकिन यदि आप माइक्रोवेव की सफाई को नजरअंदाज कर रहे हैं तो यह आपकी सेहत पर बुरा असर डाल सकता है। अगर लंबे समय तक माइक्रोवेव की सही तरीके सफाई नहीं हुई हो तो यह कीटाणुओं का घर बन सकता है। तो आइए जानते हैं कुछ ऐसे टिप्स जिनकी मदद से आप माइक्रोवेव की सही सफाई कर सकती हैं।
* सबसे पहले माइक्रोवेव में से रैक्स, ग्रिल और टिन को निकालकर साबुन के पानी में डुबोकर रख दें। इससे इन चीजों में जमी चिकनाई आसानी से निकलने लगेगी।
* इन्हें अच्छी तरह ब्रश से रगड़कर साफ पानी से धोकर सूखने के लिए रख दें।
* अब पानी में बैकिंग सोडा, नींबू व नमक मिलाकर सॉल्यूशन तैयार करें। इस सॉल्यूशन में कपड़े को भिगोकर अच्छी तरह से माइक्रोवेव के अंदर से सफाई करें।
* एक ब्रश में साबुन का पानी तैयार करें। इस पानी से ब्रश की मदद से माइक्रोवेव में जमे दाग-धब्बों को रगड़कर अच्छी तरह साफ करें।
* अब माइक्रोवेव को ऊपर से साफ करने के लिए पानी में सिरका डालें और इस पानी से इसे ऊपर से साफ करें।
आस्था / शौर्यपथ / हिन्दू धर्म में वृक्ष की पूजा और परिक्रमा का बहुत ही महत्व माना गया है। बहुत से त्योहार तो वृक्ष से ही जुड़े हुए हैं जैसे वट सावित्री व्रत, आंवला नवमी, तुलसी पूजा, अश्वत्थोपनयन व्रत आदि कई ऐसे व्रत और त्योहार हैं जो पेड़ पौधों से जुड़े हुए हैं। आओ जानते हैं कि वृक्ष की पूजा और परिक्रमा करने के क्या है 10 खास फायदे।
प्रत्येक वृक्ष का गहराई से विश्लेषण करके हमारे ऋषियों ने यह जाना की पीपल और वट वृक्ष सभी वृक्षों में कुछ खास और अलग हैं। इनके धरती पर होने से ही धरती के पर्यावरण की रक्षा होती है। यही सब जानकर ही उन्होंने उक्त वृक्षों के संवरक्षण और इससे मनुष्य के द्वारा लाभ प्राप्ति के हेतु कुछ विधान बनाए गए उन्ही में से दो है पूजा और परिक्रमा।
1. वृक्ष को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है। इसीलिए इसकी पूजा का अर्थ है ईश्वर या परमेश्वर की पूजा परिक्रमा करना। ऐसे करने से व्यक्ति का संबंधी सीधे परमेश्वर से जुड़ता है।
।।मूलतः ब्रह्म रूपाय मध्यतो विष्णु रुपिणः। अग्रतः शिव रूपाय अश्वत्त्थाय नमो नमः।।
भावार्थ- अर्थात इसके मूल में ब्रह्म, मध्य में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव का वास होता है। इसी कारण 'अश्वत्त्थ' नामधारी वृक्ष को नमन किया जाता है। -पुराण
।।तहं पुनि संभु समुझिपन आसन। बैठे वटतर, करि कमलासन।।भावार्थ- अर्थात कई सगुण साधकों, ऋषियों यहां तक कि देवताओं ने भी वटवृक्ष में भगवान विष्णु की उपस्थिति के दर्शन किए हैं। -रामचरित मानस
2. हिन्दू धर्मानुसार वृक्ष में भी आत्मा होती है। वृक्ष संवेदनशील होते हैं और उनके शक्तिशाली भावों के माध्यम से आपका जीवन बदल सकता है। इसीलिए इसकी परिक्रमा और पूजा का विधान है।
3. हिन्दू धर्म में परिक्रमा का बड़ा महत्त्व है। इसको 'प्रदक्षिणा करना' भी कहते हैं, जो षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। प्रदक्षिणा का प्राथमिक कारण सूर्यदेव की दैनिक चाल से संबंधित है। जिस तरह से सूर्य प्रात: पूर्व में निकलता है, दक्षिण के मार्ग से चलकर पश्चिम में अस्त हो जाता है, उसी प्रकार वैदिक विचारकों के अनुसार अपने धार्मिक कृत्यों को बाधा विध्नविहीन भाव से सम्पादनार्थ प्रदक्षिणा करने का विधान किया गया। व्यक्ति का संपूर्ण जीवन ही एक चक्र है। वृक्ष की परिक्रमा से वृक्ष का सानिध्य मिलता है जिसके चलते उसकी सकारात्मक उर्जा हमारा नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मकता में बदल देती है।
4. एक उत्तरी ध्रुव और दूसरा दक्षिणी ध्रुव। वृक्ष इन दोनों ध्रुवों से कनेक्ट रहकर धरती और आकाश के बीच ऊर्जा का एक सकारात्मक वर्तुल बनाते हैं। वृक्ष का संबंध या जुड़ाव जितना धरती से होता है उससे ज्यादा कई गुना आकाश से होता है। वैज्ञानिक शोधों से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि धरती के वृक्ष ऊंचे आसमान में स्थित बादलों को आकर्षित करते हैं। यदि आप किसी प्राचीन या ऊर्जा से भरपूर वृक्षों के झुंड के पास खड़े होकर कोई मन्नत मांगते हो तो यहां आकर्षण का नियम तेजी से काम करने लगता है। वृक्ष आपके संदेश को ब्रह्मांड तक फैलाने की क्षमता रखते हैं और एक दिन ऐसा होता है जबकि ब्रह्मांड में गया सपना हकीकत बनकर लौटता हैं।
5. अक्सर आपने देखा होगा की पीपल और वट वृक्ष की परिक्रमा का विधान है। इनकी पूजा के भी कई कारण है। स्कन्द पुराण में वर्णित पीपल के वृक्ष में सभी देवताओं का वास है। पीपल की छाया में ऑक्सीजन से भरपूर आरोग्यवर्धक वातावरण निर्मित होता है। इस वातावरण से वात, पित्त और कफ का शमन-नियमन होता है तथा तीनों स्थितियों का संतुलन भी बना रहता है। इससे मानसिक शांति भी प्राप्त होती है।
6. अश्वत्थोपनयन व्रत के संदर्भ में महर्षि शौनक कहते हैं कि मंगल मुहूर्त में पीपल वृक्ष की नित्य तीन बार परिक्रमा करने और जल चढ़ाने पर दरिद्रता, दु:ख और दुर्भाग्य का विनाश होता है। पीपल के दर्शन-पूजन से दीर्घायु तथा समृद्धि प्राप्त होती है। अश्वत्थ व्रत अनुष्ठान से कन्या अखण्ड सौभाग्य पाती है।
7. शनिवार की अमावस्या को पीपल वृक्ष की पूजा और सात परिक्रमा करके काले तिल से युक्त सरसो के तेल के दीपक को जलाकर छायादान करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। अनुराधा नक्षत्र से युक्त शनिवार की अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष के पूजन से शनि पीड़ा से व्यक्ति मुक्त हो जाता है। श्रावण मास में अमावस्या की समाप्ति पर पीपल वृक्ष के नीचे शनिवार के दिन हनुमान की पूजा करने से सभी तरह के संकट से मुक्ति मिल जाती है।
8.श्रीमद्भागवत् में वर्णित है कि द्वापरयुग में परमधाम जाने से पूर्व योगेश्वर श्रीकृष्ण इस दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान में लीन हुए। इसके नीचे विश्राम या ध्यान करने से सभी तरह के मानसिक संताप मिट जाते हैं तथा मन स्थिर हो जाता है। स्थिर चित्त ही मोक्ष को प्राप्त कर सकता है या कोई महान कार्य कर सकता है। वृक्ष हमारे मन को स्थिर और शांत रखने की ताकत रखते हैं। चित्त की स्थिरता से साक्षित्व या हमारे भीतर का दृष्टापन गहराता है। हमारे ऋषि-मुनि, बुद्ध पुरुष, अरिहंत, भगवान आदि सभी पीपल के नीचे बैठकर ही ध्यान करते थे। उक्त वृक्ष के नीचे ही बैठकर बुद्ध और महावीर स्वामी ने तपस्या की तथा वे ज्ञान को उपलब्ध हो गए। पूर्ण दृष्टा हो गए।
9. वृक्ष के आसपास रहने से जीवन में मानसिक संतुष्टि और संतुलन मिलता है। वृक्ष हमारे जीवन के संतापों को समाप्त करने की शक्ति रखते हैं। माना कि वृक्ष देवता नहीं होते लेकिन उनमें देवताओं जैसी ही ऊर्जा होती है। हाल ही में हुए शोधों से पता चला है कि नीम के नीचे प्रतिदिन आधा घंटा बैठने से किसी भी प्रकार का चर्म रोग नहीं होता। तुलसी और नीम के पत्ते खाने से किसी भी प्रकार का कैंसर नहीं होता। इसी तरह वृक्ष से सैकड़ों शारीरिक और मानसिक लाभ मिलते हैं। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हमारे ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण संरक्षण हेतु वृक्ष से संबंधित अनेक मान्यताओं को प्रचलन में लाया।
10. कुछ देर किसी भी अच्छे वृक्ष के नीचे बैठने से शरीर और मन के सारे त्रास मिट जाते हैं। इसीलिए हमें वृक्ष की परिक्रमा और पूजा करना चाहिए क्योंकि इससे वृक्ष भी हमें अपना मित्र समझकर हमारे दुख और संताप को मिटाने में हमारी सहायता करते हैं।
धर्म संसार / शौर्यपथ / अधिकतर घरों में तुलसी को पौधा होता है। तुलसी पौथे की देखरेख बहुत ही सावधानी से करना होती है अन्यथा यह पौधा जल्दी ही मुरझाकर खत्म हो जाता है। इसकी देखरेख या सेवा करने के कुछ नियम है उन्हीं में से एक है जल अर्पित करने का नियम। इन नियमों का पालन करने से जहां विष्णु, लक्ष्मी प्रसन्न होंगे वहीं देवी तुलसी भी आपको आशीर्वाद देती है।
1. तुलसी की जड़ों में रविवार और एकादशी को जल नहीं चढ़ाया जाता है।
2. रविवार और एकादशी के दिन तुलसी महारानी ठाकुरजी के लिए व्रत रखती है। वह केवल इन्हीं दो दिनों विश्राम करती और निंद्रा लेती हैं।
3. तुलसी माता को प्रतिदिन उचित मात्रा में जल अर्पण करना चाहिए। अर्थात ना कम और ना ज्यादा।
4. यदि ज्यादा मात्रा में जल अर्पण किया तो पौधा समाप्त हो जाएगा और कम मात्रा में भी। कम फिर भी चल जाएगा परंतु ज्यादा नहीं। वैसे यदि एक दिन छोड़कर भी आप पानी अर्पण करेंगे तो चलेगा। बारिश में तो सप्ताह में दो बार ही डालें।
5. तुलसी के पौधे को मौसम की मार से भी बचा कर रखना चाहिए। ज्यादा ठंड या गर्मी से तुलसी समाप्त हो जाती है। इसलिए ठंड में तुलसी माता के आसपास कपड़े या कांच का कवर लगाया जा सकता है। तेज बारिश से भी तुलसी को बचाकर रखें।
लाइफस्टाइल /शौर्यपथ / किसी भी रिलेशनशिप को परफेक्ट बनाने की कोई सटीक ट्रिक नहीं है लेकिन फिर भी आपसी समझ और कोशिश रिश्ते को मजबूत बनाए रखती है। लम्बे समय तक रिलेशनशिप में रहते हुए कपल एक-दूसरे के पार्टनर ही नहीं बल्कि दोस्त भी बन जाते हैं लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि रिश्ते में ज्यादा समय में रहते हुए किसी एक का प्यार धीरे-धीरे कम होने लगता है। ऐसे में कुछ बातों से जाना जा सकता है कि आपके लिए आपके पार्टनर का प्यार कम होता जा रहा है।
सम्मान का खत्म होना
किसी भी रिश्ते की नींव सम्मान पर टिकी होती है। पार्टनर के लिए प्यार और सम्मान, ये दो चीजें हैं। ऐसे में कई बार ऐसा होता है कि कपल एक-दूसरे से प्यार तो करते हैं लेकिन इज्जत नहीं करते। जैसे पार्टनर के प्रोफेशन, काम, विचारों या बातों की इज्जत न करते हुए हमेशा मजाक उड़ाना। ऐसे में अगर आपके रिश्ते में भी ये चीजें शुरू होने लगी हैं, तो समझ जाएं कि आपके लिए आपके पार्टनर के मन में इज्जत खत्म हो रही है।
एक-दूसरे के साथ वक्त बिताना बोरिंग लगना
हमेशा मिलने पर पार्टनर के साथ मिलने का क्रेज खत्म हो जाता है। ऐसा हमेशा नहीं होता लेकिन कई लोगों को इस बात से परेशानी होती है। ऐसे में अगर आप भी यह महसूस करें कि अब बहुत टाइम बाद मिलने पर भी आपका पार्टनर बोरियत महसूस कर रहा है, तो आपको आगे के रिश्ते के बारे में सोचने की जरूरत है।
आपके प्रति व्यवहार बदलना
हर व्यक्ति बदलाव के दौर से बदलता है लेकिन अगर पार्टनर का व्यवहार सिर्फ आपके लिए बदला है, तो आपको इस बारे में उनसे बात करने की जरूरत है। बदले हुए व्यवहार में साथी का समय पर घर न आना, आपसे दूर-दूर भागने का प्रयास करना, अक्सर दोस्तों के साथ पार्टी करना जैसी बातें शामिल हो सकती हैं।
शौर्यपथ / त्योहार का अवसर हो या फिर खाने के बाद मीठा खाने का कर रहा हो मन, पनीर लड्डू हर घर में बेहद पसंद किए जाते हैं। मावा और पनीर को मिलाकर बनाए गए ये लड्डू सेहतमंद होने के साथ-साथ बहुत जल्दी बनकर तैयार भी हो जाते हैं। तो आइए देर किस बात की जानते हैं कैसे बनाए जाते हैं ये टेस्टी लड्डू।
पनीर के लड्डू बनाने के लिए सामग्री-
-पनीर-300 ग्राम
- नारियल का बुरा -2 चम्मच
- चीनी-1 कप
- इलाइची पाउडर-1/2 चम्मच
- मिल्क पाउडर-1/2 चम्मच
- मेवे-2 चम्मच
- घी-1/2 चम्मच
पनीर के लड्डू बनाने का तरीका-
पनीर के लड्डू बनाने के लिए सबसे पहले आप पनीर को मिक्सर में डालकर दरदरा पीसकर किसी बर्तन में निकल लें। अब किसी दूसरे बर्तन में घी गर्म करके मध्यम आंच पर पनीर को डालकर कुछ देर भूनें। अब इसी भी चीनी और इलाइची पाउडर को भी डालकर अच्छे से मिलाते हुए पनीर के साथ चार से पांच मिनट तक भूनकर गैस बंद कर दें। थोड़ी देर बाद बारीक कटे हुए मेवों के साथ नारियल का बुरादा तैयार मिश्रण में मिक्स करके उसके लड्डू बना लें।
खाना खजाना / शौर्यपथ / शाम की चाय के साथ अकसर कुछ फाई खाने का मन करता है। ऐसे में अगर 10- 15 मिनट में बनने वाला कोई नाश्ता हो तो अलग ही मजे होते हैं। क्योंकि जितनी देर में चाय बनती है उतनी देर में टेस्टी नाश्ता भी तैयार हो जाता है। तो चाय के साथ बनाएं आलू क्रिस्पी बॉल्स।
सामग्री
5 से 6 उबले आलू
2 से 3 चम्मच कॉर्न स्टार्च
3 से 4 हरी मिर्च
2 चम्मच हरा धनिया
पीसी हुई काली मिर्च
नमक स्वादानुसार
तेल
विधि
आलू को मेश करें और उसमें कॉर्न स्टार्च, बारीक कटी हरी मिर्च, पीसी काली मिर्च, नमक मिलाएं और अच्छे से मिक्स करें। मिक्स होने के बाद इसमें हरा धनिया मिलाएं। अब गोल आकार में इसकी बॉल्स बनाएं और गरम तेल में गोल्डन ब्राउन होने तक फ्राई करें। आलू बॉल्स तैयार हैं। इसे घर की बनी धनिया की चटनी या फिर सॉस के साथ गर्म- गर्म सर्व करें।
टिप्स ट्रिक्स /शौर्यपथ / गेंदे का फूलों का इस्तेमाल कई तरह के कार्यों में किया जाता है, पूजा-पाठ में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है, तो गार्डन में भी सजावट के लिए इसे लगाया जाता है। इतना ही नहीं इसका प्रयोग सुंदरता और बालों के लिए भी किया जाता है। लेकिन आज आपको बताने जा रहे हैं
इससे बनने वाली चाय
के बारे में। जी हां, पढ़कर थोड़ा अजीब लगा होगा लेकिन गेंदे के फूलों की चाय भी बनती है जिसके कई सारे फायदे हैं आइए जानते हैं –
1- कैंसर से बचाएं – गेंदे के फूल में मौजूद तत्वों से कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है। गेंदे के फूल में फ्लेवोनोइड्स नामक तत्व मौजूद रहता है। इस तत्व से कोलन कैंसर, ल्यूकेमिया और मेलेनोमा को रोकने का अच्छा स्रोत माना जाता है। गेंदे के फूल की चाय पीने से कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम करने में मदद मिलती है।
2 – दांत दर्द में दे आराम – गेंदे के फूलों की चाय को हल्का ठंडा कर लें और उससे कुल्ला करें। चाय को थोड़ी देर प्रभावित वाले दांत पर रख लें और 15 सेकंड बाद वह पानी थूक दें। ऐसा करने पर दांत दर्द में
आराम मिलेगा। साथ ही अन्य इंफेक्शन से भी बचा जा सकेगा।
3-पीरियड्स में दे आराम – मासिक धर्म के दौरान लड़कियों और महिलाओं को कई तरह की परेशानी होती है। ऐसे में गेंदे के फूल की चाय का सेवन करने से पीरियड्स में आराम मिलता है। गैस्ट्राइटिस, एसिड रिफ्लक्स और अल्सर के इलाज को कम करने में भी मददगार होता है।
4. त्वचा का रखें ख्याल – गेंदे के फूल में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एसपीएफ त्वचा की क्षति को कम कर सकते हैं। ऐसा करने से त्वचा
संबंधित परेशानियों से छुटकारा मिलेगा। नियमित सेवन से चेहरे का ग्लो बढ़ता है।
5. एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर – गेंदे के फूल से बनी चाय पीने से तनाव कम होता है। इसमें ट्राइटरपेंस, फ्लेवोनोइड्स, पॉलीफेनोल्स और कैरोटेनॉइड्स मुख्य रूप से मौजूद होते हैं।
आइए जानते हैं कैसे बनाएं गेंदे के फूल की चाय
सामग्री – 4-5 गेंदे के फूल
2 गिलास पानी
-शहद –(शक्कर का विकल्प)
विधि – सबसे पहले एक पैन में 2 गिलास पानी डालकर उबाल लें।
-पानी उबलने के बाद उसमें गेंदे के फूल डाल दें।
-पानी को 5 मिनट तक धीमी आंच पर उबलने दें जब तक उसका रंग नहीं बदल जाता और पानी आधा नहीं हो जाता ।
-पानी का रंग बदलने के बाद और पानी कम होने के बाद उसे एक कप में छान लें।
-आपकी चाय तैयार है। हालांकि चाय का स्वाद थोड़ा सा कड़वा जरूर लगेगा ऐसे में आप थोड़ा सा शहद मिला सकते हैं।
शिक्षा /शौर्यपथ / ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों में चिरांद एक ऐसी जगह है जहां टीले में हजार वर्ष पुरानी सभ्यता और संस्कृति के अवशेषों का जखीरा दफन है। यह सही है कि नालंदा, गया, वैशाली जैसे जिलों में बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म से जुड़े अनेक ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल हैं जिनकी ख्याति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है और उनमें समृद्ध पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होने की तमाम संभावनाएं मौजूद हैं लेकिन मिथिला, चंपारण, अंग आदि क्षेत्रों में भी ऐसे अनेक प्राचीन स्थल हैं जो नायाब
कलाकृतियों, तंत्र, अध्यात्म और प्राकृतिक सौंदर्य के बेहतर नमूने हैं।
पूर्वोत्तर बिहार में पूर्णिया प्रमंडल मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर धरहरा गांव स्थित सिकुलीगढ़ का भी अपना धार्मिक और पुरातात्विक महत्व है। इसे भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार और राजा हिरण्यकश्यप का वध स्थल माना जाता है। यहां हजारों श्रद्धालु भक्त विष्णु की पूजा करने आते हैं। सिकुलीगढ़ में मौजूद स्तंभ इसके अति प्राचीन होने का प्रमाण है।
वैसे कुछ अंगरेज शासकों और बंगाली इतिहासकारों की मान्यता रही है कि यह सम्राट अशोक के समय का स्तंभ है लेकिन न तो इसका स्वरूप उस समय लगे स्तंभों से मेल खाता है न ही लोगों में ऐसी कोई मान्यता है। यहां धारणा है कि भक्त प्रह्लाद के जीवन की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने इसी स्तंभ से नृसिंह अवतार लिया। गुजरात के पोरबंदर स्थित भारत मंदिर में भी इस स्थल का उल्लेख नृसिंह अवतार के बतौर है।
वह खंभा जिससे नृसिंह अवतार के बाहर निकलने की मान्यता है।
लाल ग्रेनाइट के इस स्तंभ का शीर्ष हिस्सा ध्वस्त है। जमीन की सतह से करीब दस फुट ऊंचा और दस फुट व्यास के इस स्तंभ का अंदरूनी हिस्सा पहले खोखला था। पहले जब श्रद्धालु उसमें पैसे डालते थे तो स्तंभ के भीतर से छप-छप की आवाज आती थी। इससे अनुमान लगाया जाता था कि स्तंभ के निचले हिस्से में जल स्रोत है। बाद में स्तंभ का पेट भर गया। इसके दो कारण हो सकते हैं- एक तो स्थानीय लोगों ने मिट्टी डालकर भर दिया या फिर किसी प्राकृतिक घटना में नीचे का जल स्रोत सूख गया और उसमें रेत भर गई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि 19वीं सदी के अंत में एक अंगरेज पुरातत्वविद यहां आए थे। उन्होंने इस स्तंभ को उखाड़ने का प्रयास किया लेकिन यह हिला तक नहीं। वर्ष 1811 में फ्रांसिस बुकानन ने बिहार-बंगाल गजेटियर में इस स्तंभ का उल्लेख करते हुए लिखा कि इस प्रह्लाद उद्धारक स्तंभ के प्रति हिन्दू धर्मावलंबियों में असीम श्रद्धा है। इसके बाद वर्ष 1903 में पूर्णिया गजेटियर के संपादक जॉन ओ. मेली ने भी प्रह्लाद स्तंभ की चर्चा की। मेली ने यह खुलासा भी किया था कि इस स्तंभ की गहराई का पता नहीं लगाया जा सका है।
बिहार में होली का त्योहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। सिकुलीगढ़ के प्रति राज्य के लोगों की आस्था का यह भी एक बड़ा कारण है। इससे जुड़ी एक मान्यता इस पौराणिक कथा पर आधारित है कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी। अपने भाई के आदेश पर वह भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर धधकती चिता के बीच बैठ गई लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से होलिका जलकर राख हो गई और प्रह्लाद का बाल-बांका नहीं हुआ।
पूर्वी बिहार के सहरसा और पूर्णिया प्रमंडल पर पिछले वर्षों में कोसी के जलप्रलय ने भारी क्षति पहुंचाई। कोसी ने इन दोनों प्रमंडलों के ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों पर भी हमले किए हैं। कई स्थलों का तो नामो-निशान मिटा दिया। सिकुलीगढ़ दीए की तरह टिमटिमाता रहा है।
धर्म संसार / शौर्यपथ / भारतीय राज्य ओड़िसा में सप्तपुरियों में से एक है पुरी जहां पर प्रभु जगन्नाथ का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। इसे चार धामों में एक माना जाता है। इस मंदिर को राजा इंद्रद्युम्न ने हनुमानजी की प्रेरणा से बनवाया था। कहते हैं कि इस मंदिर की रक्षा का दायित्व प्रभु जगन्नाथ ने श्री हनुमानजी को ही सौंप रखा है। यहां के कण कण में हनुमानजी का निवास है। हनुमानजी ने यहां कई तरह के चमत्कार बताए हैं।
इस मंदिर के चारों द्वार के सामने रामदूत हनुमानजी की चौकी है अर्थात मंदिर है। परंतु मुख्य द्वार के सामने जो समुद्र है वहां पर बेड़ी हनुमानजी का वास है। यह कथा बहुत लंबी है कि क्यों हनुमानजी बेड़ी हनुमानी के रूप में यहां स्थापित हुए।
माना जाता है कि 3 बार समुद्र ने जगन्नाथजी के मंदिर को तोड़ दिया था। कहते हैं कि महाप्रभु जगन्नाथ ने वीर मारुति (हनुमानजी) को यहां समुद्र को नियंत्रित करने हेतु नियुक्त किया था, परंतु जब-तब हनुमान भी जगन्नाथ-बलभद्र एवं सुभद्रा के दर्शनों का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे। वे प्रभु के दर्शन के लिए नगर में प्रवेश कर जाते थे, ऐसे में समुद्र भी उनके पीछे नगर में प्रवेश कर जाता था। केसरीनंदन हनुमानजी की इस आदत से परेशान होकर जगन्नाथ महाप्रभु ने हनुमानजी को यहां स्वर्ण बेड़ी से आबद्ध कर दिया।
यहां जगन्नाथपुरी में ही सागर तट पर बेदी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। भक्त लोग बेड़ी में जकड़े हनुमानजी के दर्शन करने के लिए आते हैं।
खाना खजाना / शौर्यपथ / दाल बनाने सभी को आती है लेकिन अगर आप रोजमर्रा की दाल को बंगाली टच देना चाहते हैं, तो हम आपको बता रहे हैं चने की दाल बनाने का बंगाली स्टाइल-
सामग्री :
1/2 कप चना दाल
1/4 टेबलस्पून हल्दी पाउडर
1/2 टीस्पून जीरा
1/2 टीस्पून हींग
1 तेज पत्ता
1 इंच का टुकड़ा दालचीनी
2 लौंग
2 हरी इलायची
1/2 टीस्पून अदरक (कद्दूकस किया हुआ)
1 सूखी लाल मिर्च
1 हरी मिर्च
1 टेबलस्पून तेल
1/2 टीस्पून घी
नमक स्वादानुसार
पानी जरूरत के अनुसार
1/2 टीस्पून चीनी
नारियल (छोटे टुकड़ों में कटा हुआ)
विधि : सबसे पहले एक बर्तन में चने की दाल और पानी डालकर 30 मिनट के लिए पानी रख दें।
अब प्रेशर कुकर में दाल, पानी, हल्दी पाउडर और नमक डालकर 7-8 सीटी लगा लें।
अब मीडियम आंच में पैन में तल गरम करने के लिए रखें।
इसमें जीरा, सूखी लाल मिर्च, दालचीनी, लौंग, इलायची, तेजपत्ता, नारियल के टुकड़े और कद्दूकस किया हुआ अदरक डालकर गोल्डन ब्राउन होने तक भून लें।
अब इन्हें एक प्लेट में निकालकर रख लें।
अब उसी पैन में जीरा, हींग, तेज पत्ता, दालचीनी, लौंग, इलायची, अदरक और सूखी लाल मिर्च डालकर कुछ सेकेंड के लिए चलाते रहें।
अब पकी हुई दाल, हरी मिर्च, नमक और चीनी डालकर 2 मिनट तक उबलने दें।
तय समय बाद गैस बंद कर हरा धनिया डाल दें।
तैयार है बंगाली स्टाइल वाली चने की दाल।
घी डालकर चावल के साथ गरमागरम सर्व करें।
सेहत /शौर्यपथ /सुहानी फुहारों का दौर शुरू हो गया है लेकिन गर्मी के तेवर भी अभी कम नहीं हुए हैं। गर्मी व बारिश का यह मिला-जुला मौसम सेहत के लिहाज से बहुत ही संवेदनशील मौसम है। बार-बार प्यास लगने पर व्यक्ति जहां कुछ भी ठंडा पी लेता है, वहीं इस मौसम में खाद्य पदार्थों को भी खराब होते समय नहीं लगता। फूड पॉइजनिंग का खतरा हमेशा बना रहता है।
ऐसे में अपनी सेहत के प्रति पूरी सावधानी रखनी चाहिए। फूड पॉइजनिंग का सबसे बड़ा लक्षण यह है कि अगर खाना खाने के एक घंटे से 6 घंटे के बीच उल्टियां शुरू हो जाती हैं, तो मान लेना चाहिए कि व्यक्ति को फूड पॉइजनिंग की शिकायत है। इसे तुरंत काबू में करने के लिए डॉक्टर से सलाह लेना चाहिए।
यह मुख्यत: बैक्टीरिया युक्त भोजन करने से होता है। इससे बचाव के लिए कोशिश यही होना चाहिए कि घर में साफ-सफाई से बना हुआ ताजा भोजन ही किया जाए। अगर बाहर का खाना खा रहे हैं तो ध्यान रखें कि खुले में रखे हुए खाद्य पदार्थों तथा एकदम ठंडे और असुरक्षित भोजन का सेवन न करें।
इन दिनों ब्रेड, पाव आदि में जल्दी फंफूद लग जाती है इसलिए इन्हें खरीदते समय या खाते समय इनकी निर्माण तिथि को जरूर देख लें। घर के किचन में भी साफ-सफाई रखें। गंदे बर्तनों का उपयोग न करें। कम एसिड वाला भोजन करें।
निम्न कारणों से फूड पॉइजनिंग का खतरा अधिक होता है...
1 गंदे बर्तनों में खाना खाने से।
2. बासी और फफूंदयुक्त खाना खाने से।
3. अधपका भोजन खाने से बचें।
4. मांसाहार ना करें।
5. फ्रिज में काफी समय तक रखे गए खाद्य पदार्थों के उपयोग से बचें।
बरसाती बुखार के 5 कारण, 6 लक्षण और 7 जरूरी सावधानियां
बारिश का मौसम भले ही सुहाना लगता है, लेकिन बीमारियों के संक्रमण के लिए यही मौसम सबसे माकूल होता है। इस मौसम में सर्दी, जुखाम और बुखार सबसे ज्यादा फैलने वाले रोग हैं। आइए जानते हैं कैसे बचें इस बरसाती बुखार से-
बरसात में बीमारियों से बचने के लिए सबसे पहले इसके कारणों को जानना बेहद जरूरी है। पहले जानते हैं, इस मौसम में बीमारी फैलाने वाले कारणों को -
1 जगह-जगह पानी का भरना और उसमें मच्छरों का पनपना, जो डेंगू और मलेरिया फैलाने में सहायक होते हैं।
2 विषैले जीव जंतुओं, कीट, मच्छर व मक्खियों व्दारा भोज्य पदार्थों और पानी का संक्रमित होना।
3 हवा की गंदगी से संक्रमण फैलना।
4 पित्त का दूषित होना, क्योंकि पित्त से होने वाले रोगों में बुखार सबसे प्रधान होता है।
5 तेज धूप में घूमना और बारिश में ज्यादा भीगना।
अब जानते हैं, इनसे पैदा होने वाले बुखार के लक्षण-
1 सिर व बदन में दर्द होना,
2 पेशाब का रंग लाल होना,
3 बेचैनी महसूस होना,
4 प्यास अधिक लगना,
5 मुंह का स्वाद कड़वा होना, जी मचलाना
6 अमवात या संधिवात के कारण कई बार जोड़ों में दर्द भी हो सकता है।
बुखार होने पर रखें यह सावधानियां-
1 बुखार होने पर रोगी को हवादार कमरे में लेटना चाहिए और जितना हो सके आराम करना चाहिए।
2 बुखार में हल्का और सुपाच्य भोजन करना चाहिए।
3 शरीर से अधिक मेहनत न कराएं।
4 दूध, चाय, मौसंबी का रस ले सकते हैं, तेल-मसालेदार चीजों से दूरी बनाए रखें।
5 यह सभी लक्षण सामने आने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं अथवा घरेलू, आयुर्वेदिक उपचार अवश्य करें।
6 पानी को पहले उबाल कर थोड़ा गुनगुना ही पिएं।
7 मौसम में बदलाव के समय उचित आहार-विहार का पालन करें।
सेहत /शौर्यपथ /सुहानी फुहारों का दौर शुरू हो गया है लेकिन गर्मी के तेवर भी अभी कम नहीं हुए हैं। गर्मी व बारिश का यह मिला-जुला मौसम सेहत के लिहाज से बहुत ही संवेदनशील मौसम है। बार-बार प्यास लगने पर व्यक्ति जहां कुछ भी ठंडा पी लेता है, वहीं इस मौसम में खाद्य पदार्थों को भी खराब होते समय नहीं लगता। फूड पॉइजनिंग का खतरा हमेशा बना रहता है।
ऐसे में अपनी सेहत के प्रति पूरी सावधानी रखनी चाहिए। फूड पॉइजनिंग का सबसे बड़ा लक्षण यह है कि अगर खाना खाने के एक घंटे से 6 घंटे के बीच उल्टियां शुरू हो जाती हैं, तो मान लेना चाहिए कि व्यक्ति को फूड पॉइजनिंग की शिकायत है। इसे तुरंत काबू में करने के लिए डॉक्टर से सलाह लेना चाहिए।
यह मुख्यतः बैक्टीरिया युक्त भोजन करने से होता है। इससे बचाव के लिए कोशिश यही होना चाहिए कि घर में साफ-सफाई से बना हुआ ताजा भोजन ही किया जाए। अगर बाहर का खाना खा रहे हैं तो ध्यान रखें कि खुले में रखे हुए खाद्य पदार्थों तथा एकदम ठंडे और असुरक्षित भोजन का सेवन न करें।
इन दिनों ब्रेड, पाव आदि में जल्दी फंफूद लग जाती है इसलिए इन्हें खरीदते समय या खाते समय इनकी निर्माण तिथि को जरूर देख लें। घर के किचन में भी साफ-सफाई रखें। गंदे बर्तनों का उपयोग न करें। कम एसिड वाला भोजन करें।
निम्न कारणों से फूड पॉइजनिंग का खतरा अधिक होता है...
1 गंदे बर्तनों में खाना खाने से।
2. बासी और फफूंदयुक्त खाना खाने से।
3. अधपका भोजन खाने से बचें।
4. मांसाहार ना करें।
5. फ्रिज में काफी समय तक रखे गए खाद्य पदार्थों के उपयोग से बचें।
बरसाती बुखार के 5 कारण, 6 लक्षण और 7 जरूरी सावधानियां
बारिश का मौसम भले ही सुहाना लगता है, लेकिन बीमारियों के संक्रमण के लिए यही मौसम सबसे माकूल होता है। इस मौसम में सर्दी, जुखाम और बुखार सबसे ज्यादा फैलने वाले रोग हैं। आइए जानते हैं कैसे बचें इस बरसाती बुखार से-
बरसात में बीमारियों से बचने के लिए सबसे पहले इसके कारणों को जानना बेहद जरूरी है। पहले जानते हैं, इस मौसम में बीमारी फैलाने वाले कारणों को -
1 जगह-जगह पानी का भरना और उसमें मच्छरों का पनपना, जो डेंगू और मलेरिया फैलाने में सहायक होते हैं।
2 विषैले जीव जंतुओं, कीट, मच्छर व मक्खियों व्दारा भोज्य पदार्थों और पानी का संक्रमित होना।
3 हवा की गंदगी से संक्रमण फैलना।
4 पित्त का दूषित होना, क्योंकि पित्त से होने वाले रोगों में बुखार सबसे प्रधान होता है।
5 तेज धूप में घूमना और बारिश में ज्यादा भीगना।
अब जानते हैं, इनसे पैदा होने वाले बुखार के लक्षण-
1 सिर व बदन में दर्द होना,
2 पेशाब का रंग लाल होना,
3 बेचैनी महसूस होना,
4 प्यास अधिक लगना,
5 मुंह का स्वाद कड़वा होना, जी मचलाना
6 अमवात या संधिवात के कारण कई बार जोड़ों में दर्द भी हो सकता है।
बुखार होने पर रखें यह सावधानियां-
1 बुखार होने पर रोगी को हवादार कमरे में लेटना चाहिए और जितना हो सके आराम करना चाहिए।
2 बुखार में हल्का और सुपाच्य भोजन करना चाहिए।
3 शरीर से अधिक मेहनत न कराएं।
4 दूध, चाय, मौसंबी का रस ले सकते हैं, तेल-मसालेदार चीजों से दूरी बनाए रखें।
5 यह सभी लक्षण सामने आने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं अथवा घरेलू, आयुर्वेदिक उपचार अवश्य करें।
6 पानी को पहले उबाल कर थोड़ा गुनगुना ही पिएं।
7 मौसम में बदलाव के समय उचित आहार-विहार का पालन करें।
सेहत /शौर्यपथ / वैसे तो सूखे मेवों में किशमिश खाना सभी के लिए फायदेमंद है लेकिन खासतौर से महिलाओं के लिए इसे खाना किसी वरदान से कम नहीं है। आइए, आपको बताएं किशमिश खाने से मिलने वाले 7 अनमोल लाभ -
1 आयरन की मात्रा से भरपूर किशमिश महिलाओं के लिए बेहद फायदेमंद है। खास तौर से महिलाओं में अक्सर आयरन की कमी पाई जाती है। ऐसे में किशमिश का सेवन शरीर में आयरन की आपूर्ति के लिए बेहतरीन विकल्प है।
2 अत्यधिक मात्रा में फाइबर से भरपूर किशमिश, पाचन संबंधी समस्याओं का समाधान भी है। अगर आपको कब्जियत की समस्या है, तो किशमिश का प्रयोग आपके लिए बेहद फायदेमंद है।
3 किशमिश का सेवन कैंसर जैसी बीमारियों से बचाने में सहायक है। यह फ्री रेडिकल से बचाकर कैंसर की कोशिकाओं की वृद्धि को रोकने में सक्षम है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
4 आंखों की समस्याएं आजकल आम बात है, लेकिन किशमिश के पास इसका इलाज है। इसमें मौजूद विटामिन ए, बीटा कैरोटीन, ए-कैरोटीनॉइड और एंटीऑक्सीडेंट आंखों की मांशपेशियों को कमजोर होने से बचाते हैं, साथ ही आंखों की सभी समस्याओं से निजात दिलाते हैं।
5 किशमिश में प्राकृतिक शर्करा भरपूर मात्रा में पाई जाती है जो आपके शरीर में ऊर्जा का संचार करने के साथ ही वजन बढ़ाने में भी मददगार है। कमजोर लोगों के लिए किशमिश का सेवन फायदेमंद है।
6 किशमिश का ही एक प्रकार है मुनक्का, जिसका प्रयोग भूख न लगने पर बेहद फायदेमंद है। अगर आपको भूख नहीं लगती, तो आप मुनक्का को भूनकर उसमें काली मिर्च और सेंधा नमक मिलाकर खाएं। ऐसा करने से आपकी भूख बढ़ जाएगी।
7 किशमिश का नियमित सेवन बच्चों का दिमाग तेज करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें भरपूर मात्रा में बोरान पाया जाता है जो दिमाग के लिए बेहद फायदेमंद होता है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
